बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
पृष्ठ 22, कुल 122 में से
संदर्भ में पढ़ेंपीनवल्गुस्तनी काचिद्धासाघूर्णितकुण्डला ।
उच्चैरवजहासैनं समामोतु भवानिति ॥४.३९
परिपूर्ण एवं सुन्दर स्तनोंवाली किसी ने, जिसके कुण्डल उसकी हँसी से हिल रहे थे, “आप समाप्त करें,”
यह कहते हुए, जोरों से उसका उपहास किया ॥39 ॥
अपयान्तं तथैवान्या बबन्धुर्माल्यादामभिः ।
काश्चित्साक्षेपमधुरैर्जगृहुर्वचनाङ्कुशैः ॥४.४०
उसी प्रकार दूसरी ने (बाहों से) हटते हुए (कुमार) को मालाओं की डोरियों से बाँधा; किन्हीं ने आक्षेप-
युक्त मधुर वचनरूप अङ्कुशों से उसे रोका ॥40 ॥
प्रतियोगार्थिनी काचिद्गृहीत्वा चूतवल्लरीम् ।
इदं पुष्पं तु कस्येति पप्रच्छ मदविक्लवा ॥४.४१
प्रतियोग (= विरोध) चाहनेवाली किसी ने आम की मञ्जरी लेकर मद से विह्वल होते हुए पूछा- “यह फूल
किसका है?” ॥41 ॥
काचित्पुरुषवत्कृत्वा गतिं संस्थानमेव च ।
उवाचैनं जितः स्त्रीभिर्जय भो पृथिवीमिमाम् ॥४.४२
किसी ने पुरुष के समान गति और आकृति बनाकर उसे कहा- “तुम स्त्रियों द्वारा जीते गये, अब इस
पृथिवी को जीतो” ॥42 ॥
अथ लोलेक्षणा काचिज्जिघ्रन्ती नीलमुत्पलम् ।
किञ्चिन्मदकलैर्वाक्यैर्नृपात्मजमभाषत ॥४.४३
तब नीले कमल को सूँघती हुई किसी चञ्चलाक्षी ने मद से कुछ-कुछ अस्फुट वचनों में राजकुमार से
कहा- ॥43 ॥
पश्य भर्तःश्रितं चूतं कुसुमौर्मधुगन्धिभिः ।
हेमपञ्जररुद्धो वा कोकिलो यत्र कूजति ॥४.४४
“स्वामिन्, मधु-गन्ध-युक्त फूलों से भरे आम को देखिये, जहाँ कोकिल इस प्रकार (निश्चल होकर) कूज
रहा है, जैसे सोने के पिजड़े में बन्द हो ॥44 ॥
अशोको दृश्यतामेष कामिशोकविवर्धनः ।
रुवन्ति भ्रमरा यत्र दह्यमाना इवाग्निना ॥४.४५
कामियों का शोक बढ़ानेवाले इस अशोक को देखिये, जहाँ भौंरे इस तरह गूँज रहे हैं, जैसे आग से जल
रहे हों ॥45 ॥
चूतयष्ट्या समाश्लिष्टो दृश्यतां तिलकद्रुमः ।
शुक्लवासा इव नरः स्त्रिया पीताङ्गरागया ॥४.४६
आम की शाखा से आलिङ्गित होते तिलक-वृक्ष को देखिये, जैसे श्वेतवस्त्रधारी पुरुष पीत अङ्ग-रागवाली स्त्री
से आलिङ्गित हो रहा हो ॥46 ॥
फुल्लं कुरुबकं पश्य निर्भुक्ताक्तकप्रभम् ।
यो नखप्रभया स्त्रीणां निर्भर्त्सित इवानतः ॥४.४७
निचोड़े हुए अलक्तक (= लाख) के समान प्रभावान् कुसुमित कुरुबक को देखिये, जो स्त्रियों को नख-प्रभा
से मानो खूब फटकारा जाकर झुक गया है ॥47 ॥
बालाशोकश्च निचतो दृश्यतामेष पल्लवैः ।
योऽस्माकं हस्तशोभाभिर्लज्जमान इव स्थितः ॥४.४८
पल्लवों से भरे इस बाल अशोक को देखिये, जो हमारे हाथों की शोभा से मानो लजाता हुआ खड़ा
है ॥48 ॥
दीर्घिकां प्रावृतां पश्य तीरजैः सिन्दुवारकैः ।
पाण्डुरांशुकसंवीतां शयानां प्रमदामिव ॥४.४९
तीर पर उत्पन्न होनेवाले सिन्दुवारों से आच्छादित दीर्घिका (जलाशय) को देखिये, जो श्वेत वस्त्र से ढंकी
सो रही प्रमदा के समान है ॥49 ॥
दृश्यतां स्त्रीषु माहात्म्यं चक्रवाको ह्यसौ जले ।
पृष्ठतः प्रेष्यवद्भार्यामनुवर्त्यनुगच्छति ॥४.५०
स्त्रियों का माहात्म्य तो देखिये; वह आज्ञाकारी चक्रवाक जल में अपनी पत्नी के पीछे-पीछे नौकर के
समान जा रहा है ॥50 ॥
मत्तस्य परपुष्टस्य रुवतः श्रूयतां ध्वनिः ।
अपरः कोकिलोऽन्वक्षं प्रतिश्रुत्केव कूजति ॥४.५१
मत्त होकर कूकते कोकिल की ध्वनि सुनिये; दूसरा कोकिल पीछे की ओर प्रतिध्वनि के समान कूब रहा
है ॥51 ॥
अपि नाम विहङ्गानां वसन्तेनाहतो मदः ।
न तु चिन्तयतोऽचिन्त्यं जनस्य प्राज्ञमानिनः ॥४.५२
क्या वसन्त पक्षियों को मद ला सकता है और अचिन्त्य की चिन्ता करनेवाले प्राज्ञ एवं मानी मनुष्य को
नहीं?” ॥52 ॥
इत्येवं ता युवतयो मन्मथोद्दामचेतसः ।
कुमारं विविधैस्तैस्तैरुपचक्रमिरे नयैः ॥४.५३
इस प्रकार काम से उच्छृङ्खल चित्तवाली उन युवतियों ने उन-उन विविध नीतियों से कुमार को (आकृष्ट
करने का) उपक्रम किया ॥53 ॥
22 अश्वघोष