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सर्वकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 122 में से

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पृष्ठ 23

एवमाक्षिप्यमाणोऽपि स तु धैर्यावृतेन्द्रियः ।
मर्तव्यमिति सोद्वेगो न जहर्ष न विव्यथे ॥४.५४
इस प्रकार आकृष्ट किया जानेपर भी, वह धीर-इन्द्रियवाला (= जितेन्द्रिय) “मरना पड़ेगा” इस (विचार) से
उद्वेग-युक्त होकर न आनन्दित हुआ और न व्यथित ॥५४ ॥
तासां तत्त्वेऽनवस्थानं दृष्ट्वा स पुरुषोत्तमः ।
ससं विघ्नेन धीरेण चिन्तयामास चेतसा ॥४.५५
तत्त्व में उसकी स्थिरता न देखकर उस पुरुषोत्तम ने एक ही साथ संविग्न व धीर चित्त से सोचा:- ॥५५ ॥
किं विमा नावगच्छन्ति चपलं यौवनं स्त्रियः ।
यतो रूपेण सम्पत्तं जरा यन्नाशयिष्यति ॥४.५६
“क्या ये स्त्रियाँ यौवन का क्षणिक नही समझ रही हैं? ये उन्मत्त हैं अपने रूप से, जिसे जरा नष्ट कर
देगी ॥५६ ॥
नूनमेता न पश्यन्ति कस्यचिद्रोगसम्पप्लवम् ।
तथा हृष्टा भयं त्यक्त्वा जगति व्याधिधर्मिणि ॥४.५७
निश्चय ही यह किसी को रोग से आक्रान्त नही देखती हैं; (इसलिए) व्याधि-धर्मा जगत् में भय छोड़कर ये
इस प्रकार आनन्दित हैं ॥५७ ॥^२९
अनभिज्ञाश्च सुव्यक्तं मृत्योः सर्वापहारिणः ।
ततः स्वस्था निरुद्विग्नाः क्रीडन्ति च हसन्ति च ॥४.५८
स्पष्ट ही सबको दूर ले जानेवाली मृत्यु से अनभिज्ञ हैं; इसीलिए स्वस्थ और और उद्वेग-रहित होकर ये
खेलती व हँसती हैं ॥५८ ॥
जरां व्याधिं च मृत्युं च को हि जानन्सचेतनः ।
स्वस्थस्तिष्ठेन्निषीदेद्वा शयेद्वा किं पुनर्हसेत् ॥४.५९
जरा, व्याधि व मृत्यु को जानता हुआ कौन बुद्धिमान् स्वस्थ होकर खड़ा हो या बैठे या सोये, फिर हँसे ही
क्यों? ॥५९ ॥
यस्तु दृष्ट्वा परं जीर्णं व्याधितं मृतमेव च ।
स्वस्थो भवति नोद्विग्नो यथाचेतास्तथैव सः ॥४.६०
जो दूसरे को वृद्ध, रोगी या मृत देखकर स्वस्थ रहता है, उद्विग्न नही होता, वह वैसा ही है जैसा कि
अचेतन ॥६० ॥
वियुज्यमाने हि तरौ पुष्पैर्अपि फलैरपि ।
पतति च्छिद्यमाने वा तरुरन्यो न शोचते ॥४.६१
क्योंकि फूलों और फलों से अलग होकर अब (एक) वृक्ष गिरता है या काटा जाता है, तब दूसरा वृक्ष
शोक नही करता है” ॥६१ ॥
इति ध्यानपरं दृष्ट्वा विषयेभ्यो गतस्पृहम् ।
उदायी नीतिशास्त्रज्ञस्तमुवाच सुहृत्तया ॥४.६२
इस प्रकार उसे ध्यानमग्न और निरभिलाप देखकर नीति-शास्त्रज्ञ उदायी ने मित्रता से कहा:- ॥६२ ॥
अहं नृपतिना दत्तः सखा तुभ्यं क्षमः किल ।
यस्मात्त्वयि विवक्षा मे तया प्रणयवत्तया ॥४.६३
“मैं राजा के द्वारा नियुक्त किया गया तुम्हारा योग्य मित्र हूँ, इसलिए प्रेमपूर्वक मैं तुम्हें (कुछ) कहना
चाहता हूँ ॥६३ ॥
अहितात्प्रतिषेधश्च हिते चानुप्रवर्तनम् ।
व्यसने चापरित्यागस्त्रिविधं मित्रलक्षणम् ॥४.६४
अहित से रोकना, हित में लगाना और विपत्ति में नही छोड़ना—मित्र के (ये) तीन लक्षण हैं ॥६४ ॥
सोऽहं मैत्रीं प्रतिज्ञाय पुरुषार्थात्पराङ्मुखम् ।
यदि त्वां समुपेक्षेय न भवेन्मित्रता मयि ॥४.६५
मैत्री की प्रतिज्ञाकर, पुरुषार्थ (=पुरुष के काम) से विमुख हो, यदि मैं तुम्हारी उपेक्षा करूँ, तो मुझमें
मित्रता नही होगी ॥६५ ॥
तद्ब्रवीमि सुहृद्भूत्वा तरुणस्य वपुष्मतः ।
इदं न प्रतिरूपं ते स्त्रीष्वदाक्षिण्यमीदृशम् ॥४.६६
इसलिए मित्र होकर मैं कहता हूँ कि स्त्रियों के प्रति उदारता का यह ऐसा अभाव तुझ सुन्दर तरुण के
अनुरूप नही है ॥६६ ॥
अनृतेनापि नारीणां युक्तं समनुवर्तनम् ।
तद्व्रीडापरिहारार्थमात्मरत्यर्थमेव च ॥४.६७
स्त्रियों के लज्जा-परित्याग तथा अपने आनन्द के लिए असत्यता से भी उनके अनुकूल आचरण करना
उचित है ॥६७ ॥
सन्नतिश्चानुवृत्तिश्च स्त्रीणां हृदयबन्धनम् ।
स्नेहस्य हि गुणा योनिर्मानकामाश्च योषितः ॥४.६८
नम्रता व अनुकूल आचरण स्त्रियों के हृदय के लिए बन्धन हैं; क्योंकि सद्गुण ही स्नेह का उत्पत्ति-स्थान है
और स्त्रियाँ सम्मान चाहती हैं ॥६८ ॥
तदर्हसि विशालाक्ष हृदयेऽपि पराङ्मुखे ।
रूपस्यानुरूपेण दाक्षिण्येनानुवर्तितुम् ॥४.६९


^२९- व्याधिधर्मा = व्याधि जिसका धर्म अर्थात् स्वभाव है ।

बुद्धचरित 23