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सर्वकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 122 में से

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पृष्ठ 13

वह अधीर व्यक्ति के समान काम-सुख में आसक्त नहीं हुआ, उसने मातृ-वर्ग (स्त्रियों) से अनुचित अनुराग
नहीं किया (या स्त्रियों के प्रति अत्यधिक क्रोध नहीं किया) धैर्यपूर्वक इन्द्रियरूप चपल घोड़ों का दमन
किया और अपने गुणों से बन्धुओं एवं पुरवासियों को जीता ॥३४ ॥
नाध्यैष्ट दुःखाय परस्य विद्यां ज्ञानं शिवं यत्तु तदध्यगीष्ट ।
स्वाभ्यः प्रजाभ्यो हि यथा तथैव सर्वप्रजाभ्यः शिवमशशंसे ॥२.३५
उसने दूसरे के दुःख के लिए (तन्त्र मन्त्र) विद्या नहीं सीखी, किन्तु जो कल्याण-कारी ज्ञान है उसे
अध्ययन किया; क्योंकि जैसे अपनी प्रजाओं के लिए वैसे ही सब प्रजाओं के लिए उसने कल्याण-कामना
की ॥३५ ॥
भं भासुरं चाङ्गिरसाधिदेवं यथावदार्च तदायुषे सः।
जुहाव हव्यान्यकृशे कृशानौ ददौ द्विजेभ्यः कृशनं च गाश्च ॥२.३६
उसकी आयु के लिए उसने उज्ज्वल ग्रह-मण्डल की, जिसका अधिदेव बृहस्पति है, यथोचित्त पूजा की,
विशाल अग्नि में हवन किया तथा द्विजों को सोना और गाएँ दीं ॥३६ ॥
स्रक्षौ शरीरं पवितुं मनश्च तीर्थाम्बुमिश्रैश्च गुणाम्बुमिश्रैः ।
वेदोपदिष्टं सममात्मजं च सोमं पपौ शान्तिसुखं च हार्दम् ॥२.३७
शरीर को पवित्र करने के लिए तीर्थ के जल से और मन को पवित्र करने के लिए गुणरूप जल से स्नान
किया, वेदविहित सोम (-रस) पिया और साथ ही अपने से ही उत्पन्न हार्दिक शान्ति-सुख की रक्षा
की ॥३७ ॥$^{18}$
सान्त्वं बभाषे न च नार्थवद्यज्जजल्प तत्त्वं न च विप्रियं यत्।
सान्त्वं ह्यतत्त्वं परुषं च तत्त्वं हियाशकन्नात्मन एव वक्तुम् ॥२.३८
उसने प्रिय कहा और व्यर्थ नहीं; सत्य कहा और अप्रिय नहीं; क्योंकि प्रिय असत्य और कठोर सत्य वह
लाज से अपने को भी न कह सका ॥३८ ॥
इष्टेष्वनिष्टेषु च कार्यवत्सु न रागदोषाश्रयतां प्रपेदे ।
शिवं सिषेवे व्यवहारशुद्धं यज्ञं हि मेने न तथा यथा तत् ॥२.३९
कार्यवालों के प्रति, वे इष्ट हों या अनिष्ट उसने अनुराग या द्वेष नहीं किया; कल्याणकारी शुद्ध विवाद
निर्णय का सेवन किया, यज्ञ को वैसा नहीं माना जैसा कि उसे अर्थात् न्याय की पवित्रता को ॥३९ ॥
आशावते चाभिगताय सद्यो देयाम्बुभिस्तर्षमचेच्छिदिष्ट ।
युद्धाहते वृत्तपरश्वधेन द्विद्दर्पमुद्धत्तमबेभिदिष्ट ॥२.४०
आगत आशावान् व्यक्ति की प्यास को दानरूप जल से सद्यः काटा और युद्ध के बिना ही सदाचाररूप
कुठार से शत्रु के असंयत अभिमान को भेदा ॥४० ॥
एकं विनिन्ये स जुगोप सप्त सप्तैव तत्याज ररक्ष पञ्च ।
प्राप त्रिवर्गं बुबुधे त्रिवर्गं जज्ञे द्विवर्गं प्रजहौ द्विवर्गम् ॥२.४१
उसने एक (अपने) को विनीत किया, सात (= राज्य के सात अङ्गों) की रक्षा की, सात (= राजाओं के
सात दोषों) का त्याग किया, पाँच (= पाँच उपायों) की रक्षा की, त्रिवर्ग (= अर्थ-धर्म-काम) को पाया,
त्रिवर्ग (= शत्रु-मित्र-मध्यस्थ) को समझा, द्विवर्ग (= नीति-अनीति) को जाना, और द्विवर्ग (= काम-क्रोध)
को छोड़ा ॥४१ ॥$^{19}$
कृतागसोऽपि प्रतिपाद्य वध्याञ्ज्ञाजीघनन्नापि रुषा ददर्श ।
बबन्ध सान्त्वेन फलेन चैतांस्त्यागोऽपि तेषां ह्यनपाय दृष्टः ॥२.४२
अपराधियों को वध्य प्रतिपादित करके भी नहीं मरवाया, क्रोध से भी नही देखा। उन्हें प्रिय फल से युक्त
किया (= हल्का दण्ड दिया); क्योंकि उन्हें छोड़ने में भी अनीति देखी ॥४२ ॥
आर्षान्यचारीत्परमव्रतानि वैराण्युहासीच्चिरसम्भृतानि ।
यशांसि चापद्गुणगन्धवन्ति रजांस्यहासीन्मलिनीकराणि ॥२.४३
ऋषियों के कठोर व्रतों का आचरण किया, चिर-पोषित शत्रुता छोड़ी, अपने गुणों से सुगन्धित यश पाया,
(मन) मलिन करनेवाली (काम की) धूल झाड़ी ॥४३ ॥
न चाजिहीर्षीद्बलिमप्रवृत्तं न चाचिकीर्षीत्परवस्त्वभिध्याम् ।
न चाविवक्षीद्विषतामधर्मं न चादिधक्षीद्धृदयेन मन्युम् ॥२.४४
उसने (प्रजाओं से) अप्रवृत्त (= अनुचित, अप्रस्तुत) कर लेने की इच्छा नहीं की, पर-वस्तु हरण करना
नही चाहा, शत्रुओं का अधर्म प्रकट करना नही चाहा और हृदय में क्रोध रखना नही चाहा ॥४४ ॥
तस्मिंस्तथा भूमिपतौ प्रवृत्ते भृत्याश्च पौराश्च तथैव चेरुः ।
शमात्मके चेतसि विप्रसन्ने प्रयुक्तयोगस्य यथेन्द्रियाणि ॥२.४५
उस राजा की प्रवृत्ति वैसी होनेपर, भृत्यों और पुरवासियों ने वैसा ही आचरण किया; जिस प्रकार योगारूढ
व्यक्ति का चित्त शान्त और प्रसन्न (= निर्मल) होनेपर, उसके इन्द्रिय भी (वैसे ही शान्त और निर्मल हो
जाते हैं) ॥४५ ॥
काले ततश्चारुपयोधरायां यशोधरायां स्वयशोधरायाम् ।
शौद्धोदने राहुसपत्नवक्त्रो जज्ञे सुतो राहुल एव नाम्ना ॥२.४६
$^{18}$_ "आत्मजं च" की जगह "आत्मजेन" पढ़ें, तो उत्तरार्ध का अर्थ यों होगा— "आत्मज के साथ वेद-विहित
सोम (-रस) पिया और हार्दिक शान्ति-सुख की रक्षा की।"
$^{19}$_ पाँच उपाय, देखिये—सौ० पन्द्रह 61 ।
बुद्धचरित 13