बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरस्पर उत्पीड़ित होती हुई वे इकट्ठी हुईं, एक दूसरे की रगड़ से उनके कुण्डल चञ्चल हुए, उनके गहने
बज रहे थे। अतः उस समय खिड़कियों पर अशान्ति हुई ॥18 ॥
वातायनेभ्यस्तु विनिःसृतानि परस्परायासितकुण्डलानि ।
स्त्रीणां विरेजुर्मुखपङ्कजानि सक्तानि हर्म्येष्विव पङ्कजानि ॥३.१९
खिड़कियों से निकले हुए स्त्रियों के मुख-कमल, जो एक-दूसरें के कुण्डल संक्षुब्ध कर रहे थे, ऐसे शोभित
हुए जैसे महलों में कमल लगे हों ॥19 ॥
ततो विमानैर्युवतीकरालैः कौतूहलोद्घाटितवातयानैः ।
श्रीमत्समन्तान्नगरं बभासे वियद्विमानैरिव साप्सरोभिः ॥३.२०
तब उन विमानों (महलों) से, युवतियों से दन्तुर लगते थे (अर्थात् दाँत निकालकर हँस रह थे) और
कौतूहल से जिनके झरोखे खोल दिये गये थे, वह श्री-सम्पन्न नगर चारों ओर इस प्रकार भासित हुआ
जिस प्रकार अप्सरा-युक्त देव-प्रासादों से स्वर्ग ॥20 ॥
वातायनानामविशालभावादन्योन्यगण्डार्पितकुण्डलानाम् ।
मुखानि रेजुः प्रमदोत्तमानां बद्धाः कलापा इव पङ्कजानाम् ॥३.२१
खिड़कियाँ बड़ी-बड़ी नही होने के कारण जो उत्तम प्रमदाएँ एक दूसरें के गालों पर अपने कुण्डल रक्खे
हुई थीं, उनके मुख ऐसे विराजे, जैसे कमलों के बँधे हुए गुच्छे हों ॥21 ॥
तं ताः कुमारं पथि वीक्षमाणाः स्त्रियो बभुर्गामिव गन्तुकामाः ।
ऊर्ध्वोन्मुखाश्चैनमुदीक्षमाणा नरा बभुर्द्यामिव गन्तुकामाः ॥३.२२
उस कुमार को मार्ग में जाते देखकर स्त्रियों ने मानो (महलों से) पृथ्वी पर आने की कामना की और
ऊपर मुख उठाकर उसे देखते हुए पुरुषों ने मानो आकाश में जाने की कामना की ॥22 ॥
दृष्ट्वा च तं राजसुतं स्त्रियस्ता जाज्वल्यमानं वपुषा श्रिया च ।
धन्यास्य भार्येति शनैरवोचञ्छुद्वैर्मनोभिः खलु नान्यभावात् ॥३.२३
सौन्दर्य और विभूति से चमकते हुए राजा के उस पुत्र को देखकर स्त्रियों ने शुद्ध मन से, निश्चय ही अन्य
भाव से नही, धीरे-धीरे कहा- “धन्य है इसकी भार्या" ॥23 ॥
अयं किल व्यायतपीनबाहु रूपेण साक्षादिव पुष्पकेतुः ।
त्यक्त्वा श्रियं धर्ममुपैष्यतीति तस्मिन् हि ता गौरवमेव चक्रुः ॥३.२४
लम्बी और मोटी बाहुवाला यह कुमार, जो रूप में साक्षात् पुष्पकेतु (कामदेव) के समान है, लक्ष्मी को
छोड़कर धर्म के समीप जायगा - इस प्रकार उन्होंने उसका गौरव ही किया ॥24 ॥
कीर्णं तथा राजपथं कुमारः पौरैर्विनीतैः शुचिधीरवेषैः ।
तत्पूर्वमालोक्य जहर्ष किञ्चिन्मेने पुनर्भावमिवात्मनश्च ॥३.२५
शुचि और धीर वेषवाले विनीत पुर-वासियों से उस प्रकार भरे हुए राज-पथ को पहले पहल देखकर, वह
प्रसन्न हुआ और उसने अपना कुछ पुनर्जन्म सा माना ॥25 ॥
पुरं तु तत्स्वर्गमिव प्रहृष्टं शुद्धाधिवासाः समवेक्ष्य देवाः ।
जीर्णं नरं निर्ममिरे प्रयातुं सञ्चोदनार्थं क्षितिपात्मजस्य ॥३.२६
उस नगर को स्वर्ग के समान प्रसन्न देखकर, शुद्धाधिवास देवों ने एक वृद्ध पुरुष को बनाया कि वह राजा
के पुत्र को (घर से वन को) प्रयाण करने के लिए प्रेरित करे ॥26 ॥
ततः कुमारो जरयाभिभूतं दृष्ट्वा नरेभ्यः पृथगाकृतिं तम् ।
उवाच सङ्गाहकमागतास्थस्तत्रैव निष्कम्पनिविष्टदृष्टिः ॥३.२७
तब कुमार ने जरा (= वृद्धावस्था) से अभिभूत उस पुरुष को जिसकी आकृति (अन्य) पुरुषों से पृथक् थी,
देखा और उसी को निर्निमेष दृष्टि से देखते हुए ध्यान में आकर उसने सारथि से कहाः- ॥27 ॥
क एष भोः सूत नरोऽभ्युपेतः केशैः सितैर्यष्टिविषक्तहस्तः ।
भ्रूसंवृताक्षः शिथिलावनाङ्गः किं विक्रियैषा प्रकृतिर्यदृच्छा ॥३.२८
“हे सारथि, यह कौन पुरुष आया? इसके केश सफेद हैं, हाथ में लाठी है, भौंहों से आँखें ढकी हैं, अङ्ग
ढीले व झुके हैं। क्या यह विकार है? या स्वभाव? या संयोग?” ॥28 ॥
इत्येवमुक्तः स रथप्रणेता निवेदयामास नृपात्मजाय ।
संरक्ष्यमप्यर्थमदोषदर्शी तैरेव देवैः कृतबुद्धिमोहः ॥३.२९
ऐसा कहे जानेपर उस सारथि ने राजा के पुत्र से गोपनीय बात भी निवेदन कर दी, इसमें अपना दोष नही
देखा, उन्हीं देवों ने उसका बुद्धि-मोह जो कर दिया था ॥29 ॥
रूपस्य हन्त्री व्यसनं बलस्य शोकस्य योनिर्निधनं रतीनाम् ।
नाशः स्मृतीनां रिपुरिन्द्रियाणामेषा जरा नाम ययैष भग्नः ॥३.३०
“रूप की हत्या करनेवाली, बल की विपत्ति, शोक की उत्पत्ति (-भूमि) आनन्द की मृत्यु, स्मृति का नाश
करनेवाली, इन्द्रियों का शत्रु यह जरा है, जिसने इसे भग्न कर दिया है ॥30 ॥
पीतं ह्यनेनापि पयः शिशुत्वे कालेन भूयः परिसृप्तमुर्व्याम् ।
क्रमेण भूत्वा च युवा वपुष्मान् क्रमेण तेनैव जरामुपेतः ॥३.३१
बचपन में इसने भी दूध पिया, फिर काल-क्रम से पृथिवी पर पेट के बल चला, क्रम से सुन्दर युवक
हुआ, और उसी क्रम से जरा को प्राप्त हुआ है" ॥31 ॥
इत्येवमुक्ते चलितः स किञ्चिद्राजात्मजः सूतमिदं बभाषे ।
किमेष दोषो भविता ममापीत्यस्मै ततः सारथिरभ्युवाच ॥३.३२
ऐसा कहे जानेपर कुछ विचलित होकर उस राजात्मज ने सारथि से कहा- "क्या यह दोष मुझे भी
होगा?” तब सारथि ने उसे कहाः- ॥32 ॥
आयुष्मतोऽप्येष वयःप्रकर्षो निःसंशयं कालवशेन भावी ।
एवं जरां रूपविनाशयित्रीं जानाति चैवेच्छति चैव लोकः ॥३.३३
16 अश्वघोष