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सर्वकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 122 में से

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पृष्ठ 15

तब पुत्र-नामक उस मनोरथ का विचार सुनकर, राजा से स्नेह, लक्ष्मी और वयस के योग्य विहार-यात्रा की
आज्ञा दी ॥३॥
निवर्तयामास च राजमार्गे सम्पातमार्तस्य पृथग्जनस्य ।
मा भूत्कुमारः सुकुमारचित्तः संविग्नचेता इति मन्यमानः ॥३.४
और, राजमार्ग पर आर्त जनता का निकलना रोक दिया गया, यह सोचते हुए कि सुकुमार मनवाले कुमार
के चित्त में कहीं संवेग न हो जाय ॥४॥
प्रत्यङ्गहीनान्विकलेंद्रियांश्च जीर्णातुरान्दीन् कृपणांश्च दिक्षु ।
ततः समुत्सार्य परेण साम्ना शोभां परा राजपंथस्य चक्रुः ॥३.५
अङ्ग-हीनों, विकलेन्द्रियों, वृद्धों, आतुर आदि लोगों तथा बेचारों को सब ओर परम शान्ति से हटा कर, उन
(राज-पुरुषों) ने राज-पथ की परम शोभा की ॥५॥
ततः कृते श्रीमति राजमार्गे श्रीमान्विनीतानुचरः कुमारः ।
प्रासादपृष्ठादवतीर्य काले कृताभ्यनुज्ञो नृपमभ्यगच्छत् ॥३.६
तब राज मार्ग शोभा-युक्त किया जानेपर, आज्ञा पाकर, श्रीमान् कुमार विनीत अनुचरों के साथ प्रासाद पर
से समय पर नीचे उतरा और राजा के समीप गया ॥६॥
अथो नरेन्द्रः सुतमागताश्रुः शिरस्युपाघ्राय चिरं निरीक्ष्य ।
गच्छेति चाज्ञापयति स्म वाचा स्नेहान्न चैनं मनसा मुमोच ॥३.७
तब राजा ने, जिसे आँसू आ गये थे, पुत्र के शिर को सूंघकर उसे देर तक देखा और “जाओ” कहते हुए
आज्ञा दी, किन्तु स्नेह-वश उसे मन से नही छोड़ा ॥७॥
ततः स जाम्बूनदभाण्डभृद्भिर्युक्तं चतुर्भिर्निवृतैस्तुरङ्गैः ।
अक्लीबविद्वच्छुचिरश्मिधारं हिरण्मयं स्यन्दनमारुरोह ॥३.८
तब वह सुवर्ण आभरण धारण करनेवाले चार शिक्षित तुरंगों से युक्त सुवर्ण-रथ पर सवार हुआ, जिसका
सारथि बलवान्, विद्वान् और पवित्र था ॥८॥
ततः प्रकीर्णोज्ज्वलपुष्पजालं विषक्तमाल्यं प्रचलत्पताकम् ।
मार्गं प्रपेदे सदशानुयात्रश्चन्द्रः सनक्षत्र इवान्तरीक्षम् ॥३.९
तब जिस मार्ग पर उजले फूल बिखरे हुए थे, मालाएँ लटक रही थीं, और पताकाएं फहरा रही थीं उसपर
वह योग्य अनुचरों के साथ आया, जैसे आकाश में नक्षत्रों के साथ चन्द्रमा (आवे) ॥९॥
कौतूहलात्स्फीततरैश्च नेत्रैर्नीलोत्पलार्धैरिव कीर्यमाणम् ।
शनैः शनै राजपंथ जगाहे पौरैः समन्तादभिवीक्ष्यमाणः ॥३.१०
कौतूहल से अति विकसित आँखें, जो आधे-आधे नीले कमलों के समान थीं, जिस राज-पथ पर बिखर
रही थीं उसपर चारों ओर पुरवासियों द्वारा देखे जाते हुए उसने धीरे-धीरे प्रवेश किया ॥१०॥


तं तुष्टुवुः सौम्यगुणेन केचिद्ववन्दिरे दीप्ततया तथान्ये ।
सौमुख्यतस्तु श्रियमस्य केचिद्वैपुल्यमाशंसिषुरायुरश्च ॥३.११
कतिपयों ने उनके सौम्य-गुण के लिए उसकी स्तुति की तथा दूसरों ने दीप्ति के लिए उसकी वन्दना की;
किन्तु उसकी अनुकूलता के कारण कतिपयों ने उसके लिए लक्ष्मी और दीर्घायु कामना की ॥११॥
निःसृत्य कुब्जाश्च महाकुलेभ्यो व्यूहाश्च कैरातकवामनानाम् ।
नार्यः कृशेभ्यश्च निवेशनेभ्यो देवानुयानध्वजवतप्रणेमुः ॥३.१२
बड़े-बड़े कुलों के झुण्ड-के-झुण्ड कुबड़े किरात व वामन तथा छोटे-छोटे घरों से स्त्रियाँ निकल आईं। उन
सबने उसे वैसे ही प्रणाम किया, जैसे (इन्द्र-) देव की ध्वजा को ॥१२॥
ततः कुमारः खलु गच्छतीति श्रुत्वा स्त्रियः प्रेष्यजनात्प्रवृत्तुम् ।
दिदृक्षया हर्म्यतलानि जग्मुर्जनेन मान्येन कृताभ्यनुज्ञाः ॥३.१३
तब “कुमार जा रहा है” यह समाचार नौकरों से सुनकर स्त्रियों गुरु-जन से आज्ञा पाकर, उसे देखने की
इच्छा से प्रासाद-तल पर गईं ॥१३॥
ताः त्रस्तकाञ्चीगुणविघ्निताश्च सुप्तप्रबुद्धाकुललोचनाश्च ।
वृत्तान्तविन्यस्तविभूषणाश्च कौतूहलेनानिभृताः परीयुः ॥३.१४
गिरती करधनी से उन्हें बाधा हुई, सोकर उठने से उनकी आँखें आकुल थीं, समाचार सुनकर उन्होंने गहने
पहने, कौतूहल के कारण अविनीत होकर वे गईं ॥१४॥
प्रासादसोपानतलप्रणादैः काञ्चीरवैर्नूपुरनिस्वनैश्च ।
वित्रासयन्त्यो गृहपक्षिणस्त्वानन्योन्वेवेगांश्च समाक्षिपन्त्यः ॥३.१५
महल के सोपान पर पद-तलों के निनाद से, करधनियों के शब्द से और नूपुरों की ध्वनियों से घरेलू
पक्षियों के झुण्डों को डराती हुई तथा एक दूसरे के वेगपर अपेक्ष करती हुई (वे गईं) ॥१५॥
कासाञ्चिदासां तु वराङ्गनानां जातत्वराणामपि सोत्सुकानाम् ।
गतिं गुरुत्वाज्जगृहुर्विशालाः श्रोणीरथाः पीनपयोधराश्च ॥३.१६
उत्सुक होकर शीघ्रता करनेपर भी उन उत्तम स्त्रियों में से कतिपयों की गति को उनके अपने ही विशाल
नितम्बों और पीन पयोधरों ने रोका ॥१६॥
शीघ्रं समर्थापि तु गन्तुमन्या गतिं निजग्राह ययौ न तूर्णम् ।
ह्रियाप्रगल्भा विनिगूहमाना रहःप्रयुक्तानि विभूषणानि ॥३.१७
शीघ्र जाने में समर्थ होनेपर भी दूसरी ने अपनी चाल को रोक लिया और वह तेजी से नही गई, वह
सङ्कोचशीला एकान्त में पहने गहनों को लाज से छिपाने लगी ॥१७॥
परस्परोत्पीडनपिण्डितानां सम्मर्दसंक्षोभितकुण्डलानाम् ।
तासां तदा सस्वनभूषणानां वातायनेष्ववप्रशो बभूव ॥३.१८

बुद्धचरित 15