बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसलिए, हे सारथि, हमारे रथ को लौटाइये, विहार-भूमि (में जाने) का (यह) देश-काल नही है। अपना
विनाश जानता हुआ (कोई भी) बुद्धिमान् सङ्कट-काल में कैसे असावधान हो सकता है?" ॥६२॥
इति ब्रुवाणेऽपि नराधिपात्मजे निवर्तयामास स नैव तं रथम् ।
विशेषयुक्तं तु नरेन्द्रशासनात्स पद्मषण्डं वनमेव निर्ययौ ॥३.६३
राज-पुत्र के ऐसा बोलते रहनेपर भी उसने रथ को नही लौटाया, किन्तु राजा की आज्ञा से वह पद्मषण्ड
वन को निकल गया, जो विशेषता से युक्त था ॥63॥
ततः शिवं कुसुमितबालपादपं परिश्रमत्रमुदितमत्तकोकिलम् ।
विमानवत्स कमलचारुदीर्घिकं ददर्श तन्नन्दनमिव नन्दनं वनम् ॥३.६४
तब उसने कुसुमित बाल-पादपों, घूमते हुए प्रमुदित मत्त कोकिलों, विमानों, तथा कमलों के सुन्दर पोखरों
से युक्त उस भव्य वन को देखा, जो नन्दन-वन के समान था ॥64॥
वराङ्गनागणकलिलं नृपात्मजस्ततो बलाद्वनमनिनीयते स्म तत् ।
वराप्सरोवृतमलकाधिपालयं नवव्रतो मुनिरिव विघ्नकातरः ॥३.६५
तब श्रेष्ठ स्त्रियों से भरे वन में राजा का पुत्र बलात् ले जाया गया, जैसे श्रेष्ठ अप्सराओं से पूर्ण कुबेर-
प्रासाद में नया व्रतवाला विघ्न-कातर मुनि (बलात् ले जाया जा रहा हो) ॥65॥$^{24}$
इति बुद्धचरिते महाकाव्ये संवेगोत्पत्तिर्नाम तृतीयः सर्गः ॥३॥
चतुर्थ सर्ग
स्त्री-निवारण
ततस्तस्मात्पुरोद्यानात्कौतूहलचलेक्षणाः ।
प्रत्युज्जग्मुर्नृपसुतं प्राप्तं वरमिव स्त्रियः ॥४.१
तब उस नगर-उद्यान से निकलकर कौतूहल से चञ्चल आँखोंवाली स्त्रियों ने राजा के पुत्र की, मानो आये
हुए वर की, अगवानी की ॥1॥
अभिगम्य च तास्तस्मै विस्मयोत्फुल्ललोचनाः ।
चक्रिरे समुदाचारं पद्मकोशनिभैः करैः ॥४.२
समीप आकर उन्होंने, जिनकी आँखें विस्मय से विकसित हो गईं, पद्मकोश-सदृश हाथों (के सम्पुटों) से
उसका सत्कार किया ॥2॥
तस्थुश्च परिवार्यैनं मन्मथाक्षिप्तचेतसः ।
निश्चलैः प्रीतिविकचैः पिबन्त्य इव लोचनैः ॥४.३
और काम से आकृष्ट चित्तवाली वे (स्त्रियाँ) उसे घेरकर प्रीति से विकसित हुए निश्चल आँखों से उसे मानो
पीती रहीं (अर्थात् उसकी रूप-सुधा का पान करती रहीं) ॥3॥
तं हि ता मेनिरे नार्यः कामो विग्रहवानिव ।
शोभितं लक्षणैर्दीप्तैः सहजैर्भूषणैरिव ॥४.४
उज्ज्वल लक्षणों से, मानो स्वाभाविक भूषणों से, शोभित उस (कुमार) को उन नारियों ने मूर्त कामदेव
माना ॥4॥
सौम्यत्वाच्चैव धैर्याच्च काश्चिदेनं प्रजज्ञिरे ।
अवतीर्णे महीं साक्षाद्गूढांशुश्चन्द्रमा इव ॥४.५
उसकी सौम्यता और धैर्य से कतिपयों ने उसे पृथ्वी पर अवतीर्ण साक्षात् चन्द्रमा माना, जिसकी किरणें
गुप्त थीं ॥5॥
तस्य ता वपुषाक्षिप्ता निगृहीतं जजृम्भिरे ।
अन्योन्यं दृष्टिभिर्हत्वा शनैश्च विनिशश्वसुः ॥४.६
उसके रूप से आकृष्ट होकर, उन्होंने (हाथों से मुँह) पकड़े हुए जँभाई ली और एक दूसरे के ऊपर दृष्टि से
प्रहार कर धीरे-धीरे साँसें लीं ॥6॥
एवं ता दृष्टिमात्रेण नार्यो ददृशुरेव तम् ।
न व्याजह्रर्न जहसुः प्रभावेणास्य यन्त्रिताः ॥४.७
इस प्रकार उन स्त्रियों ने केवल आँखों से उसे देखा और उसके प्रभाव के वश में होकर, वे न (कुछ)
बोलीं, न हँसीं ॥7॥
तास्तथा तु निरारम्भा दृष्ट्वा प्रणयविक्लवाः ।
पुरोहितसुतो धीमानुदायी वाक्यमब्रवीत् ॥४.८
उन्हें उस प्रकार से (कुछ) आरम्भ नहीं करती तथा प्रेमविह्वल देखकर, पुरोहित-पुत्र बुद्धिमान् उदायी ने ये
वचन कहे:– ॥8॥
सर्वाः सर्वकलाज्ञाः स्थ भावग्रहणपण्डिताः ।
रूपचातुर्यसम्पन्नाः स्वगुणैर्मुख्यतां गताः ॥४.९
"तुम सब सब कलाओं में निपुण हो, भाव जानने में निपुण हो, रूप और चतुराई से युक्त हो, अपने गुणों
से मुख्यता को प्राप्त हो ॥9॥
शोभयेत गुणैरेभिरपि तानुत्तरान् कुरून् ।
कुवेरस्यापि चाक्रीडं प्रागेव वसुधामिमाम् ॥४.१०
$^{24}$ विघ्न-कातर = विघ्न (पड़ने के भय) से कातर।
बुद्धचरित 19