बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
पृष्ठ 14, कुल 122 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब समय पर चारु पयोधरवाली तथा अपने (गर्भ में पुत्ररूप) यश को धारण करनेवाली यशोधरा से
शौद्धोदनि (=शुद्धोदन के पुत्र) का राहु-शत्रु (चन्द्र)-सदृश मुखवाला पुत्र उत्पन्न हुआ, (उसका) नाम
राहुल ही (रहा) ॥46॥
अथेष्टपुत्रः परमप्रतीतः कुलस्य वृद्धिं प्रति भूमिपालः।
यथैव पुत्रप्रसवे ननन्द तथैव पौत्रप्रसवे ननन्द ॥२.४७
तब अभिलषित पुत्रवाले राजा को वंश-वृद्धि का पूरा विश्वास हुआ। जैसे वह पुत्र जन्म में आनन्दित हुआ
था, वैसे ही पौत्र-जन्म में आनन्दित हुआ ॥47॥
पुत्रस्य मे पुत्रगतो ममेव स्नेहः कथं स्यादिति जातहर्षः।
काले स तं तं विधिमाललम्बे पुत्रप्रियः स्वर्गमिवारुरुक्षन् ॥२.४८
"मेरे पुत्र को मेरे ही समान पुत्रगत स्नेह किस प्रकार होता होगा" यह सोचकर उसे हर्ष हुआ उस पुत्र-
प्रिय ने मानो स्वर्गारोहण की इच्छा से समय पर उस-उस (धार्मिक) विधि का अवलम्बन किया ॥48॥
स्थित्वा पथि प्राथमल्पिकानां राजर्षभाणां यशसान्वितानाम्।
शुक्लान्यमुक्त्वापि तपांस्यतप्त यज्ञैश्च हिंसारहितैरयष्ट ॥२.४९
कृत-युग के यशस्वी नृप-श्रेष्ठ के पथ में रहते हुए, (गृहस्थाश्रम के) सफेद कपड़ों को नहीं छोड़ते हुए भी
उसने तप किये और हिंसा-रहित यज्ञों से पूजा की ॥49॥
अजाज्वलिष्ठाथ स पुण्यकर्मा नृपश्रिया चैव तपःश्रिया च।
कुलेन वृत्तेन धिया च दीप्तस्तेजः सहस्रांशुरिवोत्सिसृक्षुः ॥२.५०
वह पुण्यकर्मा राज्य और तपस्या की श्री से प्रज्वलित हुआ; (अपने श्रेष्ठ) कुल आचार और बुद्धि से प्रदीप्त
हुआ, जैसे सहस्र किरणोंवाले सूर्य के समान प्रकाश फैलाने की इच्छा कर रहा हो ॥50॥
स्वायम्भुवं चार्चिकमर्चयित्वा जजाप पुत्रस्थितये स्थितश्रीः।
चकार कर्माणि च दुष्कराणि प्रजाः सिसृक्षुः क इवादिकाले ॥२.५१
उस स्थायी लक्ष्मीवाले (राजा) ने पुत्र के जीवन के लिए स्वयम्भू की पूजा की, जप किया और आदि युग
में प्रजा सृजन करने को इच्छुक स्रष्टा के समान दुष्कर कर्म किये ॥51॥$^{20}$
तत्याज शस्त्रं विममर्श शास्त्रं शमं सिषेवे नियमं विषेहे।
वशीव कञ्चिद्विषयं न भेजे पितेव सर्वान्विषयानपश्यत् ॥२.५२
शस्त्र छोड़ा, शास्त्र विचारा, शम का सेवन किया, नियम को सहन किया, संयमी के समान किसी विषय
का सेवन नहीं किया, पिता के समान सब विषयों (=देशों, प्रजासमूह) को देखा ॥52॥
बभार राज्यं स हि पुत्रहेतोः पुत्रं कुलार्थं यशसे कुलं तु।
स्वर्गाय शब्दं दिवमात्महेतोर्धर्मार्थमात्मस्थितिमाचकाङ्क्ष ॥२.५३
उसने राज्य का पुत्र के लिए, पुत्र का कुल के लिए, कुल का यश के लिए पालन किया और यश की
स्वर्ग के लिए, स्वर्ग की अपने लिए, अपने जीवन की धर्म के लिए आकाङ्क्षा की ॥53॥
एवं स धर्मं विविधं चकार सद्भिर्निपातं श्रुतितश्च सिद्धम्।
दृष्ट्वा कथं पुत्रमुखं सुतो मे वनं न यायादिति नाथमानः ॥२.५४
इस प्रकार उसने भाँति भाँति का धर्म किया, सज्जन जिसका पालन करते हैं और जो श्रुति से सिद्ध है,
यह प्रार्थना करते हुए कि "अपने पुत्र का मुख देखकर मेरा पुत्र किसी प्रकार वन को न जाय" ॥54॥
रिरक्षिषन्तः श्रियमात्मसंस्थां रक्षन्ति पुत्रान् भुवि भूमिपालाः।
पुत्रं नरेन्द्रः स तु धर्मकामो ररक्ष धर्माद्विषयेषु मुञ्चन् ॥२.५५
पृथ्वी पर अपनी श्री की रक्षा चाहनेवाले भूपाल अपने पुत्रों की रक्षा करते हैं; किन्तु इस धर्माभिलाषी
राजा ने अपने पुत्र को (इन्द्रिय-) विषयों में छोड़ते हुए उसकी धर्म से रक्षा की ॥55॥
वनमनुपमसत्त्वा बोधिसत्त्वास्तु सर्वे विषयसुखरसज्ञा जग्मुरुत्पन्नपुत्राः।
अत उपचितकर्मा रूढमूलेऽपि हेतौ स रतिमुपसिषेवे बोधिमापन्न यावत् ॥२.५६
अनुपम स्वभाववाले सब बोधिसत्त्व विषय-सुख का रस जानकर, पुत्र उत्पन्न होनेपर, वन को गये; अतः
(राग, द्वेष, मोह को क्षीण करनेवाले) कर्मों के इकट्ठे होने से (कल्याण का) हेतु रूढ़मूल (=सुदृढ़)
होनेपर भी, उसने बुद्धत्व पाने तक विषयों को कुछ-कुछ सेवन किया ॥56॥$^{21}$
इति बुद्धचरिते महाकाव्येऽन्तःपुरविहारो नाम द्वितीयः सर्गः ॥२॥
तृतीय सर्ग
संवेग-उत्पत्ति
ततः कदाचिन्मृदुशाद्वलानि पुंस्कोकिलोन्नादितपादपानि।
शुश्राव पद्माकरमण्डितानि गीतैर्निबद्धानि स काननानि ॥३.१
तब एक बार उसने गीत-निबद्ध काननों के बारे में सुना, जो मृदु और हरे तृणों से युक्त थे, जिनके पेड़
कोयलों से निनादित थे और जो कमल के पोखरों से मण्डित थे ॥1॥
श्रुत्वा ततः स्त्रीजनवल्लभानां मनोज्ञभावं पुरकाननानाम्।
बहिःप्रयाणाय चकार बुद्धिमन्तर्गृहे नाग इवावरुद्धः ॥३.२
तब स्त्रियों के प्रिय पुर-काननों की मनोहरता सुनकर, घर के भीतर बँधे हाथी के समान उसने बाहर जाने
का विचार किया ॥2॥
ततो नृपस्तस्य निशम्य भावं पुत्राभिधानस्य मनोरथस्य।
स्नेहस्य लक्ष्म्या वयसश्च योग्यामाज्ञापयामास विहारयात्राम् ॥३.३
$^{20}$ _ "पुत्रस्थितये" का दूसरा अर्थ होगा "पुत्र के (घर में ही) रहने के लिए"।
$^{21}$ _ बोधिसत्त्व = बोधि अर्थात् बुद्धत्व प्राप्त करनेवाला प्राणी; वह व्यक्ति, जिसे बुद्धत्व प्राप्त होगा।
14 अश्वघोष