बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
५९० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
वार्षिक भविष्यवाणियाँ-
सुदर्शन चक्र से वार्षिक फल कहने के लिये जन्म से प्रथम १२ मास
तक प्रथम भाव को लग्न मानकर किया जाता है। दूसरे वर्ष में द्वितीय भाव
को लग्न माना जाता है, तीसरे वर्ष में तीसरा स्थान ही लग्न माना जाता है।
इस प्रकार में लग्न प्रति वर्ष एक-एक राशि खिसकता जाता है। वार्षिक
भविष्यवाणियों में मंदगति वाले ग्रहों राहु केतु शनि आदि का ही विचार किया
जाता है। १२।२४।३६।४८ वें वर्ष के अन्त में वैसी ही स्थिति हो जाती
है जैसी कि जन्मकाल में होती है। इसी प्रकार लग्नादि १२ भाव एक-एक
मास के द्योतक होते हैं। दिन फल कहने के लिये एक-एक भाव में ढाई दिन
कल्पना करना चाहिये।
अथ राहुदृष्टिमाहुः-
सुतमदननवांते पूर्णदृष्टिं तमस्य
युगलदशमगेहे चार्धदृष्टिंवदन्ति ।
सहजरिपुविपश्यन् पाददृष्टिं मुनीन्द्रा
निजभवनमुपेतोलोचनान्धः प्रदिष्टः ।।
ग्रहाणामुदयवर्षाणि-
आकृत्योजिनसम्मितागजकरा नेत्राग्नयः षोडश-
तत्त्वान्यङ्गगुणाद्विवेद प्रमिताः सूर्यादिकानां समा
यः खेटः स्वगृहे स्वतुङ्गभवने षड्वर्गशुद्धश्च यः-
तस्याब्दे हि नृणां भवेदति सुखं भाग्योदयो निश्चितम् ।।
इति सुदर्शनचक्र विवरणं समाप्तम्।
इति वृहत्पाराशरहोरायाः पूर्वार्धे सूर्यादि ग्रहाणां प्राणदशा
फलाध्यायः।
समाप्तश्चायं पूर्वार्धभागः।
श्रीः
वृहत्पाराशरहोरायाः उत्तरार्धम्
भाषाटीका सहितम्
अष्टकवर्गाध्यायः ।
मैत्रेय उवाच-
भगवन्सर्वमाख्यातं जातकं विस्तरेण मे ।
सहस्रायुतश्लोकैरशीत्यध्यायसंयुतैः ॥१॥
मैत्रेयजी ने कहा- हे भगवन् ! आपने एक हजार श्लोकों से युक्त ८०
अध्याय (पूर्वखंड) में विस्तार पूर्वक सभी जातक को मुझसे कहा।।१।।
संकरात्तत्फलानां तु ग्रहाणां गतिसंकरात् ।
नान्येनहीदृगस्येदमिति वक्तुमलं नराः ॥२॥
किन्तु ग्रहों की गति का परस्पर (संकर) मिश्रण होने से उनके फल में भी
मिश्रण हो जाता है अतः इस प्रमाण से ऐसा फल कहना ऐसा निश्चय कर कहने
को कोई समर्थ नहीं होता है।।२।।
कलौ युगे ततोऽल्पैव बुद्धिः पापोत्तरा नराः ।
अतो न चास्य प्रचयगमनं न प्रयोजनम् ॥३॥
क्योंकि कलियुग में पूर्व युग से अल्प ही बुद्धि के और अधिक पापी होते
हैं अतः उनके लिये इस महान् ग्रंथ का विचार करना और उसके प्रयोजन का कहना
दुर्लभ ही है।।३।।
एतावंतं कलामस्य प्रयोजनं प्रचयगमनं च कथमासीत् इति
शंकायामाह-
अत्र त्रेतायुगे केचिद्द्वापरे च कृतेयुगे ।
कुशाग्रमतयः सर्वे पुण्यभाजश्चिरायुषः ॥४॥
आप यह कह सकते हैं इतने काल पर्यन्त इस ग्रंथ का उपयोग कैसे हुआ
और अब क्यों नहीं हो पा रहा है, इसका उत्तर स्वयं दे रहे हैं- हे मुनीश्वर! इस
त्रेतायुग में, द्वापर में तथा सत्ययुग में मनुष्य कुशाग्रबुद्धि, पुण्यवान् और दीर्घायु
होते थे। अतः वे पूर्व के कहे हुये शास्त्र को देखने और कहने में समर्थ थे।।४।।
५९२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अतोऽल्पबुद्धिगम्यं यच्छास्त्रमेतद्वदस्य मे ।
लोकयात्रापरिज्ञानमायुषो निर्णयं तथा ॥५॥
इसलिये इस युग (कलियुग) के अल्पबुद्धि वाले लोगों के जानने योग्य शास्त्र
का निर्देश करें जिसके अभ्यास से प्राणियों की लोकयात्रा (सुख दुःख) का परिज्ञान
हो और आयुष्य का निर्णय भी हो सके॥५॥
पराशर उवाच-
साधुपृष्टं त्वया ब्रह्मन्वदामि तव सुव्रत ।
लोकयात्रापरिज्ञानमायुषो निर्णयं तथा ॥६॥
पराशरजी ने कहा— हे ब्रह्मन्! तुमने बड़ा ही अच्छा प्रश्न किया है मैं
लोकयात्रा का ज्ञान और आयुष्य का निर्णय॥६॥
संकरस्याविरोधं च शास्त्रस्यापि प्रसिद्धये ।
प्रयोजनस्य लोकानामुपकाराय तच्छृणु ॥७॥
और ग्रहों की गति की संकरता से फल में विपर्यास होता है इसे भी शास्त्र
की सिद्धता के लिये अविरोध प्रकार और प्रयोजन भी लोकोपकार के लिये कहता
हूँ उसे सुनो॥७॥
भावानांशुभाशुभत्वमाह-
लग्नादिव्ययपर्यंता भावाः संज्ञानुरूपतः ।
फलदाः शुभसंदृष्टायुक्ता वा शोभना मताः ॥८॥
लग्न से लेकर व्यय भाव पर्यन्त सभी भाव यदि शुभग्रह से युक्त वा दृष्ट हों
तो उन भावों के संज्ञानुरूप शुभफल को देते हैं॥८॥
पापदृष्टयुताभावाः कल्याणोतरदायकाः ।
नितरां शत्रुनीचस्थैर्न च मित्रोच्चगैश्च तैः ॥९॥
पापग्रह से दृष्ट या युक्त हों तो अशुभ फल को देते हैं। यदि पापग्रह अपने
शत्रु की राशि में वा नीचराशि में हों तो अत्यंत अशुभ फल देता है किन्तु अपने
मित्र की राशि या उच्चराशि में हों तो शुभफल को ही देता है॥९॥
एवं सामान्यतः प्रोक्तं होराविद्भिस्तु सूरिभिः ।
मयैतत्सकलं प्रोक्तं पूर्वाचार्यानुवर्तिनी ॥१०॥
अष्टकवर्गाध्यायः । ५९३
इस प्रकार होराशास्त्र के जानने वालों ने सामान्य रीति से कहा है उसे मैंने
संपूर्ण पूर्वाचार्यों के अनुसार कहा है॥११०॥
आयुश्च लोकयात्रा च शास्त्रेऽस्मितत्प्रयोजनम् ।
निश्चेतुं तन्न शक्नीति वशिष्ठो वा बृहस्पतिः ॥१११॥
इस शास्त्र में आयु का प्रमाण और मनुष्यों के सुख दुःख का वर्णन है यही
इसका प्रयोजन है। किन्तु उन सबके निर्णय करने में वशिष्ठ या बृहस्पति भी समर्थ
नहीं हो सकते हैं॥१११॥
किं पुनर्मनुजास्तत्र विशेषात्तु कलौ युगे ।
नष्टादिषु च नातीव द्रेष्काणादि फलेषु च ॥११२॥
साधारण मनुष्य कहां से निश्चय कर सकता है। विशेषकर कलियुग में
विशेषकर नष्ट चौर आदि के प्रश्नों के उत्तर द्रेष्काणादि से देने में समर्थ नहीं
हो सकते हैं॥११२॥
आचार्यस्य मुखादेतच्छास्त्रं तु शृणुयाद्बुधः ।
संप्रदायेन यः श्रोतश्चास्मिञ्छास्त्रे महामतिः ॥११३॥
इस शास्त्र को आचार्य के मुख से सुन कर संप्रदायानुसार इसमें परिश्रम करने
वाला पुरुष श्रेष्ठ दैवज्ञ होता है॥११३॥
कर्मज्ञानविदा वेदो द्विधा यद्वत्तदाह्वये ।
होराशास्त्रं द्विधा प्रोक्तं संकीर्णनिश्चयादिति ॥११४॥
जिस प्रकार कर्मकांड और ज्ञानकांड से युक्त वेद एक होते हुये भी दो प्रकार
का है उसी प्रकार से संकीर्ण और निश्चय से यह ज्योति शास्त्र भी दो प्रकार का
है॥११४॥
प्रोक्तः संकीर्णभागस्तु निश्चयांशस्तु कथ्यते ।
योवेत्ति सम्यगेतत्तु दैवज्ञः स उदाहृतः ॥११५॥
इसमें संकीर्णभाग पूर्वार्ध (पूर्वभाग) में वर्णित है और निश्चय भाग को इस
उत्तरार्ध में कह रहा हूँ जो सम्यक् प्रकार से इसे जानता है उसे ही दैवज्ञ कहते
हैं॥११५॥
भावदृष्ट्यांदिषु प्रोक्तानर्थान्सम्यग्विचार्य च ।
समीचीनांस्तु संगृह्य विरुद्धांस्तु परित्यजेत् ॥११६॥
५९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
तनु आदि बारह भाव और उसपर दृष्टि का योग ठीक-ठीक विचार कर जो
उत्तम बल हों उनको ग्रहण कर हीनवल का त्याग कर दे।।१६।।
आयुर्दायैः परं योगैः फलान्यष्टकवर्गंतः ।
तन्वादीनां तु भावानां सूक्तैर्भावादिभिः फलैः ।।१७।।
ज्ञात्वादौ करणं स्थानं बिन्दुरेखे च वर्गणाम् ।
क्रमादष्टकवर्गस्य पृथक्कृत्य फलं वदेत् ।।१८।।
पहले आयुष्य का ज्ञान करे इसके बाद नाभासादिक योगों के फल का ज्ञान
करें दोनों का ज्ञान हो जाने के बाद प्रत्येक भावों के अष्टकवर्ग के अनुसार करण
और स्थान को बिन्दु और रेखा के स्थान पर मानकर योगकर उन भावों के फल
को कहे।।१८।।
अथ रवेः करणसंख्यां-करणप्रदग्रहांश्चाह-
तनुस्वायुस्त्रिरिष्फेषु पंचकामेऽर्णवाः सुखे ।
अरौ भाग्ये त्रयः पुत्रे षट् करौ खे भवे चभूः ।।१९।।
लग्नेकुजीवशुक्रज्ञास्तन्नौखे मरणेऽपि च ।
रविभौमार्कि चन्द्रार्या व्यये ज्ञेन्दुसितार्यकाः ।।२०।।
अष्टक वर्ग क्या है— प्रायः फलकहने के तीन प्रकार हैं (१) जन्म लग्न
से ग्रहों की स्थिति के अनुसार। (२) चन्द्रलग्न से ग्रहों की स्थिति के अनुसार।
(३) नवांश कुंडली के अनुसार फल कहने की विधि है। जातक के जन्म
लग्न से उसके शरीर के सुख दुःखादि का विचार किया जाता है और चन्द्रमा
से मन का विचार किया जाता है। मन ही की शान्ति एवं अशान्ति और सबलता
वा निर्बलता के अनुसार इहलौकिक और पारलौकिक सभी शुभ अशुभ कार्य
हुआ करते हैं। अतः फलादेश का मुख्य अंग चन्द्रमा ही हुआ, इसलिये ही
आचार्यों ने यह निश्चय किया है कि मनुष्य के जन्म के समय चन्द्रमा जिस
राशि पर हो उस राशि से जिन जिन भावों में ग्रहगण भ्रमण करते हुये जाते
हैं वैसा वैसा ही फल उस उस समय में मनुष्यको होते हैं। इसी को गोचर
फल कहते हैं। किन्तु यह विधि गौण है। क्यों कि सम्पूर्ण मानव मात्र के चन्द्रमा
इन्हीं बारह राशियों में से किसी राशि में रहता है। अतः साधारण गोचर फल
केवल बारह ही प्रकार का होगा किन्तु ऐसा होता नहीं है। इसलिये आचार्यों
अष्टकवर्गाध्यायः । ५९५
ने जन्मकालीन ग्रहस्थिति और जन्मलग्न स्थित राशि इन आठ स्थानों से यदि
गोचर फल का विचार किया जाय तो अवश्य विश्वास योग्य होगा। ऐसा निश्चय
किया है। इसी को अष्टक वर्ग विधि कहते हैं। प्रत्येक जन्मकुंडली में सातग्रह
और जन्मलग्न अर्थात् इन आठ पदार्थों से किसी न किसी स्थान में शुभ और
अशुभ फलों में विशेषता हो जाती है। इसी को आचार्यों ने प्रत्येक ग्रह एवं
लग्न अपने अपने स्थान से जिन जिन स्थानों में शुभ फल देता है इस शुभफल
दायित्व स्थान को रेखा या बिन्दुद्वारा दिखलाया है। किसी आचार्य ने बिन्दु
संकेत से शुभफल माना है और किसी ने रेखा द्वारा शुभ फल माना है इसके
भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये चाहे जिस चिह्न से मानाजाय। इस ग्रंथ में शून्य
को करण कहते हैं। अतः सूर्य की करण संख्या कह रहे हैं- सूर्य से १,
२, ८, ३, १२ भावों में पांच पांच करण होता है।, ७, ४ भाव में चार
चार करण होता है। ६, ९ भाव में तीन तीन करण होता है। ५ भाव में ६
करण होता है। १० भाव में दो करण और ११ भाव में एक करण होता
है। १९ अर्थात् सूर्य से १, २, ८ भाव में लग्न, चंद्र, शुक्र और बुध ये
पांच ग्रह करण देने वाले हैं, १२ वें भाव में सूर्य, भौम, शनि, चंद्र, गुरु
ये पांच करण देने वाले हैं।।२०।।
सुखे होरेन्दुशुक्राश्च धर्मेऽर्कार्किकुजा अरौ ।
होराज्ञार्येंदवः कामे भवे दैत्येन्द्रपूजितः ॥२१॥
४ थे भाव में बुध, चन्द्र, शुक्र, गुरु ये चार ग्रह करण देने वाले हैं। नवम
भाव में लग्न, चन्द्र, शुक्र ये तीन ग्रह करण प्रद हैं। ६ भाव में सूर्य शनि, मंगल
ये तीन ग्रह करण देने वाले हैं। ७ भाव में लग्न, बुध, शुक्र, चंद्र ये चार ग्रह करण
देने वाले हैं। ११ भाव में केवल शुक्र करण देने वाले हैं।।२१।।
सहजेऽर्कार्किशुक्रार्यभौमाः खे गुरुभार्गवौ ।
सुतेऽर्कार्कीन्दुलग्नारशुक्राः स्युः करणं रवेः ॥२२॥
तीसरे भाव में सूर्य, शनि, शुक्र, गुरु, मंगल ये पांच ग्रह करण देने वाले
हैं। १० भाव में गुरु, शुक्र ये दो ग्रह करण देने वाले हैं। ५ भाव में सूर्य, शनि,
चंद्र, लग्न, मंगल, शुक्र ये छः ग्रह करण देने वाले हैं। यह सूर्य की करण संख्या
है।।२२।।
? Actually, in Devanagari OCR and transcription of this verse from BPHS: Let's transcribe what is visible: Most faithfully: होरार्कारार्किभृगवोऽङ्गार्केन्द्वार्किभार्गवाः ॥२४॥(or if it looks like झ:होरार्कारार्किभृगवोऽझार्केन्द्वार्किभार्गवाःorहोरार्कारार्किभृगवोऽङ्गार्केन्द्वार्किभार्गवाः). Wait, look at ङ्ग: In Devanagari, ङ्गis composed ofङ+ग. Does it look like ङwith aगunderneath? Yes! Look at it! Top:ङ(short stem, S-shape, with a dot? or just S-shape). Bottom:गsuspended below theङ! In classical Devanagari fonts (like Nirnaya Sagar), the conjunct ligature ङ्गis: an upperङand a lowerगhanging from the bottom of theङ! And to its right is the vowel sign ा(aa-matra)! Wait! An upperङand a lowerगlooks EXACTLY like a letter with a loop at the bottom, and withाit becomesङ्गा! YES! That is the ligature ङ्ग! In old fonts,
अष्टकवर्गाध्यायः । ५९७
दूसरे भाव में लग्न, बुध, सूर्य, चन्द्रमा, शनि और शुक्र, ये ६ करण देने
वाले हैं। तीसरे भाव में केवल गुरु करण देने वाला है। चौथे भाव में सूर्य, शनि,
चन्द्र, लग्न, भौम ये पांच करण प्रद हैं। पाचवें भाव में लग्न, चन्द्र, गुरु, रवि ये
चार करण प्रद हैं। छठे भाव में शुक्र, बुध, गुरु ये तीन ग्रह करण प्रद हैं। सातवें
भाव में भौम लग्न, शनि ये तीन करण प्रद हैं। आठवें भाव में भौम, लग्न, शनि,
शुक्र, चन्द्रमा ये ५ करण प्रद हैं।।२५।।
होराकरार्किविज्जीवाः शनिः खं सकलाःक्रमात्।
नवम भाव में लग्न, सूर्य, भौम, शनि, बुध, गुरु ये ६ ग्रह करण प्रद हैं।
दशम भाव में केवल शनि करण प्रद है, एकादश भाव में शून्य और बारहवें भाव
में सभी करणप्रद होते हैं।
स्पष्टार्थचन्द्रकरणचक्रम्।
| मा. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ल. | सू. | स. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त. | ० | ० | ० | ० | ० | ५ | |||
| ध. | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ६ | ||
| स. | ० | १ | |||||||
| सु. | ० | ० | ० | ० | ० | ५ | |||
| सु. | ० | ० | ०. | ० | ४ | ||||
| रि. | ० | ० | ० | ३ | |||||
| जा | ० | ० | ० | ३ | |||||
| मृ. | ० | ० | ० | ० | ० | ५ | |||
| ध. | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ६ | ||
| क. | ० | १ | |||||||
| आ | |||||||||
| व्य | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ८ |
| अथ भौमस्यकरणसंख्यांकरणप्रदग्रहांश्चाह- | |||||||||
| व्ययवेश्मसुतस्त्रोषु षट्सप्त धनधर्मयोः ।।२६।। | |||||||||
| होराभृत्योः शरा वेदा विक्रमे खेत्रयः क्षते । | |||||||||
| द्वौभवे शून्यमेवं स्यात्करणं भूमिजस्य तु ।।२७।। | |||||||||
| 'भौम से १२, ४, ५, ७ भाव में ६ करण, २, ९ भाव में ७ करण।।२६।। | |||||||||
| १, ८ भाव में ५ करण, ३ भाव में ४ करण, २ भाव में ३ करण, ६ भाव में | |||||||||
| २ करण, ११ भाव में शून्य करण होते हैं।।२७।। |
५९८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्।
कुजस्यार्केन्दुविज्जीवसिता लग्नशनी च ते ।
सितारगुरुमंदाः स्युर्धर्मोक्तेषु कुजं विना ।।२८।।
भौम से १ भाव में सूर्य, चंद्रमा, बुध, गुरु, शुक्र ये ५ करणप्रदग्रह हैं, २
भाव में लग्न, शनि, सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र ये ७ करणप्रद ग्रह हैं। ३ भाव
में शुक्र, भौम, गुरु, शनि ये ४ करणप्रद हैं। ४ भाव में सूर्य, चंद्र, बुध, गुरु,
शुक्र लग्न ये ६ ग्रह करणप्रद हैं।।२८।।
चन्द्रारगुरुशुक्रार्किलग्नानि कुजभास्करी ।
ज्ञेन्द्वर्कसितलग्नार्या एषु शुक्रं विना ततः ।।२९।।
५ भाव में चन्द्र, भौम, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न ये ६ ग्रह करणप्रद हैं। ६
भाव में भौम, शनि ये दो करणप्रद हैं, ७ भाव में बुध, चंद्र, सूर्य, शुक्र, गुरु
ये ६ करणप्रद ग्रह हैं।।२९।।
विना शनिं सप्तधर्मे सितेन्दुज्ञा वियत्ततः ।
अर्कार्किक्षेंदुलग्णाराः करणं प्रोच्यते क्रमात् ।।३०।।
८ भाव में बुध, चंद्र, सूर्य, गुरु, लग्न ये ५ करणप्रद ग्रह हैं, ९ भाव में
सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र लग्न ये ७ करणप्रद ग्रह है, १० भाव में शुक्र,
चंद्र, बुध ये तीन करणप्रद ग्रह हैं। ११ भाव में शून्य और १२ भाव में सूर्य,
शनि, बुध, चंद्र, लग्न, भौम ये ६ करणप्रद ग्रह हैं।।३०।।
स्पष्टार्थभौमकरणचक्रम्।
| भा. | सू. | चं. | मं. | बु. | वृ. | शु. | श. | ल. | स. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त. | ० | ० | ० | ० | ० | ५ | |||
| ध. | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ७ | |
| स | ० | ० | ० | ० | ४ | ||||
| सु. | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ६ | ||
| सु. | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ६ | ||
| रि. | ० | ० | २ | ||||||
| जा | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ६ | ||
| मृ. | ० | ० | ० | ० | ० | ५ | |||
| ध. | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ७ | |
| क. | ० | ० | ० | ३ | |||||
| आ | |||||||||
| व्य | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ६ |
अष्टकवर्गाध्यायः। ५९९
अथ बुधस्य करण संख्यां करणप्रदग्रहांश्चाह-
तनुस्वगृहकर्मारि धर्मेष्वग्निर्मृतौ करौ ।
मातृस्त्रियों रसा लाभे शून्यं पुत्रे व्यये शराः ॥३१॥
बुध से १,२,४,१०,६,९ भाव में तीन करण, ८ भाव में २ करण, ३,
७ भाव में ६ करण, ११ भाव में शून्य और १२ भाव में ५ करण होता है॥३१॥
बुधस्यार्केन्दुगुरवो गुरुसूर्यबुधाः क्रमात् ।
लग्नाक्रारार्विचंद्रार्या ज्ञाकार्या हि बुधस्यतु ॥३२॥
बुध से १ भाव में सूर्य, चंद्र, गुरु ये तीन करणप्रद ग्रह हैं, २ भाव में गुरु,
सूर्य, बुध ये तीन करणप्रद ग्रह हैं। ३ भाव में लग्न, सूर्य, शनि, चंद्र, भौम, गुरु
ये ६ करणप्रद ग्रह हैं, ४ भाव में बुध, सूर्य, गुरु ये तीन करणप्रद ग्रह हैं॥३२॥
जीवारेन्द्वार्किलग्नानि शुक्रमंदधरासुताः ।
ज्ञेन्दुलग्नार्कशुक्रार्या ज्ञाकौ जीवेन्दुलग्नकाः ॥३३॥
अकार्यशुक्राः शून्यं च होरेन्द्वारार्किभार्गवाः ।
५ भाव में गुरु, भौम, चंद्र, शनि, लग्न ये ५ करणप्रद ग्रह हैं। ६ भाव में
शुक्र, शनि, भौम ये तीन करणप्रद ग्रह हैं। ७ भाव में बुध, चंद्र, लग्न, सूर्य, शुक्र,
गुरु ये ६ करणप्रद ग्रह हैं, ८ भाव में बुध, सूर्य ये दो करणप्रद ग्रह हैं। ८ भाव
में बुध, सूर्य ये दो करणप्रद ग्रह हैं। ९ भाव में गुरु, चंद्र, लग्न ये ३ करणप्रद ग्रह
हैं, १० भाव में सूर्य, गुरु, शुक्र ये तीन करणप्रद ग्रह हैं, ११ भाव में शून्य और
१२ भाव में लग्न, चंद्र, भौम, शनि, शुक्र ये ५ करणप्रद ग्रह हैं॥३३॥
स्पष्टार्थबुधकरणचक्रम्।
| मा | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ल. | स |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त. | ० | ० | ० | ३ | |||||
| ध. | ० | ० | ० | ३ | |||||
| स. | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ६ | ||
| सु. | ० | ० | ० | ३ | |||||
| सु. | ० | ० | ० | ० | ० | ५ | |||
| रि. | ० | ० | ० | ३ | |||||
| जा. | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ६ | ||
| मृ. | ० | ० | २ | ||||||
| क. | ० | ० | २ | ||||||
| धः | ० | ० | ० | ३ | |||||
| आ | |||||||||
| व्य | ० | ० | ० | ० | ० | ५ |
६०० · बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अथ गुरोः करण संख्यां करणप्रदग्रहांश्चाह-
रूपं धनाययोः खे द्वौ व्यये सप्तक्षतेऽर्णवाः ॥३४॥
गुरु से २ रे भाव में १ करण, १० भाव में २ करण, ११ भाव में १ करण,
१० भाव में २ करण, १२ भाव में ७ करण, ६ भाव में ४ करण ।। ३४ ।।
मृतिविक्रमयोः पंच गुरोः शेषेषु वह्नयः ।
शुक्रेन्दुमंदा लग्ने स्वे आये मंदश्च विक्रमे ।। ३५ ।।
८, ३ भाव में ५ करण और शेष भावों (१, ४, ५, ७, ९) में ३ करण
होते हैं। गुरु से १ भाव में शुक्र, चंद्र, शनि ये तीनग्रह करणप्रद हैं, २ और ११
भाव में केवल शनि करणप्रद है ।। ३५ ।।
लग्णारेन्दुज्ञभृगवः सुतेऽकार्यकुजा गृहे ।
शुक्रमंदेदवो द्यूने बुधशुक्रशनैश्चराः ।। ३६ ।।
३ भाव में लग्न, भौम, चंद्र, बुध, शुक्र ये पांच ग्रह करणप्रद हैं। ५ भाव
में सूर्य, गुरु, भौम ये तीन करणप्रद हैं, ४ भाव में शुक्र, शनि, चंद्र ये तीन ग्रह
करणप्रद हैं, ७ भाव में बुध, शुक्र, शनि ये तीन ग्रह करणप्रद हैं ।। ३६ ।।
जीवाराकैन्दवः शत्रौ मंदं विना व्यये सर्वे ।
कर्मणीन्दुशनी धर्मे मंदारगुरवो मृतौ ।। ३७ ।।
६ भाव में गुरु, भौम, सूर्य, चन्द्र ये चार ग्रह करणप्रद हैं, १२ भाव में
शनि को छोड़कर सभी ग्रह करणप्रद हैं, १० भाव में चंद्र, शनि ये २ ग्रह, ९
भाव में शनि, भौम, गुरु ये तीन ग्रह करणप्रद हैं ।। ३७ ।।
स्पष्टार्थगुरुकऱणचक्रम् ।
| मा | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ल. | स |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त. | ० | ० | ० | ३ | |||||
| ध. | ० | १ | |||||||
| स. | ० | ० | ० | ० | ० | ५ | |||
| सु. | ० | ० | ० | ३ | |||||
| सु. | ० | ० | ० | ३ | |||||
| रि. | ० | ० | ० | ० | ४ | ||||
| जा | ० | ० | ० | ३ | |||||
| मृ. | ० | ० | ० | ० | ० | ५ | |||
| ध. | ० | ० | ० | ३ | |||||
| क. | ० | ० | २ | ||||||
| आ. | ० | १ | |||||||
| व्य | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ७ |
ये पांच ग्रह करणप्रद हैं।
अथ भृगोः करणसंख्यां करणप्रद ग्रहांश्चाह-
सुतायुर्विक्रमेष्वक्षितनुस्वव्ययखेष्विषुः ।।३८।।
शुक्र से ५, ८, ३ भाव में २ करण, १, २, १२, १० भाव में ५
करण।।३८।।
अष्टौस्त्रियामरौ षड्भूर्धर्मे मित्रेऽग्निखं भवे ।
लग्ने स्वेऽर्करविज्जीवमंदाः सर्वे च काम मे ।।३९।।
७ भाव में ८ करण, ६ भाव में ६ करण, ९ भाव में १ करण, ४ भाव
में ३ करण और ११ भाव में शून्य करण होता है। शुक्र से १, २ भाव में सूर्य,
भौम, गुरु, बुध, शनि ये ५ करणप्रद ग्रह हैं। ७ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध,
गुरु, शुक्र, शनि और लग्न ये आठ करणप्रद ग्रह हैं।।३९।।
अर्कार्यो विक्रमस्थाने सुतेऽर्कारौ शुभे रविः ।
सुखेऽर्कबुधजीवाः स्युर्भौमज्ञौ मृत्तिभे द्विज ।।४०।।
३ भाव में
६०२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अथ शनेःकरणसंख्यां-करणप्रद ग्रहांश्चाह-
शुक्रार्केन्द्वार्किलग्ग्यार्याः शत्रौ शून्यं भवेव्यये ।
होरार्किबुधशुक्रार्यास्तन्वारङ्गेन्दिनाश्च खे ।।४१।।
६ भाव में शुक्र, सूर्य, चन्द्र, शनि, लग्न और गुरु ये ६ करणप्रद ग्रह हैं।
११ भाव में कोई नहीं है। १२ भाव में लग्न, शनि, बुध, शुक्र, गुरु ये ५ करणप्रद
ग्रह हैं। १० भाव में लग्न, भौम, बुध, चंद्र, सूर्य ये ५ करणप्रद ग्रह हैं।।४१।।
स्वस्त्रीधर्मेषु सप्ताङ्गं मृतिहोरगृहेषु च ।
आज्ञाभ्रातृव्यये वेदा रूपं शत्रौ सुते शराः ।।४२।।
शनि से २।७।९ भाव में ७ करण, ८ लग्न, ४ भाव में ६ करण,
१०।३।१२ भाव में ४ करण, ६ भाव में १ करण, ५ भाव में ५ करण।।४२।।
आये शून्यं शनेरेवं करणं प्रोच्यते बुधैः ।
गृहे तनौ च लग्नाकौ स्वस्त्रियोश्च रविं बिना ।।४३।।
११ भाव में शून्य करण होता है। शनि से ४।१ भाव में लग्न, सूर्य
को छोड़कर सभी ग्रह करणप्रद होते हैं। २।७ भाव में रवि को छोड़कर शेष
७ ग्रह।।४।।
हित्वा धर्मे बुधं माने लग्नाररविचन्द्रजान् ।
ततो भ्रातरि जीवार्कबुध शुक्राः क्षते रविः ।।४४।।
९ भाव में बुध के बिना ७ ग्रह। १० भाव में लग्न, भौम, रवि, चंद्र के
बिना (चंद्र, गुरु, शुक्र, शनि) चार ग्रह, ३ भाव में गुरु, सूर्य, बुध, शुक्र ये चार ग्रह
६ भाव में केवल सूर्य।।४४।।
व्यये लग्नेन्दुमंदार्काः सितार्केन्दुज्ञलग्रकाः ।
सुते मृतौ बुधाकौ च हित्वाऽऽये खं शनेर्विंदः।।४५।।
१२ भाव में लग्न, चंद्र, शनि, सूर्य ये चार ग्रह। ५ भाव में शुक्र, सूर्य,
चंद्र, बुध, लग्न ये चार ग्रह, ८ भाव में चन्द्र, सूर्य ये २ ग्रह, ११ भाव में कोई
नहीं करणप्रद हैं। यह शनि की बिन्दु संख्या कही गई है।।४५।।
अष्टकवर्गाध्यायः । ६०३
स्पष्टार्थाशिनेःकरणचक्रम्।
| मा. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ल. | स. |
| त. | | ० | ० | ० | ० | ० | ० | | ६ |
| ध. | | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ७ |
| स. | ० | | | ० | ० | ० | | | ४ |
| स. | | ० | ० | ० | ० | ० | ० | | ६ |
| स. | ० | ० | | ० | | ० | | ० | ५ |
| रि. | ० | | | | | | | | १ |
| जा. | | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ७ |
| मृ. | | ० | ० | | ० | ० | ० | ० | ६ |
| ध. | ० | ० | ० | | ० | ० | ० | ० | ७ |
| क. | | ० | | | ० | ० | ० | | ४ |
| आ | | | | | | | | | |
| व्य | ० | ० | | | | | ० | ० | ४ |
अथ लग्नस्य करणसंख्या करणप्रदग्रहांश्चाह-
तनौ तुर्ये च वह्निः स्यादुश्चिक्ये द्वौ धने शराः ।
बुद्धिमृत्यंकरिःफेपु षट्खेशक्षतराशिषु ॥४६॥
लग्न और ४ भाव में ३ करण, ३ भाव में २ करण, २ भाव में ५ करण,
५।८।९।१२ भाव में ६ करण, १०।११।६ भाव में १ करण॥४६॥
रूपं स्त्रियां गुरुं त्यक्त्वा लग्नस्य करणं विदुः ।
होरासूर्येन्दवो लग्ने लग्नरेंद्विनसूर्यजाः ॥४७॥
७ भाव में ७ करण होते हैं। लग्न में लग्न, सूर्य, चंद्र ये तीन करणप्रद हैं।
२ भाव में लग्न, भौम, चंद्र, सूर्य, शनि ये ५ करणप्रद हैं॥४७॥
गुरुज्ञौ लग्नचन्द्रारा लसूचंमंवुसौरयः ।
क्षतेशुक्रस्तथा चैकः कामे सर्वे गुरुं विना ॥४८॥
३ भाव में गुरु, बुध ये २ करणप्रद हैं। ४ भाव में लग्न, चन्द्र, भौम करणप्रद
हैं। ५ भाव में लग्न, सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, शनि ये करणप्रद हैं। ६ भाव में शुक्र,
७ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, शुक्र, शनि ये करणप्रद हैं॥४८॥
मृतौ भृगुबुधौ त्यक्त्वा धर्मेगुरुसितौ विना ।
कर्मण्याये तथा शुक्नो व्यये सूर्येन्दुवर्जिताः ॥४९॥
६०४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
८ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, गुरु, शनि, लग्न ये ६ ग्रह करणप्रद हैं। ९
भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, शनि, लग्न ये करणप्रद हैं। १० भाव में और ११
भाव में शुक्र, करणप्रद हैं। १२ भाव में भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न ये
६ ग्रह करणप्रद हैं॥४९॥
लग्नस्यैवं तु संप्रोक्तं करणं द्विजपुंगव ।
हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! इस प्रकार से लग्न के करण (बिन्दु) संख्या को कहा।
उक्तान्ये स्थानदातारं इति स्थानं विदुर्बुधाः ।
अथ स्थानग्रहान्वक्ष्ये सुखवीधाय सूरिणाम् ।।५०।।
पहले सूर्यादि ग्रहों के बिन्दु देनेवाले ग्रहों को कहकर उससे भिन्न स्थान (रेखा)
देनेवालों को कहते हैं।।५०।।
अथ रवि भावस्थानप्रदानग्रहान् आह-
स्वायुस्तनुषु मंदारसूर्यजीवबुधौ सुते ।
विक्रमे ज्ञेन्दुलग्नानि लग्नाकार्किकुजा गृहे ।।५१।।
सूर्य से २।७, १ भाव में शनि, भौम, सूर्य ये तीन रेखाप्रद ग्रह हैं। ५ भाव
में गुरु, बुध ये दो ग्रह, २ भाव में बुध, चन्द्र और लग्न ये ३ ग्रह। ४ भाव में
लग्न सूर्य, शनि, भौम ये ४ ग्रह।।५१।।
खे ज्ञेन्दुरवयश्चाये सर्वे शुक्रं विना व्यये ।
लग्नशुक्रवुधाः शत्रौ ते च जीवसुधाकरौ ।।५२।।
१० भाव में लग्न, सूर्य, शनि, भौम, बुध और चन्द्र ये ६ ग्रह। ११ भाव
में शुक्र से भिन्न (सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, गुरु, शनि, लग्न ये ७ ग्रह। १२ भाव
में लग्न, शुक्र, बुध ये ३ ग्रह। ६ भाव में लग्न, शुक्र, बुध, गुरु, चंद्र ये ५
ग्रह।।५२।।
सूर्याष्टकवर्गः। रे. सं. ४८
| सू. | चं | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ल. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | ३ | १ | ३ | ५ | ६ | १ | १ |
| २ | ६ | २ | ४ | ६ | ७ | २ | ४ |
| ४ | १० | ४ | ६ | ९ | १२ | ४ | ६ |
| ७ | ११ | ७ | ९ | ११ | ७ | १० | |
| ८ | ८ | १० | ८ | ११ | |||
| ९ | ९ | ११ | ९ | १२ | |||
| १० | १० | १२ | १० | ||||
| ११ | ११ | ११ |
सूर्याष्टकवर्ग चक्र (कुण्डली)
- प्रथम भाव (१): ।।। ४ सू.
- द्वितीय भाव (२): ।।। शु ३, च
- तृतीय भाव (३): ।।।।।। २
- चतुर्थ भाव (४): ।।। २
- पंचम भाव (५): ।। ११ मं.
- षष्ठ भाव (६): ।।।।। ९
- सप्तम भाव (७): ।।।। १० ल
- अष्टम भाव (८): ।।।।।।। (७)
- नवम भाव (९): ।।।। ७
- दशम भाव (१०): ।। ६
- एकादश भाव (११): ।।।। बु ५ / वृ
- द्वादश भाव (१२): ।।।।। २
, लग्न!)
7th bhava: Surya, Chandra, Bhauma, Guru, Budha, Shukra = 6
Shloka 55:
8th bhava: Surya, Budha, Guru = 3
9th bhava: Shukra, Chandra = 2
10th bhava: Surya, Budha, Guru, Shukra, Chandra, Lagna, Bhauma = 7
11th bhava: Surya, Chandra, Bhauma, Budha, Shukra, Shani, Lagna = 7
12th bhava: 0.
Sum of bhavas:
1: 3
2: 2
3: 7
4: 3
5: 4
6: 5
7: 6
8: 3
9: 2
10: 7
11: 7
12: 0
Total = 3 + 2 + 7 + 3 + 4 + 5 + 6 + 3 + 2 + 7 + 7 + 0 = 49!
Yes! In Chandrashtakavarga according to this tradition (some versions have 49, some 48; here it has 49).
And in the chart, the Chandra is in Mithuna (Rashi 3)!
Since Chandra is in 3 (Gemini):
Bhava 1 = Rashi 3 -> 3 rekhas? Wait, the chart has:
६०६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अथ भौमभावस्थानप्रदान्ग्रहानाह-
लग्नमन्दकुजा भौमो होराज्ञेन्दुदिनाधिपाः ।
मन्दारौ ज्ञरवी ज्ञेन्दुजवार्कतनुभार्गवाः ॥५६॥
भौम से १ भाव में लग्न, शनि, भौम ये तीन रेखाप्रद हैं। २ भाव में भौम,
३ भाव में लग्न, बुध, चंद्र, सूर्य ये ४ रेखाप्रद हैं। ४ भाव में शनि, भौम। ५
भाव में बुध, सूर्य। ६-भाव में बुध, चंद्र, गुरु, सूर्य, लग्न, शुक्र ये ६ ग्रह॥५६॥
मन्दारौ तौ सितश्चार्किकुजार्कार्यार्किलग्नकाः ।
सर्वे गुरुसितौ स्थानं भौमस्यैवंविदुर्बुधाः ॥५७॥
७ भाव में शनि, भौम, ८ भाव में शनि, भौम, शुक्र ये ३ रेखाप्रद हैं।
९ भाव में शनि, १० भाव में भौम, सूर्य, गुरु, शनि, लग्न ११ भाव में सूर्य,
चंद्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न और १२ भाव में गुरु, शुक्र ये २ ग्रह
रेखाप्रद हैं॥५७॥
भौमभावस्थानप्रदान्ग्रहान् भौमस्याष्टकवर्गः
रे. सं. ३९
| मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | सू. | चं. | ल. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | ३ | ६ | ६ | १ | ३ | ३ | १ |
| २ | ५ | १० | ८ | ४ | ५ | ६ | ३ |
| ४ | ६ | ११ | ११ | ७ | ६ | ११ | ६ |
| ७ | ११ | १२ | १२ | ८ | १० | १० | |
| ८ | ९ | ११ | ११ | ||||
| १० | १० | ||||||
| ११ | ११ |
/-------------------------------------------------\
| ।।१२ | ।।।।१० | ।।।९ | ।।मं.११ |
| | | | |
|--------------+-------------+-------------+-----------|
| ।।।९ | ।।।।।२ | ।।।।।।श८ | ।।।६ |
| | | | |
|--------------+-------------+-------------+-----------|
| ।।।।च३ | ।।सू.४ | ।।।बु५वृ | ।।।बु५वृ |
\-------------------------------------------------/
(कुण्डली चक्र में राशियों के अनुसार रेखाएँ एवं ग्रह स्थिति अंकित हैं)
अथ बुधभावस्थानप्रदान्ग्रहानाह-
लग्नमन्दारशुक्रज्ञा लग्नारेन्दुसितार्कजाः ।
शुक्रज्ञौ लग्नचन्द्रार्की, सितारज्ञार्किभार्गवाः ॥५८॥
बुध से १ भाव में लग्न, शनि, भौम, शुक्र, बुध ये ५ रेखाप्रद हैं। २ भाव
में लग्न, भौम, चंद्र, शुक्र, शनि ये ४ रेखाप्रद हैं। ३ भाव में शुक्र बुध रेखा देने
वाले हैं। ४ भाव में लग्न, चंद्र, शनि, शुक्र, भौम ये रेखाप्रद हैं। ५ भाव में बुध,
सूर्य, शुक्र रेखाप्रद हैं॥५८॥
जीवज्ञार्केन्दुलग्नानि भूमिपुत्रशनैश्चरौ ।
तौ च लग्नेन्दुशुक्रार्या मन्दारार्कज्ञभार्गवाः ॥५९॥
अष्टकवर्गाध्यायः । ६०७
लग्नम्न्दारविच्चन्द्राः सर्वे जीवज्ञभास्कराः ।
६ भाव में गुरु, बुध, सूर्य, चंद्र ये रेखाप्रद हैं। ७ भाव में भौम, शनि ये
रेखाप्रद हैं। ८ भाव में लग्न, चंद्र, शुक्र, गुरु, भौम, शनि ये रेखाप्रद हैं। ९ भाव
में शनि, भौम, सूर्य, बुध, शुक्र ये रेखाप्रद हैं। १० भाव में लग्न, शनि, भौम,
बुध, चन्द्र रेखाप्रद हैं। ११ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, शुक्र, शनि ये रेखाप्रद
हैं। १२ भाव में गुरु, बुध, सूर्य रेखाप्रद हैं।।५९।।
बुधभावस्थानप्रदान्ग्रहानाह
रे. स. ५४ . बुधस्याष्टकवर्गः
| बु. | बृ. | शु. | श. | सू. | चं. | मं. | ल. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | ६ | १ | १ | ५ | २ | १ | १ |
| २ | ८ | २ | २ | ६ | ४ | २ | २ |
| ५ | ११ | ३ | ४ | ९ | ६ | ४ | ४ |
| ६ | १२ | ४ | ७ | ११ | ८ | ७ | ६ |
| ९ | ५ | ८ | १२ | १० | ८ | ८ | |
| १० | ८ | ९ | ११ | ९ | १० | ||
| ११ | ९ | १० | १० | ११ | |||
| १२ | ११ | ११ | ११ |
[बुधस्याष्टकवर्ग चक्र:]
तनु/लग्न: ।।।।बु ५ वृ; द्वितीय: ।।।।सू. ४; तृतीय: ।।।शु. ३ चं; चतुर्थ: ।।।। २, ।।।।।। ४; पंचम: ।।।।| ६; षष्ठ: ५, ।।।।। ।७; सप्तम: ।।।।।। ७ श; अष्टम: ।।। ९; नवम: ।।।। १०; दशम: ।।।।।। मं ११; एकादश/द्वादश: ।।।।| १२
अथ गुरोः भावस्थानप्रदान्ग्रहानाह-
गुरोर्लग्नेसुखे जीवलग्नार्कबुधाः धने ।।६०।।
गुरु से १ । ४ भाव में गुरु, लग्न, भौम, सूर्य, बुध ये ५ ग्रह रेखाप्रद हैं।।६०।।
चन्द्रशुक्रौ च दुश्चिक्ये मन्दार्यार्काः शनिव्यये ।
सुते शुक्रेन्दुलग्नज्ञश्चन्द्रंविनात्वरौ ।।६१।।
२ भाव में गुरु, लग्न, भौम, सूर्य, बुध, चंद्र, शुक्र ये ७ ग्रह रेखाप्रद हैं।
३ भाव में शनि, गुरु, सूर्य ये ३ रेखाप्रद हैं। ५ भाव में शुक्र, चंद्र, लग्न, बुध, शनि
ये ५ ग्रह रेखाप्रद हैं। ६ भाव में शुक्र, लग्न, बुध, शनि ये ४ ग्रह रेखाप्रद हैं।।६१।।
लग्नार्याऽर्केन्दवोऽस्ते मृतौ जीवार्कभूसुताः ।
धर्मे शुक्रार्कलग्नेन्दुबुधाः मंदं विनाऽऽयमे ।।६२।।
माने गुरुबुधारार्कशुक्रहोरास्तथा विदुः ।
७ भाव में लग्न, गुरु, भौम, सूर्य, चंद्र ये रेखाप्रद हैं। ८ भाव में गुरु, सूर्य,
भौम ये रेखाप्रद हैं। ९ भाव में शुक्र, सूर्य, चंद्र, बुध ये रेखाप्रद हैं। ११ भाव
६०६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अथ भौमभावस्थानप्रदान्ग्रहानाह-
लग्नमन्दकुजा भौमो होराज्ञेन्दुदिनाधिपाः ।
मन्दारौ झरवी ज्ञेन्दुजवार्कतनुभार्गवाः ॥५६॥
भौम से १ भाव में लग्न, शनि, भौम ये तीन रेखाप्रद हैं। २ भाव में भौम,
३ भाव में लग्न, बुध, चंद्र, सूर्य ये ४ रेखाप्रद हैं। ४ भाव में शनि, भौम। ५
भाव में बुध, सूर्य। ६ भाव में बुध, चंद्र, गुरु, सूर्य, लग्न, शुक्र ये ६ ग्रह ॥५६॥
मन्दारौ तौ सितश्चार्किकुजार्कार्यार्कि लग्नकाः ।
सर्वे गुरुसितौ स्थानं भौमस्यैवंविदुर्बुधाः ॥५७॥
७ भाव में शनि, भौम, ८ भाव में शनि, भौम, शुक्र ये ३ रेखाप्रद हैं।
९ भाव में शनि, १० भाव में भौम, सूर्य, गुरु, शनि, लग्न ११ भाव में सूर्य,
चंद्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, लग्न और १२ भाव में गुरु, शुक्र ये २ ग्रह
अष्टकवर्गाध्यायः । ६०७
लग्नमन्दारविच्चन्द्राः सर्वे जीवज्ञभास्कराः ।
६ भाव में गुरु, बुध, सूर्य, चंद्र ये रेखाप्रद हैं। ७ भाव में भौम, शनि ये
रेखाप्रद हैं। ८ भाव में लग्न, चंद्र, शुक्र, गुरु, भौम, शनि ये रेखाप्रद हैं। ९ भाव
में शनि, भौम, सूर्य, बुध, शुक्र ये रेखाप्रद हैं। १० भाव में लग्न, शनि, भौम,
बुध, चन्द्र रेखाप्रद हैं। ११ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, शुक्र, शनि ये रेखाप्रद
हैं। १२ भाव में गुरु, बुध, सूर्य रेखाप्रद हैं।।५९।।
बुधभावस्थानप्रदान्ग्रहानाह
रे. स. ५४ बुधस्याष्टकवर्गः
| बु. | बृ. | शु. | श. | सू. | चं. | मं. | ल. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | ६ | १ | १ | ५ | २ | १ | १ |
| २ | ८ | २ | २ | ६ | ४ | २ | २ |
| ५ | ११ | ३ | ४ | ९ | ६ | ४ | ४ |
| ६ | १२ | ४ | ७ | ११ | ८ | ७ | ६ |
| ९ | ५ | ८ | १२ | १० | ८ | ८ | |
| १० | ८ | ९ | ११ | ९ | १० | ||
| ११ | ९ | १० | १० | ११ | |||
| १२ | ११ | ११ | ११ |
[कुण्डली विवरण:
- १ भाव (सिंह): ।।।। बु ५ बृ
- २ भाव (कर्क): ।।।। सू. ४
- ३ भाव (मिथुन): ।।। शु. ३ चं
- ४ भाव (वृष): ।।।। २
- ५ भाव (मेष): ।।।।। १
- ६ भाव (मीन): ।।।। १२
- ७ भाव (कुम्भ): ।।।।। मं ११
- ८ भाव (मकर): ।।।। १०
- ९ भाव (धनु): ।।। ९
- १० भाव (वृश्चिक): ।।।।। ७ श
- ११ भाव (तुला): ।७
- १२ भाव (कन्या): ।।।।। ६]
अथ गुरोः भावस्थानप्रदान्ग्रहानाह-
गुरोर्लग्रेसुखे जीवलग्नार्कबुधाः धने ।।६०।।
गुरु से १।४ भाव में गुरु, लग्न, भौम, सूर्य, बुध ये ५ ग्रह रेखाप्रद हैं।।६०।।
चन्द्रशुक्रौ च दुश्क्रिक्ये मन्दार्यार्काःशनिर्व्यये ।
सुते शुक्रेन्दुलग्नज्ञश्चन्द्रंविनात्वरौ ।।६१।।
२ भाव में गुरु, लग्न, भौम, सूर्य, बुध, चंद्र, शुक्र ये ७ ग्रह रेखाप्रद हैं।
३ भाव में शनि, गुरु, सूर्य ये ३ रेखाप्रद हैं। ५ भाव में शुक्र, चंद्र, लग्न, बुध, शनि
ये ५ ग्रह रेखाप्रद हैं। ६ भाव में शुक्र, लग्न, बुध, शनि ये ४ ग्रह रेखाप्रद हैं।।६१।।
लग्नार्याऽर्केदवोऽस्ते मृतौ जीवार्कभूसुताः ।
धर्मे शुक्रार्कलग्नेन्दुबुधाः मंदं विनाऽऽयमे ।।६२।।
माने गुरुबुधारार्कशुक्रहोरास्तथा विदुः ।
७ भाव में लग्न, गुरु, भौम, सूर्य, चंद्र ये रेखाप्रद हैं। ८ भाव में गुरु, सूर्य,
भौम ये रेखाप्रद हैं। ९ भाव में शुक्र, सूर्य, चंद्र, बुध ये रेखाप्रद हैं। ११ भाव