सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 592, कुल 800 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 592

५९२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अतोऽल्पबुद्धिगम्यं यच्छास्त्रमेतद्वदस्य मे ।
लोकयात्रापरिज्ञानमायुषो निर्णयं तथा ॥५॥
इसलिये इस युग (कलियुग) के अल्पबुद्धि वाले लोगों के जानने योग्य शास्त्र
का निर्देश करें जिसके अभ्यास से प्राणियों की लोकयात्रा (सुख दुःख) का परिज्ञान
हो और आयुष्य का निर्णय भी हो सके॥५॥
पराशर उवाच-
साधुपृष्टं त्वया ब्रह्मन्वदामि तव सुव्रत ।
लोकयात्रापरिज्ञानमायुषो निर्णयं तथा ॥६॥
पराशरजी ने कहा— हे ब्रह्मन्! तुमने बड़ा ही अच्छा प्रश्न किया है मैं
लोकयात्रा का ज्ञान और आयुष्य का निर्णय॥६॥
संकरस्याविरोधं च शास्त्रस्यापि प्रसिद्धये ।
प्रयोजनस्य लोकानामुपकाराय तच्छृणु ॥७॥
और ग्रहों की गति की संकरता से फल में विपर्यास होता है इसे भी शास्त्र
की सिद्धता के लिये अविरोध प्रकार और प्रयोजन भी लोकोपकार के लिये कहता
हूँ उसे सुनो॥७॥
भावानांशुभाशुभत्वमाह-
लग्नादिव्ययपर्यंता भावाः संज्ञानुरूपतः ।
फलदाः शुभसंदृष्टायुक्ता वा शोभना मताः ॥८॥
लग्न से लेकर व्यय भाव पर्यन्त सभी भाव यदि शुभग्रह से युक्त वा दृष्ट हों
तो उन भावों के संज्ञानुरूप शुभफल को देते हैं॥८॥
पापदृष्टयुताभावाः कल्याणोतरदायकाः ।
नितरां शत्रुनीचस्थैर्न च मित्रोच्चगैश्च तैः ॥९॥
पापग्रह से दृष्ट या युक्त हों तो अशुभ फल को देते हैं। यदि पापग्रह अपने
शत्रु की राशि में वा नीचराशि में हों तो अत्यंत अशुभ फल देता है किन्तु अपने
मित्र की राशि या उच्चराशि में हों तो शुभफल को ही देता है॥९॥
एवं सामान्यतः प्रोक्तं होराविद्भिस्तु सूरिभिः ।
मयैतत्सकलं प्रोक्तं पूर्वाचार्यानुवर्तिनी ॥१०॥