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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 603, कुल 800 में से

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पृष्ठ 603

अष्टकवर्गाध्यायः । ६०३
स्पष्टार्थाशिनेःकरणचक्रम्।
| मा. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ल. | स. |
| त. | | ० | ० | ० | ० | ० | ० | | ६ |
| ध. | | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ७ |
| स. | ० | | | ० | ० | ० | | | ४ |
| स. | | ० | ० | ० | ० | ० | ० | | ६ |
| स. | ० | ० | | ० | | ० | | ० | ५ |
| रि. | ० | | | | | | | | १ |
| जा. | | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ७ |
| मृ. | | ० | ० | | ० | ० | ० | ० | ६ |
| ध. | ० | ० | ० | | ० | ० | ० | ० | ७ |
| क. | | ० | | | ० | ० | ० | | ४ |
| आ | | | | | | | | | |
| व्य | ० | ० | | | | | ० | ० | ४ |
अथ लग्नस्य करणसंख्या करणप्रदग्रहांश्चाह-
तनौ तुर्ये च वह्निः स्यादुश्चिक्ये द्वौ धने शराः ।
बुद्धिमृत्यंकरिःफेपु षट्खेशक्षतराशिषु ॥४६॥
लग्न और ४ भाव में ३ करण, ३ भाव में २ करण, २ भाव में ५ करण,
५।८।९।१२ भाव में ६ करण, १०।११।६ भाव में १ करण॥४६॥
रूपं स्त्रियां गुरुं त्यक्त्वा लग्नस्य करणं विदुः ।
होरासूर्येन्दवो लग्ने लग्नरेंद्विनसूर्यजाः ॥४७॥
७ भाव में ७ करण होते हैं। लग्न में लग्न, सूर्य, चंद्र ये तीन करणप्रद हैं।
२ भाव में लग्न, भौम, चंद्र, सूर्य, शनि ये ५ करणप्रद हैं॥४७॥
गुरुज्ञौ लग्नचन्द्रारा लसूचंमंवुसौरयः ।
क्षतेशुक्रस्तथा चैकः कामे सर्वे गुरुं विना ॥४८॥
३ भाव में गुरु, बुध ये २ करणप्रद हैं। ४ भाव में लग्न, चन्द्र, भौम करणप्रद
हैं। ५ भाव में लग्न, सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, शनि ये करणप्रद हैं। ६ भाव में शुक्र,
७ भाव में सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, शुक्र, शनि ये करणप्रद हैं॥४८॥
मृतौ भृगुबुधौ त्यक्त्वा धर्मेगुरुसितौ विना ।
कर्मण्याये तथा शुक्नो व्यये सूर्येन्दुवर्जिताः ॥४९॥