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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

हम भारतवासी उन ऋषियों,
मुनियों तथा आचार्यों के
चिर-ऋणी हैं, जिन्होंने अपने
तप, त्याग से दीर्घायु प्राप्त
करके सैकड़ों वर्षों से शोध-
स्वरूप ऐसे ग्रन्थों की रचना
की जिन्हें आज तक विश्व का
कोई भी मानव (वैज्ञानिक)
असत्य सिद्ध नहीं कर पाया।

गाँवों तथा नगरों से दूर, घोर जंगलों के मध्य, तपश्चर्या में लीन, साधु-
महात्माओं के आगे वन्य हिंसक जन्तु भी नत हो जाते हैं, उन्हीं ने
आत्मिक प्रेरणास्वरूप सर्वजन - हिताय ऐसे महाग्रन्थों की रचना की है।

हस्तलिखित, असली, प्राचीन
भृगुसंहिता फलित प्रकाश
[कुण्डली चक्र:]
वृष २ | मेष १ | मीन १२
मिथुन ३ | कर्क ४ | मकर १० | कुंभ ११
सिंह ५ | कन्या ६ | तुला ७ | वृश्चिक ८ | धनु ९
1
प्रथम खण्ड
[ आवश्यक ज्ञातव्य ]

ग्रह-शान्ति के उपाय
यदि कोई ग्रह किसी जातक के लिए अशुभ हो तो उसकी शान्ति के लिए
निम्नलिखित वस्तुओं का दान करके, उस ग्रह के मन्त्र का जप करना चाहिए—
(१) सूर्य—माणिक्य, तांबा, लाल चन्दन, लाल वस्त्र, गेहूँ, गुड़, लाल कमल, गाय।
(२) चन्द्र—मोती, चाँदी, कपूर, श्वेतवस्त्र, चावलों से भरी बांस की पिटारी, जल-
पूर्ण घट, गाय, शंख।
(३) मंगल—प्रवाल, लाल रंग का वस्त्र, स्वर्ण, लाल रंग का बैल, मसूर, ताँबा,
गेहूँ तथा कनेर के फूल।
(४) बुध—पन्ना, स्वर्ण, घृत, पीतवस्त्र, नीलवस्त्र, कांसी, मूंगा, हाथी दाँत।
(५) गुरु—पुखराज, स्वर्ण, पीतवस्त्र, हल्दी, पीले रंग का अन्न, नमक, घोड़ा।
(६) शुक्र—हीरा, स्वर्ण, चित्र-विचित्र रंग का वस्त्र, चावल, गाय, घृत, सुगन्धित
वस्तुएँ तथा श्वेत रंग का घोड़ा।
(७) शनि—नीलम, लोहा, काले तिल, बैल, कृष्णवस्त्र, स्वर्ण, नीले रंग का कम्बल,
काले रंग की गाय, उड़द तथा भैंस।
(८) राहु—गोमेद, स्वर्ण, कृष्णवस्त्र, कम्बल, तलवार, तिल का तेल तथा घोड़ा।
(९) केतु—वैदूर्य, कस्तूरी, स्वर्ण, कम्बल, तिल का तेल, शस्त्र तथा बकरा।

प्रारंभिक जानकारी
जन्मकुण्डलीस्थ ग्रहों का फलादेश जानने से पूर्व ज्योतिष-विषयक प्रारम्भिक
जानकारी, यथा—तिथि, वार, नक्षत्र, राशि, ग्रहों का पारस्परिक सम्बन्ध आदि
का ज्ञान होना अत्यावश्यक है। अस्तु, इस प्रथम-खण्ड में उन्ही सब प्रारम्भिक,
परन्तु अत्यावश्यक ज्ञातव्य विषयों का उल्लेख किया जा रहा है, जिन्हें जाने बिना
ज्योतिष विद्या के क्षेत्र में प्रवेश ही नहीं मिल सकता।
तिथि अथवा मितौ
भारतीय ज्योतिष में चन्द्रमा की एक 'कला' को 'तिथि' कहते हैं। सामान्य
बोलचाल की भाषा में तिथि को ही 'मिती' के नाम से पुकारा जाता है।
विक्रम-सम्वत्सर का प्रारम्भ चैत्र शुक्ला प्रतिपदा से होता है तथा अन्त
चैत्र कृष्णपक्ष की अमावस्या को होता है। जिस रात्रि में चन्द्रमा बिल्कुल दिखाई
नहीं देता, वह तिथि कृष्णपक्ष की 'अमावस्या' कही जाती है। कृष्णपक्ष की
अमावस्या के दूसरे दिन से शुक्लपक्ष की प्रतिपदा आरम्भ होती है।
जिन पन्द्रह दिनों में चन्द्रमा प्रतिदिन आकाश में थोड़ा-थोड़ा बढ़ना आरंभ
होता है तथा पन्द्रहवें दिन अपने पूर्णरूप में दिखाई देता है, उसे 'शुक्लपक्ष' कहते
हैं तथा बाद के जिन पन्द्रह दिनों में चन्द्रमा आकाश में प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा करके
घटने लगता है तथा पन्द्रवें दिन बिल्कुल दिखाई नहीं देता, उसे 'कृष्णपक्ष' कहते हैं।
इस प्रकार प्रत्येक महीने में पन्द्रह-पन्द्रह दिन के दो पक्ष हुआ करते हैं—(१) शुक्ल-
पक्ष और (२) कृष्णपक्ष। पक्ष को आम बोलचाल की भाषा में 'पखवाड़ा' कहा
जाता है।
यद्यपि नवीन संवत्सर का प्रारम्भ चैत्र मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से
होता है, परन्तु प्रत्येक मास (महीने) का प्रारम्भ कृष्णपक्ष से ही माना जाता है
अर्थात् प्रत्येक महीने का पहला आधा भाग कृष्णपक्ष का और दूसरा आधा भाग
शुक्लपक्ष का होता है।

२०
शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से जो पन्द्रह दिन की पन्द्रह तिथियाँ होती हैं, उन्हें
क्रमशः (१) प्रतिपदा, (२) द्वितीया, (३) तृतीया, (४) चतुर्थी, (५) पंचमी,
(६) षष्ठी, (७) सप्तमी, (८) अष्टमी, (६) नवमी, (१०) दशमी, (११)
एकादशी, (१२) द्वादशी, (१३) त्रयोदशी, (१४) चतुर्दशी, तथा (१५) पूर्णिमा
के नाम से अभिहित किया जाता है। इसके बाद कृष्णपक्ष की तिथियों को भी
प्रतिपदा से चतुर्दशी तक इन्हीं नामों से पुकारा जाता है परन्तु कृष्णपक्ष की अन्तिम
अर्थात् पन्द्रहवीं तिथि को 'अमावस्या' कहा जाता है। दोनों पक्षों की प्रतिपदा से
चतुर्दशी तक की तिथियों को क्रमशः १, २, ३, ४ आदि अंकों में लिखा जाता है,
परन्तु पूर्णिमा को १५ तथा अमावस्या तिथि को ३०, अंक के रूप में लिखा जाता है।

तिथियों के स्वामी

विभिन्न देवताओं को विभिन्न तिथियों का स्वामी माना गया है। किस
तिथि का स्वामी कौन-सा देवता होता है, इसे नीचे बताया गया है। जिस तिथि के
स्वामी का जैसा स्वभाव है, वही स्वभाव उस तिथि का तथा उस तिथि में जन्म
लेने वाले व्यक्ति का भी समझना चाहिए—

तिथिस्वामीतिथिस्वामी
प्रतिपदाअग्निनवमीदुर्गा
द्वितीयाब्रह्मादशमीकाल
तृतीयागौरीएकादशीविश्वेदेवा
चतुर्थीगणेशद्वादशीविष्णु
पंचमीशेषनागत्रयोदशीकामदेव
षष्ठीकार्तिकेयचतुर्दशीशिव
सप्तमीसूर्यपूर्णिमाचन्द्रमा
अष्टमीशिवअमावस्यापितर

नक्षत्र

ज्योतिषियों ने सम्पूर्ण आकाश-मण्डल को २७ भागों में विभक्त कर, प्रत्येक
भाग को एक-एक 'नक्षत्र' की संज्ञा दी है। अर्थात् जिस प्रकार पृथ्वी पर स्थान की
दूरी को किलोमीटर आदि में नापा जाता है, उसी प्रकार आकाश में एक स्थान से
दूसरे स्थान की दूरी को नक्षत्रों के माध्यम से नापा जाता है। जिस प्रकार पृथ्वी
पर नापने की दूरी में किलोमीटर के अन्तर्गत मीटर, सेण्टीमीटर आदि होते हैं, उसी
प्रकार प्रत्येक नक्षत्र को भी ४ चरण तथा ६० अंशों में विभाजित किया गया है।
नक्षत्रों के 'अंश' को 'घटी' नाम से भी सम्बोधित किया जाता है।

२१
नक्षत्रों के नाम क्रमशः निम्नानुसार हैं—
| १ अश्विनी | ८ पुष्य | १५ स्वाति | २२ श्रवण |
| २ भरणी | ९ अश्लेषा | १६ विशाखा | २३ धनिष्ठा |
| ३ कृत्तिका | १० मघा | १७ अनुराधा | २४ शतभिषा |
| ४ रोहिणी | ११ पूर्वाफाल्गुनी | १८ ज्येष्ठा | २५ पूर्वाभाद्रपद |
| ५ मृगशिरा | १२ उत्तराफाल्गुनी | १९ मूल | २६ उत्तराभाद्रपद |
| ६ आर्द्रा | १३ हस्त | २० पूर्वाषाढ़ा | २७ रेवती |
| ७ पुनर्वसु | १४ चित्रा | २१ उत्तराषाढ़ा | |
उत्तराषाढ़ा की अन्तिम १५ घटी तथा श्रवण नक्षत्र की पहली ४ घड़ी—
इस प्रकार कुल १९ घड़ी का एक नक्षत्र 'अभिजित्' भी माना जाता है। 'अभिजित्'
सहित नक्षत्रों की कुल संख्या २८ हो जाती है। २८ नक्षत्रों के क्रम में अभिजित
२२वाँ नक्षत्र माना जाता है उसके बाद श्रवण से रेवती पर्यन्त क्रमशः २३ से २८
तक की संख्या वाले नक्षत्र माने जाते हैं।
नक्षत्रों के स्वामी
पूर्वोक्त २८ नक्षत्रों के स्वामी २८ विभिन्न देवता माने गये हैं। जिस देवता
का जो स्वभाव है, उसी के अनुरूप नक्षत्र तथा उस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक
का स्वभाव भी माना जाता है। विभिन्न नक्षत्रों के स्वामी निम्नानुसार हैं—

नक्षत्रस्वामीनक्षत्रस्वामी
१ अश्विनीअश्विनीकुमार१५ स्वातिपवन
२ भरणीकाल१६ विशाखाशक्राग्नि
३ कृत्तिकाअग्नि१७ अनुराधामित्र
४ रोहिणीब्रह्मा१८ ज्येष्ठाइन्द्र
५ मृगशिराचन्द्रमा१९ मूलनिर्ऋति
६ आर्द्रारुद्र२० पूर्वाषाढ़ाजल
७ पुनर्वसुअदिति२१ उत्तराषाढ़ाविश्वेदेवा
८ पुष्यबृहस्पति२२ अभिजित्ब्रह्मा
९ अश्लेषासर्प२३ श्रवणविष्णु
१० मघापितर२४ धनिष्ठावसु
११ पूर्वाफाल्गुनीभग२५ शतभिषावरुण
१२ उत्तराफाल्गुनीअर्यमा२६ पूर्वाभाद्रपदअजैकपाद
१३ हस्तसूर्य२७ उत्तराभाद्रपदअहिर्बुध्न्य
१४ चित्राविश्वकर्मा२८ रेवतीपूषा

२२

नक्षत्रों के चरणाक्षर

ऊपर बताया जा चुका है कि प्रत्येक नक्षत्र को ४ चरण तथा ६० अंशों में
विभाजित किया गया है। ज्योतिषियों के प्रत्येक नक्षत्र के प्रत्येक चरण का एक-एक
'अक्षर' भी निर्धारित किया है। जिस नक्षत्र के जिस चरण के लिए जो अक्षर निश्चित
है, उसका उल्लेख नीचे किया गया है। जो मनुष्य जिस नक्षत्र के जिस चरण के
भोग-काल में जन्म लेता है, उसका नाम उसी चरणाक्षर के आधार पर रखा जाता
है। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति का जन्म अश्विनी नक्षत्र के तीसरे चरण में
हुआ हो तो उसका नाम का आदि अक्षर 'चो' होगा और उसी के आधार पर उसका
नाम 'चोवसिंह', 'चोइथराम' आदि रखा जाएगा।
किस नक्षत्र के किस चरण के लिए कौनसा अक्षर नियत है, इसे निम्नानुसार
समझ लें।

नक्षत्र नामचरणाक्षर: प्रथमचरणाक्षर: द्वितीयचरणाक्षर: तृतीयचरणाक्षर: चतुर्थनक्षत्र नामचरणाक्षर: प्रथमचरणाक्षर: द्वितीयचरणाक्षर: तृतीयचरणाक्षर: चतुर्थ
१. अश्विनीचूचेचोला१५. स्वातिरूरेरोता
२. भरणीलीलूलेलो१६. विशाखातीतूतेतो
३. कृत्तिकाआईउए१७. अनुराधानानीनूने
४. रोहिणीओवावीवू१८. ज्येष्ठानोयायीयू
५. मृगशिरावेवोकाकी१९. मूलयेयोभाभी
६. आर्द्राकुघङछ२०. पूर्वाषाढ़ाभूधाफाढा
७. पुनर्वसुकेकोहाही२१. उत्तराषाढ़ाभेभोजाजी
८. पुष्यहूहेहोडा२२. अभिजित्जूजेजोखा
९. अश्लेषाडीडूडेडो२३. श्रवणखीखूखेखो
१०. मघामामीमूमे२४. धनिष्ठागागीगूगे
११. पू. फाल्गुनीमोटाटीटू२५. शतभिषागोसासीसू
१२. उ. फाल्गुनीटेटोपापी२६. पू. भाद्रपदसेसोदादी
१३. हस्तपूषणठ२७. उ. भाद्रपददूथझञ
१४. चित्रापेपोरारी२८. रेवतीदेदोचाची

वार

भारतीय ज्योतिष के अनुसार आकाश-मण्डल में मुख्य ग्रहों की संख्या ७ है।
वे ग्रह हैं—(१) शनि, (२) बृहस्पति, (३) मंगल, (४) रवि, (५) शुक्र, (६) बुध
और (७) चन्द्रमा। इन ग्रहों की अवस्थिति क्रमशः एक दूसरे से नीचे है। अर्थात्
शनि की कक्षा सबसे ऊपर तथा चन्द्रमा की कक्षा सबसे नीचे है।
एक दिन-रात २४ घंटे का होता है। ज्योतिष में एक घंटे के समय के लिए
'होरा' शब्द प्रचलित है। यह 'होरा' शब्द 'अहोरात्र' शब्द का संक्षिप्त रूप है अर्थात्

२३
'अहोरात्र' शब्द में से 'अहो' का अन्तिम अक्षर 'हो' तथा 'रात्र' का यादि अक्षर 'रा'
लेकर 'होरा' शब्द का निर्माण हुआ है। इस तरह 'होरा' शब्द को घण्टे का पर्याय-
वाची भी कहा जा सकता है।
सृष्टि के प्रारंभ में सर्वप्रथम सूर्य दिखाई दिया, अतः पहली 'होरा' का स्वामी
'सूर्य' को माना गया तथा सृष्टि के पहले दिन का नामकरण किया गया—'रविवार'
अर्थात् सूर्यवार। तत्पश्चात् अगली प्रत्येक होरा पर अन्य एक-एक ग्रह का अधिकार
माना गया। फलतः एक दूसरे के समीपी क्रम में दूसरी होरा का स्वामी शुक्र, तीसरी
का बुध, चौथी का चन्द्रमा, पाँचवीं का शनि, छठी का वृहस्पति तथा सातवीं का
मंगल हुआ । इसी क्रम के पुनरावर्त्तन के फलस्वरूप पहले दिन की चौबीसवीं अर्थात्
अन्तिम होरा बुध के स्वामित्व पर समाप्त हुई, तब दूसरे दिन की पहली होरा का
स्वामी चन्द्रमा हुआ, अतः उस दिन का नाम रखा गया—सोमवार अर्थात् चन्द्रवार।
इसी क्रमानुसार तीसरे दिन की पहली होरा का स्वामी 'मंगल', चौथे दिन का बुध,
पाँचवें दिन का वृहस्पति, छठे दिन का शुक्र तथा सातवें दिन की पहली होरा का
स्वामी शनि हुआ। फलतः सृष्टि के पहले वारों का क्रम हुआ—(१) रविवार,
(२) सोमवार, (३) मंगलवार, (४) बुधवार, (५) गुरुवार, (६) शुक्रवार और
(७) शनिवार । आठवें दिन फिर पहली होरा का स्वामी सूर्य हुआ । इसी क्रम से
अगले दिनों की पहली होरा के स्वामी पूर्ववत् ग्रह होते चले आ रहे हैं। अस्तु उन
सात वारों का चक्र निरन्तर चल रहा है। सात दिनों के इस समूह को ही 'सप्ताह'
कहा जाता है।
प्रत्येक वार का स्वामी उसी का अधिपति ग्रह होता है। गुरु, सोम, बुध तथा
शुक्र—इन चार वारों को 'सौम्य' तथा मंगल, रवि एवं शनि—इन तीन वारों को
'क्रूर' संज्ञक माना गया है। जिस वार के स्वामी का जैसा स्वभाव है, वही स्वभाव
उस वार का तथा उस वार में जन्म लेने वाले जातक का भी माना जाता है।
राशि
जिस प्रकार सम्पूर्ण खमण्डल को २७ या २८ नक्षत्रों में बांटा गया है, उसी
प्रकार उसे १२ राशि, १०८ भाग यथा ३६० अंशों में भी बाँटा गया है। बारह
राशियों के नाम इस प्रकार हैं—
१- मेष ४- कर्क ७- तुला १०. मकर
२- वृष ५- सिंह ८- वृश्चिक ११- कुम्भ
३- मिथुन ६- कन्या ९. धनु १२- मीन
अस्तु, खमण्डल अर्थात् भ-चक्र के ३० अंश अथवा ९ भागों की एक राशि
होती है। पहले बताया जा चुका है कि एक-एक नक्षत्र को चार-चार भागों में बाँटा

२४
गया है और प्रत्येक भाग के लिए एक-एक चरणाक्षर भी निश्चित किया गया है अस्तु
२७ नक्षत्रों के कुल १०८ भाग अर्थात् 'चरण' हुए और एक राशि के अन्तर्गत आये
९ भाग अर्थात् नक्षत्रों के ९ चरण । इस प्रकार सवा दो नक्षत्रों की हुई एक राशि ।
किस राशि के अन्तर्गत कौन-कौन सा नक्षत्र समाहित है, इसे नक्षत्रों के
चरणाक्षरों के आधार पर निम्नानुसार समझ लेना चाहिए—

राशि का नामराशि के चरणाक्षर
१. मेषचूचेचोलालीलूलेलो
२. वृषईऊएओवावीवूवे
३. मिथुनकाकीकूघङछकेको
४. कर्कहीहूहेहोडाडीडूडे
५. सिंहमामीमूमेमोटाटीटू
६. कन्याटोपापीपूषणठपे
७. तुलारारीरूरेरोतातीतू
८. वृश्चिकतोनानीनूनेनोयायी
९. धनुयेयोभाभीभूधाफाढा
१०. मकरभोजाजीखीखूखेखोगा
११. कुम्भगूगेगोसासीसूसेसो
१२. मीनदीदूथझञदेदोचा
टिप्पणी—'अभिजित्' नक्षत्र के चारों चरणों—जू, जे, जो, खा—की गणना
'मकर' राशि के अन्तर्गत की जाती है।

२५
ग्रह : उनका स्वभाव और प्रभाव
आकाशमण्डलस्थ असंख्य ज्योतिष्पिण्डों में से जो पिण्ड पृथ्वी स्थित सभी जड़-
चेतन पदार्थों को अपने प्रभाव से प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं, उनकी गणना
ग्रहों में की जाती है। प्राचीन भारतीय-ज्योतिष में ऐसे ग्रहों की कुल संख्या ७
बताई गई है। वे हैं—१. सूर्य, २. चन्द्र, ३. मंगल, ४. बुध, ५. बृहस्पति, ६. शुक्र
और ७. शनि।
परवर्ती ज्योतिषियों ने अपने अनुसन्धानों के बल पर यह सिद्ध किया कि
भूमण्डल की दोनों ओर पड़ने वाली छाया भी ग्रहों जैसी ही प्रभावशालिनी है, अतः
उन्होंने 'राहु', 'केतु' नामक दो अन्य छायाग्रहों की कल्पना करके ग्रहों की कुल संख्या
९ कर दी।
आधुनिक काल के पाश्चात्य ज्योतिषियों ने आकाशमण्डल में ३ अन्य ग्रहों
की भी खोज की है। वे हैं—(१) हर्षल, (२) नेपच्यून और (३) प्लूटो। ये सभी
ग्रह पूर्वोक्त ७ ग्रहों से भी अत्यधिक ऊँचाई पर स्थित हैं। इस प्रकार कुल ग्रहों की
संख्या १२ हो जाती है। परन्तु भारतीय-ज्योतिष में अभी तक पाश्चात्य ज्योतिषों
द्वारा नवीन-आविष्कृत तीन ग्रहों को स्थान नहीं दिया गया है। अतः उसमें छायाग्रह
राहु-केतु सहित केवल ९ ग्रहों का ही उल्लेख मिलता है।
चन्द्र, बृहस्पति तथा शुक्र इन तीन ग्रहों को शुभ ग्रह माना जाता है। बुध
को नपुंसक ग्रह माना गया है, यह जिस ग्रह के साथ बैठता है, उस जैसा ही प्रभाव
देता है। सूर्य, मंगल तथा शनि क्रूर ग्रह कहे गये हैं। राहु-केतु की गणना भी क्रूर
ग्रहों में की जाती है। परन्तु कुछ विद्वानों के मतानुसार 'केतु' को भी शुभ ग्रह माना
जाता है।
उक्त ९ ग्रहों में कौनसा ग्रह किस स्वभाव, बल तथा प्रभाव वाला है तथा
उसके द्वारा किन विषयों का विशेष रूप से विचार करना चाहिए, इसे निम्नानुसार
समझ लें—
(१) सूर्य—यह ग्रह 'पाप' संज्ञक, पूर्व दिशा का स्वामी, पुरुष जाति, रक्त-
वर्ण एवं पित्त प्रकृति का है। स्नायु, मेरुदण्ड, नेत्र, हृदय आदि अवयवों पर इसका
विशेष प्रभाव होता है। इसके द्वारा आत्मा आरोग्य, स्वभाव, पिता, राज्य, देवालय,
शोक, अपमान, कलह तथा रोग—अतिसार, क्षय, मंदाग्नि, मानसिक रोग, नेत्र
विकार आदि के सम्बन्ध में विचार करना चाहिए।
यह लग्न से सप्तम स्थान में बली एवं मकर से ६ राशियों तक चेष्टा-बली
होता है।

(२) चन्द्र-यह ग्रह 'शुभ' संज्ञक, पश्चिमोत्तर दिशा का स्वामी, स्त्री जाति,
श्वेत वर्ण एवं जलीय प्रकृति का है। यह रक्त का स्वामी तथा वातश्लेष्मा धातु वाला
है। इसके द्वारा मन, चित्त वृत्ति, सम्पत्ति, माता, पिता, निरर्थकभ्रमण, राजकीय
अनुग्रह, उदर, मस्तिष्क एवं शारीरिक स्वास्थ्य तथा कफज एवं जलीय रोग, स्त्रीजन्य
रोग, मानसिक रोग तथा पीनस रोग आदि के विषय में विचार करना चाहिए ।
यह लग्न से चतुर्थ स्थान में बली तथा मकर से ६ राशियों तक चेष्टा बली
होता है ।
कृष्णपक्ष की षष्ठी से शुक्लपक्ष की दशमी तक बह क्षीण रहता है । इस
अवधि में इसे पाप ग्रह तथा क्षीण माना जाता है। शुक्ल पक्ष की दशमी से कृष्ण
पक्ष की पंचमी तक यह पूर्ण ज्योतिर्मान्, बली तथा शुभ ग्रह माना है ।
चतुर्थभाव में बली चन्द्रमा हो पूर्ण फलदायी होता है, क्षीण चन्द्रमा नही ।
(३) मङ्गल-यह ग्रह 'पाप' संज्ञक, दक्षिण दिशा का स्वामी, पुरुष जाति,
रक्त वर्ण, पित्त प्रकृति तथा अग्नि तत्व वाला है। यह उत्तेजक, तृष्णाकारक तथा
दुःखदायी है। इसके द्वारा धैर्य, पराक्रम, भाई-बहिन, शक्ति तथा रक्त सम्बन्धी
विचार करना चाहिए।
यह तीसरे तथा छठे स्थान में बली, दशम स्थान में दिग्बली। चन्द्रमा के साथ
चेष्टा बली तथा द्वितीय भाग में बलहीन होता है ।
(४) बुध-यह ग्रह 'नपुंसक', संज्ञक उत्तर दिया का स्वामी, श्यामवर्ण,
त्रिदोष तथा पृथ्वी तत्त्व वाला है। यह व्यवसाय, चिकित्सा, ज्योतिष, शिल्प, कानून,
चतुर्थ एवं दशम स्थान का कारक है। इसके द्वारा बुद्धिभ्रम, विवेक, शक्ति, जिह्वा
एवं तालु से उच्चारण किये जाने वाले शब्द एवं अवयव तथा गुप्त रोग, श्वेतकुष्ठ,
गूंगापन, वातरोग, संग्रहणी आदि का विचार किया जाता है।
बुध चतुर्थ स्थान में 'निर्बल' होता है। यह जैसे यह के साथ बैठा हो उसी के
स्वभाव का बन कर, शुभ अथवा अशुभ फल देने वाला शुभग्रह अथवा पापग्रह बन
जाता है। पूर्ण चन्द्र, बुध तथा शुक्र के साथ शुभ फलदायक तथा सूर्य, मंगल,
शनि, राहु, केतु के साथ अशुभ फलदाता होता है। यदि यह अकेला हो तो शुभ
फल देता है।
(५) वृहस्पति-यह ग्रह 'शुभ' संज्ञक, पूर्वोत्तर दिशा का स्वामी, पीतवर्ण
तथा आकाश तत्त्व वाला है। यह हृदय की शक्ति का कारक है। इसके द्वारा
पारलौकिक सुख, आध्यात्मिक-सुख, घर, विद्या, पुत्र, पौत्र तथा शोथ, गुल्म आदि
रोगों का विचार किया जाता है।
लग्न में बैठा हुआ वृहस्पति अभी तथा चन्द्रमा के साथ कहीं भी बैठा हुआ
चेष्टा-बली होता है।

२७
(६) शुक्र—यह ग्रह 'शुभ' संज्ञक, दक्षिण-पूर्व दिशा का स्वामी, श्याम-गौर
वर्ण तथा जलीय तत्त्व वाला है। यह कफ, वीर्य आदि धातुओं तथा काव्य-संगीत,
वाहन, शय्या, कामेच्छा, पत्नी (स्त्री), आँख, वस्त्राभूषण आदि का कारक है। इसके
द्वारा सांसारिक-सुख, व्यावहारिक-सुख, एवं चातुर्य का विचार किया जाता है। यदि
जातक का जन्म दिन में हुआ हो तो इसके द्वारा उसकी माता के सम्बन्ध में भी विचार
किया जाता है।
यह छठे स्थान में निष्फल तथा सातवें स्थान में अनिष्टकर होता है।
(७) शनि—यह ग्रह 'क्रूर' संज्ञक, नपुंसक जाति, पश्चिम दिशा का स्वामी
कृष्णवर्ण, वातश्लेष्मिक प्रकृति का तथा वायुतत्त्व वाला है। इसके द्वारा आयु, शारीरिक
बल, दृढ़ता, ऐश्वर्य, यश, मोक्ष, योगाभ्यास, नौकरी, विदेशी भाषा, विपत्ति एवं मूर्च्छा
आदि रोगों का विचार किया जाता है। यदि जातक का जन्म रात्रि में हुआ हो तो
यह ग्रह माता-पिता का कारक होता है। पापग्रह होने पर भी इसका अन्तिम
परिणाम सुखदायक होता है। यह जातक को दुर्भाग्य एवं संकटों का शिकार बनाने
के बाद उसे शुद्ध एवं सात्विक बना देता है।
यह सप्तम स्थान में बली तथा चन्द्रमा अथवा किसी अन्य वक्री ग्रह के साथ
रहने पर चेष्टा बली होता है।
(८) राहु—यह ग्रह 'क्रूर' संज्ञक, दक्षिण दिशा का स्वामी तथा कृष्णवर्ण
है। यह गुप्त युक्ति-बल, कष्ट एवं त्रुटियों का कारक है। यह जिस स्थान में बैठता है
वहाँ की उन्नति को रोक देता है।
(९) केतु—यह ग्रह 'क्रूर' संज्ञक, उत्तर दिशा का स्वामी तथा कृष्णवर्ण है।
कुछ विद्वान इसे 'शुभ ग्रह' भी मानते हैं। यह गुप्त-शक्ति-बल, कठिन कर्म, भय एवं
त्रुटियों का कारक है। इसके द्वारा जातक के हाथ-पाँव, क्षुधाजनित कष्ट, माता-
मह (नाना) एवं चर्म रोगों के सम्बन्ध में विचार किया जाता है।

राशि : उनका स्वभाव और प्रभाव

कुल राशियां १२ हैं। किस राशि का क्या स्वभाव, प्रभाव है तथा उसके
द्वारा किन विषयों का विशेष रूप से विचार किया जाता है, निम्नानुसार समझ लें—
(१) मेष—यह राशि 'पुरुष' जाति, पूर्व दिशा की स्वामिनी, लाल-पीले
रंग वाली, कान्तिहीन, क्षत्रिय वर्ण, चर-संज्ञक, अग्नि तत्त्व, समान अंग, अल्प-सन्तति
तथा पित्त प्रकृति होती है। यह अहंकारी, साहसी तथा मित्रों के प्रति दयालु-स्वभाव

२८

रखने वाली है। इसके द्वारा जातक के मस्तक के सम्बन्ध में विचार किया
जाता है।
(२) वृष—यह राशि 'स्त्री' जाति, दक्षिण दिशा की स्वामिनी, श्वेत रंग
वाली, कान्ति-हीन, वैश्य वर्ण, स्थिर संज्ञक, शिथिल शरीर, शुभकारक, महा कष्ट-
कारी तथा भूमितत्त्व वाली है। यह स्वार्थी तथा सांसारिक कार्यों में दक्षता एवं
बुद्धिमत्ता से काम लेने वाली है। इसके द्वारा जातक के मुंह तथा कपोलों के सम्बन्ध
में विचार किया जाता है। इसे 'अर्द्ध जलराशि' भी कहते हैं।
(३) मिथुन—यह राशि 'पुरुष' जाति, पश्चिम दिशा की स्वामिनी, हरित
रंग, चिकनी, उष्ण स्वभाव, शूद्रवर्ण, शिथिल शरीर, विषमोदयी तथा महाशब्दकारी
है। यह शिल्पी तथा विद्या-व्यसनी स्वभाव की है। इसके द्वारा जातक के स्कन्ध तथा
बाहुओं के सम्बन्ध में विचार किया जाता है।
(४) कर्क—यह राशि 'स्त्री' जाति, उत्तर दिशा की स्वामिनी, रक्त-धवल
मिश्रित रंग वाली, जलचारी, सौम्य, कफ प्रकृति, बहु सन्ततिवान्, बहुत पाँवों वाली,
रात्रिबली एवं समोदयी है। यह लज्जालु स्वभाव की, समयानुसार चलने वाली तथा
सांसारिक उन्नति के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहने वाली है। इसके द्वारा जातक
के वक्षस्थल एवं गुर्दों के सम्बन्ध में विचार किया जाता है।
(५) सिंह—यह राशि 'पुरुष' जाति, पूर्व दिशा की स्वामिनी, पीले रंग वाली,
क्षत्रिय-वर्ण, उष्ण-स्वभाव, पुष्ट शरीर, पित्त प्रकृति, अग्नि तत्त्व वाली, निर्जल एवं
अल्प सन्ततिवान् है। इसका स्वभाव मेष राशि जैसा है, परन्तु इसमें स्वातन्त्र्य-
प्रियता एवं उदारता अधिक है। इसके द्वारा जातक के हृदय के सम्बन्ध में विचार
किया जाता है।
(६) कन्या—यह राशि 'स्त्री' जाति, दक्षिण दिशा की स्वामिनी, पिंगल
रंग जाती, द्वि-स्वभाव, पृथ्वीतत्त्व वाली, वायु एवं शीत-प्रकृति, अल्प सन्ततिवान्
तथा रात्रिबली है। इसका स्वभाव मिथुन राशि जैसा है, परन्तु यह अपनी उन्नति
एवं सम्मान पर अधिक ध्यान देती है। इसके द्वारा जातक के पेट के सम्बन्ध में
विचार किया जाता है।
(७) तुला—यह राशि 'पुरुष' जाति, पश्चिम दिशा की स्वामिनी, श्याम
रंग की, शूद्रवर्ण, क्रूर-स्वभाव, वायुतत्त्व वाली, शीर्षोदयी, चर-संज्ञक, दिनबली,
अल्प सन्ततिवान् एवं पादजलराशि है। यह स्वभाव से ज्ञानप्रिय, राजनीतिज्ञ,
विचारशील तथा कार्य-सम्पादक है। इसके द्वारा जातक के नाभि से नीचे के अंगों
के सम्बन्ध में विचार किया जाता है।
(८) वृश्चिक—यह राशि 'स्त्री' जाति, उत्तर दिशा की स्वामिनी, शुभ्र रंग
वाली, ब्राह्मणवर्ण, कफ प्रकृति, रात्रि बली, बहु जल तत्त्व वाली तथा बहु सन्ततिवान्

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है। इसका स्वभाव निर्मल, स्पष्टवादी, हठी, दम्भी तथा दृढ़-प्रतिज्ञ है। इसके द्वारा
जातक की जननेन्द्रिय के सम्बन्ध में विचार किया जाता है।
(९) धनु—यह राशि 'पुरुष' जाति, पूर्व दिशा की स्वामिनी, सुनहरे रंग
वाली, क्षत्रियवर्ण, अग्नि तत्त्व वाली, पित्त-प्रकृति, द्वि-स्वभाव, दिनबली, दृढ़-शरीर,
अल्प सन्ततिवान् तथा अर्द्ध जल राशि है। इसका स्वभाव करुणामय, अधिकार प्रिय
तथा मर्यादा युक्त है। इसके द्वारा जातक के पाँवों की संधि एवं जांघों के सम्बन्ध में
विचार किया जाता है।
(१०) मकर—यह राशि 'स्त्री' जाति, दक्षिण दिशा की स्वामिनी, पिंगल
रंग की, वैश्य वर्ण, पृथ्वी तत्त्व वाली, शिथिल शरीर, वात प्रकृति तथा रात्रिबली
है। इसका स्वभाव उच्चस्थिति का अभिलाषी है। इसके द्वारा जातक के पाँवों के
घुटनों के सम्बन्ध में विचार किया जाता है।
(११) कुम्भ—यह राशि 'पुरुष' जाति, पश्चिम दिशा की स्वामिनी, विचित्र
रंग वाली, शूद्र वर्ण, वायुतत्त्व एवं त्रिदोष प्रकृति वाली, उष्ण-स्वभाव, क्रूर, मध्यम
सन्तति वाली, दिनबली तथा शीर्षोदयी है। इसका स्वभाव नवीन वस्तुओं का
आविष्कारक, विचारशील, धार्मिक तथा शान्त है। इसके द्वारा जातक के पेट के
भीतरी भागों के सम्बन्ध में विचार किया जाता है।
(१२) मीन—यह राशि 'स्त्री' जाति, उत्तर दिशा की स्वामिनी, पिंगल रंग
वाली, ब्राह्मणवर्ण, कफ प्रकृति, जल तत्त्ववाली तथा रात्रिबली है। यह पूर्णतः जल-
राशि है। इसका स्वभाव श्रेष्ठ, दयालु तथा दानशीलता का है। इसके द्वारा जातक
के पाँवों के सम्बन्ध में विचार किया जाता है।
राशियों के स्वामी
विभिन्न राशियों के विभिन्न ग्रहस्वामी माने गये हैं। कौनसा ग्रह किस राशि
का स्वामी है, इसे निम्नानुसार समझना चाहिए—
मेष एवं वृश्चिक—इन दोनों राशियों का स्वामी 'मंगल' है।
१ ८
वृष एवं तुला—इन दोनों राशियों का स्वामी 'शुक्र' है।
२ ७
मिथुन एवं कन्या—इन दोनों राशियों का स्वामी 'बुध' है।
३ ६
कर्क—इस राशि का स्वामी 'चन्द्रमा' है।
४
सिंह—इस राशि का स्वामी 'सूर्य' है।
५

३०
धनु एवं मीन—इन दोनों राशियों का स्वामी 'बृहस्पति' है ।
९ १२
मकर एवं कुम्भ—इन दोनों राशियों का स्वामी 'शनि' है ।
१० ११
टिप्पणी—राहु तथा केतु छाया-ग्रह होने के कारण किसी राशि के स्वामी
नहीं माने जाते, परन्तु कुछ ज्योतिर्विद बुध की राशि 'कन्या' पर 'राहु' तथा 'मिथुन'
पर 'केतु' का भी आधिपत्य स्वीकार करते हैं।

राशीश बोधक चक्र

राशिस्वामीराशिस्वामी
१. मेषमंगल७. तुलाशुक्र
२. वृषशुक्र८. वृश्चिकमंगल
३. मिथुनबुध/केतु९. धनुबृहस्पति
४. कर्कचन्द्रमा१०. मकरशनि
५. सिंहसूर्य११. कुम्भशनि
६. कन्याबुध/राहु१२. मीनबृहस्पति

ग्रहों का राशि-भोग काल

भ-चक्र में सभी ग्रह क्रमशः सभी राशियों में विचरण करते हैं। कौनसा
ग्रह एक राशि में कितने समय तक ठहरता है, इसे निम्नानुसार समझना चाहिए—

ग्रह का नामएक राशि पर ठहरने की अवधिग्रह का नामएक राशि पर ठहरने की अवधि
१. सूर्यएक मास६. शुक्रपौन मास
२. चन्द्रसवा दो दिन७. शनिढाई वर्ष
३. मंगलडेढ़ मास८. राहुडेढ़ वर्ष
४. बुधपौन मास९. केतुडेढ़ वर्ष
५. बृहस्पतितेरह मास

३१

ग्रहों की वक्री तथा अतिचारी गति

सूर्य, चन्द्र, राहु तथा केतु—इनचार ग्रहों के अतिरिक्त शेष पांचों ग्रह—अर्थात्
मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि—कभी-कभी वक्री अथवा अतिचारी हो
जाते हैं।
ग्रह के राशियों में क्रमशः परिभ्रमण को 'मार्गी', शीघ्रतापूर्वक परिभ्रमण को
'अतिचारी' तथा अगली राशि की ओर बढ़ने की बजाय पीछे की राशि में लौट पड़ने
को 'वक्री' गति कहा जाता है।
अतिचारी तथा वक्री ग्रह एक राशि पर अपने भ्रमण को निश्चित अवधि में
पूरा करने की बजाय कुछ आगे पीछे भी हो जाते हैं। आकाश-मण्डल में किस समय
कौनसा ग्रह मार्गी, वक्री अथवा अतिचारी चल रहा है, इसका ज्ञान पंचांग देखकर
हो सकता है। जातक के जन्म के समय जो ग्रह आकाश-मण्डल में जिस गति से भ्रमण
कर रहा होता है उसका वैसा ही प्रभाव जातक के ऊपर जीवन भर पड़ता रहता है।

ग्रहों की नैसर्गिक-मैत्री

कौनसा ग्रह किस ग्रह का मित्र, सम अथवा शत्रु है, इसे नीचे प्रदर्शित
'निसर्ग मैत्री चक्र' में देख कर समझ लेना चाहिए—

निसर्ग मैत्री चक्र

सम्बन्ध का स्वरूपग्रहों के नाम
सूर्यचन्द्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनि
मित्रचन्द्र<br>मंगल<br>बुधसूर्य<br>बुधसूर्य<br>चन्द्र<br>गुरुसूर्य<br>शुक्रसूर्य<br>चन्द्र<br>मंगलबुध<br>शनिबुध<br>शुक्र
समबुधमंगल<br>बुध<br>शुक्र<br>शनि<br>बुधशुक्र<br>शनिमंगल<br>गुरु<br>शनिशनिमंगल<br>गुरुबुध
शत्रुशुक्र<br>शनिबुधचन्द्रशुक्र<br>बुधसूर्य<br>चन्द्रसूर्य<br>चन्द्र<br>मंगल
टिप्पणी (१)—कुछ विद्वानों के मतानुसार चन्द्रमा गुरु से शत्रुता मानते हैं।

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(२) राहु केतु छायाग्रह हैं, अतः 'निसर्ग मैत्री चक्र' में इनका उल्लेख नहीं
किया गया है। परन्तु ये दोनों ग्रह शुक्र तथा शनि से मित्रता मानते हैं तथा सूर्य,
चन्द्र, मंगल, एवं गुरु—इन चारों से शत्रुता रखते हैं। बुध इन दोनों के लिए सम
है। इसी प्रकार सूर्य, चन्द्र, मंगल और गुरु—ये चारों ग्रह राहु तथा केतु से शत्रुता
मानते हैं, बुध इन दोनों से समभाव रखता है तथा शुक्र और शनि इन दोनों से
मित्रता मानते हैं।
ग्रहों के अंश
प्रत्येक ग्रह के ३० अंश होते हैं। 'जातक के जन्म के समय कौनसा ग्रह
कितने अंश पर था', इसका ज्ञान उस समय के पंचांग द्वारा ज्ञात हो सकता है। इस
विषय में किसी ज्योतिषी से जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।
३ से ६ अंश तक का ग्रह किशोरावस्था का, १० से २२ अंश तक युवावस्था
का, २३ से २८ अंश तक वृद्धावस्था का तथा २९ से २ अंश (२९, ३०, १ और २)
तक मृतक अवस्था का माना जाता है।
किशोर एवं वृद्धावस्था वाले ग्रह बालक पर अपना प्रभाव अल्प परिमाण में
तथा युवावस्था वाले ग्रह पूर्ण परिमाण में प्रकट करते हैं। मृतक-अवस्था वाले ग्रहों
का प्रभाव न के बराबर होता है।
जन्म कुण्डली के द्वादशभाव
जन्म-कुण्डली इस बात की परिचायक है कि जातक के जन्म के समय आकाश-
मण्डल में कौन-सा ग्रह, किस राशि में, कितने अंशों पर परिभ्रमण कर रहा था।
बारह राशियों के प्रतीक रूप जन्म-कुण्डली में बारह खाने होते हैं, जिन्हें 'भाव',
'स्थान' अथवा 'घर' आदि नामों से पुकारा जाता है।
जन्म-कुण्डली के द्वादशभावों के नाम निम्नलिखित हैं—
(१) तनु, (२) धन, (३) सहज,
(४) सुहृद्, (५) पुत्र, (६) रिपु,
(७) जाया (स्त्री), (८) आयु, (९) धर्म,
(१०) कर्म, (११) आय (लाभ) और (१२) व्यय।

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जन्म-कुण्डली के द्वादशभाव
[कुण्डली चक्र: प्रथम (तनु), द्वितीय (धन), तृतीय (सहज), चतुर्थ (सुहृद्), पंचम (पुत्र), षष्ठ (रिपु), सप्तम (जाया), अष्टम (आयु), नवम (धर्म), दशम (राज्य), एकादश (लाभ), द्वादश (व्यय)]
३
उक्त नामों को अन्य नामों के भी पुकारा जाता है। द्वादश भावों के विभिन्न
नाम तथा किस भाव द्वारा किन-किन विषयों का विचार किया जाता है, इसे
निम्नानुसार समझना चाहिए—
(१) पहला भाव—इसे प्रथम, तनु, लग्न, केतु आदि नामों से भी पुकारा
जाता है। इसके द्वारा जातक के स्वरूप, आकृति, आयु, चिह्न, जाति, मस्तिष्क,
विवेक, शील, सुख-दुःख आदि के विषय में विचार किया जाता है। लग्नेश की स्थिति
एवं बलाबल के आधार पर जातक को कार्यकुशलता एवं जातीय-उन्नति-अवनति का
ज्ञान भी इसी भाव से प्राप्त होता है।
इस भाव का कारक 'सूर्य' है। यदि इस भाव में मिथुन, कन्या, तुला अथवा
कुम्भ—इनमें से कोई राशि हो तो उसे बलवान माना जाता है।
(२) दूसरा भाव—इसे द्वितीय, धन, वित्त, पणफर आदि नामों से भी
पुकारा जाता है। इसके द्वारा जातक के स्वर, सौन्दर्य, सत्यवादन, आंख, नाक, कान,
कुल, कुटुम्ब, मित्र, सुखोपभोग, बन्धन, गायन, क्रय-विक्रय, रत्न, स्वर्ण-चाँदी, धन,
संचित पूँजी आदि के विषय में विचार किया जाता है।
(३) तीसरा भाव—इसे तृतीय, सहज, पराक्रम, भ्रातृ, आपोक्लिम आदि
नामों से भी पुकारा जाता है। इसके द्वारा जातक के पराक्रम, शौर्य, धैर्य, साहस,
कर्म, सहोदर, सेवक, आयुष्य, काम, योगाभ्यास तथा क्षय-श्वास, दमा आदि रोगों के
सम्बन्ध में विचार किया जाता है।
(४) चौथा भाव—इसे चतुर्थ, सुहृद्, सुख, केन्द्र आदि नामों से भी पुकारा

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जाता है। इसके द्वारा जातक की माता, पिता का सुख, अन्तःकरण, घर, गांव, उपवन,
चतुष्पद, सम्पत्ति, वाहन, निधि, दयालुता, उदारता, छल-कपट तथा यकृत् एवं उदर
रोग आदि के सम्बन्ध में विचार किया जाता है। यह स्थान विशेष कर 'माता'
का है।
इस भाव के कारक चन्द्रमा तथा बुध हैं।
(५) पाँचवाँ भाव—इसे पंचम, बुध, विद्या, पणफर, त्रिकोण आदि नामों
से भी पुकारा जाता है। इसके द्वारा जातक की विद्या, बुद्धि, सन्तान, विनय, नीति,
प्रबन्ध-कुशलता, देवभक्ति, धन प्राप्ति के उपाय, आकस्मिक-धन की प्राप्ति, नौकरी
छूटना, मामा का सुख, हाथ का यश तथा बस्ति, गर्भाशय, मूत्रपिण्ड आदि के विषय
में विचार किया जाता है।
इस भाव का कारक बुध है।
(६) छठा भाव—इसे षष्ठ, रिपु, त्रिक, उपचय, आपोक्लिम आदि नामों
से भी पुकारा जाता है। इसके द्वारा जातक के शत्रु, चिन्ता, सन्देह, जागीर, यश,
मामा की स्थिति, गुदा तथा पीड़ा, व्रण, रोग आदि के विषय में विचार किया
जाता है।
इस भाव के कारक शनि तथा मगल हैं।
(७) सातवाँ भाव—इसे सप्तम, जाया, केतु आदि नामों से भी पुकारा जाता
है। इसके द्वारा जातक की स्त्री, कामेच्छा, काम चिन्ता, रमणशक्ति, विवाह, स्वास्थ्य,
मित्र, दैनिक आय, व्यवसाय, झगड़े-झंझट, जननेन्द्रिय तथा बवासीर की बीमारी
आदि के सम्बन्ध में विचार किया जाता है।
इस भाव में 'वृश्चिक' राशि को बलवान मानते हैं।
(८) आठवाँ भाव—इसे अष्टम, आयु, जीवन, मृत्यु, चतुरस्र, पणफर आदि
नामों से भी पुकारा जाता है। इसके द्वारा जातक की आयु, जीवन, मृत्यु, मृत्यु के
कारण, मानसिक चिन्ताएं, पुरातत्त्व, संकट, ऋण, समुद्र-यात्रा, जननेन्द्रियों के रोग
आदि के सम्बन्ध में विचार किया जाता है।
इस भाव का कारक 'शनि' है।
(९) नवाँ भाव—इसे नवम, धर्म, भाग्य, त्रिकोण आदि नामों से पुकारा
जाता है। इसके द्वारा जातक के पुण्य, धर्म, तप, शील, तीर्थ-यात्रा, दान, प्रवास,
विद्या, मानसिक वृत्ति, पिता का सुख एवं भाग्योदय आदि के सम्बन्ध में विचार किया
जाता है।
इस भाव के कारक 'सूर्य' तथा 'गुरु' हैं।
(१०) दसवाँ भाव—इसे दशम, कर्म, राज्य, केन्द्र आदि नामों से भी पुकारा
जाता है। इसके द्वारा जातक के ऐश्वर्य-भोग, यश, नेतृत्व, प्रभुत्व, सम्मान, राज्य-
संबंध व्यवसाय, नौकरी, अधिकार तथा पिता के सम्बन्ध में विचार किया जाता है।