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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

२. द्वितीय खण्ड: तृतीय, चतुर्थ एवं पञ्चम भावस्थ ग्रह-योग एवं विद्या-संतान विचार

१८६
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
दूसरे भाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर स्थित उच्च के गुरु के प्रभाव
मिथुन लग्न : द्वितीयभाव : गुरु से जातक के धन-कुटुम्ब को वृद्धि होती है।
पांचवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-
पक्ष पर प्रभाव एवं विजय की प्राप्ति होती है।
सातवीं नीचदृष्टि से अष्टमभाव
को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के लाभ में
कमी रहती है। नवीं दृष्टि से स्वराशि वाले
दशमभाव को देखने से पिता एवं राज्य के
द्वारा सहयोग तथा सफलताएँ मिलती हैं तथा
व्यवसाय द्वारा धन की पर्याप्त वृद्धि होती है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
तीसरे भाव में सूर्य की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक के पराक्रम
मिथुन लग्न : तृतीयभाव : गुरु एवं भाई-बहिनों के सुख में वृद्धि होती है।
पांचवीं दृष्टि से स्वराशि के सप्तमभाव को देखने
से श्रेष्ठ पत्नी द्वारा सुख प्राप्त होता है तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है।
सातवीं दृष्टि से नवमभाव को देखने से
भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में कुछ असन्तोष रहता
है तथा धन-प्राप्ति के लिए परिश्रम अधिक करना
पड़ता है, परन्तु नवीं मित्र-दृष्टि से एकादशभाव
को देखने के कारण आमदनी अच्छी रहती है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
चौथे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को
मिथुन लग्न : चतुर्थभाव : गुरु माता, भूमि तथा भवन आदि का सुख पर्याप्त
मिलता है। पाँचवीं नीचदृष्टि से अष्टमभाव
को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के क्षेत्र में अशांति
तथा कुछ कमी रहती है। सातवीं दृष्टि से
स्वराशि वाले दशमभाव को देखने से पिता तथा
राज्य-पक्ष से सहयोग, यश एवं लाभ प्राप्त होता है
नवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च
अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से
कुछ लाभ भी होता है।

१६०
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
पाँचवें भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को विद्या-
मिथुन लग्न : पंचमभाव : गुरु बुद्धि के क्षेत्र में विशेष सफलता मिलती है परन्तु
सन्तान-पक्ष में कुछ कमजोरी रहती है। पाँचवीं
शत्रुदृष्टि से नवम भाव को देखने के कारण
भाग्योन्नति कुछ कठिनाइयों के साथ होती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने से
आमदनी अच्छी रहती है तथा नवीं मित्रदृष्टि
से प्रथम भाव को देखने के कारण जातक को श्रेष्ठ
शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव एवं स्वाभिमान की
प्राप्ति होती है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
छठे भाव में मित्र मङ्गल की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को
शत्रु-पक्ष में विजय प्राप्त होती है परन्तु स्त्री-पक्ष से कुछ मतभेद रहता है।
मिथुन लग्न : षष्ठभाव : गुरु पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि वाले दशमभाव
को देखने से राज्य द्वारा सम्मान तथा उन्नति के
अवसर मिलते हैं, परन्तु पिता से कुछ मतभेद रहता
है। सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने के
कारण खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों
के सम्बन्ध से लाभ होता है। नवीं उच्च दृष्टि से
द्वितीयभाव को देखने से परिश्रम द्वारा धन की
वृद्धि होती है तथा कुटुम्ब से भी सहयोग मिलता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
सातवें भाव में स्वराशि-स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय
मिथुन लग्न : सप्तमभाव : गुरु के क्षेत्र में पर्याप्त सफलता मिलती है। पिता
तथा राज्य के क्षेत्र से भी सहयोग तथा सम्मान
मिलता है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव
को देखने से आमदनी खूब रहती है। सातवीं
मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक
सौन्दर्य तथा प्रभाव की प्राप्ति होती है। नवीं
मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम में
वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख मिलता
है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी तथा संपन्न होता है।

१६१
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
आठवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक की आयु
तथा पुरातत्व के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं। पिता, राज्य, व्यवसाय तथा स्त्री-पक्ष
से भी कष्ट होता है। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से द्वादश-
मिथुन लग्न : अष्टमभाव : गुरु
भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी
स्थानों से कपटपूर्ण सम्बन्ध द्वारा काम चलता
है। सातवीं उच्चदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने
से परिश्रम के द्वारा धन की कुछ वृद्धि होती है।
नवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता,
भूमि तथा भवन आदि का सामान्य सुख प्राप्त
होता है।
३८८


'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
नवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक कुछ
कठिनाइयों के साथ भाग्य तथा धर्म की उन्नति
मिथुन लग्न : नवमभाव : गुरु
करता है। पिता, राज्य तथा स्त्री-पक्ष से असंतोष
रहता है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने
से शारीरिक सौन्दर्य एवं प्रभाव की प्राप्ति होती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से
पराक्रम तथा भाई-बहिनों का सुख बढ़ता है। नवीं
शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या-बुद्धि
के क्षेत्र में सफलता मिलती है, परन्तु सन्तान-पक्ष
से असन्तोष रहता है।
३८९


'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
दसवें भाव में स्वराशि स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को राज्य एवं पिता से
पूर्ण सहयोग, सुख तथा सम्मान मिलता है। व्यवसाय
मिथुन लग्न : दशमभाव : गुरु
में भी सफलता मिलती है। पाँचवीं उच्चदृष्टि
से द्वितीयभाव को देखने से धन का संचय भी
अच्छा होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव
को देखने से माता, भूमि, भवन तथा सम्पत्ति का
सुख भी खूब मिलता है। नवीं मित्रदृष्टि से षष्ठ-
भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित
होता है। ऐसा व्यक्ति हर प्रकार से सुखी रहता है।
३९०

१६२
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
ग्यारहवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक
मिथुन लग्न : एकादशभाव : गुरु
को श्रेष्ठ लाभ होता है तथा पिता, व्यवसाय
एवं राज्य से भी सहयोग मिलता है। पाँचवीं
मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम
तथा भाई-बहिनों के सुख में वृद्धि होती है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से पञ्चमभाव को देखने से
विद्या-बुद्धि में तो वृद्धि होती है परन्तु सन्तान-
पक्ष कमजोर रहता है। नवीं दृष्टि से स्वराशि
के सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय-
पक्ष से पर्याप्त लाभ एवं सुख मिलता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
बारहवें भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित गुरु के प्रभाव से जातक का
मिथुन लग्न : द्वादशभाव : गुरु
खर्च अधिक होता है तथा बाहरी स्थानों के
सम्बन्ध से यश तथा लाभ मिलता है। स्त्री तथा
पिता के सुख में कुछ कमी रहती है तथा व्यवसाय
में भी हानि होती है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से
चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि, भवन तथा
घरेलू सुख की प्राप्ति होती है। सातवीं मित्रदृष्टि
से षष्ठभाव को देखने से शत्रुपक्ष में सफलता
मिलती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टम भाव को
देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के विजय में संकटों
का सामना करना पड़ता है।
'मिथुन' लग्न में 'शुक्र'
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
पहले भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक शरीर
मिथुन लग्न : प्रथमभाव : शुक्र
से दुर्बल परन्तु विद्या, बुद्धि एवं चातुर्य में
प्रवीण होता है। वह खर्चीला तथा बाहरी स्थानों
से लाभ प्राप्त करने वाला होता है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव को
देखने के कारण स्त्री के साथ मतभेदपूर्ण आसक्ति
बनी रहती है। दैनिक कार्यों तथा व्यवसाय में
बड़ी युक्ति के साथ सफलता मिलती है। ऐसा
व्यक्ति बहुत विलासी होता है।

१६३
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मिथुन लग्न : द्वितीयभाव : शुक्र
दूसरे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर
स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक बुद्धि एवं चातुर्य
द्वारा धन तथा प्रतिष्ठा तो कमाता है, परन्तु
धन का संचय नहीं हो पाता। बाहरी स्थानों से
संबंध अच्छा रहता है, परन्तु सन्तान-सुख में कुछ
कमी रहती है। विद्या का श्रेष्ठ लाभ होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को
देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है।
ऐसी ग्रहस्थिति का व्यक्ति शानदार जीवन बिताने का आदी होता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मिथुनलग्न : तृतीयभाव : शुक्र
तीसरे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर
स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक के पराक्रम तथा
भाई-बहिनों के सुख में कुछ कमी रहती है।
विद्या तथा सन्तान-पक्ष में भी न्यूनता रहती है
परन्तु बुद्धि-चातुर्य प्रबल होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को
देखने से जातक धर्म तथा भाग्य की वृद्धि के लिए
विशेष प्रयत्न करता है। वह पुरुषार्थ द्वारा
अपना खर्च चलाने तथा चातुर्य द्वारा काम निकालने में कुशल होता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मिथुनलग्न : चतुर्थभाव : शुक्र
चौथे भाव में स्थित नीच के शुक्र के
प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन के
सुख में कमी रहती है। सन्तान का सुख भी
कम मिलता है। अन्य सुखों में भी व्यवधान
आता है।
सातवीं उच्चदृष्टि से दशमभाव को
देखने से पिता तथा राज्य के द्वारा सुख-सम्मान
तथा सहयोग मिलता है और गुप्त चतुराई के
बल पर मान-प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है।

१६४
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मिथुन लग्न : पंचमभाव : शुक्र
पांचवें भाव में स्वराशि-स्थित शुक्र के
प्रभाव से जातक को सन्तान तथा विद्या के क्षेत्र
में कुछ त्रुटिपूर्ण सफलता मिलती है। ऐसा
व्यक्ति चतुर होता है तथा बाहरी स्थानों के
सम्बन्ध से लाभ उठाता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से एकादश भाव को
देखने से बुद्धि द्वारा लाभ अधिक होता है, परन्तु
शुक्र के व्ययेश होने के कारण आमदनी से खर्च
अधिक रहता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मिथुन लग्न : षष्ठभाव : शुक्र
छठे भाव में सामान्य मित्र मंगल की
राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक शत्रु-
पक्ष में अपनी गुप्त चतुराई एवं खर्च करने की
शक्ति से सफलता प्राप्त करता है। सन्तान-पक्ष
तथा विद्याध्ययन के क्षेत्र में भी कठिनाइयां
आती हैं।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले द्वादश
भाव को देखने से खर्च आमदनी से अधिक बना
रहता है। ऐसा व्यक्ति झगड़े-टंटे एवं मुकदमेबाजी में अधिक फंसा रहता है और
उसी में उसकी शक्तियां व्यय होती रहती हैं।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मिथुन लग्न : सप्तमभाव : शुक्र
सातवें भाव में सामान्य मित्र गुरु की
राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक की
पत्नी बुद्धिमान् तथा चतुर होती है। परन्तु उसे
स्त्री-पक्ष से कष्ट तथा चिन्ताएं भी प्राप्त होती
रहती हैं। दैनिक खर्च चलाने के लिए उसे
बुद्धिमानी तथा बड़ी चतुराई से काम लेना
पड़ता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को
देखने से शरीर दुर्बल होता है, परन्तु सम्मान की वृद्धि होती है। ऐसे व्यक्ति की
विद्या, बुद्धि, सन्तान तथा बाहरी सम्बन्धों के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं।

१६५
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मिथुन लग्न : अष्टमभाव : शुक्र आठवें भाव में मित्र शनि की राशि पर
स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को आयु तथा
पुरातत्त्व की शक्ति प्राप्त होती है। वह कूट-
नीतिज्ञ तथा परिश्रमी होता है। उसे सन्तान
तथा विद्या के क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना
करना पड़ता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को
देखने के कारण जातक की धन-वृद्धि के लिए विशेष
प्रयत्न करने पड़ते हैं, तथा शुक्र के व्ययेश होने के कारण खर्च अधिक बना रहता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मिथुन लग्न : नवमभाव : शुक्र नवें भाव में मित्र शनि की राशि पर
स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा
धर्म की कुछ कठिनाइयों के साथ उन्नति होती है।
विद्या तथा सन्तान का सुख भी प्राप्त होता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को
देखने से भाई-बहिनों के साथ वैमनस्य रहता है
तथा पराक्रम में भी कुछ कमी आती है। ऐसा
व्यक्ति भाग्य को पुरुषार्थ से बड़ा मानने वाला
होता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मिथुन लग्न : दशमभाव : शुक्र दसवें भाव में सामान्य मित्र गुरु की
राशि पर स्थित व्ययेश उच्च के शुक्र के प्रभाव
से जातक को पिता तथा व्यवसाय के क्षेत्र में
बड़ी हानि उठानी पड़ती है, परन्तु बाहरी स्थानों
के सम्बन्ध से लाभ होता है। पिता, राज्य, विद्या
तथा सन्तान की शक्ति भी प्राप्त होती है।
चौथी नीचदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने
से माता, भूमि एवं भवन के सुख में कमी आती
है। ऐसा व्यक्ति अपने अहङ्कारी स्वभाव के
कारण बार-बार हानि उठाता है।

१६६
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मिथुन लग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में सामान्य मित्र मंगल की
राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक की आमदनी
अच्छी रहती है परन्तु खर्च भी खूब होता रहता है।
मस्तिष्क में चिन्ताएं भी बनी रहती हैं।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि के पंचमभाव को
देखने के कारण कुछ कठिनाइयों के साथ विद्या-बुद्धि
में प्रवीणता प्राप्त होती है तथा सन्तान-पक्ष में भी कुछ
कठिनाइयां आती हैं। ऐसे व्यक्ति के मस्तिष्क में
चिन्ताएं बनी रहती हैं।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मिथुन लग्न : द्वादशभाव : शुक्र बारहवें भाव में स्वराशि-स्थित शुक्र के प्रभाव
से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों
के सम्बन्ध से लाभ भी होता है। विद्या तथा सन्तान
के पक्ष में कुछ परेशानियां रहती हैं।
सातवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव को
देखने के कारण जातक शत्रु-पक्ष में चतुराई से प्रभाव
स्थापित करके अपना काम निकालता है। ऐसा व्यक्ति
बड़ा चतुर होता है। साथ ही, उसके मस्तिष्क में
चिन्ताएं भी बनी रहती हैं।
'मिथुन' लग्न में 'शनि'
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
मिथुन लग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य में कुछ
कमी आती है, परन्तु आयु तथा पुरातत्व की वृद्धि
होती है।
तीसरी शत्रुदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से
भाई-बहिन से वैमनस्य रहता है तथा पराक्रम में कमी
आती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने
से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में असन्तोष रहता है।
दसवीं शत्रु-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता से
वैमनस्य रहता है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं।

१६७
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
मिथुन लग्न : द्वितीयभाव : शनि दूसरे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक को धन-संचय की शक्ति एवं
कौटुम्बिक सुख में हानि होती है। तीसरी मित्र-दृष्टि
से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का
सुख कुछ कष्टों के साथ प्राप्त होता है। सातवीं दृष्टि
से स्वराशि के अष्टमभाव को देखने से आयु तथा
पुरातत्त्व का लाभ होता है। दसवीं नीचदृष्टि से
एकादशभाव को देखने से आय के मार्ग में कठिनाइयां
आती हैं। ऐसा व्यक्ति समाज में भाग्यवान् समझा
जाता है और वह सज्जन होने के साथ ही स्वार्थी भी होता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
मिथुन लग्न : तृतीय भाव : शनि तीसरे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक के पराक्रम में कुछ कमी
आती है तथा भाई-बहिन से वैमनस्य रहता है। साथ
ही आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति बढ़ती है। तीसरी
उच्चदृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान तथा
विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में उन्नति होती है। सातवीं दृष्टि
से स्वराशि वाले नवमभाव को देखने से कुछ
कठिनाइयों के साथ भाग्य की वृद्धि होती है तथा धर्म
का पालन भी होता है। दसवीं दृष्टि से द्वादशभाव को
देखने के कारण बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है, परन्तु खर्च अधिक बना
रहता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
मिथुन लग्न : चतुर्थभाव : शनि चौथे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक को कुछ कमी के साथ माता
का सुख प्राप्त होता है तथा भूमि-भवन के सुख में भी
कुछ कमी रहती है। आयु एवं पुरातत्त्व का श्रेष्ठ लाभ
होता है तथा धर्म का पालन भी होता है। तीसरी शत्रु-
दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर कड़ाई के
साथ प्रभाव स्थापित होता है तथा शत्रुओं एवं झगड़ों
से लाभ मिलता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से दशमभाव
को देखने से पिता एवं राज्य-क्षेत्र से असन्तोष तथा
वैमनस्य रहता है। दसवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक शक्ति में
वृद्धि होती है तथा लोग उसे भाग्यवान् भी समझते हैं।

१६८
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित शनि का फलादेश
मिथुन लग्न : पञ्चमभाव : शनि पाँचवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक को विद्या-बुद्धि तथा सन्तान
के क्षेत्र में सफलता मिलती है। भाग्य-वृद्धि भी होती
है। तीसरी शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री
तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ
सफलता मिलती है। सातवीं नीचदृष्टि से एकादश-
भाव को देखने से आमदनी के क्षेत्र में कमी आती है।
दसवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से
कठिनाइयों के साथ धन-सम्बन्धी आवश्यकताएँ पूरी
होती हैं तथा कुटुम्ब से भी कम सुख प्राप्त होता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
मिथुन लग्न : षष्ठभाव : शनि छठे भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक को शत्रु तथा झगड़ों के क्षेत्र
में सफलता एवं विजय मिलती है। तीसरी दृष्टि से
स्वराशि वाले अष्टमभाव को देखने से आयु तथा
पुरातत्त्व का लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से
द्वादशभाव को देखने से बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से
लाभ होता है तथा ठाठ-वाट में बहुत खर्च होता है।
दसवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम में
कमी आती है तथा भाई-बहिन के सुख में बाधा
पड़ती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा परिश्रमी भी होता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
मिथुन लग्न : सप्तमभाव : शनि सातवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय के
क्षेत्र में सुख-दुःख तथा हानि-लाभ दोनों की प्राप्ति
होती रहती है। जननेन्द्रिय में कष्ट होता है। परन्तु
आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता
है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि के नवमभाव को देखने
से भाग्य की वृद्धि होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथम
भाव को देखने से शारीरिक प्रभाव में कुछ न्यूनता के
साथ वृद्धि होती है। दसवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव
को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख कुछ कठिनाइयों के भाव मिलता है।
ऐसा व्यक्ति परिश्रम द्वारा कठिनाइयों पर विजय पाकर तरक्की करता है।

१६६
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
मिथुन लग्न : अष्टमभाव : शनि आठवें भाव में स्वराशि-स्थित शनि के प्रभाव
से जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का
लाभ होता है। भाग्य तथा सम्मान के क्षेत्र में
कठिनाइयां आती हैं। धर्म का पालन भी ठीक से नहीं
होता । तीसरी शत्रु-दृष्टि से दशमभाव को देखने से
पिता एवं राज्य के क्षेत्र में कठिनाइयों के साथ
सफलता मिलती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव
को देखने से धन-संचय में कमी रहती है। दसवीं उच्च
दृष्टि से पंचमभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के
साथ सन्तान तथा विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में सफलता मिलती है। ऐसा जातक अपनी
वाणी की शक्ति द्वारा भाग्योन्नति करता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
मिथुन लग्न : नवमभाव : शनि नवें भाव में स्वराशि-स्थित शनि के प्रभाव से
जातक कुछ कमियों के साथ भाग्यवान बना रहता है।
उसे वायु तथा पुरातत्त्व का भी लाभ होता है। धर्म-
पालन में रुचि रहती है तथा यश भी मिलता है।
तीसरी नीच-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से
आमदनी में कठिनाइयां आती हैं। सातवीं शत्रुदृष्टि
से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम तथा भाई-बहिन के
सुख में कमी आती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव
को देखने से शत्रु-पक्ष से होने वाली परेशानियों पर
विजय प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति बड़े ठाठ का जीवन व्यतीत करता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
मिथुन लग्न : दशमभाव : शनि दसवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक को पिता के सुख में कमी
रहती है, परन्तु राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में
सफलताएँ मिलती हैं। तीसरी मित्र-दृष्टि से द्वादश
भाव को देखने से बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से श्रेष्ठ
लाभ होता है तथा खर्च अधिक रहता है। सातवीं
मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि
तथा भवन का सुख मिलता है। दसवीं दृष्टि से
सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष
में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। ऐसा जातक संघर्षपूर्ण जीवन
बिताता है।

२००
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
मिथुन लग्न : एकादशभाव : शनि ग्यारहवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर
स्थित शनि के प्रभाव से जातक की आमदनी के मार्ग
में परेशानियां आती हैं। भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में
की त्रुटियां रहती हैं। यह धन-प्राप्ति के लिए अनुचित
मार्ग भी अपनाता है। तीसरी मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव
की देखने से शरीर को कुछ कष्ट भी रहता है तथा
जातक भाग्यशाली भी बनता है। सातवीं उच्च दृष्टि
से पंचमभाव को देखने से सन्तान, विद्या तथा बुद्धि के
क्षेत्र में उन्नति होती है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि वाले
अष्टमभाव को देखने के कारण आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। नीच का शनि
जातक के जीवन को अनेक संकटों तथा खतरों में डालता रहता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित शनि का फलादेश
मिथुन लग्न : द्वादशभाव : शनि बारहवें भाव में अपने मित्र शुक्र की राशि पर
स्थित शनि के प्रभाव से जातक को बाहरी सम्बन्धों से
लाभ होता है तथा खर्च अधिक रहता है। तीसरी शत्रु-
दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन एवं कुटुम्ब-सुख
के पक्ष में कमी बनी रहती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से
षष्ठभाव को देखने से शत्रुपक्ष पर कठिनाइयों के बाद
विजय मिलती है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि के नवम
भाव में देखने से भाग्य की वृद्धि होती है तथा जातक
धर्म का पालन भी करता है। ऐसा व्यक्ति यश-अपयश
तथा सुख-दुःख दोनों ही प्राप्त करता है, परन्तु भाग्यशाली समझा जाता है।
'मिथुन' लग्न में 'राहु'
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : प्रथमभाव : राहु
पहले भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
उच्च के राहु के प्रभाव से जातक प्रभावशाली, लम्बे
शरीर वाला, विवेकी, स्वार्थी, गुप्त युक्तियों का ज्ञाता
तथा बड़ी हिम्मत वाला होता है। यह कष्टसाध्य
कर्मों तथा गुप्त युक्तियों के आश्रय से अपनी उन्नति
करता है तथा धन एवं सम्मान पाता है।

२०१
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : द्वितीयभाव : राहु
दूसरे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक को धन-सम्पत्ति तथा कौटुम्बिक
सुख की बड़ी हानि उठानी पड़ती है। गुप्त युक्तियों
तथा कठिन परिश्रम का आश्रय लेने पर भी धन-प्राप्ति
के क्षेत्र में सामान्य सफलताएँ ही मिलती हैं। उसे बहुत
समय बाद धन का अल्प सुख मिलता है।
४१८
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : तृतीयभाव : राहु
तीसरे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है,
परन्तु भाई-बहिन के सुख में कमी आती है। वह अपनी
उन्नति के लिए बहुत हिम्मत तथा परिश्रम से लगा
रहता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा धैर्यवान्, हिम्मती तथा
गुप्त युक्तियों से सम्पन्न होता है। परन्तु कभी-कभी
उसे बड़े संकटों का सामना भी करना पड़ता है।
४२०
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : चतुर्थभाव : राहु
चौथे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक की माता, भूमि, भवन एवं
घरेलू सुख में कमी तथा असन्तोष की प्राप्ति होती है।
वह गुप्त युक्तियों के बल पर सुख-प्राप्ति का प्रयत्न
करता है, परन्तु उसकी इच्छा भली-भाँति पूर्ण नहीं हो
पाती।
४२१

२०२
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : पंचमभाव : राहू पाँचवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर
स्थित राहु के प्रभाव में जातक को अनेक कठि-
नाइयो के बाद विद्या तथा बुद्धि के क्षेत्र में सफ-
लता मिलती है, परन्तु सन्तान-पक्ष में कष्ट ही
बना रहता है।
ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों का ज्ञाता-
बुद्धिमान, असत्यवादी, प्रभावोत्पादक तथा अनेक
प्रकार की चिंताओं से ग्रस्त होता है।
४२२
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : षष्ठभाव : राहू
छठे भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित
राहू के प्रभाव से जातक शत्रु पर अपना विशेष
प्रभाव बनाये रखता है तथा उन पर विजय पाता है।
ऐसा व्यक्ति अपनी कमजोरियों को प्रकट नहीं होने
देता तथा बड़ा साहसी, धैर्यवान, चतुर, पराक्रमी
तथा गुप्त युक्तियों का जानकार होता है।
४२३
मिथुन' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : सप्तमभाव : राहू सातवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर
स्थित राहू के प्रभाव से जातक की स्त्री को बहुत
कष्ट प्राप्त होता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी
बड़ी कठिनाइयां आती रहती हैं।
ऐसे व्यक्ति की मूलेन्द्रिय में भी कोई
विकार होता है। यह गुप्त युक्तियों तथा असत्य-
भाषण आदि के अनुचित तरीकों से भी अपना
४२४ स्वार्थ-साधन करने से नहीं चूकता

२०३
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : अष्टमभाव : राहु
आठवें भाव में मित्र शनि की राशि पर
स्थित राहु के प्रभाव से जातक की पुरातत्त्व
एवं आयु के विषय में अनेक प्रकार के संकटों
का सामना करना पड़ता है। उसके पेट के निम्न
भाग में कोई विकार भी होता है।
ऐसा व्यक्ति कठिन परिश्रम तथा गुप्त
युक्तियों के गल पर सफलता पाने के लिए प्रयत्न-
शील रहता है तथा अपनी कठिनाइयों के विषय
में किसी की पता नहीं चलने देता।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : नवमभाव : राहु
नवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में अनेक
कठिनाइयां आती हैं। वह अपने परिश्रम तथा
गुप्त युक्तियों के बल पर भाग्य की वृद्धि तो करता
है, परन्तु पूर्ण सुख-सम्मान प्राप्त नहीं कर पाता।
उसका धर्म-पालन भी ढोंग-जैसा ही होता है।
कहीं बहुत बाद में उसे थोड़ी-सी सफलता मिल
पाती है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : दशमभाव : राहु
दसवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक की राज्य, पिता तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना
पड़ता है तथा अत्यन्त कठिन परिश्रम के बाद ही
थोड़ी-बहुत सफलता मिल पाती है। ऐसे व्यक्ति
पर बार-बार संकट आते रहते हैं, अन्त में थोड़ी-
तो सफलता भी मिलती है।

२०४
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर
स्थित राहु के प्रभाव से जातक गुप्त युक्तियों
का आश्रय लेकर आमदनी की वृद्धि करता है
तथा कठिन परिश्रम द्वारा पर्याप्त धन भी उपार्जित
करता है। कभी-कभी उसे घोर संकटों का सामना
भी करना पड़ता है परन्तु अन्त में विशेष सफलता
भी मिलती है। ऐसा व्यक्ति थोड़े लाभ से
सन्तुष्ट रहकर भी विशेष लाभ के लिए नित नई
योजनाएं बनाता रहता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर
स्थित राहु के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक
होता है और इसी कारण उसे कभी-कभी बड़ी
कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है। उसे
बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ भी होता है।
गुप्त युक्तियों, परिश्रम तथा चातुर्य के बल
पर वह अपना खर्च चलाता है तथा बाहरी लोगों
की दृष्टि में वह प्रभावशाली बना रहता है।
'मिथुन' लग्न में 'केतु'
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : प्रथमभाव : केतु
पहले भाव में मित्र बुध की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक में शारीरिक सौंदर्य
में कमी रहती है। वह गुप्त चिंताओं, रोग, चोट
आदि का शिकार बनता रहता है। गुप्त युक्तियों
तथा शारीरिक परिश्रम के बल पर वह अपने
स्वार्थों की पूर्ति करता है। विवेकी होने पर भी
उसमें स्वाभिमान कम होता है।

२०५
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक धन तथा कुटुम्ब के
बारे में चिन्ता-ग्रस्त बना रहता है। धन-संचय
न हो पाने से कभी-कभी अत्यधिक कष्ट पाता है
तथा कौटुम्बिक कारणों से मानसिक क्लेश का
शिकार भी होता है। वह धैर्य, साहस एवं गुप्त
युक्तियों का आश्रय लेकर ही अपनी कठिनाइयों
पर थोड़ी-बहुत विजय प्राप्त कर पाता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : तृतीय भाव : केतु
तीसरे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक के पराक्रम में तो
अत्यधिक वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख
में कमी आ जाती है। वह अपने पराक्रम-विषयक
कारणों से ही परेशानी उठाता है। ऐसा जातक
बड़ा दम्मी, हिम्मती, हठी, बहादुर तथा साहसी
होता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : चतुर्थभाव : केतु
चौथे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
केतु के प्रभाव से जातक घरेलू सुखों की पाने के
लिए बड़ी चतुराई का आश्रय लेकर सफल होता
है। भूमि तथा भवन का सुख भी कुछ कमी के
साथ मिलता है। अपने गुप्त साहस एवं धैर्य के
बल पर अन्त में उसे सुख-प्राप्ति में सफलता भी
मिलती है।

२०६
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : पंचमभाव : केतु पाँचवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक की विद्याध्ययन
में कठिनाइयाँ आती हैं तथा सन्तान-पक्ष में भी
कठिनाइयों के साथ ही सामान्य सफलता मिलती
है।
ऐसा व्यक्ति अपने गुप्त धैर्य की शक्ति,
चातुर्य तथा हिम्मत के बल पर ही विद्या के तथा
अन्य क्षेत्रों में सफलताएँ प्राप्त करता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : षष्ठभाव : केतु
छठे भाव में शत्रु मंगल की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक अपनी गुप्त युक्तियों
द्वारा शत्रुओं का दमन करने में समर्थ होता है
तथा मुकदमे आदि में सफलताएँ प्राप्त करता है।
ऐसा व्यक्ति अपनी आन्तरिक कमजोरी
को छिपाने में कुशल होता है तथा बड़ी हिम्मत
से काम लेकर लोगों को आश्चर्य में डाल देता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : सप्तमभाव : केतु
सातवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक की स्त्री तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के बाद
सफलता प्राप्त होती है। उसके जीवन में इन्द्रिय-
भोगों की अधिकता रहती है। ऐसा व्यक्ति
कठिन परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों के बल पर
अत्यधिक उन्नति भी कर लेता है।

२०७
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : अष्टमभाव : केतु
आठवें भाव में मित्र शनि की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक की पुरातत्त्व की
हानि होती है तथा आयु के सम्बन्ध में भी अनेक
बार संकटों का सामना करना पड़ता है। ऐसा
व्यक्ति अपनी हिम्मत तथा बहादुरी के बल पर
संकट के समय भी धैर्य को नहीं खोता। उसे पेट
की कोई बीमारी भी हो सकती है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : नवमभाव : केतु
नवें भाव में मित्र शनि की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में
कुछ बाधाएँ आती हैं, परन्तु परिश्रम द्वारा थोड़ी-
बहुत सफलता भी मिलती है। ऐसा व्यक्ति धर्म
का पूर्ण पालन नहीं कर पाता। वह अपनी गुप्त
युक्तियों तथा कठिन परिश्रम के बल पर सभी
क्षेत्रों में न्यूनाधिक सफलताएँ प्राप्त करता
रहता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : दशमभाव : केतु
दसवें भाव में अपने शत्रु गुरु की राशि
पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को पिता,
राज्य एवं व्यवसाय के पक्ष में अनेक कठिनाइयों
का सामना करना पड़ता है। मान-प्रतिष्ठा की भी
कभी-कभी बड़ी हानि उठानी पड़ती है। गुप्त
युक्तियों तथा कठिन परिश्रम के बाद ही उसे
सामान्य सफलता मिल पाती है।

२०८
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : एकादशभाव : केतु
ग्यारहवें भाव में शत्रु मंगल की राशि
पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की आमदनी
के क्षेत्र में कठिन परिश्रम करना पड़ता है तथा
कभी-कभी घोर संकटों का सामना भी करना
पड़ता है। अपने धैर्य, साहस तथा परिश्रम से ही
उसे अन्त में कठिनाइयों पर विजय तथा आमदनी
के क्षेत्र में थोड़ी-बहुत सफलता मिलती है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : द्वादशभाव : केतु
बारहवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक
रहता है, जिसके कारण उसे कभी-कभी भारी
संकटों का सामना करना पड़ता है। बाहरी
स्थानों के सम्बन्ध से भी उसे कुछ परेशानी बनी
रहती है। परन्तु ऐसा जातक अपनी हिम्मत,
गुप्त युक्ति, परिश्रम तथा चतुराई के बल पर
येन-केन-प्रकारेण अपना खर्च चलाता रहता है।