भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
पृष्ठ 18, कुल 638 में से
संदर्भ में पढ़ें२३
'अहोरात्र' शब्द में से 'अहो' का अन्तिम अक्षर 'हो' तथा 'रात्र' का यादि अक्षर 'रा'
लेकर 'होरा' शब्द का निर्माण हुआ है। इस तरह 'होरा' शब्द को घण्टे का पर्याय-
वाची भी कहा जा सकता है।
सृष्टि के प्रारंभ में सर्वप्रथम सूर्य दिखाई दिया, अतः पहली 'होरा' का स्वामी
'सूर्य' को माना गया तथा सृष्टि के पहले दिन का नामकरण किया गया—'रविवार'
अर्थात् सूर्यवार। तत्पश्चात् अगली प्रत्येक होरा पर अन्य एक-एक ग्रह का अधिकार
माना गया। फलतः एक दूसरे के समीपी क्रम में दूसरी होरा का स्वामी शुक्र, तीसरी
का बुध, चौथी का चन्द्रमा, पाँचवीं का शनि, छठी का वृहस्पति तथा सातवीं का
मंगल हुआ । इसी क्रम के पुनरावर्त्तन के फलस्वरूप पहले दिन की चौबीसवीं अर्थात्
अन्तिम होरा बुध के स्वामित्व पर समाप्त हुई, तब दूसरे दिन की पहली होरा का
स्वामी चन्द्रमा हुआ, अतः उस दिन का नाम रखा गया—सोमवार अर्थात् चन्द्रवार।
इसी क्रमानुसार तीसरे दिन की पहली होरा का स्वामी 'मंगल', चौथे दिन का बुध,
पाँचवें दिन का वृहस्पति, छठे दिन का शुक्र तथा सातवें दिन की पहली होरा का
स्वामी शनि हुआ। फलतः सृष्टि के पहले वारों का क्रम हुआ—(१) रविवार,
(२) सोमवार, (३) मंगलवार, (४) बुधवार, (५) गुरुवार, (६) शुक्रवार और
(७) शनिवार । आठवें दिन फिर पहली होरा का स्वामी सूर्य हुआ । इसी क्रम से
अगले दिनों की पहली होरा के स्वामी पूर्ववत् ग्रह होते चले आ रहे हैं। अस्तु उन
सात वारों का चक्र निरन्तर चल रहा है। सात दिनों के इस समूह को ही 'सप्ताह'
कहा जाता है।
प्रत्येक वार का स्वामी उसी का अधिपति ग्रह होता है। गुरु, सोम, बुध तथा
शुक्र—इन चार वारों को 'सौम्य' तथा मंगल, रवि एवं शनि—इन तीन वारों को
'क्रूर' संज्ञक माना गया है। जिस वार के स्वामी का जैसा स्वभाव है, वही स्वभाव
उस वार का तथा उस वार में जन्म लेने वाले जातक का भी माना जाता है।
राशि
जिस प्रकार सम्पूर्ण खमण्डल को २७ या २८ नक्षत्रों में बांटा गया है, उसी
प्रकार उसे १२ राशि, १०८ भाग यथा ३६० अंशों में भी बाँटा गया है। बारह
राशियों के नाम इस प्रकार हैं—
१- मेष ४- कर्क ७- तुला १०. मकर
२- वृष ५- सिंह ८- वृश्चिक ११- कुम्भ
३- मिथुन ६- कन्या ९. धनु १२- मीन
अस्तु, खमण्डल अर्थात् भ-चक्र के ३० अंश अथवा ९ भागों की एक राशि
होती है। पहले बताया जा चुका है कि एक-एक नक्षत्र को चार-चार भागों में बाँटा