भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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जाता है। इसके द्वारा जातक की माता, पिता का सुख, अन्तःकरण, घर, गांव, उपवन,
चतुष्पद, सम्पत्ति, वाहन, निधि, दयालुता, उदारता, छल-कपट तथा यकृत् एवं उदर
रोग आदि के सम्बन्ध में विचार किया जाता है। यह स्थान विशेष कर 'माता'
का है।
इस भाव के कारक चन्द्रमा तथा बुध हैं।
(५) पाँचवाँ भाव—इसे पंचम, बुध, विद्या, पणफर, त्रिकोण आदि नामों
से भी पुकारा जाता है। इसके द्वारा जातक की विद्या, बुद्धि, सन्तान, विनय, नीति,
प्रबन्ध-कुशलता, देवभक्ति, धन प्राप्ति के उपाय, आकस्मिक-धन की प्राप्ति, नौकरी
छूटना, मामा का सुख, हाथ का यश तथा बस्ति, गर्भाशय, मूत्रपिण्ड आदि के विषय
में विचार किया जाता है।
इस भाव का कारक बुध है।
(६) छठा भाव—इसे षष्ठ, रिपु, त्रिक, उपचय, आपोक्लिम आदि नामों
से भी पुकारा जाता है। इसके द्वारा जातक के शत्रु, चिन्ता, सन्देह, जागीर, यश,
मामा की स्थिति, गुदा तथा पीड़ा, व्रण, रोग आदि के विषय में विचार किया
जाता है।
इस भाव के कारक शनि तथा मगल हैं।
(७) सातवाँ भाव—इसे सप्तम, जाया, केतु आदि नामों से भी पुकारा जाता
है। इसके द्वारा जातक की स्त्री, कामेच्छा, काम चिन्ता, रमणशक्ति, विवाह, स्वास्थ्य,
मित्र, दैनिक आय, व्यवसाय, झगड़े-झंझट, जननेन्द्रिय तथा बवासीर की बीमारी
आदि के सम्बन्ध में विचार किया जाता है।
इस भाव में 'वृश्चिक' राशि को बलवान मानते हैं।
(८) आठवाँ भाव—इसे अष्टम, आयु, जीवन, मृत्यु, चतुरस्र, पणफर आदि
नामों से भी पुकारा जाता है। इसके द्वारा जातक की आयु, जीवन, मृत्यु, मृत्यु के
कारण, मानसिक चिन्ताएं, पुरातत्त्व, संकट, ऋण, समुद्र-यात्रा, जननेन्द्रियों के रोग
आदि के सम्बन्ध में विचार किया जाता है।
इस भाव का कारक 'शनि' है।
(९) नवाँ भाव—इसे नवम, धर्म, भाग्य, त्रिकोण आदि नामों से पुकारा
जाता है। इसके द्वारा जातक के पुण्य, धर्म, तप, शील, तीर्थ-यात्रा, दान, प्रवास,
विद्या, मानसिक वृत्ति, पिता का सुख एवं भाग्योदय आदि के सम्बन्ध में विचार किया
जाता है।
इस भाव के कारक 'सूर्य' तथा 'गुरु' हैं।
(१०) दसवाँ भाव—इसे दशम, कर्म, राज्य, केन्द्र आदि नामों से भी पुकारा
जाता है। इसके द्वारा जातक के ऐश्वर्य-भोग, यश, नेतृत्व, प्रभुत्व, सम्मान, राज्य-
संबंध व्यवसाय, नौकरी, अधिकार तथा पिता के सम्बन्ध में विचार किया जाता है।