भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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(२) राहु केतु छायाग्रह हैं, अतः 'निसर्ग मैत्री चक्र' में इनका उल्लेख नहीं
किया गया है। परन्तु ये दोनों ग्रह शुक्र तथा शनि से मित्रता मानते हैं तथा सूर्य,
चन्द्र, मंगल, एवं गुरु—इन चारों से शत्रुता रखते हैं। बुध इन दोनों के लिए सम
है। इसी प्रकार सूर्य, चन्द्र, मंगल और गुरु—ये चारों ग्रह राहु तथा केतु से शत्रुता
मानते हैं, बुध इन दोनों से समभाव रखता है तथा शुक्र और शनि इन दोनों से
मित्रता मानते हैं।
ग्रहों के अंश
प्रत्येक ग्रह के ३० अंश होते हैं। 'जातक के जन्म के समय कौनसा ग्रह
कितने अंश पर था', इसका ज्ञान उस समय के पंचांग द्वारा ज्ञात हो सकता है। इस
विषय में किसी ज्योतिषी से जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।
३ से ६ अंश तक का ग्रह किशोरावस्था का, १० से २२ अंश तक युवावस्था
का, २३ से २८ अंश तक वृद्धावस्था का तथा २९ से २ अंश (२९, ३०, १ और २)
तक मृतक अवस्था का माना जाता है।
किशोर एवं वृद्धावस्था वाले ग्रह बालक पर अपना प्रभाव अल्प परिमाण में
तथा युवावस्था वाले ग्रह पूर्ण परिमाण में प्रकट करते हैं। मृतक-अवस्था वाले ग्रहों
का प्रभाव न के बराबर होता है।
जन्म कुण्डली के द्वादशभाव
जन्म-कुण्डली इस बात की परिचायक है कि जातक के जन्म के समय आकाश-
मण्डल में कौन-सा ग्रह, किस राशि में, कितने अंशों पर परिभ्रमण कर रहा था।
बारह राशियों के प्रतीक रूप जन्म-कुण्डली में बारह खाने होते हैं, जिन्हें 'भाव',
'स्थान' अथवा 'घर' आदि नामों से पुकारा जाता है।
जन्म-कुण्डली के द्वादशभावों के नाम निम्नलिखित हैं—
(१) तनु, (२) धन, (३) सहज,
(४) सुहृद्, (५) पुत्र, (६) रिपु,
(७) जाया (स्त्री), (८) आयु, (९) धर्म,
(१०) कर्म, (११) आय (लाभ) और (१२) व्यय।