सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

अदालत एक ढकोसला है
छह साथियों का एलान
कमिश्नर,
विशेष ट्रिब्यूनल,
लाहौर साज़िश केस, लाहौर
जनाब,
अपने छह साथियों की ओर से, जिनमें कि मैं भी शामिल हूँ, निम्नलिखित
स्पष्टीकरण इस सुनवाई के शुरू में ही देना आवश्यक है। हम चाहते हैं कि यह
दर्ज किया जाये।
हम मुक़दमे की कार्यवाही में किसी भी प्रकार भाग नहीं लेना चाहते, क्योंकि
हम इस सरकार को न तो न्याय पर आधारित समझते हैं और न ही क़ानूनी तौर
पर स्थापित। हम अपने विश्वास से यह घोषणा करते हैं कि “समस्त शक्ति का
आधार मनुष्य है। कोई व्यक्ति या सरकार किसी भी ऐसी शक्ति की हक़दार नहीं
है जो जनता ने उसको न दी हो।” क्योंकि यह सरकार इन सिद्धान्तों के विपरीत
है इसलिए इसका अस्तित्व ही उचित नहीं है। ऐसी सरकारें जो राष्ट्रों को लूटने के
लिए एकजुट हो जाती हैं उनमें तलवार की शक्ति के अलावा कोई आधार क़ायम
रहने के लिए नहीं होता। इसीलिए वे वहशी ताक़त के साथ मुक्ति और आज़ादी
के विचार और लोगों की उचित इच्छाओं को कुचलती हैं।
हमारा विश्वास है कि ऐसी सरकारें, विशेषकर अंग्रेज़ी सरकार जो असहाय और
असहमत भारतीय राष्ट्र पर थोपी गयी है, गुण्डों, डाकुओं का गिरोह और लुटेरों का
टोला है जिसने क़त्लेआम करने और लोगों को विस्थापित करने के लिए सब प्रकार
की शक्तियाँ जुटायी हुई हैं। शान्ति-व्यवस्था के नाम पर यह अपने विरोधियों या
रहस्य खोलने वाले को कुचल देती है।
हमारा यह भी विश्वास है कि साम्राज्यवाद एक बड़ी डाकेजनी की साज़िश
के अलावा कुछ नहीं। साम्राज्यवाद मनुष्य के हाथों मनुष्य के और राष्ट्र के हाथों
380 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

राष्ट्र के शोषण का चरम है। साम्राज्यवादी अपने हितों, और लूटने की योजनाओं को
पूरा करने के लिए न सिर्फ़ न्यायालयों एवं क़ानून को क़त्ल करते हैं, बल्कि
भयंकर हत्याकाण्ड भी आयोजित करते हैं। अपने शोषण को पूरा करने के लिए जंग
जैसे ख़ौफ़नाक अपराध भी करते हैं। जहाँ कहीं लोग उनकी नादिरशाही शोषणकारी
माँगों को स्वीकार न करें या चुपचाप उनकी ध्वस्त कर देने वाली और घृणा योग्य
साज़िशों को मानने से इन्कार कर दें तो वह निरपराधियों का खून बहाने से संकोच
नहीं करते। शान्ति-व्यवस्था की आड़ में वे शान्ति-व्यवस्था भंग करते हैं। भगदड़
मचाते हुए लोगों की हत्या, अर्थात हर सम्भव दमन करते हैं।
हम मानते हैं कि स्वतन्त्रता प्रत्येक मनुष्य का अमिट अधिकार है। हर मनुष्य
को अपने श्रम का फल पाने जैसा सभी प्रकार का अधिकार है और प्रत्येक राष्ट्र
अपने मूलभूत प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण स्वामी है। अगर कोई सरकार जनता
को उसके इन मूलभूत अधिकारों से वंचित रखती है तो जनता का केवल यह
अधिकार ही नहीं बल्कि आवश्यक कर्त्तव्य भी बन जाता है कि ऐसी सरकार को
समाप्त कर दे। क्योंकि ब्रिटिश सरकार इन सिद्धान्तों, जिनके लिए हम लड़ रहे
हैं, के बिल्कुल विपरीत है, इसलिए हमारा दृढ़ विश्वास है कि जिस भी ढंग से
देश में क्रान्ति लायी जा सके और इस सरकार का पूरी तरह ख़ात्मा किया जा
सके, इसके लिए हर प्रयास और अपनाये गये सभी ढंग नैतिक स्तर पर उचित
हैं। हम वर्तमान ढाँचे के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में क्रान्तिकारी
परिवर्तन लाने के पक्ष में हैं। हम वर्तमान समाज को पूरे तौर पर एक नये सुगठित
समाज में बदलना चाहते हैं। इस तरह मनुष्य के हाथों मनुष्य का शोषण असम्भव
बनाकर सभी के लिए सब क्षेत्रों में पूरी स्वतन्त्रता विश्वसनीय बनायी जाये। जब
तक सारा सामाजिक ढाँचा बदला नहीं जाता और उसके स्थान पर समाजवादी
समाज स्थापित नहीं होता, हम महसूस करते हैं कि सारी दुनिया एक तबाह कर
देने वाले प्रलय-संकट में है।
जहाँ तक शान्तिपूर्ण या अन्य तरीक़ों से क्रान्तिकारी आदर्शों की स्थापना का
सम्बन्ध है, हम घोषणा करते हैं कि इसका चुनाव तत्कालीन शासकों की मर्जी पर
निर्भर है। क्रान्तिकारी अपने मानवीय प्यार के गुणों के कारण मानवता के पुजारी
हैं। हम शाश्वत और वास्तविक शान्ति चाहते हैं, जिसका आधार न्याय और समानता
है। हम झूठी और दिखावटी शान्ति के समर्थक नहीं जो बुज़दिली से पैदा होती है
और भालों और बन्दूक़ों के सहारे जीवित रहती है।
क्रान्तिकारी अगर बम और पिस्तौल का सहारा लेता है तो यह उसकी चरम
आवश्यकता में से पैदा होता है और आख़िरी दाँव के तौर पर होता है। हमारा
विश्वास है कि अमन और क़ानून मनुष्य के लिए है, न कि मनुष्य अमन और
क़ानून के लिए।
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 381

फ़्रांस के उच्च न्यायाधीश का यह कहना उचित है कि क़ानून की आन्तरिक
भावना स्वतन्त्रता समाप्त करना या प्रतिबन्ध लगाना नहीं, वरन स्वतन्त्रता को सुरक्षित
रखना और उसे आगे बढ़ाना है। सरकार को क़ानूनी शक्ति बनाये गये उन उचित
क़ानूनों से मिलेगी जो केवल सामूहिक हितों के लिए बनाये गये हैं, और जो जनता
की इच्छाओं पर आधारित हों, जिनके लिए यह बनाये गये हैं। इससे विधायकों समेत
कोई भी बाहर नहीं हो सकता।
क़ानून की पवित्रता तभी तक रखी जा सकती है जब तक वह जनता के दिल
यानी भावनाओं को प्रकट करता है। जब यह शोषणकारी समूह के हाथों में एक
पुर्ज़ा बन जाता है तब अपनी पवित्रता और महत्त्व खो बैठता है। न्याय प्रदान करने
के लिए मूल बात यह है कि हर तरह के लाभ या हित का ख़ात्मा होना चाहिए।
ज्यों ही क़ानून सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा करना बन्द कर देता है त्यों ही
ज़ुल्म और अन्याय को बढ़ाने का हथियार बन जाता है। ऐसे क़ानूनों को जारी रखना
सामूहिक हितों पर विशेष हितों की दम्भपूर्ण ज़बरदस्ती के सिवाय कुछ नहीं है।
वर्तमान सरकार के क़ानून विदेशी शासन के हितों के लिए चलते हैं और हम
लोगों के हितों के विपरीत हैं। इसलिए इनकी हमारे ऊपर किसी भी प्रकार की
सदाचारिता लागू नहीं होती।
अतः हर भारतीय की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि इन क़ानूनों को चुनौती दे
और इनका उल्लंघन करे। अंग्रेज़ न्यायालय, जो शोषण के पुर्जे हैं, न्याय नहीं दे
सकते। विशेषकर राजनीतिक क्षेत्रों में, जहाँ सरकार और लोगों के हितों का टकराव
है। हम जानते हैं कि ये न्यायालय सिवाय न्याय के ढकोसले के और कुछ नहीं
हैं।
इन्हीं कारणों से हम इसमें भागीदारी करने से इन्कार करते हैं और इस मुक़दमे
की कार्यवाही में भाग नहीं लेंगे।
5-5-30
जज ने नोट किया – यह रिकॉर्ड में तो रखा जाये लेकिन इसकी कॉपी न दी
जाये, क्योंकि इसमें कुछ अनचाही बातें लिखी हैं।
382 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

विशेष ट्रिब्यूनल के पुनर्गठन पर
1 मई, 1930 को अध्यादेश द्वारा स्थापित विशेष ट्रिब्यूनल के सदस्य थे –
जस्टिस जे. कोल्डस्ट्रीम (अध्यक्ष), जस्टिस आग़ा हैदर व जस्टिस जी.सी. हिल्टन।
5 मई को कार्रवाई शुरू हुई। पुंज हाउस को अदालत बनाया गया। क्रान्तिकारी युवक
अदालत में क्रान्तिकारी गीत गाते और क्रान्तिकारी नारे लगाते आते। भगतसिंह ने माँग
की कि उन्हें 15 दिन का समय दिया जाये, ताकि वे ट्रिब्यूनल के गैर-क़ानूनी होने
सम्बन्धी तर्क पेश कर सकें। लेकिन यह माँग मानी नहीं गयी। 24 क्रान्तिकारियों के
नाम मुक़दमे के लिए लिये गये, जिनमें से 16 पर मुक़दमा चलाया गया। बाद में
बटुकेश्वर दत्त के ख़िलाफ़ केस वापिस ले लिया गया। जिन पर मुक़दमा शुरू किया
गया वे थे – सुखदेव, भगतसिंह, किशोरी लाल, देसराज, प्रेमदत्त, जयदेव कपूर, शिव
वर्मा, महावीर सिंह, यतीन्द्रनाथ दास, अजयकुमार घोष, यतीन्द्र सान्याल, विजयकुमार
सिन्हा, शिवराम राजगुरु, कुन्दनलाल व कमलनाथ तिवारी। भगतसिंह और उनके
साथियों ने वकील करने से इन्कार कर दिया। 12 मई, 1930 को भगतसिंह और
उनके साथियों को हथकड़ियों में अदालत में लाया गया। हथकड़ियाँ न खोलने के
विरोध में उन्होंने बस से उतरने से इन्कार कर दिया। ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष ने उन्हें
ज़बरदस्ती उतारने का आदेश दिया। भगतसिंह और उनके साथियों ने अदालत का
बायकाट कर दिया। यद्यपि उन लोगों की हथकड़ियाँ दोपहर के खाने के लिए खोली
गयीं, लेकिन खाने के बाद फिर लगाने का आदेश दे दिया गया, जिसका भगतसिंह
और उनके साथियों ने विरोध किया। अध्यक्ष ने भारतीयों को गाली देते हुए भगतसिंह
को लाठियों से पीटने का आदेश दिया।
अदालत में क्रान्तिकारियों, ख़ासकर भगतसिंह को संवाददाताओं और जनता के
सामने लाठियों और जूतों से मारा गया। भगतसिंह ने भारतीयों को गाली देने पर
आपत्ति करते हुए जस्टिस आग़ा हैदर के भारतीय होने पर सवाल किया और पूछा
कि ऐसी मानसिक स्थिति वाले जज न्याय कैसे करेंगे? जस्टिस आग़ा हैदर ने उस
दिन की कार्रवाई पर हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया। इस घटना की दुनियाभर
में चर्चा हुई। सारे भारत में भगतसिंह-दिवस मनाया गया, जिसके फलस्वरूप जस्टिस
कोल्डस्ट्रीम को लम्बी छुट्टी पर जाना पड़ा और 21 जून को ट्रिब्यूनल नये सिरे से
गठित किया गया। अब जस्टिस जी.सी. हिल्टन को अध्यक्ष व जस्टिस जे.के. टैप और
जस्टिस अब्दुल कादिर को सदस्य बनाया गया।
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 383

इस पर भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने निम्नलिखित पत्र में अपने विचार प्रकट
किये। – स.
कमिश्नर,
विशेष ट्रिब्यूनल
लाहौर षड्यन्त्र केस, लाहौर
श्रीमान जी,
जबकि ट्रिब्यूनल के दो न्यायाधीशों को हटा दिया गया है या वे हट गये
हैं और दो नये न्यायाधीश उनके स्थान पर नियुक्त कर दिये गये हैं, इसलिए
हम अपना स्पष्टीकरण दर्ज कराना आवश्यक समझते हैं, ताकि हम अपना पक्ष
स्पष्ट कर सकें और किसी भी प्रकार की शंकाएँ पैदा होने से बचा जा सके।
12 मई, 1930 को न्यायाधीश कोल्डस्ट्रीम ने जोकि अध्यक्ष भी हैं, एक
अदालती आदेश पास किया जिसके अन्तर्गत हमें अदालत में हथकड़ियाँ पहनाने
का आदेश दिया गया। इस आदेश का पालन कराने के लिए पुलिस को
बल-प्रयोग करने के लिए भी कहा गया।
इस अचानक और असाधारण आदेश का कारण जानने के लिए हमने इस
अदालत से निवेदन किया था, जिसे सुनने की आवश्यकता महसूस नहीं की
गयी। ऐसी स्थितियों में पुलिस हमें ज़बरन हथकड़ियाँ लगाकर वापिस जेल ले
आयी। अगले दिन तीन में से एक न्यायाधीश आगा़ हैदर ने अध्यक्ष के इस
आदेश से अपने को अलग कर लिया। उस दिन से हम न्यायालय में नहीं जा
रहे।
जिन शर्तों पर हम न्यायालय में आने को तैयार हैं, वे अगले दिन न्यायालय
के समक्ष रखी गयी थीं। शर्तें थीं कि या तो अध्यक्ष क्षमा माँगें या फिर उन्हें
बदल दिया जाये। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि उनकी जगह पर ऐसे
एक न्यायाधीश को बैठा दिया जाये जो उस आदेश में भागीदार था।
पाँच हफ़्ते तक तो अपराधियों की शिकायत को विचार-योग्य ही नहीं
समझा गया।
वर्तमान ट्रिब्यूनल के निर्माण में दोनों अध्यक्ष और दूसरे न्यायाधीश – जो
उनके साथ सहमत नहीं हुए थे – को बदलकर दो नये न्यायाधीश लगाये गये
हैं। इस तरह एक न्यायाधीश को जो उस आदेश में भागीदार था, क्योंकि
आदेश बहुमत के आधार पर दिया गया था, ट्रिब्यूनल का अध्यक्ष बनाया गया
है। ऐसी स्थिति में हम पुरज़ोर यह कहना चाहते हैं कि न्यायाधीश कोल्डस्ट्रीम
से व्यक्तिगत स्तर पर हमारा कोई शिकवा नहीं था और न ही शिकायत थी।
384 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

हमारे विरोध का कारण तो न्यायाधीश कोल्डस्ट्रीम की ओर से पास किया
बहुमत का आदेश और उसके बाद हमारे साथ हुआ दुर्व्यवहार था। न्यायाधीश
कोल्डस्ट्रीम और न्यायाधीश हैमिल्टन का हम सम्मान करते हैं, जैसाकि एक
मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का किया जाना चाहिए। हमारा रोष एक विशेष आदेश
के विरोध में था जिसके कारण ट्रिब्यूनल, जोकि उस आदेश के लिए
ज़िम्मेदार है, के अध्यक्ष से क्षमा माँगने की माँग की गयी थी। अध्यक्ष को
हटा देने से कोई अन्तर नहीं पड़ता, क्योंकि अब जज हैमिल्टन, जो उस
आदेश में शरीक थे, न्यायाधीश कोल्डस्ट्रीम के स्थान पर अध्यक्षता कर रहे
हैं। हम तो केवल यह कह सकते हैं कि बदली हुई स्थितियों ने अब ज़ख़्म
पर नमक छिड़कने का ही काम किया है।
आपके,
भगतसिंह
25 जून, 1930 बी.के. दत्त
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 385

राजनीतिक मामलों की पैरवी पर
23 दिसम्बर, 1930 को पंजाब के गवर्नर सर ज़्याफ़्रेडी पर क्रान्तिकारी युवक
हरिकृष्ण ने गोली चलायी और उसे घायल कर दिया। हरिकृष्ण पकड़ा गया और
उस पर केस चला। लेकिन वकील की सलाह पर हरिकृष्ण जिस तरह केस की पैरवी
कर रहा था, भगतसिंह उसके तरीक़े से असहमत थे। इसलिए उन्होंने अपने एक साथी
को जेल से दो पत्र जोकि जून, 1931 में लाहौर से प्रकाशित 'पीपुल्स' नामक अंग्रेज़ी
साप्ताहिक में छपा था, नीचे दिया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि हरिकृष्ण को 9
जून, 1931 को फाँसी दी गयी। – स.
मुझे यह जानकर बहुत अफ़सोस है कि इस सम्बन्ध में मेरा पहला पत्र समय पर
अपने ठिकाने नहीं पहुँच सका और इसलिए उससे कोई फ़ायदा न हो सका, या
यह कि वह उस उद्देश्य की पूर्ति में असफल रहा, जिसके लिए वह लिखा गया
था। इसलिए मैं आमतौर पर यह पत्र राजनीतिक मुक़दमों में पैरवी के सवाल के
बारे में और ख़ासतौर पर क्रान्तिकारी मुक़दमे के बारे में अपने विचारों को प्रकट
करने के लिए लिख रहा हूँ। पहले पत्र में विचारे गये ख़ास-ख़ास नुकतों के अलावा
इसका एक और मक़सद भी होगा, और वह यह कि मैं घटनाओं से गुज़र जाने के
बाद समझदार नहीं बन रहा हूँ।
ख़ैर, मैंने उस ख़त में यह लिखा था कि वकील पैरवी के लिए जो दलीलें
दे रहा था, उन्हें माना न जाये, पर बावजूद आपके और मेरे विरोध के उन्हें मान
लिया गया है।
बावजूद इसके हम अधिक रोशनी में इस बात पर विचार कर सकते हैं और
पैरवी से सम्बन्धित आगामी नीति के बारे में ठोस विचार बना सकते हैं।
आप यह जानते ही हैं कि मैं कभी भी हमारे राजनीतिक बन्दियों की बचाव
वाली पैरवी करने का समर्थक नहीं रहा, परन्तु इसका यह मतलब नहीं कि उचित
संघर्ष की ख़ूबसूरती बिल्कुल ही बिगाड़ दी जाये। इस पर विशेष ध्यान की
आवश्यकता है कि ख़ूबसूरती शब्द यहाँ अवास्तविक शक्ल में प्रयोग नहीं किया
गया है और इसका उस उद्देश्य से सम्बन्ध है, जिसने कि एक ख़ास कार्रवाई के
लिए हरिकृष्ण को प्रेरित किया। जब मैं यह जानता हूँ कि सब राजनीतिक बन्दियों
386 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

को अपनी पैरवी स्वयं करनी चाहिए, तो यह कुछ विशेष मान्यताओं के साथ कहता
हूँ। मेरा मतलब सिर्फ़ एक ही बात से साफ़ हो सकता है।
एक मनुष्य एक ही विशेष मक़सद को सामने रखकर काम नहीं करता।
उसकी गिरफ़्तारी के बाद उसके काम का राजनीतिक महत्त्व समाप्त नहीं होना
चाहिए और काम की अपेक्षा मरने की तैयारी ही ज़्यादा ज़रूरी नहीं बन जानी
चाहिए। हम इसे उदाहरण की मदद से और साफ़ करें। हरिकृष्ण गवर्नर को गोली
मारने के लिए आये। मैं इस कार्रवाई का नैतिक पक्ष नहीं लेना चाहता। मैं सिर्फ़
इस केस के राजनीतिक पहलू पर विचार करना चाहता हूँ। गोली मारने वाला व्यक्ति
गिरफ़्तार कर लिया गया। दुर्भाग्य से पुलिस-कर्मचारी इस कार्रवाई में मर गया। अब
पैरवी का सवाल सामने आता है। जब गवर्नर बच गया तो हरिकृष्ण के केस में बड़ा
सुन्दर बयान आ सकता था; अर्थात असली तथ्यों का बयान, जैसाकि हमारे केस
में नीचे की अदालत में दिया गया था। इस प्रकार यह क़ानूनी मक़सद को भी पूरा
कर देता और कार्य के उद्देश्य को भी ऊपर उठाता, पर वकील की कोशिश और
क़ाबिलियत सब-इंस्पेक्टर की मौत के बारे में दलीलें देने में उलझी रही। उसे यह
कहकर क्या मिला कि हरिकृष्ण सिर्फ़ गवर्नर को ज़ख़्मी करना चाहता था, मारना
नहीं चाहता था? इसी तरह की दूसरी बातें थीं। क्या कोई समझदार एक क्षण के
लिए भी ऐसी बात की उम्मीद कर सकता है? क्या इस दलील की कोई क़ानूनी
क़ीमत थी? बिल्कुल कोई क़ीमत नहीं, तो फिर गवर्नर पर गोली चलाने के विशेष
कार्य की ही नहीं, बल्कि सारी क्रान्तिकारी लहर की ख़ूबसूरती ख़राब करने से
क्या फ़ायदा था?
प्रतिवाद तथा भावनाएँ ज़्यादा देर तक नहीं चल सकतीं। क्रान्तिकारी दल के
द्वारा सरकार को बहुत समय पहले चेतावनी दी जा चुकी। इसके लिए क्रान्तिकारी
दल को भारत ने बेहद इज़्ज़त दी थी और क्रान्ति की लहर सही स्वरूप में आरम्भ
हो गयी थी। वायसराय की गाड़ी पर बम फेंकने का कार्य एक चेतावनी नहीं था;
भले ही वह असफल रहा। चटगाँव की घटनाएँ न चेतावनी थीं और न केवल
विरोध-प्रदर्शन। इसी तरह हरिकृष्ण का एक्शन अपनेआप में क्रान्तिकारी संघर्ष का
एक हिस्सा था, चेतावनी बिल्कुल नहीं। कार्रवाई की असफलता के बाद अभियुक्त
इस चीज़ को खिलाड़ी की तरह ले सकता है। मक़सद पूरा होने पर सम्भव है
भाग्यवश गवर्नर के बच जाने से हरिकृष्ण प्रसन्न हुआ हो। व्यक्तिगत रूप में किसी
को मारने से कोई लाभ भी नहीं। इन कार्यों का राजनीतिक महत्त्व होता है, ये वह
वातावरण और सोचने का ढंग बनाने में मदद करते हैं जोकि आख़िरी संघर्ष के लिए
बहुत ज़रूरी है। इतना ही पर्याप्त है। व्यक्तिगत कार्य लोगों की सहानुभूति जीतने
के लिए होते हैं। हम कभी-कभी इनको अपने कार्यों के द्वारा प्रोपेगेण्डा का नाम
दे देते हैं।
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 387

इस विचार की रोशनी में क्रान्तिकारी मुक़दमों की पैरवी होनी चाहिए। यह एक
आम समझ वाला नियम है कि संघर्ष करने वाली सभी पार्टियाँ प्राप्त अधिक करना
चाहती हैं और खोना कम। कोई भी जनरल ऐसी युद्धनीति नहीं अपना सकता जिसमें
उसे सोचे हुए लाभ से अधिक बलिदान देना पड़े। मुझसे अधिक कोई भी हरिकृष्ण
के अमूल्य जीवन को बचाने के लिए बेताब नहीं होगा, पर मैं आपको बताना चाहता
हूँ कि जो चीज़ उसकी ज़िन्दगी को अनमोल बनाती है उसे आँख से ओझल नहीं
करना चाहिए। किसी भी क़ीमत पर जीवन को बचाना ही हमारी नीति नहीं है। यह
कांग्रेस की नीति हो सकती है, यह आरामकुर्सियों वाले राजनीतिज्ञों की नीति हो
सकती है, परन्तु यह हमारी नीति नहीं है। बचाव-नीति (डिफ़ेंस पालिसी)
अधिकतर अभियुक्त के अपने सोचने के ढंग पर आधारित होती है, पर यदि
अभियुक्त न सिर्फ़ निडर हो, बल्कि हमेशा की तरह जोशीला भी रहे तो जिस कार्य
के लिए उसने अपनी ज़िन्दगी का ख़तरा मोल लिया उसे बयान में पहले लिया
जाना चाहिए और व्यक्तिगत मसलों को बाद में। इसके बाद भी एक तरह की
उलझन भरी स्थिति हो सकती है क्योंकि कुछ ऐसे केस हो सकते हैं जिनमें
स्थानीय महत्त्व के होने पर भी कार्रवाई (एक्शन) का आम महत्त्व न हो। वहाँ
अपनी ज़िम्मेदारी स्वीकार करने में अभियुक्त को भावुक नहीं होना चाहिए।
निर्मलकान्त राय का मशहूर मुक़दमा इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, परन्तु इस
तरह के राजनीतिक महत्त्व के केस में व्यक्तिगत पहलू को राजनीतिक पहलू से
अधिक महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिए। अगर आप मेरा निष्पक्ष मत प्रस्तुत केस के
बारे में पूछना चाहते हैं तो मैं साफ़-साफ़ बताना चाहता हूँ कि यह ऐतिहासिक
महत्त्व की राजनीतिक हत्या बिल्कुल नहीं है।
यहाँ मैं एक बात अवश्य बताना चाहता हूँ कि इस केस का गला घोंटने वाले
लोग – जिन्हें अपनी ग़लती का अहसास हो गया है और उसके बाद जो समझदार
बन गये हैं, लेकिन अपने कन्धों पर उत्तरदायित्व लेने का हौसला नहीं कर पा रहे
हैं – हमारे नौजवान साथी के चमत्कारी चरित्र के सौन्दर्य को नीचा दिखाने की
कोशिश कर रहे हैं। मैंने उन्हें यह कहते सुना है कि हरिकृष्ण बहादुरी से सामना
करने में काँप गया है यह एक हद दर्जे का शर्मनाक झूठ है। मुझे उस जैसा हौसले
वाला नौजवान कभी कोई नहीं मिला। लोगों को हमारे ऊपर मेहरबानी करनी चाहिए।
हौसला पस्त करने और नीचा दिखाने से तो अच्छा है कि वे हमारी तरफ़ ध्यान
ही न दें।
वकीलों को उन नौजवानों की ज़िन्दगियाँ, यहाँ तक कि मौतों को ख़राब करने
में इतने आत्महीन विशेषज्ञ (बेज़मीरे एक्सपर्ट) नहीं होना चाहिए, जो दुखी जनता
की मुक्ति के पवित्र काम में अपना आपा न्योछावर करने के लिए आते हैं। मुझे
यह जानकर सचमुच बहुत दुख होता है कि धीरे-धीरे हम राजनीतिक कार्यकर्ताओं
388 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

की एक नयी अफ़सरशाही बना रहे हैं। यह बात ठीक नहीं है तो भला एक वकील
किसी राजनीतिक मुक़दमे में यक़ीन न आने वाली फ़ीस क्यों माँगे, जैसाकि इस
केस में फ़ीस दी गयी है।
राजद्रोह के केसों में मैं वह हद बता सकता हूँ जिस तक हम पैरवी की इजाज़त
दे सकते हैं। गत वर्ष जब एक साथी पर समाजवादी भाषण देने का मुक़दमा चला
और उसे ग़लत ढंग पर लड़ा गया तो हमें केवल हैरानगी ही हुई थी। ऐसे केसों
में हमें अपने द्वारा प्रचारित विचारों और आदर्शों को स्वीकार कर लेना चाहिए और
स्वतन्त्र भाषण का अधिकार माँगना चाहिए, परन्तु कहाँ यह बात और कहाँ यह
कहना कि हमने कुछ कहा ही नहीं! हम इस तरह अपने ही आन्दोलन के हितों
के विरुद्ध जाते हैं। कांग्रेस को मौजूदा आन्दोलन में बिना मुक़दमों की पैरवी किये
जेल जाने से नुक़सान पहुँचा है। मेरे विचार में यह एक ग़लती थी।
ख़ैर, मेरा ख़याल है कि आप मेरा यह पत्र पिछले पत्र के साथ पढ़ेंगे और
राजनीतिक मुक़दमों की पैरवी के बारे में मेरे विचारों से अच्छी तरह परिचित हो
जायेंगे। हरिकृष्ण के केस में मेरे ख़याल में जल्दी से जल्दी हाईकोर्ट में अपील कर
देनी चाहिए और उसको बचाने की पूरी कोशिश होनी चाहिए। मुझे आशा है कि
मेरे ये दोनों पत्र प्रत्येक बात आपको बता देंगे, जो मैं आपको बताना चाहता हूँ।
आपका
भगतसिंह
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 389

गाँधीजी के नाम

सुखदेव की खुली चिट्ठी

गाँधीजी के नाम सुखदेव की यह ‘खुली चिट्ठी’ मार्च, 1931 में लिखी गयी
थी जो गाँधीजी के उत्तर सहित हिन्दी ‘नवजीवन’ 30 अप्रैल, 1931 के अंक में
प्रकाशित हुई थी। — स.
परम कृपालु महात्मा जी,
आजकल की ताज़ा ख़बरों से मालूम होता है कि समझौते की बातचीत की
सफलता के बाद आपने क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं को फ़िलहाल अपना आन्दोलन
बन्द कर देने और आपको अपने अहिंसावाद को आज़मा देखने का आख़िरी मौक़ा
देने के लिए कई प्रकट प्रार्थनाएँ की हैं। वस्तुतः किसी आन्दोलन को बन्द करना
केवल आदर्श या भावना से होने वाला काम नहीं है। भिन्न-भिन्न अवसरों की
आवश्यकताओं का विचार ही अगुआओं को उनकी युद्धनीति बदलने के लिए
विवश करता है।
माना कि सुलह की बातचीत के दरम्यान, आपने इस ओर एक क्षण के लिए
भी न तो दुर्लक्ष्य किया, न इसे छिपा ही रखा कि यह समझौता अन्तिम समझौता
न होगा। मैं मानता हूँ कि सब बुद्धिमान लोग बिल्कुल आसानी के साथ यह समझ
गये होंगे कि आपके द्वारा प्राप्त तमाम सुधारों का अमल होने लगने पर भी कोई
यह न मानेगा कि हम मंज़िले-मकसूद पर पहुँच गये हैं। सम्पूर्ण स्वतन्त्रता जब तक
न मिले, तब तक बिना विराम के लड़ते रहने के लिए महासभा लाहौर के प्रस्ताव
से बँधी हुई है। उस प्रस्ताव को देखते हुए मौजूदा सुलह और समझौता सिर्फ़
कामचलाऊ युद्ध-विराम है, जिसका अर्थ यही होता है कि आने वाली लड़ाई के
लिए अधिक बड़े पैमाने पर अधिक अच्छी सेना तैयार करने के लिए यह थोड़ा
विश्राम है। इस विचार के साथ ही समझौते और युद्ध-विराम की शक्यता की
कल्पना की जा सकती है और उसका औचित्य सिद्ध हो सकता है।
किसी भी प्रकार का युद्ध-विराम करने का उचित अवसर और उसकी शर्तें
ठहराने का काम तो उस आन्दोलन के अगुआओं का है। लाहौर वाले प्रस्ताव के
390 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

रहते हुए भी आपने फ़िलहाल सक्रिय आन्दोलन बन्द रखना उचित समझा है, तो
भी वह प्रस्ताव तो क़ायम ही है। इसी तरह ‘हिन्दुस्तानी सोशियलिस्ट रिपब्लिकन
पार्टी’ के नाम से ही साफ़ पता चलता है कि क्रान्तिकारियों का आदर्श
समाज-सत्तावादी प्रजातन्त्र की स्थापना करना है। यह प्रजातन्त्र मध्य का विश्राम नहीं
है। उनका ध्येय प्राप्त न हो और आदर्श सिद्ध न हो, तब तक वे लड़ाई जारी रखने
के लिए बँधे हुए हैं। परन्तु बदलती हुई परिस्थितियों और वातावरण के अनुसार वे
अपनी युद्धनीति बदलने को तैयार अवश्य होंगे। क्रान्तिकारी युद्ध जुदा-जुदा मौक़ों
पर जुदा-जुदा रूप धारण करता है। कभी वह प्रकट होता है, कभी गुप्त, कभी
केवल आन्दोलन-रूप होता है, और कभी जीवन-मरण का भयानक संग्राम बन
जाता है। ऐसी दशा में क्रान्तिकारियों के सामने अपना आन्दोलन बन्द करने के लिए
विशेष कारण होने चाहिए। परन्तु आपने ऐसा कोई निश्चित विचार प्रकट नहीं किया।
निरी भावपूर्ण अपीलों का क्रान्तिकारी युद्ध में कोई विशेष महत्त्व नहीं होता, हो नहीं
सकता।
आपके समझौते के बाद आपने अपना आन्दोलन बन्द किया है, और
फलस्वरूप आपके सब क़ैदी रिहा हुए हैं। पर क्रान्तिकारी क़ैदियों का क्या? 1915
ई. से जेलों में पड़े हुए ग़दर-पक्ष के बीसों क़ैदी सज़ा की मियाद पूरी हो जाने पर
भी अब तक जेलों में सड़ रहे हैं। मार्शल लॉ के बीसों क़ैदी आज भी ज़िन्दा क़ब्रों
में दफ़नाये पड़े हैं। यही हाल बब्बर अकाली क़ैदियों का है। देवगढ़, काकोरी,
मछुआ-बाज़ार और लाहौर षड्यन्त्र के क़ैदी अब तक जेल की चहारदीवारी में बन्द
पड़े हुए बहुतेरे क़ैदियों में से कुछ हैं। लाहौर, दिल्ली, चटगाँव, बम्बई, कलकत्ता
और अन्य जगहों में कोई आधी दर्जन से ज़्यादा षड्यन्त्र के मामले चल रहे हैं।
बहुसंख्यक क्रान्तिवादी भागते फिरते हैं, और उनमें कई तो स्त्रियाँ हैं। सचमुच आधी
दर्जन से अधिक क़ैदी फाँसी पर लटकने की राह देख रहे हैं। इन सबका क्या?
लाहौर षड्यन्त्र केस के सज़ायाफ़्ता तीन क़ैदी, जो सौभाग्य से मशहूर हो गये हैं और
जिन्होंने जनता की बहुत अधिक सहानुभूति प्राप्त की है, वे कुछ क्रान्तिवादी दल
का एक बड़ा हिस्सा नहीं हैं। उनका भविष्य ही उस दल के सामने एकमात्र प्रश्न
नहीं है। सच पूछा जाये तो उनकी सज़ा घटाने की अपेक्षा उनके फाँसी पर चढ़ जाने
से ही अधिक लाभ होने की आशा है।
यह सब होते हुए भी आप उन्हें अपना आन्दोलन बन्द करने की सलाह देते
हैं। वे ऐसा क्यों करें? आपने कोई निश्चित वस्तु की ओर निर्देश नहीं किया है। ऐसी
दशा में आपकी प्रार्थनाओं का यही मतलब होता है कि आप इस आन्दोलन को
कुचल देने में नौकरशाही की मदद कर रहे हैं, और आपकी विनती का अर्थ उनके
दल को द्रोह, पलायन और विश्वासघात का उपदेश करना है। यदि ऐसी बात नहीं
है, तो आपके लिए उत्तम तो यह था कि आप कुछ अग्रगण्य क्रान्तिकारियों के पास
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 391

जाकर उनसे सारे मामले के बारे में बातचीत कर लेते। अपना आन्दोलन बन्द करने
के बारे में पहले आपको उनकी बुद्धि की प्रतीति करा लेने का प्रयत्न करना चाहिए
था। मैं नहीं मानता कि आप भी इस प्रचलित पुरानी कल्पना में विश्वास रखते हैं
कि क्रान्तिकारी बुद्धिहीन हैं, विनाश और संहार में आनन्द मानने वाले हैं। मैं आपको
कहता हूँ कि वस्तुस्थिति ठीक इसकी उलटी है, वे सदैव कोई भी काम करने से
पहले उसका खूब सूक्ष्म विचार कर लेते हैं, और इस प्रकार वे जो ज़िम्मेदारी अपने
माथे लेते हैं, उसका उन्हें पूरा-पूरा ख़याल होता है। और, क्रान्ति के कार्य में दूसरे
किसी भी अंग की अपेक्षा वे रचनात्मक अंग को अत्यन्त महत्त्व का मानते हैं,
हालाँकि मौजूदा हालत में अपने कार्यक्रम के संहारक अंग पर डटे रहने के सिवा
और कोई चारा उनके लिए नहीं है।
उनके प्रति सरकार की मौजूदा नीति यह है कि लोगों की ओर से उन्हें अपने
आन्दोलन के लिए जो सहानुभूति और सहायता मिली है, उससे वंचित करके उन्हें
कुचल डाला जाये। अकेले पड़ जाने पर उनका शिकार आसानी से किया जा सकता
है। ऐसी दशा में उनके दल में बुद्धि-भेद और शिथिलता पैदा करने वाली कोई भी
भावपूर्ण अपील एकदम बुद्धिमानी से रहित और क्रान्तिकारियों को कुचल डालने
में सरकार की सीधी मदद करने वाली होगी।
इसलिए हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि या तो आप कुछ क्रान्तिकारी नेताओं
से बातचीत कीजिये – उनमें से कई जेलों में हैं – और उनके साथ सुलह कीजिये
या ये सब प्रार्थनाएँ बन्द रखिये। कृपा कर हित की दृष्टि से इन दो में से कोई एक
रास्ता चुन लीजिये और सच्चे दिल से उस पर चलिये। अगर आप उनकी मदद न
कर सकें, तो मेहरबानी करके उन पर रहम करें। उन्हें अलग रहने दें। वे अपनी
हिफ़ाज़त आप अधिक अच्छी तरह कर सकते हैं। वे जानते हैं कि भावी राजनीतिक
युद्ध में सर्वोपरि स्थान क्रान्तिकारी पक्ष को ही मिलने वाला है। लोकसमूह उनके
आस-पास इकट्ठा हो रहे हैं, और वह दिन दूर नहीं है, जब ये जनसमूह को अपने
झण्डे तले, समाज-सत्ता प्रजातन्त्र के उम्दा और भव्य आदर्श की ओर ले जाते होंगे।
अथवा अगर आप सचमुच ही उनकी सहायता करना चाहते हों, तो उनका
दृष्टिकोण समझ लेने के लिए उनके साथ बातचीत करके इस सवाल की पूरी
तफ़सीलवार चर्चा कर लीजिये।
आशा है, आप कृपा करके उक्त प्रार्थना पर विचार करेंगे और अपने विचार
सर्वसाधारण के सामने प्रकट करेंगे।
आपका,
अनेकों में से एक
392 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

IX.
क्रान्तिकारी जीवन की तस्वीर :
पत्रों के आईने में

The provided image is completely blank and contains no text to transcribe.

मित्र अमरचन्द को लिखा
भगतसिंह का पत्र
भगतसिंह ने यह पत्र अपने मित्र अमरचन्द को 1927 में लिखा था जो उस समय
अमेरिका में पढ़ रहे थे। – स.
प्यारे भाई अमरचन्द जी,
नमस्ते।
अर्ज़ है कि इस दफ़ा अचानक माँ के बीमार होने पर इधर आया और आपकी
मोहतरिमा वाल्दा (आदरणीया माँ) के दर्शन हुए। आपका ख़त पढ़ा। इनके लिए
यह ख़त लिखा। साथ ही दो-चार अल्फ़ाज़ लिखने का मौक़ा मिल गया। क्या
लिखूँ, करम सिंह विलायत गया है, उसका पता भेजा जा रहा है। अभी तो उसने
लिखा है कि लॉ पढ़ेगा, मगर कैसे चल रहा है, सो खुदा जाने, ख़र्च बहुत ज़्यादा
हो रहा है।
भाई, हमारी मुमालिक गैर (विदेश) में जाकर तालीम हासिल करने की
ख़्वाहिश खूब पायमाल (बरबाद) हुई। अच्छा, तुम्हीं लोगों को सब मुबारक़, कभी
मौक़ा मिले तो कोई अच्छी-अच्छी कुतब (पुस्तकें) भेजने की तकलीफ़ उठाना।
आख़िर अमेरिका में लिट्रेचर तो बहुत है। ख़ैर, अभी तो अपनी तालीम में बुरी तरह
फँसे हुए हो।
सानफ़्रांसिस्को वग़ैरह की तरफ़ से सरदारजी (अजीत सिंह जी) का शायद
कुछ पता मिल सके। कोशिश करना। कम अज़ कम ज़िन्दगी का यक़ीन तो हो
जाये। मैं अभी लाहौर जा रहा हूँ। कभी मौक़ा मिले तो ख़त तहरीर फ़रमाइयेगा। पता
सूत्र मण्डी लाहौर होगा। और क्या लिखूँ? कुछ लिखने को नहीं है। मेरा हाल भी
खूब है। बारहा (कई बार) मुसायब (मुसीबतों) का शिकार होना पड़ा। आख़िर
केस वापस ले लिया गया। बादवाँ (बाद में) फिर गिरफ़्तार हुआ। साठ हज़ार की
जमानत पर रिहा हूँ। अभी तक कोई मुक़दमा मेरे ख़िलाफ़ तैयार नहीं हो सका और
ईश्वर ने चाहा तो हो भी नहीं सकेगा। आज एक बरस होने को आया, मगर जमानत
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 395

वापस नहीं ली गयी। जिस तरह ईश्वर को मंजूर होगा। ख़्वाहमख़्वाह तंग करते
**हैं।**¹ भाई, ख़ूब दिल लगाकर तालीम हासिल करते चले जाओ।
आपका ताबेदार
भगतसिंह
अपने मुताल्लिक और क्या लिखूँ, ख़्वाहमख़्वाह शक का शिकार बना हुआ
हूँ। मेरी डाक रुकती है। ख़तूत (पत्र) खोल लिये जाते हैं। न जाने मैं कैसे इस क़दर
शक की निगाह से देखा जाने लगा। ख़ैर भाई, आख़िर सच्चाई सतह पर आयेगी
और इसी की फतह होगी।
1 काले अक्षरों में दिये शब्द लिखकर काट दिये गये हैं। – स.
396 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

सुखदेव के नाम
भगतसिंह का पत्र
मार्च, 1929 में पब्लिक सेफ़्टी बिल को असेम्बली में भारतीय सदस्यों द्वारा रद्द
करने पर दोबारा लाया गया। यद्यपि बिल मतगणना से पास नहीं हो सकता था, तो
भी वायसराय उसे आर्डिनेंस द्वारा लागू करना चाहते थे। राष्ट्रीय नेता एक बार फिर
ब्रिटिश सरकार की ताक़त के सामने लाचारी और अप्रभावी होने की स्थिति पेश कर
रहे थे। ऐसे समय पर भगतसिंह ने सुझाव दिया कि असेम्बली हॉल में बम का धमाका
किया जाये और क्रान्तिकारी पार्टी के विचारों से जनता को शिक्षित किया जाये। इसके
लिए दो साथियों – शिव वर्मा और जयदेव कपूर को चुना गया। सुखदेव उस मीटिंग
में नहीं थे। जब उन्हें इस फ़ैसले की जानकारी हुई तो उन्होंने भगतसिंह से कुछ ऐसे
सवाल किये कि पार्टी की मीटिंग दोबारा बुलायी गयी। इस मीटिंग में भगतसिंह और
बटुकेश्वर दत्त को असेम्बली हॉल में बम का धमाका करने के लिए चुना गया। 8
अप्रैल, 1929 को हॉल में बम का धमाका किया गया।
सुखदेव और भगतसिंह में काफ़ी घनिष्ठता थी और बमकाण्ड में जाने वाले
व्यक्ति को लेकर दोनों में कुछ ग़लतफ़हमी भी हुई। उसी ग़लतफ़हमी को दूर करने
के लिए भगतसिंह ने सुखदेव को एक पत्र लिखा। नीचे उद्धृत यह पत्र 11 अप्रैल,
1929 को सुखदेव की गिरफ़्तारी के समय उनसे बरामद हुआ और मुक़दमे की
कार्रवाई का हिस्सा बन गया। – स.
प्रिय भाई,
जब तक तुम्हें यह ख़त मिलेगा, मैं दूर मंज़िल की ओर जा चुका होऊँगा। मेरा
यक़ीन कर, आजकल मैं बहुत प्रसन्नचित्त अपने आख़िरी सफ़र के लिए तैयार हूँ।
अपनी ज़िन्दगी की सारी खुशियों और मधुर यादों के बावजूद मेरे दिल में एक बात
आज तक चुभती रही। वह यह कि मुझे भाई ने ग़लत समझा और मुझ पर कमज़ोरी
का बहुत ही गम्भीर आरोप लगाया। आज मैं पहले से कहीं ज़्यादा पूरी तरह से
सन्तुष्ट हूँ। मैं आज भी महसूस करता हूँ कि वह बात कुछ भी नहीं, बस
ग़लतफ़हमी थी। ग़लत शक था। मेरे खुले व्यवहार के कारण मुझे बातूनी समझा
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 397

गया और मेरे द्वारा सबकुछ स्वीकार कर लेने को कमज़ोरी माना गया। लेकिन आज
मैं महसूस कर रहा हूँ कि कोई ग़लतफ़हमी नहीं, मैं कमज़ोर नहीं, अपनों में से
किसी से भी कमज़ोर नहीं।
भाई मेरे, मैं साफ़ दिल से विदा लूँगा और तुम्हारी शंका भी दूर करूँगा। इसमें
तुम्हारी बहुत कृपालुता होगी। ध्यान रहे, तुम्हें जल्दबाज़ी से कोई क़दम नहीं उठाना
चाहिए। सोच-समझकर और शान्ति से काम को आगे बढ़ाना। अवसर पा लेने की
जल्दबाज़ी न करना। जनता के प्रति जो तुम्हारा फ़र्ज़ है उसे निभाते हुए काम को
सावधानीपूर्वक करते रहना। सलाह के तौर पर मैं कहना चाहता हूँ कि शास्त्री मुझे
पहले से अधिक अच्छा लग रहा है। मैं उसे सामने लाने की कोशिश करता, बशर्ते
कि वह साफ़गोई से अपनेआप को एक अँधेरे भविष्य के लिए अर्पित करने के लिए
सहमत हो। उसे साथियों के नज़दीक आने दो ताकि वह उनके आचार-विचार का
अध्ययन कर सके। यदि वह अर्पित भाव से काम करेगा तो काफ़ी लाभदायक और
मूल्यवान सिद्ध होगा। लेकिन जल्दबाज़ी न करना। तुम स्वयं अच्छे पारखी हो। जिस
तरह जँचे, देख लेना। आ मेरे भाई, अब हम खुशियाँ मना लें।
खैर, मैं कह सकता हूँ कि बहस के मामले में मुझसे अपने पक्ष पेश किये
बिना नहीं रहा जाता। मैं पुरज़ोर कहता हूँ कि मैं आशाओं और आकांक्षाओं से भरपूर
जीवन की समस्त रंगीनियों से ओतप्रोत हूँ, लेकिन वक्त आने पर मैं सबकुछ कुर्बान
कर दूँगा। सही अर्थों में यही बलिदान है। ये वस्तुएँ मनुष्य की राह में कभी भी
अवरोध नहीं बन सकतीं, बशर्ते कि वह इन्सान हो। जल्द ही तुम्हें इसका प्रमाण
मिल जायेगा। किसी के चरित्र के सन्दर्भ में विचार करते समय एक बात विचारणीय
होनी चाहिए कि क्या प्यार किसी इन्सान के लिए मददगार साबित हुआ है? इसका
जवाब मैं आज देता हूँ – हाँ वह मेजिनी था, तुमने अवश्य पढ़ा होगा कि अपने
पहले नाकाम विद्रोह, मन को कुचल डालने वाली हार का दुख और दिवंगत
साथियों की याद – यह सब वह बरदाश्त नहीं कर सकता था। वह पागल हो जाता
या खुदकशी कर लेता। लेकिन प्रेमिका के एक पत्र से वह दूसरों जितना ही नहीं,
बल्कि सबसे अधिक मज़बूत हो गया।
जहाँ तक प्यार के नैतिक स्तर का सम्बन्ध है, मैं यह कह सकता हूँ कि यह
अपने में एक भावना से अधिक कुछ भी नहीं और यह पशुवृत्ति नहीं बल्कि मधुर
मानवीय भावना है। प्यार सदैव मानव चरित्र को ऊँचा करता है, कभी भी नीचा
नहीं दिखाता बशर्ते कि प्यार प्यार हो। इन लड़कियों (प्रेमिकाओं) को कभी भी
पागल नहीं कहा जा सकता है जैसाकि हम फ़िल्मों में देखते हैं – वे सदैव
पाशविक वृत्ति के हाथों में खेलती हैं। सच्चा प्यार कभी भी सृजित नहीं किया जा
सकता। यह अपने ही आप आता है – कब, कोई कह नहीं सकता?
मैं यह कह सकता हूँ कि नौजवान युवक-युवती आपस में प्यार कर सकते
398 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

हैं और वे अपने प्यार के सहारे अपने आवेगों से ऊपर उठ सकते हैं। अपनी पवित्रता
क़ायम रखे रह सकते हैं। मैं यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि जब मैंने प्यार को
मानवीय कमज़ोरी कहा था तो यह किसी सामान्य व्यक्ति को लेकर नहीं कहा था,
जहाँ तक कि बौद्धिक स्तर पर सामान्य व्यक्ति होते हैं पर वह सबसे उच्च आदर्श
स्थिति होगी जब मनुष्य प्यार, घृणा और अन्य सभी भावनाओं पर नियन्त्रण पा लेगा।
जब मनुष्य कर्म के आधार पर अपना पक्ष अपनायेगा। एक व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति
से प्यार की मैंने निन्दा की है, वह भी एक आदर्श स्थिति होने पर। मनुष्य के पास
प्यार की एक गहरी भावना होनी चाहिए जिसे वह एक व्यक्ति विशेष तक सीमित
न करके सर्वव्यापी बना दे।
मेरे विचार से मैंने अपने पक्ष को काफ़ी स्पष्ट कर दिया है। हाँ, एक बात मैं
तुम्हें ख़ासतौर पर बताना चाहता हूँ कि बावजूद क्रान्तिकारी विचारों के हम नैतिकता
सम्बन्धी सभी सामाजिक धारणाओं को नहीं अपना सके। क्रान्तिकारी बातें करके
इस कमज़ोरी को बहुत सरलता से छिपाया जा सकता है, लेकिन वास्तविक जीवन
में हम तुरन्त ही थर-थर काँपना शुरू कर देते हैं।
मैं तुमसे अर्ज़ करूँगा कि यह कमज़ोरी त्याग दो। अपने मन में बिना कोई ग़लत
भावना लाये अत्यन्त नम्रतापूर्वक क्या मैं तुमसे आग्रह कर सकता हूँ कि तुममें जो
अति आदर्शवाद है उसे थोड़ा-सा कम कर दो। जो पीछे रहेंगे और मेरी जैसी बीमारी
का शिकार होंगे, उनसे बेरुख़ी का व्यवहार न करना, झिड़ककर उनके दुख-दर्दों
को न बढ़ाना, क्योंकि उनको तुम्हारी हमदर्दी की ज़रूरत है। क्या मैं यह आशा रखूँ
कि तुम किसी विशेष व्यक्ति के प्रति खुन्दक रखने के बजाय उनसे हमदर्दी रखोगे,
उनको इसकी बहुत ज़रूरत है। तुम तब तक इन बातों को नहीं समझ सकते जब
तक कि स्वयं इस चीज़ का शिकार न बनो। लेकिन मैं यह सबकुछ क्यों लिख
रहा हूँ? दरअसल मैं अपनी बातें स्पष्ट तौर पर कहना चाहता हूँ। मैंने अपना दिल
खोल दिया है।
तुम्हारी सफलताओं और जीवन के लिए शुभकामनाओं के साथ।
तुम्हारा,
भगतसिंह
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 399