भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
नहीं करती और इस देश में क़ानूनी व्याख्याओं में कभी-कभार उद्देश्य और नीयत
की चर्चा होती है", हमारी सब कोशिशें बेकार कर दीं।
माई लॉर्ड, इन परिस्थितियों में सुयोग्य सेशन जज के लिए उचित होता कि
या तो अपराध का अनुमान परिणाम से लगाते या हमारे बयान की मदद से
मनोवैज्ञानिक पहलू का फ़ैसला करते, पर उन्होंने इन दोनों में से एक भी काम
नहीं किया।
विचारणीय बात यह है कि असेम्बली में हमने जो दो बम फेंके, उनसे
किसी भी व्यक्ति की शारीरिक या आर्थिक हानि नहीं हुई। इस दृष्टिकोण से हमें
जो सज़ा दी गयी है वह कठोरतम ही नहीं, बदला लेने की भावना वाली भी है।
यदि दूसरे दृष्टिकोण से देखा जाये तो जब तक अभियुक्त की मनोभावना का
पता न लगाया जाये, उसके असली उद्देश्य का पता ही नहीं चल सकता। यदि
उद्देश्य को पूरी तरह भुला दिया जाये तो किसी भी व्यक्ति के साथ न्याय नहीं हो
सकता, क्योंकि उद्देश्य को नज़रों में न रखने पर संसार के बड़े-बड़े सेनापति
साधारण हत्यारे नज़र आयेंगे, सरकारी कर वसूल करने वाले अधिकारी चोर,
जालसाज दिखायी देंगे और न्यायाधीशों पर भी क़त्ल करने का अभियोग लगेगा।
इस तरह तो समाज-व्यवस्था और सभ्यता ख़ूनखराबा, चोरी और जालसाजी
बनकर रह जायेगी। यदि उद्देश्य की उपेक्षा की जाये, तो किसी हुकूमत को क्या
अधिकार है कि समाज के व्यक्तियों से न्याय करने को कहे? उद्देश्य की उपेक्षा
की जाये तो हर धर्मप्रचारक झूठ का प्रचारक दिखायी देगा और हरेक पैग़म्बर पर
अभियोग लगेगा कि उसने करोड़ों भोले और अनजान लोगों को गुमराह किया।
यदि उद्देश्य को भुला दिया जाये तो हज़रत ईसा मसीह गड़बड़ कराने वाले,
शान्ति भंग करने वाले और विद्रोह का प्रचार करने वाले दिखायी देंगे और क़ानून
के शब्दों में 'ख़तरनाक व्यक्तित्व' माने जायेंगे, लेकिन हम उनकी पूजा करते हैं,
उनके लिए हमारे दिलों में बेहद आदर है, उनकी मूर्ति हमारे दिलों में
आध्यात्मिकता का स्पन्दन पैदा करती है। यह क्यों? यह इसलिए कि उनके
प्रयत्नों का प्रेरक एक ऊँचे दरजे का उद्देश्य था। उस युग के शासकों ने उनके
उद्देश्य को नहीं पहचाना, उन्होंने उनके बाहरी व्यवहार को ही देखा, लेकिन उस
समय से लेकर इस समय तक उन्नीस शताब्दियाँ बीत चुकी हैं, क्या हमने तब
से लेकर अब तक कोई तरक़्क़ी नहीं की? क्या हम ऐसी गलतियाँ दोहरायेंगे?
अगर ऐसा हो तो मानना पड़ेगा कि इन्सानियत की कुर्बानियाँ, बड़े शहीदों के
प्रयत्न बेकार रहे और आज भी हम उसी स्थान पर हैं, जहाँ आज से बीस
शताब्दी पहले थे?
क़ानूनी दृष्टि से उद्देश्य का प्रश्न ख़ास महत्त्व रखता है। जनरल डायर का
उदाहरण लीजिये। उसने गोली चलायी और सैकड़ों निरपराध और शस्त्रहीन
बहरों को सुनाने के लिए बम का धमाका / 341
व्यक्तियों को मार डाला, लेकिन फ़ौजी अदालत ने उसे गोली का निशाना बनाने
का हुक्म देने की जगह लाखों रुपये इनाम दिये। एक और उदाहरण पर ध्यान
दीजिये – श्री खड्गबहादुर सिंह ने, जो एक गोरखा नौजवान हैं, कलकत्ता में एक
अमीर मारवाड़ी को छुरे से मार डाला। यदि उद्देश्य को एक तरफ़ रख दिया जाये
तो खड्गबहादुर को मौत की सज़ा मिलनी चाहिए थी, लेकिन उसे कुछ वर्षों की
सज़ा दी गयी और उस अवधि से भी बहुत पहले ही मुक्त कर दिया गया। क्या
क़ानून में कोई दरार रखनी थी, जो उसे मौत की सज़ा न दी गयी? या उसके विरुद्ध
हत्या का अभियोग सिद्ध न हुआ? उसने हमारी ही तरह अपना अपराध स्वीकार
किया था, लेकिन उसका जीवन बच गया और वह स्वतन्त्र है। मैं पूछता हूँ, उसे
फाँसी की सज़ा क्यों नहीं दी गयी? उसका कार्य जाँचा-तुला था। उसने पेचीदा ढंग
की तैयारी की थी। उद्देश्य की दृष्टि से उसका कार्य हमारे कार्य की अपेक्षा ज़्यादा
घातक और संगीन था। उसे इसलिए बहुत ही नरम सज़ा मिली क्योंकि उसका
मक़सद नेक था। उसने समाज को एक ऐसी जोंक से छुटकारा दिलाया, जिसने
कई एक सुन्दर लड़कियों का खून चूस लिया था। श्री खड्गबहादुर सिंह को महज
क़ानून की प्रतिष्ठा बचाये रखने के लिए कुछ वर्षों की सज़ा दी गयी।
यह सिद्धान्त किस क़दर ग़लत है। यह न्याय के बुनियादी सिद्धान्त का
विरोध है, जोकि इस प्रकार है – ‘क़ानून आदमियों के लिए है, आदमी क़ानून
के लिए नहीं है।’ इस दशा में क्या कारण है कि हमें भी वे रियायतें न दी जायें,
जो श्री खड्गबहादुर सिंह को मिली थीं। स्पष्ट है कि उसे नरम सज़ा देते समय
उसका उद्देश्य दृष्टि में रखा गया था, अन्यथा कोई भी व्यक्ति जो किसी दूसरे को
क़त्ल करता है, फाँसी की सज़ा से नहीं बच सकता। क्या इसलिए हमें आम
क़ानूनी अधिकार नहीं मिल रहा कि हमारा कार्य हुकूमत के विरुद्ध था या इसलिए
कि इस कार्य का राजनीतिक महत्त्व है?
माई लॉर्ड, इस दशा में मुझे यह कहने की आज्ञा दी जाये कि जो हुकूमत इन
कमीनी हरकतों में आश्रय खोजती है, जो हुकूमत व्यक्ति के क़ुदरती अधिकार
छीनती है, उसे जीवित रहने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं। अगर यह क़ायम है,
तो आरजी तौर पर और हज़ारों बेगुनाहों का खून इसकी गरदन पर है। यदि क़ानून
उद्देश्य नहीं देखता, तो न्याय नहीं हो सकता और न ही स्थायी शान्ति स्थापित हो
सकती है।
आटे में संखिया (ज़हर) मिलाना जुर्म नहीं, बशर्ते कि इसका उद्देश्य चूहों को
मारना हो, लेकिन यदि इससे किसी आदमी को मार दिया जाये, तो यह क़त्ल का
अपराध बन जाता है। लिहाज़ा ऐसे क़ानूनों को जो तर्क पर आधारित नहीं और न्याय
के सिद्धान्त के विरुद्ध हैं, समाप्त कर देना चाहिए। ऐसे ही न्याय-विरोधी क़ानूनों
342 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
के कारण बड़े-बड़े श्रेष्ठ बौद्धिक लोगों ने बग़ावत के कार्य किये हैं।
हमारे मुक़दमे के तथ्य बिल्कुल सादा हैं। 8 अप्रैल, 1929 को हमने सेण्ट्रल
असेम्बली में दो बम फेंके। उनके धमाके से चन्द लोगों को मामूली खरोंचें आयीं।
चेम्बर में हंगामा हुआ, सैकड़ों दर्शक और सदस्य बाहर निकल गये। कुछ देर बाद
ख़ामोशी छा गयी। मैं और साथी बी.के. दत्त ख़ामोशी के साथ दर्शक गैलरी में बैठे
रहे और हमने स्वयं अपने को प्रस्तुत किया कि हमें गिरफ़्तार कर लिया जाये। हमें
गिरफ़्तार कर लिया गया। अभियोग लगाये गये और हत्या करने के प्रयत्न के अपराध
में हमें सज़ा दी गयी, लेकिन बमों से 4-5 आदमियों को मामूली चोटें आयीं और
एक बेंच को मामूली-सा नुक़सान पहुँचा, और जिन्होंने यह अपराध किया, उन्होंने
बिना किसी क़िस्म के हस्तक्षेप के अपनेआप को गिरफ़्तारी के लिए पेश कर दिया।
सेशन जज ने स्वीकार किया कि यदि हम भागना चाहते तो भागने में सफल हो
सकते थे। हमने अपना अपराध स्वीकार किया और अपनी स्थिति स्पष्ट करने के
लिए बयान दिया। हमें सज़ा का भय नहीं है। लेकिन हम यह नहीं चाहते कि हमें
ग़लत तौर पर समझा जाये। हमारे बयान से कुछ पैराग्राफ़ काट दिये गये हैं, यह
वास्तविक स्थिति की दृष्टि से हानिकारक है।
समग्र रूप में हमारे वक्तव्य के अध्ययन से साफ़ प्रकट होता है कि हमारे
दृष्टिकोण से हमारा देश एक नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है। इस दशा में काफी ऊँची
आवाज़ में चेतावनी देने की ज़रूरत थी और हमने अपने विचारानुसार चेतावनी दी
है। सम्भव है कि हम ग़लती पर हों, हमारा सोचने का ढंग जज महोदय के सोचने
के ढंग से भिन्न हो, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हमें अपने विचार प्रकट करने
की स्वीकृति न दी जाये और ग़लत बातें हमारे साथ जोड़ी जायें।
'इन्क़लाब ज़िन्दाबाद' और 'साम्राज्यवाद मुर्दाबाद' के सम्बन्ध में हमने जो
व्याख्या अपने बयान में दी, उसे उड़ा दिया गया है; हालाँकि यह हमारे उद्देश्य का
ख़ास भाग है। 'इन्क़लाब ज़िन्दाबाद' से हमारा वह उद्देश्य नहीं था, जो आमतौर पर
ग़लत अर्थ में समझा जाता है। पिस्तौल और बम इन्क़लाब नहीं लाते, बल्कि
इन्क़लाब की तलवार विचारों की सान पर तेज़ होती है और यही चीज़ थी जिसे
हम प्रकट करना चाहते थे। हमारे इन्क़लाब का अर्थ पूँजीवादी युद्धों की मुसीबतों
का अन्त करना है। मुख्य उद्देश्य और उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया समझे बिना
किसी के सम्बन्ध में निर्णय देना उचित नहीं है। ग़लत बातें हमारे साथ जोड़ना
साफ़-साफ़ अन्याय है।
इसकी चेतावनी देना बहुत आवश्यक था। बेचैनी रोज़-रोज़ बढ़ रही है। यदि
उचित इलाज न किया गया, तो रोग ख़तरनाक रूप ले लेगा। कोई भी मानवीय
शक्ति इसकी रोकथाम न कर सकेगी। हमने इस तूफ़ान का रुख़ बदलने के लिए
यह कार्रवाई की। हम इतिहास के गम्भीर अध्येता हैं। हमारा विश्वास है कि यदि
बहरों को सुनाने के लिए बम का धमाका / 343
सत्ताधारी शक्तियाँ ठीक समय पर सही कार्रवाइयाँ करतीं, तो फ्रांस और रूस की
खूनी क्रान्तियाँ न बरस पड़तीं। दुनिया की कई बड़ी-बड़ी हुकूमतें विचारों के तूफ़ान
को रोकते हुए खून-ख़राबे के वातावरण में डूब गयीं। सत्ताधारी लोग परिस्थितियों
के प्रवाह को बदल सकते हैं। हम पहली चेतावनी देना चाहते थे और यदि हम कुछ
व्यक्तियों की हत्या करने के इच्छुक होते, तो हम अपने मुख्य उद्देश्य में असफल
हो जाते। माई लॉर्ड, इस नीयत (भावना) और उद्देश्य को दृष्टि में रखते हुए हमने
कार्रवाई की और इस कार्रवाई के परिणाम हमारे बयान का समर्थन करते हैं। एक
और नुक़्ता स्पष्ट करना आवश्यक है। यदि हमें बमों की ताक़त के सम्बन्ध में क़तई
ज्ञान न होता, तो हम पं. मोतीलाल नेहरू, श्री केलकर, श्री जयकर और श्री जिन्ना
जैसे सम्माननीय राष्ट्रीय व्यक्तियों की उपस्थिति में क्यों बम फेंकते? हम नेताओं
के जीवन किस तरह ख़तरे में डाल सकते थे? हम पागल तो नहीं हैं? और अगर
पागल होते तो जेल में बन्द करने के बजाय हमें पागलखाने में बन्द किया जाता।
बमों के सम्बन्ध में हमें निश्चित जानकारी थी। उसी के कारण हमने ऐसा साहस
किया। जिन बेंचों पर लोग बैठे थे, उन पर बम फेंकना कहीं आसान काम था,
लेकिन खाली जगह पर बमों का फेंकना निहायत मुश्किल काम था। अगर बम
फेंकने वाले सही दिमागों के न होते या वे परेशान (असन्तुलित) होते तो बम खाली
जगह की बजाय बेंचों पर गिरते। तो मैं कहूँगा कि खाली जगह के चुनाव के लिए
जो हिम्मत हमने दिखायी, उसके लिए हमें इनाम मिलना चाहिए। इन हालात में,
माई लॉर्ड, हम सोचते हैं कि हमें ठीक तरह समझा नहीं गया। आपकी सेवा में हम
सज़ाओं में कमी कराने नहीं आये, बल्कि अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए आये
हैं। हम चाहते हैं कि न तो हमसे अनुचित व्यवहार किया जाये, न ही हमारे सम्बन्ध
में अनुचित राय दी जाये। सज़ा का सवाल हमारे लिए गौण है।
(जनवरी, 1930)
(लाहौर हाईकोर्ट के जस्टिस एस. फ़ोर्ड ने फ़ैसले में लिखा : “यह बयान कोई
ग़लती न होगी कि ये लोग दिल की गहराई और पूरे आवेग के साथ वर्तमान समाज
के ढाँचे को बदलने की इच्छा से प्रेरित थे। भगतसिंह एक ईमानदार और सच्चे
क्रान्तिकारी हैं। मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि वे इस स्वप्न को लेकर
पूरी सच्चाई से खड़े हैं कि दुनिया का सुधार वर्तमान सामाजिक ढाँचे को तोड़कर
ही हो सकता है। वे क़ानून के ढाँचे की जगह मनुष्य की स्वतन्त्र इच्छा को स्थापित
करना चाहते हैं। अराजकतावादियों की सदा यही मान्यता रही है, परन्तु जो अपराध
इनके और इनके साथी पर लगा है, उसकी यह कोई सफ़ाई नहीं है।” - स.)
344 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
VIII.
जेल की सलाख़ों के पीछे से
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इंस्पेक्टर जनरल के नाम पत्र
12 जून, 1929 को असेम्बली बमकाण्ड के मुक़दमे का ड्रामा ख़त्म हुआ।
भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त को उम्रक़ैद की सज़ा दी गयी। भगतसिंह को दिल्ली
से पंजाब ले जाकर मियाँवाली जेल में व दत्त को लाहौर केन्द्रीय जेल में रखा गया।
उन्होंने जेल में राजनीतिक बन्दियों के साथ व्यवहार के लिए संघर्ष की योजना गाड़ी
में ही बना डाली। उनके अनुसार, “सज़ा पाने के बाद हमने देखा कि हमारे वर्ग के
राजनीतिक क़ैदियों की स्थिति बहुत ख़राब थी।” 17 जून, 1929 को भगतसिंह और
बटुकेश्वर दत्त ने अलग-अलग नोटिसों में 15 जून से भूख हड़ताल शुरू करने की
सूचना और अपनी माँगों की सूची सरकार को पेश की। बाद में, 14 सितम्बर, 1929
को ये दोनों नोटिस पं. मदनमोहन मालवीय द्वारा लेजिस्लेटिव असेम्बली में पढ़े गये।
एक दूसरे पत्र में भगतसिंह ने स्वयं को लाहौर जेल भेजने की बात उठायी ताकि
साथियों के सम्पर्क में रह सकें।
मियाँवाली जेल
17 जून, 1929
सेवा में,
इंस्पेक्टर जनरल, जेल,
पंजाब (जेल्स) लाहौर।
प्रिय महोदय,
इस सच्चाई के बावजूद कि साण्डर्स शूटिंग केस में गिरफ़्तार दूसरे नौजवानों के
साथ ही मुझ पर भी मुक़दमा चलेगा, मुझे दिल्ली से मियाँवाली जेल में बदल दिया
गया है। उस केस की सुनवाई 26 जून, 1929 से शुरू होने वाली है। मैं यह समझने
में सर्वथा असमर्थ रहा हूँ कि मुझे यहाँ तब्दील करने के पीछे क्या भावना काम
कर रही है।
जो भी हो, न्याय की माँग है कि हरेक अभियुक्त (अण्डर ट्रायल) को वे सब
सुविधाएँ मिलनी चाहिए, जिनसे वह अपने मुक़दमे की तैयारी कर सके और लड़
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 347
सके। मैं यहाँ रहते कैसे अपना वकील नियुक्त कर सकता हूँ? क्योंकि यहाँ रहते
हुए मुझे अपने पिता या दूसरे रिश्तेदारों से सम्पर्क रखना कठिन है। यह स्थान काफ़ी
अलग-थलग है, रास्ता कठिन है और लाहौर से काफ़ी दूर है।
मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझे तुरन्त लाहौर सेण्ट्रल जेल में बदलने का
आदेश दें, जिससे कि मुझे अपना केस लड़ने की तैयारी करने का उचित अवसर
मिले। आशा है कि शीघ्र ध्यान दिया जायेगा।
आपका
भगतसिंह
348 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
भूख हड़ताल का नोटिस ( भगतसिंह )
17 जून, 1929
प्रति,
इंस्पेक्टर जनरल, जेल्स, पंजाब, लाहौर।
असेम्बली बमकाण्ड दिल्ली के सम्बन्ध में मुझे आजीवन क़ैद की सज़ा दी
गयी है, इसलिए स्पष्ट है कि मैं राजनीतिक बन्दी हूँ। दिल्ली जेल में मुझे विशेष
भोजन मिलता था, लेकिन यहाँ पहुँचने पर मेरे साथ सामान्य अपराधियों जैसा सलूक
किया जा रहा है इसलिए मैं 15 जून, 1929 की सुबह से भूख हड़ताल पर हूँ।
इन दो-तीन दिनों में मेरा वज़न दिल्ली जेल की अपेक्षा 6 पौण्ड कम हो गया है।
मैं आपका ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहता हूँ कि मुझे हर हाल में राजनीतिक
बन्दी का विशेष दर्जा मिलना चाहिए। मेरी माँगें हैं : अच्छा भोजन (दूध, घी, दाल,
चावल आदि के साथ), मशक़्क़त न करायी जाये, स्नान-सुविधा (साबुन,
तेल-हजामत आदि), प्रत्येक तरह का साहित्य (इतिहास, अर्थशास्त्र, राजनीतिक
विज्ञान, कविता, नाटक या उपन्यास, समाचारपत्र)। मुझे उम्मीद है कि आप
उदारतापूर्वक मेरे कथन पर विचार करेंगे और अपना फ़ैसला लेंगे।
भगतसिंह
आजीवन बन्दी न. 117,
मियाँवाली जेल
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 349
भूख हड़ताल का नोटिस (बी.के. दत्त)
17 जून, 1929
सुपरिण्टेण्डेण्ट, सेण्ट्रल जेल, लाहौर
मैं आपको और उच्च अधिकारियों को बताना चाहता हूँ कि राजनीतिक बन्दी
होने के नाते मैं निम्न सुविधाओं की माँग कर सकता हूँ। असेम्बली में बम फेंकने
के बाद लॉर्ड इर्विन ने अपने अन्तिम भाषण में कहा था, “यह बम किसी एक
व्यक्ति की ओर नहीं बल्कि एक संस्था पर फेंके गये हैं।” फिर श्री मिडल्टन ने
अपने फ़ैसले में उल्लेख किया है कि “ये लोग (दत्त और भगतसिंह) अदालत में
‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद’, ‘सर्वहारा ज़िन्दाबाद’ आदि के नारे लगाते हुए आते थे
जिससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि वे इस तरह के राजनीतिक विचारों के हैं। इन्हीं
विचारों के प्रचार को रोकने के लिए मैं इनको जीवन क़ैद की सज़ा देता हूँ।”
मैं पुनः यह बता देना चाहता हूँ कि जब कोई यूरोपियन स्वार्थपरता के लिए
स्वयं क़ानून की अवहेलना करता है तब जेल में उसको सभी तरह की सुविधाएँ
मिलती हैं। उसे बिजली वाला हवादार कमरा, सबसे अच्छी खुराक (दूध, मक्खन,
डबल रोटी, गोश्त आदि) और अच्छे कपड़े मिलेंगे। लेकिन हम राजनीतिक क़ैदियों
को ये सुविधाएँ मुहैया नहीं करायी जा रहीं। लॉर्ड इर्विन और श्री मिडल्टन की
टिप्पणियाँ यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि हम राजनीतिक बन्दी हैं और
इस आधार पर मैं माँग करता हूँ कि हमारे साथ राजनीतिक बन्दियों जैसा व्यवहार
होना चाहिए। मुझे अच्छी खुराक मिलनी चाहिए, जोकि मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए
आवश्यक है।
इसके साथ ही राजनीति पर विचार करने के लिए मुझे हर प्रकार का साहित्य
और समाचारपत्र मिलने चाहिए। लोग हमें अक्खड़, गुमराह और बेसब्र नौजवान
कहते हैं, इसलिए हमें अलग-अलग पुस्तकें पढ़ने का अवसर दिया जाना चाहिए,
ताकि हम देख सकें कि हम वास्तव में बेसब्र, गुमराह नौजवान हैं या नहीं, हमारे
काम का विचार ठीक है या नहीं। मेरी माँगें इस प्रकार हैं –
- अच्छी खुराक, सुबह दूध और डबल रोटी। दोपहर को दाल, चावल, घी,
350 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
सब्ज़ी और चीनी और रात को डबल रोटी, गोश्त और चटनी।
2. मशक़्क़त न करायी जाये।
3. समाचारपत्र और हर प्रकार का साहित्य।
4. स्नान, साबुन, तेल, कंघी और हज्जाम आदि सहित।
5. अच्छी रिहायश।
6. अपने कपड़े।
सज़ा से पहले और बाद में मुझे ये सब चीज़ें जेल के ख़र्च पर मिलती थीं,
लेकिन यहाँ ये सब चीज़ें नहीं मिल रहीं। इसलिए मैंने 14 जून, 1929 से भूख
हड़ताल शुरू कर दी है। इन्हीं कारणों से मियाँवाली जेल में मेरे साथी भगतसिंह
ने भी भूख हड़ताल की हुई है। मैं तब तक भूख हड़ताल नहीं छोड़ूँगा जब तक
कि सरकार हमारी माँगों को नहीं स्वीकार करती।
मैं तुरन्त उत्तर की आशा करता हूँ। जो भी कोई सरकारी अधिकारी आयेगा
उससे इस विषय पर विचार-विमर्श के लिए मैं तैयार हूँ।
बी.के. दत्त,
क़ैदी, असेम्बली बम केस
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 351
यतीन्द्रनाथ दास का पत्र
3 जुलाई, 1929
सम्राट बनाम यतीन्द्रनाथ दास
महोदय,
आपका प्रार्थी अत्यन्त सम्मानपूर्वक प्रार्थना करता है कि –
(क) क़रीब चार या पाँच दिन पहले रेलवे स्टेशन पुलिस लॉकअप, जहाँ मैं
बन्दी रखा गया था, में शिनाख़्ती परेड करवायी गयी।
(ख) कि रेलवे स्टेशन से गन्दे कपड़े पहने व क़रीब तीस-पैंतालीस साल
की उम्र के बीच के कुछ पंजाबी भंगियों और कुलियों को लाया गया। इन व्यक्तियों
को इस लॉकअप पर एक गली से लाया गया, जिसके क़रीब मजिस्ट्रेट की कार
में पहचान कराने वाला बैठा हुआ था। जब मुझे इन छह व्यक्तियों के बीच खड़ा
कर दिया गया और यद्यपि ऐसी शिनाख़्ती परेड के बेतुकेपन के विषय में मैंने
मजिस्ट्रेट से रोष भी प्रकट किया, क्योंकि ये पंजाबी न सिर्फ़ अत्यन्त हृष्ट-पुष्ट
थे उनके चेहरे के रूप तक से कोई भी यह बता सकता था कि वे बंगाली नहीं
हैं। लेकिन मेरी आपत्तियों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया, हालाँकि मैंने मजिस्ट्रेट
से बार-बार यह कहा कि न्यायोचित यह होगा कि मुझे मुझसे मिलते-जुलते
बंगालियों के बीच खड़ा किया जाये, क्योंकि पुलिस के पास मेरा फ़ोटो, मेरे
हस्ताक्षर आदि थे जिन्हें वे मेरी शिनाख़्त करने आने वाले व्यक्ति या व्यक्तियों को
दिखा सकते थे।
(ग) कि जो व्यक्ति मेरी शिनाख़्त करने आया उससे, मैं जिस तारीख़ को
उसने कथित रूप से मुझे देखा, उस बारे में कुछ सवाल पूछना चाहता था लेकिन
न सिर्फ़ मेरा अनुरोध नहीं माना गया, वहाँ आये पुलिस-अधिकारियों द्वारा शिनाख़्त
करने आये, उस व्यक्ति को वहाँ से घसीटकर दूर ले जाया गया।
(घ) कि यह कार्रवाई बड़े गोपनीय तरीक़े व जल्दबाज़ी से की गयी और मुझे
352 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
डर है कि इसमें गम्भीर अनियमितता पायी गयी है, जिससे मेरे बचाव में भारी
नुक़सान होगा।
यतीन्द्रनाथ दास,
3 जुलाई, 1929
2.10 अपराह्न
(क्रान्तिकारियों के विरुद्ध मुक़दमे की कार्रवाई किस ढंग से चल रही थी और
ब्रिटिश न्याय किस तरह से एक ढकोसला था, यह तथ्य मजिस्ट्रेट के नाम यतीन्द्रनाथ
दास के इस विरोध-पत्र से भली-भाँति उजागर होता है। – स.)
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 353
होम मेम्बर के नाम पत्र
सेण्ट्रल जेल, लाहौर \hfill 24 जुलाई, 1929
श्रीमान,
होम मेम्बर, भारत सरकार,
हमें (भगतसिंह और बी.के. दत्त) 12 जून, 1929 को दिल्ली के असेम्बली
बम केस में आजीवन कारावास का दण्ड सुनाया गया। जब तक हम दिल्ली जेल
में हवालाती क़ैदी (अण्डर ट्रायल) रहे, हमारे साथ बड़ा अच्छा सलूक किया गया,
पर जब से उस जेल से हमारी तब्दीली मियाँवाली और लाहौर सेण्ट्रल जेल में हुई,
तब से हमारे साथ इखलाकी क़ैदियों जैसा सलूक किया जा रहा है। पहले ही दिन
हमने उच्च अधिकारियों से अच्छी खुराक तथा कुछ और सुविधाओं की माँग की
और जेल की रोटी खाने से इन्कार कर दिया। हमारी माँगें इस प्रकार थीं –
- राजनीतिक क़ैदी होने के नाते हमें अच्छा खाना दिया जाना चाहिए, इसलिए
हमारे भोजन का रूप यूरोपियन क़ैदियों जैसा होना चाहिए। हम उसी तरह की
खुराक की माँग नहीं करते, बल्कि खुराक का स्तर वैसा चाहते हैं। - हमें मशक्क़त के नाम पर जेलों में सम्मानहीन काम करने के लिए बाध्य
नहीं किया जाना चाहिए। - बिना किसी रोक-टोक के पूर्व स्वीकृत (जिन्हें जेल-अधिकारी स्वीकृत
कर लें) पुस्तकें और लिखने का सामान लेने की सुविधा होनी चाहिए। - कम से कम एक दैनिक पत्र हरेक क़ैदी को मिलना चाहिए।
- हरेक जेल में राजनीतिक क़ैदियों का एक विशेष वार्ड होना चाहिए, जिसमें
उन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति की सुविधा होनी चाहिए, जो यूरोपियनों के लिए
होती हैं और एक जेल में रहने वाले सभी राजनीतिक क़ैदी उस वार्ड में इकट्ठा
रहने चाहिए। - स्नान के लिए सुविधाएँ मिलनी चाहिए।
- अच्छे कपड़े मिलने चाहिए।
354 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
हमारी ये माँगें पूर्णतया उचित हैं पर जेल-अधिकारियों ने हमें एक दिन कहा
कि उच्च अधिकारियों ने हमारी माँगें मानने से इन्कार कर दिया है। इससे भी
अधिक यह कि ज़बरदस्ती खाना देने वाले हमारे साथ बड़ा बुरा सलूक करते हैं।
1 जून, 1929 को भगतसिंह ज़बरदस्ती खाना देने के पन्द्रह मिनट बाद तक पूरी
तरह बेसुध पड़े रहे। अतः हम यह निवेदन करते हैं कि बिना किसी ढील के यह
दुर्व्यवहार बन्द किया जाना चाहिए।
इसके साथ ही हमें यू.पी. जेल कमेटी में पण्डित जगतनारायण और ख़ान
बहादुर हाफ़िज़ हिदायत हुसेन की सिफ़ारिश की तरफ़ इशारा करने की आज्ञा दी
जाये। उन्होंने यह सिफ़ारिश की है कि राजनीतिक क़ैदियों के साथ अच्छी क्लास
के क़ैदियों जैसा सलूक किया जाना चाहिए।
हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि हमारी माँगों की ओर ध्यान दिया जाये।
आपके,
भगतसिंह और बी.के. दत्त
नोट : राजनीतिक क़ैदियों से हमारा मतलब उन लोगों से है, जिन्हें
शासन-विरोधी कार्रवाइयों के कारण सज़ा हुई। उदाहरण के लिए, 1915-17 के
लाहौर षड्यन्त्र केस, काकोरी षड्यन्त्र केस व अन्य विद्रोही केसों में सज़ा पाये
लोग।
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 355
पंजाब जेल जाँच समिति के अध्यक्ष को पत्र
6 सितम्बर, 1929
अध्यक्ष, पंजाब जेल जाँच समिति,
और भूख हड़ताल उपसमिति के सदस्यगण, शिमला
(द्वारा, अधीक्षक, बोर्स्टल इंस्टीट्यूट, लाहौर)
प्रिय महोदयो,
निम्न बातें हम आपके विचारार्थ रखने की अनुमति चाहते हैं –
(1) कि हमने भूख हड़ताल छोड़ी नहीं थी बल्कि सिर्फ़ सरकार के निर्णय
तक इसे स्थगित किया था। हमारा विचार है कि हमने यह बात आपसे स्पष्ट कह
दी थी और बार-बार फिर आपसे यह आग्रह किया था कि इसे जनता और साथ
ही सरकार के सामने स्पष्ट कर दिया जाये।
हमें बहुत हैरानी हुई कि 4 सितम्बर, 1929 के 'सिविल एण्ड मिलिट्री गजट'
में भूख हड़ताल उपसमिति के सदस्यों की ओर से दिये प्रेस-वक्तव्य में इस बात
का कोई ज़िक्र नहीं किया गया। फिर भी हमें उम्मीद है कि आप जल्द से जल्द
यह कर देंगे।
(2) हमने सिर्फ़ आश्वासन पर भूख हड़ताल स्थगित नहीं की थी कि आप
और जाँच समिति के बाक़ी सदस्य हमारे सन्तोष के अनुसार हमारी सारी माँगें मानते
हुए इसकी सिफारिश कर देंगे। हममें से एक ने तो आपसे कहा था कि सरकार
ने विगत समय में बहुत सारे मामलों में जाँच समिति की ऐसी सिफ़ारिशें नहीं मानी
थीं, क्योंकि इससे उनका लक्ष्य पूरा नहीं होता, उदाहरणस्वरूप सकीन समिति का
हवाला दिया गया था।
उन्हें संशय था कि आपकी समिति की सिफ़ारिशों के साथ भी यही व्यवहार
होगा।
जवाब में आपने कहा था कि हमारे पास आने से पहले आपने स्थानीय सरकार
से बात कर ली थी, और आप हमें आश्वासन देने की स्थिति में थे कि सरकार
इस मामले में ऐसा नहीं करेगी।
356 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
इस स्पष्ट और महत्त्वपूर्ण आश्वासन पर ही, पूरे नौ घण्टे की बहस के बाद,
हमने भूख हड़ताल स्थगित करना स्वीकार किया था।
इसके अतिरिक्त, आपने हमें विश्वास दिलाया था कि हमारी दृढ़ इच्छा के
अनुसार साथी यतीन्द्रनाथ दास को, उनके स्वास्थ्य की नाजुक स्थिति को देखते
हुए रिहा कर दिया जायेगा।
दूसरे यह कि विचाराधीन कैदियों के रूप में हमारी माँगें, जिनमें सबसे
महत्त्वपूर्ण हम सभी को (समेत साथी भगतसिंह और साथी दत्त) एक साथ आम
बैरक में रखने की माँग, सरकार एक या दो दिन में ही मान लेगी।
पर हमारी आशंकाएँ सही सिद्ध हुईं, जब उपसमिति की तगड़ी व एकमत
सिफ़ारिशों के बावजूद सरकार ने न तो साथी दास को रिहा करना स्वीकार किया
और न ही साथी भगतसिंह और साथी दत्त को हमारे साथ रखना।
अतः इस तथ्य के तत्काल प्रमाण मिल गये हैं कि सरकार को आपकी
सिफ़ारिशों की कोई परवाह नहीं और हमें उम्मीद है, आप हमें यह कहने के लिए
क्षमा करेंगे कि सरकार यही चाहती थी कि हमारी भूख हड़ताल तुड़वाने के लिए
जन-नेता होने के आपके सम्माननीय पद का इस्तेमाल करे। हम और भी बता दें
कि भूख हड़ताल स्थगित करने से पहले हमने बहुत ध्यान से इस बात पर विचार
किया था कि जाँच समिति के वायदे पर कहाँ तक भरोसा किया जा सकता है?
इस सम्बन्ध में साथी भगतसिंह और साथी दत्त की सलाह थी कि वर्तमान अवसर
पर इसकी परीक्षा हो जायेगी। अब हम देख रहे हैं कि सरकार ने, जबकि आपकी
दो बहुत साधारण सिफ़ारिशों की ओर भी ध्यान नहीं दिया, हमें तुरन्त भूख हड़ताल
आरम्भ करने के लिए विवश किया है।
(3) साथी दास की अवस्था बेहद चिन्ताजनक है और यदि सरकार यह
सोचती है कि उनके देहान्त के बाद हम अपने कर्त्तव्य से पीछे हट जायेंगे तो यह
उसकी घातक ग़लती है। हम सभी यह बता रहे हैं कि हम सब उन्हीं के रास्ते पर
चलने के लिए तैयार हैं। फिर भी निरन्तर संघर्ष को ध्यान में रखते हुए सुविधा के
लिए हम स्वयं को दो गुटों में बाँट रहे हैं, जिनमें से पहला गुट फ़ौरन भूख हड़ताल
शुरू कर रहा है।
यह निश्चय किया गया है कि जब पहले गुट के सदस्य का देहान्त हो जाये
तो दूसरे गुट में से एक सदस्य आगे आयेगा।
हमने यह निर्णय इसकी पूरी गम्भीरता को देखते हुए लिया है। अपने साथी
दास के पद-चिह्नों पर चलने के सिवाय हमारे समक्ष और कोई भी सम्मानजनक
व सरल रास्ता नहीं बचा है।
हम अपने कॉज़ (Cause) को वाजिब व बाइज़्ज़त समझते हैं, जिन्हें ऐसे गम्भीर
क़दम उठाने पर मजबूर करने की बजाय कोई भी सरकार मान लेती। हम फिर बता
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 357
दें कि हम यह संघर्ष इस हद निश्चय के साथ कर रहे हैं कि वाजिब व पवित्र
लक्ष्य के लिए मृत्यूपर्यन्त संघर्ष करने के सिवाय और कोई भी चीज़ सम्माननीय
व शानदार नहीं हो सकती।
अन्त में हम यह महसूस करते हैं कि हम अपना कर्त्तव्य पूरा नहीं कर रहे होंगे,
यदि सरकार के सामने हमारे लक्ष्य को दिये समर्थन के लिए आपकी सच्ची हार्दिक
दिलचस्पी और भारी कष्ट के प्रति आपका हार्दिक आभार न मानें।
सच्चे दिल से, हम हैं आपके,
लाहौर षड्यन्त्र केस के भूख हड़ताली
शुक्रवार, 6 सितम्बर, 1929
प्रातः दस बजे
358 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
विद्यार्थियों के नाम पत्र
भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त की ओर से जेल से भेजा गया यह पत्र 19
अक्टूबर, 1929 को पंजाब छात्र संघ, लाहौर के दूसरे अधिवेशन में पढ़कर सुनाया
गया था। अधिवेशन के सभापति थे सुभाषचन्द्र बोस। – स.
इस समय हम नौजवानों से यह नहीं कह सकते कि वे बम और पिस्तौल उठायें।
आज विद्यार्थियों के सामने इससे भी महत्त्वपूर्ण काम है। आने वाले लाहौर
अधिवेशन में कांग्रेस देश की आज़ादी के लिए ज़बरदस्त लड़ाई की उद्घोषणा करने
वाली है। राष्ट्रीय इतिहास के इन कठिन क्षणों में नौजवानों के कन्धों पर बहुत बड़ी
ज़िम्मेदारी आ पड़ेगी। यह सच है कि स्वतन्त्रता के इस युद्ध में अग्रिम मोर्चों पर
विद्यार्थियों ने मौत से टक्कर ली है। क्या परीक्षा की इस घड़ी में वे उसी प्रकार
की दृढ़ता और आत्मविश्वास का परिचय देने से हिचकिचायेंगे?
नौजवानों को क्रान्ति का यह सन्देश देश के कोने-कोने में पहुँचाना है,
फ़ैक्टरी-कारख़ानों के क्षेत्रों में, गन्दी बस्तियों और गाँवों की जर्जर झोंपड़ियों में रहने
वाले करोड़ों लोगों में इस क्रान्ति की अलख जगानी है जिससे आज़ादी आयेगी और
तब एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण असम्भव हो जायेगा।
पंजाब वैसे ही राजनीतिक तौर पर पिछड़ा हुआ माना जाता है। इसकी भी
ज़िम्मेदारी युवक वर्ग पर ही है। आज वे देश के प्रति अपनी असीम श्रद्धा और
शहीद यतीन्द्रनाथ दास के महान बलिदान से प्रेरणा लेकर यह सिद्ध कर दें कि
स्वतन्त्रता के इस संघर्ष में वे दृढ़ता से टक्कर ले सकते हैं।
22 अक्टूबर, 1929 के ट्रिब्यून (लाहौर) में प्रकाशित
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इन्क़लाब ज़िन्दाबाद क्या है?
सम्पादक, मॉडर्न रिव्यू के नाम पत्र
लाहौर के स्पेशल मजिस्ट्रेट की अदालत में “इन्क़लाब ज़िन्दाबाद” नारा लगाने
के जुर्म में छात्रों की गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ गुजराँवाला में नौजवान भारत सभा ने
एक प्रस्ताव पारित किया। ‘मॉडर्न रिव्यू’ के सम्पादक रामानन्द चट्टोपाध्याय ने इस
ख़बर के आधार पर “इन्क़लाब ज़िन्दाबाद” के नारे की आलोचना की। भगतसिंह
और बी.के. दत्त ने ‘मॉडर्न रिव्यू’ के सम्पादक को उनके उस सम्पादकीय का
निम्नलिखित उत्तर दिया था। — स.
सम्पादक महोदय,
मॉडर्न रिव्यू।
आपने अपने सम्मानित पत्र के दिसम्बर, 1929 के अंक में एक टिप्पणी
‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद’ शीर्षक से लिखी है और इस नारे को निरर्थक ठहराने की
चेष्टा की है। आप सरीखे परिपक्व विचारक तथा अनुभवी और यशस्वी सम्पादक
की रचना में दोष निकालना तथा उसका प्रतिवाद करना, जिसे प्रत्येक भारतीय
सम्मान की दृष्टि से देखता है, हमारे लिए एक बड़ी धृष्टता होगी। तो भी इस
प्रश्न का उत्तर देना हम अपना कर्तव्य समझते हैं कि इस नारे से हमारा क्या
अभिप्राय है।
यह आवश्यक है, क्योंकि इस देश में इस समय इस नारे को सब लोगों तक
पहुँचाने का कार्य हमारे हिस्से में आया है। इस नारे की रचना हमने नहीं की है।
यही नारा रूस के क्रान्तिकारी आन्दोलन में प्रयोग किया गया है। प्रसिद्ध समाजवादी
लेखक अप्टन सिंक्लेयर ने अपने उपन्यासों ‘बोस्टन’ और ‘आईल’ में यही नारा
कुछ अराजकतावादी क्रान्तिकारी पात्रों के मुख से प्रयोग कराया है। इसका अर्थ क्या
है? इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि सशस्त्र संघर्ष सदैव जारी रहे और कोई
भी व्यवस्था अल्प समय के लिए भी स्थायी न रह सके, दूसरे शब्दों में — देश
और समाज में अराजकता फैली रहे।
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