सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 348, कुल 788 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 348

व्यक्तियों को मार डाला, लेकिन फ़ौजी अदालत ने उसे गोली का निशाना बनाने
का हुक्म देने की जगह लाखों रुपये इनाम दिये। एक और उदाहरण पर ध्यान
दीजिये – श्री खड्गबहादुर सिंह ने, जो एक गोरखा नौजवान हैं, कलकत्ता में एक
अमीर मारवाड़ी को छुरे से मार डाला। यदि उद्देश्य को एक तरफ़ रख दिया जाये
तो खड्गबहादुर को मौत की सज़ा मिलनी चाहिए थी, लेकिन उसे कुछ वर्षों की
सज़ा दी गयी और उस अवधि से भी बहुत पहले ही मुक्त कर दिया गया। क्या
क़ानून में कोई दरार रखनी थी, जो उसे मौत की सज़ा न दी गयी? या उसके विरुद्ध
हत्या का अभियोग सिद्ध न हुआ? उसने हमारी ही तरह अपना अपराध स्वीकार
किया था, लेकिन उसका जीवन बच गया और वह स्वतन्त्र है। मैं पूछता हूँ, उसे
फाँसी की सज़ा क्यों नहीं दी गयी? उसका कार्य जाँचा-तुला था। उसने पेचीदा ढंग
की तैयारी की थी। उद्देश्य की दृष्टि से उसका कार्य हमारे कार्य की अपेक्षा ज़्यादा
घातक और संगीन था। उसे इसलिए बहुत ही नरम सज़ा मिली क्योंकि उसका
मक़सद नेक था। उसने समाज को एक ऐसी जोंक से छुटकारा दिलाया, जिसने
कई एक सुन्दर लड़कियों का खून चूस लिया था। श्री खड्गबहादुर सिंह को महज
क़ानून की प्रतिष्ठा बचाये रखने के लिए कुछ वर्षों की सज़ा दी गयी।
यह सिद्धान्त किस क़दर ग़लत है। यह न्याय के बुनियादी सिद्धान्त का
विरोध है, जोकि इस प्रकार है – ‘क़ानून आदमियों के लिए है, आदमी क़ानून
के लिए नहीं है।’ इस दशा में क्या कारण है कि हमें भी वे रियायतें न दी जायें,
जो श्री खड्गबहादुर सिंह को मिली थीं। स्पष्ट है कि उसे नरम सज़ा देते समय
उसका उद्देश्य दृष्टि में रखा गया था, अन्यथा कोई भी व्यक्ति जो किसी दूसरे को
क़त्ल करता है, फाँसी की सज़ा से नहीं बच सकता। क्या इसलिए हमें आम
क़ानूनी अधिकार नहीं मिल रहा कि हमारा कार्य हुकूमत के विरुद्ध था या इसलिए
कि इस कार्य का राजनीतिक महत्त्व है?
माई लॉर्ड, इस दशा में मुझे यह कहने की आज्ञा दी जाये कि जो हुकूमत इन
कमीनी हरकतों में आश्रय खोजती है, जो हुकूमत व्यक्ति के क़ुदरती अधिकार
छीनती है, उसे जीवित रहने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं। अगर यह क़ायम है,
तो आरजी तौर पर और हज़ारों बेगुनाहों का खून इसकी गरदन पर है। यदि क़ानून
उद्देश्य नहीं देखता, तो न्याय नहीं हो सकता और न ही स्थायी शान्ति स्थापित हो
सकती है।
आटे में संखिया (ज़हर) मिलाना जुर्म नहीं, बशर्ते कि इसका उद्देश्य चूहों को
मारना हो, लेकिन यदि इससे किसी आदमी को मार दिया जाये, तो यह क़त्ल का
अपराध बन जाता है। लिहाज़ा ऐसे क़ानूनों को जो तर्क पर आधारित नहीं और न्याय
के सिद्धान्त के विरुद्ध हैं, समाप्त कर देना चाहिए। ऐसे ही न्याय-विरोधी क़ानूनों
342 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़