भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
यह अपमानजनक प्रहसन समाप्त कर दिया जाये। विदेशी शोषक नौकरशाही जो
चाहे करे परन्तु उसकी वैधानिकता की नकाब फाड़ देना आवश्यक है।
जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियामेण्ट के पाखण्ड
को छोड़ कर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों को लौट जायें और जनता को विदेशी दमन
और शोषण के विरुद्ध क्रान्ति के लिए तैयार करें। हम विदेशी सरकार को यह बतला
देना चाहते हैं कि हम 'सार्वजनिक सुरक्षा' और 'औद्योगिक विवाद' के दमनकारी
क़ानूनों और लाला लाजपत राय की हत्या के विरोध में देश की जनता की ओर
से यह क़दम उठा रहे हैं।
हम मनुष्य के जीवन को पवित्र समझते हैं। हम ऐसे उज्ज्वल भविष्य में
विश्वास रखते हैं जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शान्ति और स्वतन्त्रता का अवसर
मिल सके। हम इन्सान का ख़ून बहाने की अपनी विवशता पर दुखी हैं। परन्तु क्रान्ति
द्वारा सबको समान स्वतन्त्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त कर
देने के लिए क्रान्ति में कुछ न कुछ रक्तपात अनिवार्य है।
इन्क़लाब ज़िन्दाबाद!
ह. बलराज
कमाण्डर इन चीफ़
332 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
बमकाण्ड पर सेशन कोर्ट में बयान
असेम्बली में बम फेंकने के बाद, 6 जून, 1929 को दिल्ली के सेशन जज
मि. लियोनार्ड मिडिल्टन की अदालत में दिया गया भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त का
ऐतिहासिक बयान। – स.
हमारे ऊपर गम्भीर आरोप लगाये गये हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम भी
अपनी सफ़ाई में कुछ शब्द कहें। हमारे कथित अपराध के सम्बन्ध में निम्नलिखित
प्रश्न उठते हैं : (1) क्या वास्तव में असेम्बली में बम फेंके गये थे, यदि हाँ तो
क्यों? (2) नीचे की अदालत में हमारे ऊपर जो आरोप लगाये गये हैं, वे सही हैं
या ग़लत?
पहले प्रश्न के पहले भाग के लिए हमारा उत्तर स्वीकारात्मक है, लेकिन
तथाकथित चश्मदीद गवाहों ने इस मामले में जो गवाही दी है वह सरासर झूठ
है। चूँकि हम बम फेंकने से इन्कार नहीं कर रहे हैं इसलिए यहाँ इन गवाहों
के बयानों की सच्चाई की परख भी हो जानी चाहिए। उदाहरण के लिए, हम
यहाँ बता देना चाहते हैं कि सार्जेण्ट टेरी का यह कहना कि उन्होंने हममें से
एक के पास से पिस्तौल बरामद की, एक सफ़ेद झूठ-मात्र है, क्योंकि जब
हमने अपनेआप को पुलिस के हाथों में सौंपा तो हममें से किसी के पास कोई
पिस्तौल न थी। जिन गवाहों ने कहा है कि उन्होंने हमें बम फेंकते देखा था,
वे झूठ बोलते हैं। न्याय तथा निष्कपट व्यवहार को सर्वोपरि मानने वाले लोगों
को इन झूठी बातों से एक सबक लेना चाहिए। साथ ही हम सरकारी वकील
के उचित व्यवहार तथा अदालत के अभी तक के न्यायसंगत रवैये को भी
स्वीकार करते हैं।
पहले प्रश्न के दूसरे हिस्से का उत्तर देने के लिए हमें इस बमकाण्ड जैसी
ऐतिहासिक घटना के कुछ विस्तार में जाना पड़ेगा। हमने वह काम किस
अभिप्राय से तथा किन परिस्थितियों के बीच किया, इसकी पूरी एवं खुली
सफ़ाई आवश्यक है।
जेल में हमारे पास कुछ पुलिस अधिकारी आये थे। उन्होंने हमें बताया कि
लॉर्ड इर्विन ने इस घटना के बाद ही असेम्बली के दोनों सदनों के सम्मिलित
बहरों को सुनाने के लिए बम का धमाका / 333
अधिवेशन में कहा है कि “यह विद्रोह किसी व्यक्ति-विशेष के ख़िलाफ़ नहीं, वरन
सम्पूर्ण शासन-व्यवस्था के विरुद्ध था।” यह सुनकर हमने तुरन्त भाँप लिया कि
लोगों ने हमारे इस काम के उद्देश्य को सही तौर पर समझ लिया है।
मानवता को प्यार करने में हम किसी से पीछे नहीं हैं। हमें किसी से व्यक्तिगत
द्वेष नहीं है और हम प्राणि-मात्र को हमेशा आदर की नज़र से देखते आये हैं। हम
न तो बर्बरतापूर्ण उपद्रव करने वाले देश के कलंक हैं, जैसाकि सोशलिस्ट कहलाने
वाले दीवान चमनलाल ने कहा है, और न ही हम पागल हैं, जैसाकि लाहौर के
‘ट्रिब्यून’ तथा कुछ अन्य अख़बारों ने सिद्ध करने का प्रयास किया है। हम तो
केवल अपने देश के इतिहास, उसकी मौजूदा परिस्थिति तथा अन्य मानवोचित
आकांक्षाओं के मननशील विद्यार्थी होने का विनम्रतापूर्वक दावाभर कर सकते हैं।
हमें ढोंग तथा पाखण्ड से नफ़रत है।
एक अपकारजनक संस्था
यह काम हमने किसी व्यक्तिगत स्वार्थ अथवा विद्वेष की भावना से नहीं किया है।
हमारा उद्देश्य केवल उस शासन-व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिवाद करना था जिसके हर
एक काम से उसकी अयोग्यता ही नहीं वरन अपकार करने की उसकी असीम
क्षमता भी प्रकट होती है। इस विषय पर हमने जितना विचार किया उतना ही हमें
इस बात का दृढ़ विश्वास होता गया कि वह केवल संसार के सामने भारत की
लज्जाजनक तथा असहाय अवस्था का ढिंढोरा पीटने के लिए ही क़ायम है और
वह एक ग़ैर-ज़िम्मेदार तथा निरंकुश शासन का प्रतीक है।
जनता के प्रतिनिधियों ने कितनी ही बार राष्ट्रीय माँगों को सरकार के सामने
रखा, परन्तु उसने उन माँगों की सर्वथा अवहेलना करके हर बार उन्हें रद्दी की
टोकरी में डाल दिया। सदन द्वारा पास किये गये गम्भीर प्रस्तावों को भारत की
तथाकथित पार्लियामेण्ट के सामने ही तिरस्कारपूर्वक पैरों तले रौंदा गया है,
दमनकारी तथा निरंकुश क़ानूनों को समाप्त करने की माँग करने वाले प्रस्तावों को
हमेशा अवज्ञा की दृष्टि से ही देखा गया है और जनता द्वारा निर्वाचित सदस्यों ने
सरकार के जिन क़ानूनों तथा प्रस्तावों को अवांछित एवं अवैधानिक बताकर रद्द कर
दिया था, उन्हें केवल क़लम हिलाकर ही सरकार ने लागू कर लिया है।
संक्षेप में, बहुत कुछ सोचने के बाद भी एक ऐसी संस्था के अस्तित्व का
औचित्य हमारी समझ में नहीं आ सका जो, बावजूद उस तमाम शानो-शौक़त
के, जिसका आधार भारत के करोड़ों मेहनतकशों की गाढ़ी कमाई है, केवल
मात्र दिल को बहलाने वाली, थोथी, दिखावटी और शरारतों से भरी हुई एक
संस्था है। हम सार्वजनिक नेताओं की मनोवृत्ति को समझ पाने में भी असमर्थ
हैं। हमारी समझ में नहीं आता कि हमारे नेतागण भारत की असहाय परतन्त्रता
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की खिल्ली उड़ाने वाले इतने स्पष्ट एवं पूर्वनियोजित प्रदर्शनों पर सार्वजनिक
सम्पत्ति एवं समय बरबाद करने में सहायक क्यों बनते हैं।
हम इन्हीं प्रश्नों तथा मज़दूर आन्दोलन के नेताओं की धरपकड़ पर विचार कर
ही रहे थे कि सरकार औद्योगिक विवाद विधेयक लेकर सामने आयी। हम इसी
सम्बन्ध में असेम्बली की कार्यवाही देखने गये। वहाँ हमारा यह विश्वास और भी
दृढ़ हो गया कि भारत की लाखों मेहनतकश जनता एक ऐसी संस्था से किसी बात
की भी आशा नहीं कर सकती जो भारत के बेबस मेहनतकशों की दासता तथा
शोषकों की गलाघोंटू शक्ति की अहितकारी यादगार है।
अन्त में वह क़ानून, जिसे हम बर्बर एवं अमानवीय समझते हैं, देश के
प्रतिनिधियों के सरों पर पटक दिया गया और इस प्रकार करोड़ों संघर्षरत भूखे
मज़दूरों को प्राथमिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया और उनके हाथों से
उनकी आर्थिक मुक्ति का एकमात्र हथियार भी छीन लिया गया। जिस किसी ने
भी कमरतोड़ परिश्रम करने वाले मूक मेहनतकशों की हालत पर हमारी तरह सोचा
है वह शायद स्थिर मन से यह सब नहीं देख सकेगा। बलि के बकरों की भाँति
शोषकों – और सबसे बड़ी शोषक स्वयं सरकार है – की बलिवेदी पर आये दिन
होने वाली मज़दूरों की इन मूक कुर्बानियों को देखकर जिस किसी का दिल रोता
है वह अपनी आत्मा की चीत्कार की उपेक्षा नहीं कर सकता।
गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी समिति के भूतपूर्व सदस्य स्वर्गीय श्री एस.आर.
दास ने अपने प्रसिद्ध पत्र में अपने पुत्र को लिखा था कि इंग्लैण्ड की स्वप्ननिद्रा
भंग करने के लिए बम का उपयोग आवश्यक था। श्री दास के इन्हीं शब्दों को
सामने रखकर हमने असेम्बली भवन में बम फेंके थे। हमने वह काम मज़दूरों की
तरफ़ से प्रतिरोध प्रदर्शित करने के लिए किया था। उन असहाय मज़दूरों के पास
अपने मर्मान्तिक क्लेशों को व्यक्त करने का और कोई साधन भी तो नहीं था। हमारा
एकमात्र उद्देश्य था 'बहरों को सुनाना' और उन पीड़ितों की माँगों पर ध्यान न देने
वाली सरकार को समय रहते चेतावनी देना।
हमारी ही तरह दूसरों की भी परोक्ष धारणा है कि प्रशान्त सागर रूपी भारतीय
मानवता की ऊपरी शान्ति किसी भी समय फूट पड़ने वाले एक भीषण तूफ़ान की
द्योतक है। हमने तो उन लोगों के लिए सिर्फ़ ख़तरे की घण्टी बजायी है जो आने
वाले भयानक ख़तरे की परवाह किये बग़ैर तेज़ रफ़्तार से आगे की तरफ़ भागे जा
रहे हैं। हम लोगों को सिर्फ़ यह बता देना चाहते हैं कि 'काल्पनिक अहिंसा' का
युग अब समाप्त हो चुका है और आज की उठती हुई नयी पीढ़ी को उसकी व्यर्थता
में किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं रह गया है।
मानवता के प्रति हार्दिक सद्भाव तथा अमिट प्रेम रखने के कारण उसे व्यर्थ
के रक्तपात से बचाने के लिए हमने चेतावनी देने के इस उपाय का सहारा लिया
बहरों को सुनाने के लिए बम का धमाका / 335
है। और उस आने वाले रक्तपात को हम ही नहीं, लाखों आदमी पहले से ही देख
रहे हैं।
काल्पनिक अहिंसा
ऊपर हमने 'काल्पनिक अहिंसा' शब्द का प्रयोग किया है। यहाँ पर उसकी व्याख्या
कर देना भी आवश्यक है। आक्रामक उद्देश्य से जब बल का प्रयोग होता है उसे
हिंसा कहते हैं, और नैतिक दृष्टिकोण से उसे उचित नहीं कहा जा सकता। लेकिन
जब उसका उपयोग किसी वैध आदर्श के लिए किया जाता है तो उसका नैतिक
औचित्य भी होता है। किसी हालत में बल-प्रयोग नहीं होना चाहिए, यह विचार
काल्पनिक और अव्यावहारिक है। इधर देश में जो नया आन्दोलन तेज़ी के साथ
उठ रहा है, और जिसकी पूर्व सूचना हम दे चुके हैं वह गुरु गोविन्द सिंह, शिवाजी,
कमाल पाशा, रिज़ा खाँ, वाशिंगटन, गैरीबाल्डी, लफ़ायत और लेनिन के आदर्शों से
ही प्रस्फुरित है और उन्हीं के पद-चिह्नों पर चल रहा है। चूँकि भारत की विदेशी
सरकार तथा हमारे राष्ट्रीय नेतागण दोनों ही इस आन्दोलन की ओर से उदासीन
लगते हैं और जानबूझकर उसकी पुकार की ओर से अपने कान बन्द करने का
प्रयत्न कर रहे हैं, अतः हमने अपना कर्त्तव्य समझा कि हम एक ऐसी चेतावनी दें
जिसकी अवहेलना न की जा सके।
हमारा अभिप्राय
अभी तक हमने इस घटना के मूल उद्देश्य पर ही प्रकाश डाला है। अब हम अपना
अभिप्राय भी स्पष्ट कर देना चाहते हैं।
यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि इस घटना के सिलसिले में मामूली
चोटें खाने वाले व्यक्तियों अथवा असेम्बली के किसी अन्य व्यक्ति के प्रति हमारे
दिलों में कोई वैयक्तिक विद्वेष की भावना नहीं थी। इसके विपरीत हम एक बार
फिर स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हम मानव-जीवन को अत्यन्त पवित्र मानते हैं
और किसी अन्य व्यक्ति को चोट पहुँचाने के बजाय हम मानवजाति की सेवा में
हँसते-हँसते अपने प्राण विसर्जित कर देंगे। हम साम्राज्यवाद की सेना के भाड़े के
सैनिकों जैसे नहीं हैं जिनका काम ही हत्या होता है। हम मानव-जीवन का आदर
करते हैं और बराबर उसकी रक्षा का प्रयत्न करते हैं। इसके बाद भी हम स्वीकार
करते हैं कि हमने जान-बूझकर असेम्बली भवन में बम फेंके।
घटनाएँ स्वयं हमारे अभिप्राय पर प्रकाश डालती हैं। और हमारे इरादों की परख
हमारे काम के परिणाम के आधार पर होनी चाहिए न कि अटकल एवं मनगढ़न्त
परिस्थितियों के आधार पर। सरकारी विशेषज्ञ की गवाही के विरुद्ध हमें यह कहना
है कि असेम्बली भवन में फेंके गये बमों से वहाँ की एक ख़ाली बेंच को ही कुछ
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नुक़सान पहुँचा और लगभग आधे दर्जन लोगों को मामूली-सी खरोंचेंभर आयीं।
सरकारी वैज्ञानिकों ने कहा है कि बम बड़े ज़ोरदार थे और उनसे अधिक नुक़सान
नहीं हुआ, इसे एक अनहोनी घटना ही कहना चाहिए। लेकिन हमारे विचार से उन्हें
वैज्ञानिक ढंग से बनाया ही ऐसा गया था। पहली बात, दोनों बम बेंचों तथा डेस्कों
के बीच की ख़ाली जगह में ही गिरे थे। दूसरे, उनके फूटने की जगह से दो फिट
पर बैठे हुए लोगों को भी, जिनमें श्री पी.आर. राउ, श्री शंकर राव तथा सर जॉर्ज
शुस्टर के नाम उल्लेखनीय हैं, या तो बिल्कुल ही चोटें नहीं आयी या मात्र मामूली
आयीं। अगर उन बमों में ज़ोरदार पोटैशियम क्लोरेट और पिक्रिक एसिड भरा होता,
जैसाकि सरकारी विशेषज्ञ ने कहा है, तो इन बमों ने उस लकड़ी के घेरे को तोड़कर
कुछ गज की दूरी पर खड़े लोगों तक को उड़ा दिया होता। और यदि उनमें कोई
और भी शक्तिशाली विस्फोटक भरा जाता तो निश्चय ही वे असेम्बली के
अधिकांश सदस्यों को उड़ा देने में समर्थ होते। यही नहीं, यदि हम चाहते तो उन्हें
सरकारी कक्ष में फेंक सकते थे जोकि विशिष्ट व्यक्तियों से खचाखच भरा था।
या फिर उस सर जॉन साइमन को अपना निशाना बना सकते थे, जिसके अभागे
कमीशन ने प्रत्येक विचारशील व्यक्ति के दिल में उसकी ओर से गहरी नफ़रत पैदा
कर दी थी और जो उस समय असेम्बली की अध्यक्ष दीर्घा में बैठा था। लेकिन
इस तरह का हमारा कोई इरादा नहीं था और उन बमों ने उतना ही काम किया
जितने के लिए उन्हें तैयार किया गया था। यदि उससे कोई अनहोनी घटना हुई तो
यही कि वे निशाने पर अर्थात् निरापद स्थान पर गिरे।
एक ऐतिहासिक सबक
इसके बाद हमने इस कार्य का दण्ड भोगने के लिए अपनेआप को जान-बूझकर
पुलिस के हाथों समर्पित कर दिया। हम साम्राज्यवादी शोषकों को यह बता देना
चाहते थे कि मुट्ठीभर आदमियों को मारकर किसी आदर्श को समाप्त नहीं
किया जा सकता और न ही दो नगण्य व्यक्तियों को कुचलकर राष्ट्र को दबाया
जा सकता है। हम इतिहास के इस सबक पर ज़ोर देना चाहते थे कि परिचय-पत्र
या परिचय-चिह्न (Letter de catchet) तथा बास्तीय (फ्रांस की कुख्यात जेल
जहाँ राजनीतिक बन्दियों को घोर यन्त्रणाएँ दी जाती थीं) फ्रांस के क्रान्तिकारी
आन्दोलन को कुचलने में समर्थ नहीं हुए थे, फाँसी के फन्दे और साइबेरिया की
ख़ानें रूसी क्रान्ति की आग को बुझा नहीं पायी थीं। तो फिर क्या अध्यादेश और
सेफ़्टी बिल्स भारत में आज़ादी की लौ को बुझा सकेंगे? षड्यन्त्रों का पता
लगाकर या गढ़े हुए षड्यन्त्रों द्वारा नौजवानों को सज़ा देकर या एक महान आदर्श
के स्वप्न से प्रेरित नवयुवकों को जेलों में ठूँसकर क्या क्रान्ति का अभियान रोका
जा सकता है? हाँ, सामयिक चेतावनी से, बशर्ते कि उसकी उपेक्षा न की जाये,
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लोगों की जानें बचायी जा सकती हैं और व्यर्थ की मुसीबतों से उनकी रक्षा की
जा सकती है। आगाही देने का यह भार अपने ऊपर लेकर हमने अपना कर्त्तव्य
पूरा किया है।
क्या है क्रान्ति?
( भगतसिंह से नीचे की अदालत में पूछा गया था कि क्रान्ति से उन लोगों का क्या
मतलब है? इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा था कि) क्रान्ति के लिए खूनी
लड़ाइयाँ अनिवार्य नहीं हैं और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान
है। वह बम और पिस्तौल का सम्प्रदाय नहीं है। क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है –
अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज-व्यवस्था में आमूल परिवर्तन।
समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मज़दूरों को उनके प्राथमिक अधिकार
से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूँजीपति
हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के
लिए मुहताज हैं। दुनियाभर के बाज़ारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने
तथा अपने बच्चों के तन ढँकनेभर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का
निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी
जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूँजीपति
ज़रा-ज़रा-सी बातों के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं।
यह भयानक असमानता और ज़बरदस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक
बहुत बड़ी उथल-पुथल की ओर लिये जा रहा है। यह स्थिति अधिक दिनों तक
क़ायम नहीं रह सकती। स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक
ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरेलियाँ मना रहा है और शोषकों के मासूम बच्चे
तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल रहे हैं।
आमूल परिवर्तन की आवश्यकता
सभ्यता का यह प्रासाद यदि समय रहते सँभाला न गया तो शीघ्र ही चरमराकर बैठ
जायेगा। देश को एक आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है। और जो लोग इस बात
को महसूस करते हैं उनका कर्त्तव्य है कि साम्यवादी सिद्धान्तों पर समाज का
पुनर्निर्माण करें। जब तक यह नहीं किया जाता और मनुष्य द्वारा मनुष्य का तथा एक
राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण, जिसे साम्राज्यवाद कहते हैं, समाप्त नहीं कर दिया
जाता तब तक मानवता को उसके क्लेशों से छुटकारा मिलना असम्भव है, और तब
तक युद्धों को समाप्त कर विश्व-शान्ति के युग का प्रादुर्भाव करने की सारी बातें
महज ढोंग के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं। क्रान्ति से हमारा मतलब अन्ततोगत्वा
एक ऐसी समाज-व्यवस्था की स्थापना से है जो इस प्रकार के संकटों से बरी होगी
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और जिसमें सर्वहारा वर्ग का आधिपत्य सर्वमान्य होगा। और जिसके फलस्वरूप
स्थापित होने वाला विश्व-संघ पीड़ित मानवता को पूँजीवाद के बन्धनों से और
साम्राज्यवादी युद्ध की तबाही से छुटकारा दिलाने में समर्थ हो सकेगा।
सामयिक चेतावनी
यह है हमारा आदर्श। और इसी आदर्श से प्रेरणा लेकर हमने एक सही तथा पुरज़ोर
चेतावनी दी है। लेकिन अगर हमारी इस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया गया और
वर्तमान शासन-व्यवस्था उठती हुई जनशक्ति के मार्ग में रोड़े अटकाने से बाज न
आयी तो क्रान्ति के इस आदर्श की पूर्ति के लिए एक भयंकर युद्ध का छिड़ना
अनिवार्य है। सभी बाधाओं को रौंदकर आगे बढ़ते हुए उस युद्ध के फलस्वरूप
सर्वहारा वर्ग के अधिनायकतन्त्र की स्थापना होगी। यह अधिनायकतन्त्र क्रान्ति के
आदर्शों की पूर्ति के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा। क्रान्ति मानवजाति का जन्मजात
अधिकार है जिसका अपहरण नहीं किया जा सकता। स्वतन्त्रता प्रत्येक मनुष्य का
जन्मसिद्ध अधिकार है। श्रमिक वर्ग ही समाज का वास्तविक पोषक है, जनता की
सर्वोपरि सत्ता की स्थापना श्रमिक वर्ग का अन्तिम लक्ष्य है। इन आदर्शों के लिए
और इस विश्वास के लिए हमें जो भी दण्ड दिया जायेगा, हम उसका सहर्ष स्वागत
करेंगे। क्रान्ति की इस पूजा-वेदी पर हम अपना यौवन नैवेद्य के रूप में लाये हैं,
क्योंकि ऐसे महान आदर्श के लिए बड़े से बड़ा त्याग भी कम है। हम सन्तुष्ट हैं
और क्रान्ति के आगमन की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा कर रहे हैं।
(6 जून, 1929) इन्क़लाब ज़िन्दाबाद!
बहरों को सुनाने के लिए बम का धमाका / 339
बमकाण्ड पर हाईकोर्ट में बयान
दिल्ली के सेशन जज ने असेम्बली बम केस में भगतसिंह को आजीवन
कारावास का दण्ड दिया था। लाहौर हाईकोर्ट में उसकी अपील की गयी। दिल्ली
अदालत के निर्णय की आलोचना करते हुए भगतसिंह ने हाईकोर्ट में यह दूसरा बयान
दिया।
हमारे उद्देश्य पर ध्यान दें
माई लॉर्ड,
हम न वकील हैं, न अंग्रेज़ी विशेषज्ञ हैं और न हमारे पास डिग्रियाँ ही हैं,
इसलिए हमसे शानदार भाषणों की आशा न की जाये। हमारी प्रार्थना है कि हमारे
बयान की भाषा-सम्बन्धी त्रुटियों पर ध्यान न देते हुए, उसके वास्तविक अर्थ को
समझने का प्रयत्न किया जाये। दूसरे तमाम नुक्तों को अपने वकीलों पर छोड़ते
हुए मैं स्वयं एक मुद्दे पर अपने विचार प्रकट करूँगा। यह मुद्दा इस मुक़दमे में
बहुत महत्त्वपूर्ण है। मुद्दा यह है कि हमारी नीयत क्या थी और हम किस हद तक
अपराधी हैं।
यह बड़ा पेचीदा मामला है, इसलिए कोई व्यक्ति भी आपकी सेवा में
विचारों के विकास की वह ऊँचाई प्रस्तुत नहीं कर सकता, जिसके प्रभाव में हम
एक ख़ास ढंग से सोचने और व्यवहार करने लगे थे। हम चाहते हैं कि इसे दृष्टि
में रखते हुए ही हमारी नीयत और अपराध का अनुमान लगाया जाये। प्रसिद्ध
क़ानून-विशारद सालोमन के अनुसार किसी भी व्यक्ति को उसके अपराधी
आचरण के लिए उस समय तक सज़ा नहीं मिलनी चाहिए, जब तक उसका
उद्देश्य क़ानून-विरोधी सिद्ध न हो।
सेशन जज की अदालत में हमने जो लिखित बयान दिया था, वह हमारे
उद्देश्य की व्याख्या भी करता है और उस रूप में हमारी नीयत की व्याख्या करता
था, लेकिन सेशन जज महोदय ने क़लम की एक ही नोक से यह कहकर कि
“आमतौर पर अपराध को व्यवहार में लाने वाली बात क़ानून के कार्य को प्रभावित
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नहीं करती और इस देश में क़ानूनी व्याख्याओं में कभी-कभार उद्देश्य और नीयत
की चर्चा होती है", हमारी सब कोशिशें बेकार कर दीं।
माई लॉर्ड, इन परिस्थितियों में सुयोग्य सेशन जज के लिए उचित होता कि
या तो अपराध का अनुमान परिणाम से लगाते या हमारे बयान की मदद से
मनोवैज्ञानिक पहलू का फ़ैसला करते, पर उन्होंने इन दोनों में से एक भी काम
नहीं किया।
विचारणीय बात यह है कि असेम्बली में हमने जो दो बम फेंके, उनसे
किसी भी व्यक्ति की शारीरिक या आर्थिक हानि नहीं हुई। इस दृष्टिकोण से हमें
जो सज़ा दी गयी है वह कठोरतम ही नहीं, बदला लेने की भावना वाली भी है।
यदि दूसरे दृष्टिकोण से देखा जाये तो जब तक अभियुक्त की मनोभावना का
पता न लगाया जाये, उसके असली उद्देश्य का पता ही नहीं चल सकता। यदि
उद्देश्य को पूरी तरह भुला दिया जाये तो किसी भी व्यक्ति के साथ न्याय नहीं हो
सकता, क्योंकि उद्देश्य को नज़रों में न रखने पर संसार के बड़े-बड़े सेनापति
साधारण हत्यारे नज़र आयेंगे, सरकारी कर वसूल करने वाले अधिकारी चोर,
जालसाज दिखायी देंगे और न्यायाधीशों पर भी क़त्ल करने का अभियोग लगेगा।
इस तरह तो समाज-व्यवस्था और सभ्यता ख़ूनखराबा, चोरी और जालसाजी
बनकर रह जायेगी। यदि उद्देश्य की उपेक्षा की जाये, तो किसी हुकूमत को क्या
अधिकार है कि समाज के व्यक्तियों से न्याय करने को कहे? उद्देश्य की उपेक्षा
की जाये तो हर धर्मप्रचारक झूठ का प्रचारक दिखायी देगा और हरेक पैग़म्बर पर
अभियोग लगेगा कि उसने करोड़ों भोले और अनजान लोगों को गुमराह किया।
यदि उद्देश्य को भुला दिया जाये तो हज़रत ईसा मसीह गड़बड़ कराने वाले,
शान्ति भंग करने वाले और विद्रोह का प्रचार करने वाले दिखायी देंगे और क़ानून
के शब्दों में 'ख़तरनाक व्यक्तित्व' माने जायेंगे, लेकिन हम उनकी पूजा करते हैं,
उनके लिए हमारे दिलों में बेहद आदर है, उनकी मूर्ति हमारे दिलों में
आध्यात्मिकता का स्पन्दन पैदा करती है। यह क्यों? यह इसलिए कि उनके
प्रयत्नों का प्रेरक एक ऊँचे दरजे का उद्देश्य था। उस युग के शासकों ने उनके
उद्देश्य को नहीं पहचाना, उन्होंने उनके बाहरी व्यवहार को ही देखा, लेकिन उस
समय से लेकर इस समय तक उन्नीस शताब्दियाँ बीत चुकी हैं, क्या हमने तब
से लेकर अब तक कोई तरक़्क़ी नहीं की? क्या हम ऐसी गलतियाँ दोहरायेंगे?
अगर ऐसा हो तो मानना पड़ेगा कि इन्सानियत की कुर्बानियाँ, बड़े शहीदों के
प्रयत्न बेकार रहे और आज भी हम उसी स्थान पर हैं, जहाँ आज से बीस
शताब्दी पहले थे?
क़ानूनी दृष्टि से उद्देश्य का प्रश्न ख़ास महत्त्व रखता है। जनरल डायर का
उदाहरण लीजिये। उसने गोली चलायी और सैकड़ों निरपराध और शस्त्रहीन
बहरों को सुनाने के लिए बम का धमाका / 341
व्यक्तियों को मार डाला, लेकिन फ़ौजी अदालत ने उसे गोली का निशाना बनाने
का हुक्म देने की जगह लाखों रुपये इनाम दिये। एक और उदाहरण पर ध्यान
दीजिये – श्री खड्गबहादुर सिंह ने, जो एक गोरखा नौजवान हैं, कलकत्ता में एक
अमीर मारवाड़ी को छुरे से मार डाला। यदि उद्देश्य को एक तरफ़ रख दिया जाये
तो खड्गबहादुर को मौत की सज़ा मिलनी चाहिए थी, लेकिन उसे कुछ वर्षों की
सज़ा दी गयी और उस अवधि से भी बहुत पहले ही मुक्त कर दिया गया। क्या
क़ानून में कोई दरार रखनी थी, जो उसे मौत की सज़ा न दी गयी? या उसके विरुद्ध
हत्या का अभियोग सिद्ध न हुआ? उसने हमारी ही तरह अपना अपराध स्वीकार
किया था, लेकिन उसका जीवन बच गया और वह स्वतन्त्र है। मैं पूछता हूँ, उसे
फाँसी की सज़ा क्यों नहीं दी गयी? उसका कार्य जाँचा-तुला था। उसने पेचीदा ढंग
की तैयारी की थी। उद्देश्य की दृष्टि से उसका कार्य हमारे कार्य की अपेक्षा ज़्यादा
घातक और संगीन था। उसे इसलिए बहुत ही नरम सज़ा मिली क्योंकि उसका
मक़सद नेक था। उसने समाज को एक ऐसी जोंक से छुटकारा दिलाया, जिसने
कई एक सुन्दर लड़कियों का खून चूस लिया था। श्री खड्गबहादुर सिंह को महज
क़ानून की प्रतिष्ठा बचाये रखने के लिए कुछ वर्षों की सज़ा दी गयी।
यह सिद्धान्त किस क़दर ग़लत है। यह न्याय के बुनियादी सिद्धान्त का
विरोध है, जोकि इस प्रकार है – ‘क़ानून आदमियों के लिए है, आदमी क़ानून
के लिए नहीं है।’ इस दशा में क्या कारण है कि हमें भी वे रियायतें न दी जायें,
जो श्री खड्गबहादुर सिंह को मिली थीं। स्पष्ट है कि उसे नरम सज़ा देते समय
उसका उद्देश्य दृष्टि में रखा गया था, अन्यथा कोई भी व्यक्ति जो किसी दूसरे को
क़त्ल करता है, फाँसी की सज़ा से नहीं बच सकता। क्या इसलिए हमें आम
क़ानूनी अधिकार नहीं मिल रहा कि हमारा कार्य हुकूमत के विरुद्ध था या इसलिए
कि इस कार्य का राजनीतिक महत्त्व है?
माई लॉर्ड, इस दशा में मुझे यह कहने की आज्ञा दी जाये कि जो हुकूमत इन
कमीनी हरकतों में आश्रय खोजती है, जो हुकूमत व्यक्ति के क़ुदरती अधिकार
छीनती है, उसे जीवित रहने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं। अगर यह क़ायम है,
तो आरजी तौर पर और हज़ारों बेगुनाहों का खून इसकी गरदन पर है। यदि क़ानून
उद्देश्य नहीं देखता, तो न्याय नहीं हो सकता और न ही स्थायी शान्ति स्थापित हो
सकती है।
आटे में संखिया (ज़हर) मिलाना जुर्म नहीं, बशर्ते कि इसका उद्देश्य चूहों को
मारना हो, लेकिन यदि इससे किसी आदमी को मार दिया जाये, तो यह क़त्ल का
अपराध बन जाता है। लिहाज़ा ऐसे क़ानूनों को जो तर्क पर आधारित नहीं और न्याय
के सिद्धान्त के विरुद्ध हैं, समाप्त कर देना चाहिए। ऐसे ही न्याय-विरोधी क़ानूनों
342 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
के कारण बड़े-बड़े श्रेष्ठ बौद्धिक लोगों ने बग़ावत के कार्य किये हैं।
हमारे मुक़दमे के तथ्य बिल्कुल सादा हैं। 8 अप्रैल, 1929 को हमने सेण्ट्रल
असेम्बली में दो बम फेंके। उनके धमाके से चन्द लोगों को मामूली खरोंचें आयीं।
चेम्बर में हंगामा हुआ, सैकड़ों दर्शक और सदस्य बाहर निकल गये। कुछ देर बाद
ख़ामोशी छा गयी। मैं और साथी बी.के. दत्त ख़ामोशी के साथ दर्शक गैलरी में बैठे
रहे और हमने स्वयं अपने को प्रस्तुत किया कि हमें गिरफ़्तार कर लिया जाये। हमें
गिरफ़्तार कर लिया गया। अभियोग लगाये गये और हत्या करने के प्रयत्न के अपराध
में हमें सज़ा दी गयी, लेकिन बमों से 4-5 आदमियों को मामूली चोटें आयीं और
एक बेंच को मामूली-सा नुक़सान पहुँचा, और जिन्होंने यह अपराध किया, उन्होंने
बिना किसी क़िस्म के हस्तक्षेप के अपनेआप को गिरफ़्तारी के लिए पेश कर दिया।
सेशन जज ने स्वीकार किया कि यदि हम भागना चाहते तो भागने में सफल हो
सकते थे। हमने अपना अपराध स्वीकार किया और अपनी स्थिति स्पष्ट करने के
लिए बयान दिया। हमें सज़ा का भय नहीं है। लेकिन हम यह नहीं चाहते कि हमें
ग़लत तौर पर समझा जाये। हमारे बयान से कुछ पैराग्राफ़ काट दिये गये हैं, यह
वास्तविक स्थिति की दृष्टि से हानिकारक है।
समग्र रूप में हमारे वक्तव्य के अध्ययन से साफ़ प्रकट होता है कि हमारे
दृष्टिकोण से हमारा देश एक नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है। इस दशा में काफी ऊँची
आवाज़ में चेतावनी देने की ज़रूरत थी और हमने अपने विचारानुसार चेतावनी दी
है। सम्भव है कि हम ग़लती पर हों, हमारा सोचने का ढंग जज महोदय के सोचने
के ढंग से भिन्न हो, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हमें अपने विचार प्रकट करने
की स्वीकृति न दी जाये और ग़लत बातें हमारे साथ जोड़ी जायें।
'इन्क़लाब ज़िन्दाबाद' और 'साम्राज्यवाद मुर्दाबाद' के सम्बन्ध में हमने जो
व्याख्या अपने बयान में दी, उसे उड़ा दिया गया है; हालाँकि यह हमारे उद्देश्य का
ख़ास भाग है। 'इन्क़लाब ज़िन्दाबाद' से हमारा वह उद्देश्य नहीं था, जो आमतौर पर
ग़लत अर्थ में समझा जाता है। पिस्तौल और बम इन्क़लाब नहीं लाते, बल्कि
इन्क़लाब की तलवार विचारों की सान पर तेज़ होती है और यही चीज़ थी जिसे
हम प्रकट करना चाहते थे। हमारे इन्क़लाब का अर्थ पूँजीवादी युद्धों की मुसीबतों
का अन्त करना है। मुख्य उद्देश्य और उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया समझे बिना
किसी के सम्बन्ध में निर्णय देना उचित नहीं है। ग़लत बातें हमारे साथ जोड़ना
साफ़-साफ़ अन्याय है।
इसकी चेतावनी देना बहुत आवश्यक था। बेचैनी रोज़-रोज़ बढ़ रही है। यदि
उचित इलाज न किया गया, तो रोग ख़तरनाक रूप ले लेगा। कोई भी मानवीय
शक्ति इसकी रोकथाम न कर सकेगी। हमने इस तूफ़ान का रुख़ बदलने के लिए
यह कार्रवाई की। हम इतिहास के गम्भीर अध्येता हैं। हमारा विश्वास है कि यदि
बहरों को सुनाने के लिए बम का धमाका / 343
सत्ताधारी शक्तियाँ ठीक समय पर सही कार्रवाइयाँ करतीं, तो फ्रांस और रूस की
खूनी क्रान्तियाँ न बरस पड़तीं। दुनिया की कई बड़ी-बड़ी हुकूमतें विचारों के तूफ़ान
को रोकते हुए खून-ख़राबे के वातावरण में डूब गयीं। सत्ताधारी लोग परिस्थितियों
के प्रवाह को बदल सकते हैं। हम पहली चेतावनी देना चाहते थे और यदि हम कुछ
व्यक्तियों की हत्या करने के इच्छुक होते, तो हम अपने मुख्य उद्देश्य में असफल
हो जाते। माई लॉर्ड, इस नीयत (भावना) और उद्देश्य को दृष्टि में रखते हुए हमने
कार्रवाई की और इस कार्रवाई के परिणाम हमारे बयान का समर्थन करते हैं। एक
और नुक़्ता स्पष्ट करना आवश्यक है। यदि हमें बमों की ताक़त के सम्बन्ध में क़तई
ज्ञान न होता, तो हम पं. मोतीलाल नेहरू, श्री केलकर, श्री जयकर और श्री जिन्ना
जैसे सम्माननीय राष्ट्रीय व्यक्तियों की उपस्थिति में क्यों बम फेंकते? हम नेताओं
के जीवन किस तरह ख़तरे में डाल सकते थे? हम पागल तो नहीं हैं? और अगर
पागल होते तो जेल में बन्द करने के बजाय हमें पागलखाने में बन्द किया जाता।
बमों के सम्बन्ध में हमें निश्चित जानकारी थी। उसी के कारण हमने ऐसा साहस
किया। जिन बेंचों पर लोग बैठे थे, उन पर बम फेंकना कहीं आसान काम था,
लेकिन खाली जगह पर बमों का फेंकना निहायत मुश्किल काम था। अगर बम
फेंकने वाले सही दिमागों के न होते या वे परेशान (असन्तुलित) होते तो बम खाली
जगह की बजाय बेंचों पर गिरते। तो मैं कहूँगा कि खाली जगह के चुनाव के लिए
जो हिम्मत हमने दिखायी, उसके लिए हमें इनाम मिलना चाहिए। इन हालात में,
माई लॉर्ड, हम सोचते हैं कि हमें ठीक तरह समझा नहीं गया। आपकी सेवा में हम
सज़ाओं में कमी कराने नहीं आये, बल्कि अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए आये
हैं। हम चाहते हैं कि न तो हमसे अनुचित व्यवहार किया जाये, न ही हमारे सम्बन्ध
में अनुचित राय दी जाये। सज़ा का सवाल हमारे लिए गौण है।
(जनवरी, 1930)
(लाहौर हाईकोर्ट के जस्टिस एस. फ़ोर्ड ने फ़ैसले में लिखा : “यह बयान कोई
ग़लती न होगी कि ये लोग दिल की गहराई और पूरे आवेग के साथ वर्तमान समाज
के ढाँचे को बदलने की इच्छा से प्रेरित थे। भगतसिंह एक ईमानदार और सच्चे
क्रान्तिकारी हैं। मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि वे इस स्वप्न को लेकर
पूरी सच्चाई से खड़े हैं कि दुनिया का सुधार वर्तमान सामाजिक ढाँचे को तोड़कर
ही हो सकता है। वे क़ानून के ढाँचे की जगह मनुष्य की स्वतन्त्र इच्छा को स्थापित
करना चाहते हैं। अराजकतावादियों की सदा यही मान्यता रही है, परन्तु जो अपराध
इनके और इनके साथी पर लगा है, उसकी यह कोई सफ़ाई नहीं है।” - स.)
344 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
VIII.
जेल की सलाख़ों के पीछे से
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इंस्पेक्टर जनरल के नाम पत्र
12 जून, 1929 को असेम्बली बमकाण्ड के मुक़दमे का ड्रामा ख़त्म हुआ।
भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त को उम्रक़ैद की सज़ा दी गयी। भगतसिंह को दिल्ली
से पंजाब ले जाकर मियाँवाली जेल में व दत्त को लाहौर केन्द्रीय जेल में रखा गया।
उन्होंने जेल में राजनीतिक बन्दियों के साथ व्यवहार के लिए संघर्ष की योजना गाड़ी
में ही बना डाली। उनके अनुसार, “सज़ा पाने के बाद हमने देखा कि हमारे वर्ग के
राजनीतिक क़ैदियों की स्थिति बहुत ख़राब थी।” 17 जून, 1929 को भगतसिंह और
बटुकेश्वर दत्त ने अलग-अलग नोटिसों में 15 जून से भूख हड़ताल शुरू करने की
सूचना और अपनी माँगों की सूची सरकार को पेश की। बाद में, 14 सितम्बर, 1929
को ये दोनों नोटिस पं. मदनमोहन मालवीय द्वारा लेजिस्लेटिव असेम्बली में पढ़े गये।
एक दूसरे पत्र में भगतसिंह ने स्वयं को लाहौर जेल भेजने की बात उठायी ताकि
साथियों के सम्पर्क में रह सकें।
मियाँवाली जेल
17 जून, 1929
सेवा में,
इंस्पेक्टर जनरल, जेल,
पंजाब (जेल्स) लाहौर।
प्रिय महोदय,
इस सच्चाई के बावजूद कि साण्डर्स शूटिंग केस में गिरफ़्तार दूसरे नौजवानों के
साथ ही मुझ पर भी मुक़दमा चलेगा, मुझे दिल्ली से मियाँवाली जेल में बदल दिया
गया है। उस केस की सुनवाई 26 जून, 1929 से शुरू होने वाली है। मैं यह समझने
में सर्वथा असमर्थ रहा हूँ कि मुझे यहाँ तब्दील करने के पीछे क्या भावना काम
कर रही है।
जो भी हो, न्याय की माँग है कि हरेक अभियुक्त (अण्डर ट्रायल) को वे सब
सुविधाएँ मिलनी चाहिए, जिनसे वह अपने मुक़दमे की तैयारी कर सके और लड़
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 347
सके। मैं यहाँ रहते कैसे अपना वकील नियुक्त कर सकता हूँ? क्योंकि यहाँ रहते
हुए मुझे अपने पिता या दूसरे रिश्तेदारों से सम्पर्क रखना कठिन है। यह स्थान काफ़ी
अलग-थलग है, रास्ता कठिन है और लाहौर से काफ़ी दूर है।
मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझे तुरन्त लाहौर सेण्ट्रल जेल में बदलने का
आदेश दें, जिससे कि मुझे अपना केस लड़ने की तैयारी करने का उचित अवसर
मिले। आशा है कि शीघ्र ध्यान दिया जायेगा।
आपका
भगतसिंह
348 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
भूख हड़ताल का नोटिस ( भगतसिंह )
17 जून, 1929
प्रति,
इंस्पेक्टर जनरल, जेल्स, पंजाब, लाहौर।
असेम्बली बमकाण्ड दिल्ली के सम्बन्ध में मुझे आजीवन क़ैद की सज़ा दी
गयी है, इसलिए स्पष्ट है कि मैं राजनीतिक बन्दी हूँ। दिल्ली जेल में मुझे विशेष
भोजन मिलता था, लेकिन यहाँ पहुँचने पर मेरे साथ सामान्य अपराधियों जैसा सलूक
किया जा रहा है इसलिए मैं 15 जून, 1929 की सुबह से भूख हड़ताल पर हूँ।
इन दो-तीन दिनों में मेरा वज़न दिल्ली जेल की अपेक्षा 6 पौण्ड कम हो गया है।
मैं आपका ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहता हूँ कि मुझे हर हाल में राजनीतिक
बन्दी का विशेष दर्जा मिलना चाहिए। मेरी माँगें हैं : अच्छा भोजन (दूध, घी, दाल,
चावल आदि के साथ), मशक़्क़त न करायी जाये, स्नान-सुविधा (साबुन,
तेल-हजामत आदि), प्रत्येक तरह का साहित्य (इतिहास, अर्थशास्त्र, राजनीतिक
विज्ञान, कविता, नाटक या उपन्यास, समाचारपत्र)। मुझे उम्मीद है कि आप
उदारतापूर्वक मेरे कथन पर विचार करेंगे और अपना फ़ैसला लेंगे।
भगतसिंह
आजीवन बन्दी न. 117,
मियाँवाली जेल
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 349
भूख हड़ताल का नोटिस (बी.के. दत्त)
17 जून, 1929
सुपरिण्टेण्डेण्ट, सेण्ट्रल जेल, लाहौर
मैं आपको और उच्च अधिकारियों को बताना चाहता हूँ कि राजनीतिक बन्दी
होने के नाते मैं निम्न सुविधाओं की माँग कर सकता हूँ। असेम्बली में बम फेंकने
के बाद लॉर्ड इर्विन ने अपने अन्तिम भाषण में कहा था, “यह बम किसी एक
व्यक्ति की ओर नहीं बल्कि एक संस्था पर फेंके गये हैं।” फिर श्री मिडल्टन ने
अपने फ़ैसले में उल्लेख किया है कि “ये लोग (दत्त और भगतसिंह) अदालत में
‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद’, ‘सर्वहारा ज़िन्दाबाद’ आदि के नारे लगाते हुए आते थे
जिससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि वे इस तरह के राजनीतिक विचारों के हैं। इन्हीं
विचारों के प्रचार को रोकने के लिए मैं इनको जीवन क़ैद की सज़ा देता हूँ।”
मैं पुनः यह बता देना चाहता हूँ कि जब कोई यूरोपियन स्वार्थपरता के लिए
स्वयं क़ानून की अवहेलना करता है तब जेल में उसको सभी तरह की सुविधाएँ
मिलती हैं। उसे बिजली वाला हवादार कमरा, सबसे अच्छी खुराक (दूध, मक्खन,
डबल रोटी, गोश्त आदि) और अच्छे कपड़े मिलेंगे। लेकिन हम राजनीतिक क़ैदियों
को ये सुविधाएँ मुहैया नहीं करायी जा रहीं। लॉर्ड इर्विन और श्री मिडल्टन की
टिप्पणियाँ यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि हम राजनीतिक बन्दी हैं और
इस आधार पर मैं माँग करता हूँ कि हमारे साथ राजनीतिक बन्दियों जैसा व्यवहार
होना चाहिए। मुझे अच्छी खुराक मिलनी चाहिए, जोकि मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए
आवश्यक है।
इसके साथ ही राजनीति पर विचार करने के लिए मुझे हर प्रकार का साहित्य
और समाचारपत्र मिलने चाहिए। लोग हमें अक्खड़, गुमराह और बेसब्र नौजवान
कहते हैं, इसलिए हमें अलग-अलग पुस्तकें पढ़ने का अवसर दिया जाना चाहिए,
ताकि हम देख सकें कि हम वास्तव में बेसब्र, गुमराह नौजवान हैं या नहीं, हमारे
काम का विचार ठीक है या नहीं। मेरी माँगें इस प्रकार हैं –
- अच्छी खुराक, सुबह दूध और डबल रोटी। दोपहर को दाल, चावल, घी,
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सब्ज़ी और चीनी और रात को डबल रोटी, गोश्त और चटनी।
2. मशक़्क़त न करायी जाये।
3. समाचारपत्र और हर प्रकार का साहित्य।
4. स्नान, साबुन, तेल, कंघी और हज्जाम आदि सहित।
5. अच्छी रिहायश।
6. अपने कपड़े।
सज़ा से पहले और बाद में मुझे ये सब चीज़ें जेल के ख़र्च पर मिलती थीं,
लेकिन यहाँ ये सब चीज़ें नहीं मिल रहीं। इसलिए मैंने 14 जून, 1929 से भूख
हड़ताल शुरू कर दी है। इन्हीं कारणों से मियाँवाली जेल में मेरे साथी भगतसिंह
ने भी भूख हड़ताल की हुई है। मैं तब तक भूख हड़ताल नहीं छोड़ूँगा जब तक
कि सरकार हमारी माँगों को नहीं स्वीकार करती।
मैं तुरन्त उत्तर की आशा करता हूँ। जो भी कोई सरकारी अधिकारी आयेगा
उससे इस विषय पर विचार-विमर्श के लिए मैं तैयार हूँ।
बी.के. दत्त,
क़ैदी, असेम्बली बम केस
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 351