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आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

२४
जङ्गम आदि सभी विशेष अभिव्यक्तियाँ, सुवर्ण में कटक, कुण्डल
और मुकट आदि के समान कल्पित है। अर्थात् कल्पित की
अधिष्ठानातिरिक्त सत्ता न होने से ब्रह्म से अभिन्न हैं। ।।८।।
उपर्युक्त अर्थ को आकाश दृष्टान्त से दृढ़ करते हैं-
यथाऽऽकाशो हृषीकेशो नानोपाधिगतो विभुः।
तद्भेदाद्भिन्नवद्भाति तन्नाशे सति केवलः।।९।।
'हृषीकम्' इन्द्रियों को कहते हैं। अतः मनः आदि सभी
इन्द्रियों के प्रेरक या नियामक परमात्मा को 'हृषीकेश' कहा जाता
है। ऐसे सर्वगत परमात्मा अपनी माया से परिकल्पित नाना प्रकार
की उपाधियों में प्रतिबिम्बित होकर नाना (भिन्न) के समान
भासित होते हैं। किन्तु ब्रह्मैक्यज्ञान होने पर, देहादि उपाधियों के
नष्ट होने पर केवल एक आत्मस्वरूप से ही परिशिष्ट होकर भासते
हैं। जैसे एक ही आकाश मठ, घट आदि उपाधियों में नाना (भिन्न)
के समान भासित होता है और उपाधियों के विलय होने पर एक
के समान ही भासता हैं, तद्वद् ।।६।।
शङ्का- सभी देहों में तत्तद् जाति आदि से सम्बद्ध
आत्मा नित्य मुक्त कैसे है? इस विषय में बताते हैं-
नानोपाधिवशादेव जातिनामाश्रमादयः।
आत्मन्यारोपितास्तोये रसवर्णादिभेदवत्।।१०।।
नाना उपाधि संयुक्त आत्मा में जाति, वर्ण, नाम, रूप
आदि आरोपित हैं अर्थात् मायाकल्पित हैं। वास्तव में सत्य नहीं है।
ठीक उसी प्रकार जैसे स्वाभाविक रूप से मधुर जल कड़वा, तीखा,
मधुर, लाल और पीले आदि द्रव्यों से संयुक्त होकर वैसा ही हो
जाता है, स्वरूपतः नहीं ।।१०।।

२५
अब ज्ञानस्वरूप आत्मा की अविद्यापरिकल्पित तीन
उपाधियों में से प्रथम उपाधि को कहते हैं-
पञ्चीकृतमहाभूतसम्भवं कर्मसञ्चितम् ।
शरीरं सुखदुःखानां भोगायतनमुच्यते ।।११।।
अपञ्चीकृत पाँच भूतों में प्रत्येक को दो भाग में विभक्त
करके, उनमें से प्रत्येक के आधे भाग को पुनः चार टुकड़ों में
विभक्त करके, अपने अर्ध भाग को छोड़कर अन्यों के अर्ध भाग
में एक-एक टुकड़े को मिला देने से पञ्चीकरण होता है। इस प्रकार
से पञ्चीकृत पञ्च पृथिवी आदि स्थूल महाभूतों से उत्पन्न होने
वाला तथा प्रारब्ध कर्मों से सञ्चित स्थूल शरीर प्रत्यगात्मा के
सुख-दुःख भोग (अनुभव) का आयतन (भोगस्थान) कहा जाता
है। ।।११।।
अब प्रत्यगात्मा के भोग साधन सूक्ष्मशरीर को बताते हैं-
पञ्चप्राणमनोबुद्धिदशेन्द्रियसन्वितम् ।
अपञ्चीकृतभूतोत्थं सूक्ष्माङ्गं भोगसाधनम् ।।१२।।
अञ्चीकृत पञ्च महाभूतों से उत्पन्न पञ्च प्राण, अन्तःकरण
की संकल्पात्मिका वृत्ति रूपी मन, निश्चयात्मिका वृत्ति रूपी बुद्धि,
पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, इन सत्रह तत्त्वों से युक्त सूक्ष्म
अङ्गों वाला लिङ्गशरीर प्रत्यगात्मा का भोग साधन कहा जाता है।
।।१२।।
कार्योपाधि का कथन करके अब प्रत्यगात्मा की
कारणोपाधि को कहते हैं-
अनाद्यविद्याऽनिर्वाच्या कारणोपाधिरुच्यते।
उपाधित्रितयादन्यमात्मानमवधारयेत्।।१३।।

२६
सद् असद् शब्दों से अनिर्वचनीय (कहने योग्य नहीं)
अनादि अविद्या ही प्रत्यगात्मा की कारणोपाधि है। स्थूल और
सूक्ष्म प्रपञ्च का कारण होने से उसे ऐसा कहा जाता है। अनृत,
दुःख तथा जड़ से विलक्षण सत्, चिद् और आनन्द रूप से
प्रकाशित होने से प्रत्यगात्मा कारणोपाधिवाला है। प्रति-प्रतिकूलेन
अञ्चति प्रकाशते इति प्रत्यग्। प्रत्यगात्मा ही कारणोपाधिवाला है।
इन तीनों ही उपाधियों के साक्षी आत्मा को उनसे विलक्षण ही
जानना चाहिए ।।१३।।
शङ्का- अन्नमय आदि पाँच कोशों में तादात्म्य भाव से स्थित
आत्मा को नित्य मुक्त क्यों कहा जाता है? इस विषय में
कहते हैं-
पञ्चकोशादियोगेन तत्तन्मय इव स्थितः।
शुद्धात्मा नीलवस्त्रादियोगेन स्फटिको यथा ।।१४।।
अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय,
ये पाँच कोश हैं। इन पाँच कोशों में मिथ्या तादात्म्य करके आत्मा
तत्तन्मय जैसे होकर स्थित है। जैसे शुद्ध स्फटिक नील, पीतादि
वस्त्रों के सम्बन्ध से नीलादिरूप विशिष्ट भासित होता है। इसी
प्रकार शुद्ध आत्मा पाँच कोशों और उनके क्षुधा-पिपासा आदि
धर्मों से तादात्म्य करके कोशादि से विशिष्ट जानने में आता हैं।
वस्तुतः आत्मा में कोई लेप नहीं है। ।।१४।।
आत्मस्वरूप ज्ञान के लिए पञ्च कोशों से
आत्मा के विवेचन का प्रकार बताते हैं-
वपुस्तुषादिभिः कोशैर्युक्तं युक्त्यवघाततः।
आत्मानमान्तरं शुद्धं विविच्यात्तण्डुलं यथा।।१५।।

२७
जैसे भूसी आदि (तुषादि) युक्त चावल को अवघात
(कुटाई) से पृथक् करके शुद्ध कर लिया जाता है। वैसे ही
अन्नमयादि पाँच कोशो से आवृत आत्मा को युक्तियों से विविक्त
करके जान लेना चाहिए। निम्नलिखित युक्तियों से (अनुमान से)
आत्मा, स्थूल और सूक्ष्म शरीरों से भिन्न सिद्ध होता है।
स्थूलदेहो नात्मा कार्यभूतत्वात् घटवत्। सूक्ष्मदेहोऽपि अनात्मा
देहत्वात् स्थूलदेहवत्। इस प्रकार अनुमानरूपी युक्तियों से आत्मा
को पञ्च कोशों से पृथक् जान लेना चाहिए ।।१५।।
शंका- आत्मा सर्वगत है तो सर्वत्र दिखाई क्यों नहीं
पड़ता? समाधन करते हैं-
सदा सर्वगतोऽप्यात्मा न सर्वत्रावभासते।
बुद्धावेवावभासेत स्वच्छेषु प्रतिबिम्बवत्।।१६।।
आत्मा सदा ही सर्वत्र विराजमान होने पर भी जड़
बाह्येन्द्रियों के द्वारा प्रकाशित नहीं होता। रागादि से रहित बुद्धि
में ही उसका प्रकाशन होता है, सर्वत्र नहीं। जैसे प्रतिबिम्ब स्वच्छ
दर्पण आदि में ही दिखाई देता है, सर्वत्र नहीं। ठीक उसी तरह
।।१६।।
अब राजा के दृष्टान्त से देह में स्थित आत्मा की
उदासीनता को दिखाते हैं-
देहेन्द्रियमनोबुद्धिप्रकृतिभ्यो विलक्षणम्।
तद्वृत्तिसाक्षिणं विद्यादात्मानं राजवत्सदा।।१७।।
जड़स्वरूप परिणामस्वरूप तथा दृश्यस्वरूप देह, इन्द्रिय,
मन, बुद्धि और प्रकृति से आत्मा को विलक्षण और अन्तःकरणवृत्तियों
का साक्षी जानना चाहिए। जैसे राजा अपने नगर में स्थित होकर

२८
मन्त्री आदि को साक्षी रूप से देखता हुआ अवस्थित होता है, उसी
प्रकार ।।१७।।
'आत्मा अविकारी है' यह कहना ठीक नहीं क्योंकि
आत्मा सर्वदा व्यापार करता हुआ मालूम पड़ता है, ऐसी शंका
का समाधान करते हैं-
व्यापृतेष्विन्द्रियेष्वात्मा व्यापारीवाविवेकिनाम्।
दृश्यतेऽभ्रेषु धावत्सु धावन्निव यथा शशी।।१८।।
शास्त्र और आचार्य के उपदेश से रहित अविवेकी पुरुषों
को आत्मा, इन्द्रियों के व्यापार युक्त होने पर, व्यापारविशिष्ट
मालूम पड़ता है। किन्तु तत्त्वज्ञानी ऐसा नहीं देखते। जैसे वायु के
थपेड़ों से मेघ मण्डल में गति होने पर लौकिक पुरुषों को चन्द्रमा भी
गतिशील दिखाई पड़ता है। वास्तव में चन्द्रमा में गति नहीं होती।
इसी तरह आत्मा के विषय में जानना चाहिए। ।।१८।।
शंका- देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि भी आत्मा के
समान चेतन जानने में क्यों आ रहे है? समाधान करते हैं-
आत्मचैतन्यमाश्रित्य देहेन्द्रियमनोधियः।
स्वकीयार्थेषु वर्तन्ते सूर्यालोकं यथा जनाः।।१९।।
सत्, चित्, आनन्द स्वरूप आत्मा की चेतनता के आश्रित
होकर देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि अपने-अपने विषयों में प्रवृत्त
होते हैं। जैसे सभी प्राणी सूर्य प्रकाश का आश्रय लेकर लौकिक
व्यवहारों का निर्वहन करते हैं। इससे सिद्ध होता है कि स्वाभाविक
चैतन्य आत्मा में है, देह, इन्द्रिय आदि तो जड़ है। ।।१९।।
शङ्का- 'मैं उत्पन्न हुआ हूँ' 'मैं बाल्य, कौमार और यौवन
आदि अवस्थाओं का अनुभव करने वाला हूँ' 'मैं देखता हूँ'

अध्यस्यन्त्यविवेकेन गगने नीलिमादिवत्।।२०।।

२६
इत्यादि प्रतीतियों से निरन्तर अनुभव में आ रहा आत्मा को
अविकारी कैसे कहा जाता है? बताते हैं-
देहेन्द्रियगुणान्कर्माण्यामले सच्चिदात्मनि।
अध्यस्यन्त्यविवेकेन गगने नीलिमादिवत्।।२०।।
देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि के धर्मों को, सत्त्वादि गुणों का
और कर्मेन्द्रियों के व्यापारों को अविवेक से और अत्यन्त सन्निधि
रूपी दोष से मिथ्या तादात्म्य के कारण निर्मल, असंग, सच्चिदानन्द
स्वरूप परमात्मा में आरोपित किये जाते हैं। जैसे गगन में नीलिमा
का भान होता है, किन्तु वह गगन का धर्म नहीं है। इसी प्रकार
उत्पत्ति अवस्था आदि धर्म देहादि में हैं, आत्मा में संभव नहीं हैं।
।।२०।।
कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि धर्म आत्मा में निरन्तर अनुभव
में आ रहे हैं, अतः उसका वारण नहीं किया जा सकता है।
ऐसी शङ्का होने पर उसका समाधान अगले श्लोक से करते हैं-
अज्ञानान्मानसोपाधेः कर्तृत्वादीनि चात्मनि।
कल्प्यन्तेऽम्बुगते चन्द्रे चलनादि यथाऽम्भसः।।२१।।
जैसे जल मे होने वाले कम्पन्न आदि धर्म अविवेक से जल
में प्रतिबिम्बित चन्द्र में आरोपित किये जाते है। उसी प्रकार
अन्तःकरण उपाधि के कर्तृत्व आदि धर्म अज्ञान से शुद्ध आत्मा में
आरोपित किये जाते हैं ।।२१।।
नैयायिक और वैशेषिक मतावलंबी इच्छा, द्वेष, सुख,
दुःख आदि को आत्मा के धर्म मानते हैं। अतः उनका
निराकरण अगले श्लोक में करते हैं-
रागेच्छासुखदुःखादि बुद्धौ सत्यां प्रवर्तते।

३०
सुषुप्तौ नास्ति तन्नाशे तस्माद्बुद्धेस्तु नात्मनः॥२२॥
राग, इच्छा, सुख, दुःख, धर्म, अधर्म आदि बुद्धि के धर्म
है। कैसे मालूम पड़ा ? अन्वय व्यतिरेक रूपी युक्ति से यही सिद्ध
होता है। जाग्रत् और स्वप्नावस्था में बुद्धि के होने पर ही इन धर्मों
का भान होता है। परन्तु सुषुप्ति अवस्था में बुद्धि के, कारण
(अज्ञान) में लीन होने पर इन धर्मों का (भी) भान नहीं होता।
अतः सिद्ध होता है कि इच्छादि बुद्धि के धर्म है, आत्मा के नहीं
।।२२।।
अब अगले श्लोक में आत्मा के स्वभाव का कथन
करते हैं-
प्रकाशोऽर्कस्य तोयस्य शैत्यमग्नेर्यथोष्णता।
स्वभावः सच्चिदानन्दनित्यनिर्मलतात्मनः।।२३।।
जैसे सूर्य का स्वभाव प्रकाश, जल का शीतलता तथा
अग्नि की उष्णता है। उसी प्रकार आत्मा का स्वभाव सत्, चिद्,
आनन्द और नित्यनिर्मलता है ।।२३।।
यदि आत्मा विकार रहित है तो मैं 'जानता हूँ' यह
ज्ञान कैसे होता है, ऐसी अपेक्षा होने पर उत्तर देते हैं-
आत्मनः सच्चिदंशश्च बुद्धेर्वृत्तिरिति द्वयम्।
संयोज्य चाविवेकेन जानामीति प्रवर्तते।।२४।।
आत्मा का सत् चिद् अंश और बुद्धि की वृत्ति, इन दोनों
को अज्ञान से मिलाकर मैं 'जानता हूँ' इस प्रकार साभास अंहकार
वृत्ति प्रवृत्त होती है। असङ्ग आत्मा का किसी के साथ कोई संयोग
नहीं है। वस्तुतः न तो आत्मा का सत् चिद् अंश है। न ही बुद्धि
के साथ उसका संबंध संभव है ।।२४।।

३१
आत्मा में विकाराभाव को स्पष्ट करते हैं-
आत्मनो विक्रिया नास्ति बुद्धेर्बोधो न जात्विति।
जीवः सर्वमलं ज्ञात्वा ज्ञाता द्रष्टेति मुह्यति॥२५॥
आत्मा स्वभाव से ही विकार शून्य है। बुद्धि में ज्ञान होने
की शङ्का भी नहीं हो सकती और आत्मा में कभी विकार नहीं हो
सकता। फिर भी जीव शब्द वाच्य साभास अहंकार देह, इन्द्रिय
आदि में अत्यन्त अध्यास करके 'मैं ज्ञाता, कर्ता, भोक्ता, द्रष्टा,
पैदा हुआ तथा मरने वाला हूँ' इस प्रकार मानता है। जिस प्रकार
लौहपिण्ड में अग्नि का अध्यास होता है, वैसे ही परस्पर धर्मों के
अध्यास से मोहित होता है ॥२५॥
आत्मा अविवेक से अन्य के धर्मों को आरोपित
करके भययुक्त होता है, इसे कहते हैं-
रज्जुसर्पवदात्मानं जीवं ज्ञात्वा भयं वहेत्।
नाहं जीवः परात्मेति ज्ञातश्चेन्निर्भयो भवेत्॥२६॥
जैसे जीव रज्जु में सर्प का आरोप करके भय, कम्पन
आदि से युक्त होता है। इसी प्रकार अपने सत्, चित्, आनन्द
स्वरूपता को न जानकर, अपने को जीव मान करके सहस्रों
सांसारिक दुःखों से पीड़ित होता है। जब शास्त्र और आचार्य के
उपदेश से उत्पन्न विवेकदृष्टि से अखण्ड एकरूप आत्मा को जानता
है, तब भयरहित हो जाता है। ॥२६॥
'आत्मा सबका प्रकाशक है' इसे स्पष्ट करते हैं-
आत्मावभासयत्येको बुद्ध्यादीनीन्द्रियाणि च।
दीपो घटादिवत्स्वात्मा जडैस्तैर्नावभास्यते॥२७॥
आत्मा अकेले ही सम्पूर्ण बुद्धि आदि इन्द्रियों को प्रकाशित

३२
करता है। किन्तु उन बुद्धि आदि से प्रकाशित नहीं होता। जैसे एक
दीपक घटादि सभी संनिहित पदार्थों को प्रकाशित कर देता है,
उनसे प्रकाशित नहीं होता, उसी तरह ।।२७।।
शङ्का - आत्मा अपने प्रकाश के लिए बुद्धि आदि
की अपेक्षा रखता है, ऐसा स्वीकार करना चाहिए। उत्तर देते
हैं-
स्वबोधे नान्यबोधेच्छा बोधरूपतयात्मनः।
न दीपस्यान्यदीपेच्छा यथा स्वात्मप्रकाशने।।२८।।
आत्मा ज्ञानस्वरूप होने से नित्य प्रकाशित होते रहता है।
अपने बोध के लिए अन्य ज्ञान की अपेक्षा नहीं रखता है क्योंकि
वह अनुभवस्वरूप है। जैसे दीपक अपने प्रकाशन के लिए अन्य
दीपक की अपेक्षा नहीं रखता वैसे ही ।।२८।।
यदि बुद्ध्यादि से आत्मा जानने योग्य नहीं है तो
आत्मज्ञान का अन्य उपाय बताना चाहिए। वह उपाय क्या
है? इसे कहते हैं-
निषिध्य निखिलोपाधीन्नेति नेतीति वाक्यतः।
विद्यादैक्यं महावाक्यैर्जीवात्मपरमात्मनोः ।।२९।।
'अथात आदेशो नेति नेतीति' इन वेदान्त वाक्यों से तत्त्वं
पदार्थगत सम्पूर्ण सर्वज्ञत्व, किञ्चिज्ज्ञत्व, नियन्तृत्व, नियम्यत्व
आदि उपाधियों का निषेध कर देने से अर्थात् उन उपाधियों को
अनात्मा जानकर निराकरण करके 'तत्त्वमसि' 'अयमात्मा ब्रह्म'
'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादि वाक्यों के द्वारा भागत्याग लक्षणा से जीव
ब्रह्म की एकता को जानना चाहिए। यही आत्मज्ञान का सर्वोत्तम
उपाय है ।।२६।।

३३
आत्मस्वरूप को जानने में अनात्म पदार्थों का निषेध,
न करने से क्या क्षति हो सकती है? वास्तव में विचार दृष्टि
से देखा जाए तो अनात्म पदार्थों का निरास न करने पर
आत्मा जाना ही नहीं जा सकता। जैसे 'यह सर्प है' इस प्रकार
रज्जु में भ्रान्ति से आरोपित सर्प का निषेध किए बिना
रज्जुज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता। इसी प्रकार अनात्म पदार्थों
का निषेध करने पर ही आत्मा ज्ञातव्य है। इस आशय को
अगले श्लोक से स्पष्ट करते हैं-
आविद्यकं शरीरादि दृश्यं बुद्बुदवत् क्षरम्।
एतद्विलक्षणं विद्यादहं ब्रह्मेति निर्मलम्।।३०।।
देहेन्द्रियादि सम्पूर्ण दृश्य समुदाय अविद्याका कार्य है, दृश्य होने
से, पानी के बुलबुले के समान। यह विनाशी भी है। इससे विलक्षण
उपाधियों के संसर्ग से रहित, निर्मल, नित्य, एक, सच्चिदानन्द ब्रह्म मैं ही हूँ,
इस प्रकार अनुभव करें। ऐसा जानने से ही कृतकृत्य होगा ।।३०।।
एवं उपर्युक्त रीति से अद्वितीय, आनन्दस्वरूप आत्मा
को महावाक्यार्थ ज्ञान से अपरोक्ष रूप से जानकर, अपने
अनुभव के आधार पर विशुद्ध अन्तःकरण में आत्मविषयक
मनन के स्वरूप को पाँच श्लोकों से कहते हैं-
देहान्यत्वान्न मे जन्मजराकार्श्यलयादयः।
शब्दादिविषयैः सङ्गो निरिन्द्रियतया न च।।३१।।
दृश्य, जड़ आदि स्वभाव वाले स्थूल शरीर से भिन्न होने
से जन्म, बुढ़ापा, कृशता (पतला होना) और लय (मृत्यु) आदि
विकार मुझमें नहीं है। इन्द्रियों से सम्बन्ध न होने से मुझमें शब्दादि
विषयों का सङ्ग नहीं, अत एव मुझमें विषय-भोग नहीं हैं ।।३१।।

३४
अमनस्त्वान्न मे दुःखरागद्वेषभयादयः ।
'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्र' इत्यादिश्रुतिशासनात् ।।३२।।
आत्मस्वरूप मुझमें मन का अभाव होने से दुःख, राग,
द्वेष, भय आदि का अभाव है। आत्मा में इन्द्रिय, प्राण और मन
का अभाव कैसे हैं? ऐसी आशङ्का होने पर प्रमाण रूप से श्रुति को
प्रस्तुत करते हैं। मुण्डकोपनिषद् की श्रुति कहती है, "अप्राणो
ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः।" (मुण्ड २/१/२) ।।३२।।
अब अगले तीन श्लोकों से गुरु की प्रसन्नता से
अनुभूत ज्ञान को प्रकट करते हैं-
निर्गुणो निष्क्रियो नित्यो निर्विकल्पो निरञ्जनः ।
निर्विकारो निराकारो नित्यमुक्तोऽस्मि निर्मलः।।३३।।
मैं बुद्ध्यादि का अभाव होने से निर्गुण, इन्द्रियों का अभाव
होने से निष्क्रिय, अविद्या के कार्य से रहित होने से नित्य, मन का
अभाव होने से निर्विल्प, अज्ञान का अभाव होने से निरञ्जन, शरीर
का अभाव होने से विकाररहित, निरवयव होने से निराकार,
नित्यमुक्त तथा निर्मल हूँ ।।३३।।
अब अवशिष्ट स्वरूप को अग्रिम श्लोक से कहते हैं-
अहमाकाशवत्सर्वबहिरन्तर्गतोऽच्युतः ।
सदा सर्वसमः शुद्धो निःसङ्गो निर्मलोऽचलः ।।३४।।
जैसे आकाश सर्वत्र व्याप्त है, उसी तरह मैं सम्पूर्ण दृश्य
समुदाय के बाहर-भीतर व्याप्त, किसी भी प्रकार की च्युति (स्वरूप
नाश) से रहित, विषम वस्तुओं में भी समान रूप से स्थित, शुद्ध
(निर्लिप्त) तथा पूर्ण होने से अचल हूँ ।।३४।।

पूर्वोक्त श्लोक वर्णित मनन का चिरकाल अभ्यास

३५
पूर्वोक्त श्लोक वर्णित मनन का चिरकाल अभ्यास
करने पर पुरुषार्थ की सिद्धि अवश्यम्भावी होती है, इसे
दिखाते हैं-
एवं निरन्तराभ्यस्ता ब्रह्मैवास्मीति वासना।
हरत्यविद्याविक्षेपान् रोगानिव रसायनम्।।३५।।
इस प्रकार से निरन्तर 'मैं ब्रह्म हूँ' इसका अभ्यास करने
से तज्जन्य दृढ़ संस्कार अविद्याकृत चित्त विक्षेपों को पूरी तरह से
नाश कर देता है। जैसे चिरकालतक सेवन की गयी उपयुक्त
औषधि रोग को जड़ से निकाल देती है, ठीक वैसे ही ।।३५।।
अब जीव-ब्रह्म की एकता को दृढ़ करने के लिए पुनः
कथन करते हैं-
नित्यशुद्धविमुक्तैकमखण्डानन्दमद्वयम्।
सत्यं ज्ञानमनन्तं यत् परब्रह्माहमेव तत्।।३६।।
'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतियों में जिस नित्य,
शुद्ध, विमुक्त, एक, अखण्ड, आनन्दस्वरूप, अद्वितीय परब्रह्म का
कथन किया गया है, वह ब्रह्म मैं ही हूँ। ।।३६।।
अब ब्रह्मानुसन्धान संबन्धित कुछ अवश्य पालनीय नियमों
को कहते हैं-
विविक्तदेश आसीनो विरागो विजितेन्द्रियः।
भावयेदेकमात्मानं तमनन्तमनन्यधीः ।।३७।।
स्त्री, जन आदि के विक्षेप से रहित विविक्त देश में वैराग्य
और इन्द्रियनिग्रह पूर्वक स्थित होकर अनन्यचित्त से उस अनन्त
आत्मा का प्रत्यग् रूप से चिन्तन करें। अर्थात् ब्रह्म में ही बुद्धि को
स्थिर करे।।३७।।

३६
दृश्य प्रपञ्च के विद्यमान रहते एकत्वभावना कैसे
संभव है? इस विषय में बताते हैं-
आत्मन्येवाखिलं दृश्यं प्रविलाप्य धिया सुधीः।
भावयेदेकमात्मानं निर्मलाकाशवत्सदा ॥३८॥
बुद्धिमान् साधक शुद्ध बुद्धि से आत्मा में ही सम्पूर्ण दृश्य
प्रपञ्च को लीन करके अर्थात् प्रपञ्चमिथ्यात्व का दृढ़ निश्चय
करके, द्वैत का अभाव होने से निर्मल आकाश के समान एक
आत्मा की ही भावना करें।।३८।।
अब ज्ञानी महापुरुष की स्थिति का वर्णन करते हैं-
नामवर्णादिकं सर्वं विहाय परमार्थवित्।
परिपूर्णचिदानन्दस्वरूपेणावतिष्ठते।।३९।।
परमात्मतत्त्व ज्ञानी महापुरुष सम्पूर्ण नाम, रूप, वर्ण
आदि युक्त जगत् का परित्याग करके देश काल और वस्तु के
परिच्छेद से रहित चिदानन्द स्वरूप से अवस्थित हो जाता है
।।३९।।
शङ्का- प्रमातृत्व आदि त्रिपुटी (प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय)
का ज्ञान जब तक है, तब तक एकत्वभावना कैसे संभव है?
समाधान करते हैं-
ज्ञातृज्ञानज्ञेयभेदः परात्मनि न विद्यते।
चिदानन्दैकरूपत्वादीप्यते स्वयमेव हि।।४०।।
ज्ञातृ, ज्ञान, ज्ञेय भेद रूपी त्रिपुटी परमात्मा में बिल्कुल
नहीं है। भेद कल्पित आत्मा में ही भासित होता है। आत्मा ज्ञान
और आनन्दरूप होने से स्वयं ही प्रकाशित होता है ।।४०।।

३७
इस प्रकार विशुद्ध आत्म वस्तु के ज्ञान से प्रत्यक्ष फल
बताते हैं।
एवमात्मारणौ ध्यानमथने सततं कृते।
उदिताऽवगतिज्वाला सर्वाज्ञानेन्धनं दहेत्।।४१।।
याज्ञिक क्रियाओं के आरम्भ में दो अरणियों (अरहर
आदि काष्ठनिर्मित) के मन्थन से अग्नि प्रकट की जाती है, जो
डाली गयी सभी आहुतियों को जलाकर भस्म कर देती है। इसी
प्रकार दाष्ट्रान्त में, विशुद्ध अन्तःकरण रूपी अरणि में मन उत्तर
अरणि के समान है, ध्यान के द्वारा दोनों का नित्य निरन्तर मन्थन
करने पर वहाँ उत्पन्न ज्ञानाग्नि की ज्वाला, सम्पूर्ण अज्ञानरूपी
ईंधन को अर्थात् कार्य के सहित मूलाज्ञान को सम्पूर्ण रूप से
जलाकर भस्मसात् कर देती है। इससे तितिक्षु मुमुक्षु स्वाराज्य में
अभिषिक्त होकर कृतकृत्य हो जाता है ॥४१॥
जीव-ब्रह्म के एकत्व के दृढ़ ज्ञान से, अविद्या से
परिकल्पित अन्धकार के सम्पूर्ण रूप से नष्ट होने पर परमात्मा
स्वयं आविर्भूत हो जाता है। इसे अगले श्लोक से कहते हैं-
अरुणेनेव बोधेन पूर्वसन्तमसे हृते।
तत आविर्भवेदात्मा स्वयमेवांशुमानिव।।४२।।
जैसे सूर्योदय के पहले सूर्यप्रकाश से अन्धकार का नाश
होने पर सूर्य प्रकट हो जाता है। उसी तरह ज्ञान से अज्ञानान्धकार
का नाश होने पर आत्मा का आविर्भाव हो जाता है ॥४२॥
आत्मा परोक्ष स्वभाव वाला होने से सर्वदा अप्राप्त ही
है। वह प्राप्त कब होगा? इसे बताते हैं-

३८
आत्मा तु सततं प्राप्तो ह्यप्राप्तवदविद्यया।
तन्नाशे प्राप्तवद्भाति स्वकण्ठाभरणं यथा।।४३।।
सर्वत्र परिपूर्ण, अद्वितीय, आनन्दस्वरूप आत्मा सदा प्राप्त
ही है। अज्ञानकृत भ्रान्ति से अप्राप्त के समान भासित होता है।
जैसे कण्ठ में धारण की गयी माला, विस्मरण से अप्राप्त के समान
होती है। किन्तु आप्त वाक्य सुनते ही भ्रान्ति का अपनय होते ही
प्राप्त हो जाती है। ऐसे ही अज्ञानरूपी आवरण काल में अप्राप्त के
समान भासित होने वाला आत्मा, महावाक्य श्रवण जन्य ज्ञान से
अज्ञान नष्ट होते ही प्राप्त के समान भासित होता है। अत एव
शास्त्रों में आत्म-लाभ को 'प्राप्त की ही प्राप्ति' कहा गया है
।।४३।।
शङ्का- संसारी जीव परमात्मा से अभिन्न है, यह
कहना ठीक नहीं है? समाधान करते हैं-
स्थाणौ पुरुषवद्भ्रान्त्या कृता ब्रह्मणि जीवता।
जीवस्य तात्त्विके रूपे तस्मिन्दृष्टे निवर्तते।।४४।।
जैसे अन्धकार में स्थित स्थाणु आदि में कोई अनजान
व्यक्ति 'यह पुरुष है' इस प्रकार की आशङ्का करके भयसंयुक्त
होता है। वैसे ही अनादि काल से अविवेक से ब्रह्म में जीवत्व की
कल्पना करके प्राणी तरह-तरह के अनर्थों को प्राप्त करते हैं। जब
'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों से उत्पन्न विवेक दृष्टि से वह जीव
अपने तात्त्विक (पारमार्थिक) स्वरूप को जान लेता है, तो कल्पित होने
से जीवभाव की भी निवृत्ति हो जाती है। (तभी 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा जान
सकेगा) ।।४४।।

३६
अहंता-ममता का ज्ञान होते रहने पर एकत्त्वज्ञान
कैसे संभव है? इस आशङ्का का समाधान करते हैं-
तत्त्वस्वरूपानुभवादुत्पन्नं ज्ञानमञ्जसा।
अहं ममेति चाज्ञानं बाधते दिग्भ्रमादिवत् ।।४५।।
जैसे दिशाओं के सम्यग् ज्ञान से दिग्भ्रान्ति तुरंत नष्ट हो
जाती है। इसी प्रकार तत्त्वस्वरूप के अनुभव से अर्थात् जीव-ब्रह्म
की एकता का निरन्तर अभ्यास करने से उत्पन्न दृढ़ ज्ञान सहसा
'मैं' 'मेरा' इस अज्ञान को नष्ट कर डालता है। ऐसा ही तत्त्वज्ञानियों
का अनुभव देखा गया है ।।४५।।
अहंता-ममता रूपी अज्ञान के नष्ट होने पर योगी
(तत्त्वज्ञानी) ज्ञाननेत्र से सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च को आत्मा में ही
अभिन्न रूप से देखता है अर्थात् सम्पूर्ण प्रपञ्च को आत्मा में
कल्पित जानता है। इसे कहते हैं-
सम्यग्विज्ञानवान्योगी स्वात्मन्येवाखिलं स्थितम्।
एकं च सर्वमात्मानमीक्षते ज्ञानचक्षुषा ।।४६।।
यथार्थज्ञानवान् योगी सर्वाधिष्ठानभूत आत्मा में ही ज्ञान
नेत्र से सम्पूर्ण विश्व को स्थित देखता है। जैसे मिट्टी और स्वर्ण
से बने पदार्थों को जानकार व्यक्ति उपादान से अभिन्न मानते हैं,
वैसे ही। अथवा आत्मस्वरूप होने से मच्छर आदि सभी प्राणियों में
नियन्ता रूप से विद्यमान अपने निरतिशय ऐश्वर्य को देखता है।
किन्तु अपने ऐश्वर्य में तारतम्य नहीं देखता । इसके अतिरिक्त
तिर्यक् आदि अधम योनियों में भी भेदक जाति, गुणादि के न होने
से.निरतिशय ऐश्वर्य का दर्शन कर कृतकृत्य हो जाता है ।।४६।।

४०
शङ्का- प्रत्यक्षविरोध होने से आत्मा सर्वात्मक नहीं हो
सकता। नाना रूप से दृष्टिगोचर इस जगत् को योगी आत्मा
से अभिन्न रूप से कैसे देखता है? इसका समाधान करते हैं-
आत्मैवेदं जगत्सर्वमात्मनोऽन्यन्न किञ्चन।
मृदो यद्वद्घटादीनि स्वात्मानं सर्वमीक्षते॥४७॥
यह सम्पूर्ण जगत् आत्मा का कार्य होने से आत्मरूप ही
है। अतः आत्मा से भिन्न कोई भी वस्तु विद्यमान नहीं है। जैसे
मिट्टी के विकार घट, सकोरा, कुल्हड़ मिट्टी से भिन्न नहीं होते।
अतः योगी आत्मा में सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च को कल्पित देखता है,
इस विषय में शंका का कोई अवसर नहीं है। श्रुतियाँ भी कहती हैं,
“वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् (विकार वाणी के
आलम्बन मात्र है, उपादान मिट्टी ही सत्य है।) “सर्वं खल्विदं
ब्रह्म” (यह सम्पूर्ण दृश्यमान जगत् ब्रह्म ही हैं) इत्यादि ॥४७॥
ऐसा आत्मदर्शी ही जीवन्मुक्त होता है, इसे कहते हैं-
जीवन्मुक्तस्तु तद्विद्वान्पूर्वोपाधिगुणांस्त्यजेत्।
स सच्चिदादिधर्मत्वं भेजे भ्रमरकीटवत्॥४८॥
शास्त्रों में 'कीट भ्रमर न्याय' प्रसिद्ध है। जैसे कीट
क्रियान्तर का परित्याग करके सतत भ्रमर का ध्यान करते हुए उसी
शरीर में भ्रमरभाव को प्राप्त होता है। उसी प्रकार मुमुक्षु साधक
श्रवणादि साधनों की परिपाक दशा में अनादि अविद्या परिकल्पित
स्थूल शरीरादि उपाधियों के धर्मों का परित्याग करके जीवन्मुक्त हो
जाता है। वह सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म हो जाता है ॥४८॥
तदनन्तर स्वात्माराम होकर सुखपूर्वक स्थित होता है,
इसे बताते हैं-

४१
तीर्त्वा मोहार्णवं हत्वा रागद्वेषादिराक्षसान्।
योगी शान्तिसमायुक्तो ह्यात्मारामो विराजते।।४९।।
अपरिमित मोह रूपी समुद्र को ज्ञानरूपीनौका से पार
करके, मोक्ष के विरोधि राग, द्वेष आदि राक्षसों को मार करके शम
दम आदि से विशिष्ट ज्ञानी जीवन्मुक्त पुरुष आत्मा में ही रमण
करते हुए स्वराज्य में अभिषिक्त होकर विराजमान होता है
।।४६।।
अब जीवन्मुक्त का लक्षण बताते हैं-
बाह्यानित्यसुखासक्तिं हित्वाऽऽत्मसुखनिर्वृतः।
घटस्थदीपवच्छश्वदन्तरेव प्रकाशते ।।५०।।
बाह्येन्द्रियों का विषयों के सम्बन्ध से जन्य अनित्य सुख
की आसक्ति का परित्याग करके, आत्मसुखरूप से संपन्न, स्वसाक्षी
रूप से आत्मानुभव करने वाला ही जीवन्मुक्त कहलाता है। जैसे
घट के भीतर रखा हुआ दीपक भीतर-ही-भीतर प्रकाशित होता
रहता है। उसी प्रकार जीवन्मुक्त पुरुष आत्मसुख का अनुभव
नित्य करना है। किन्तु अन्यों के द्वारा नहीं जाना जाता ।।५०।।
इस प्रकार कहा गया जीवन्मुक्त पुरुष प्रारब्धक्षय
होने तक स्थित रहता है। इसे अगले श्लोक से स्पष्ट करते हैं-
उपाधिस्थोऽपि तद्धर्मैर्न लिप्तो व्योमवन्मुनिः।
सर्वविन्मूढवत्तिष्ठेदसक्तो वायुवच्चरेत् ।।५१।।
मननशील जीवन्मुक्त पुरुष देहादि उपाधियों के साक्षीरूप
से होने पर भी आकाश के समान उपाधि के धर्मों से लिप्त नहीं
होता। सर्वज्ञ होने पर भी प्राकृत (अज्ञानी) मनुष्यों के समान स्थित

अग्रिम श्लोक से बताते हैं-

: ४२
होता है। स्वाभाविक रूप से विषयों की प्राप्ति होने पर भी आसक्ति
से रहित होकर वायु के समान विचरण करता है ।।५१।।
प्रारब्ध के क्षीण होने पर देहद्वय रूपी उपाधि के लीन
होने पर कैवल्य (विदेहमुक्ति) को प्राप्त कर लेता है। इसे
अग्रिम श्लोक से बताते हैं-
उपाधिविलयाद्विष्णौ निर्विशेषं विशेन्मुनिः।
जले जलं वियद्व्योम्नि तेजस्तेजसि वा यथा।।५२।।
जैसे जल में जल, आकाश में आकाश और तेज में तेज
मिलकर एकाकारता को प्राप्त कर लेता है। उसी प्रकार प्रारब्ध
समाप्त होने पर दोनों शरीर नष्ट होते ही तत्त्वज्ञानी मुनि
सर्वव्यापक परब्रह्म परमात्मा में निर्विशेष को प्राप्त कर लेता है।
अर्थात् अत्यन्त अभिन्न हो जाता है ।।५२।।
अब तटस्थ लक्षण के द्वारा ब्रह्म जीव से अभिन्न है,
इसे दिखाते हैं-
यल्लाभान्नापरो लाभो यत्सुखान्नापरं सुखम्।
यज्ज्ञानान्नापरं ज्ञानं तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।५३।।
जिस ब्रह्म साक्षात्कार रूपी लाभ से बढ़कर कोई लाभ
कहीं भी विद्यमान नहीं है। क्योंकि सभी सांसारिक लाभों का
अन्तर्भाव ब्रह्मलाभ में ही हो जाता है। ब्रह्मानन्द में ही सभी
सांसारिक आनन्दों का अन्तर्धान (अन्तर्भाव) हो जाता है। जिस ब्रह्म
सुख से बढ़कर कोई भी सांसारिक सुख नहीं है। क्योंकि ब्रह्म सुख
निरतिशय सुख है। जिसके साक्षात्कार से अन्य कोई ज्ञान अवशिष्ट
नहीं रहता। वही ब्रह्म है, ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए ब्रह्म ज्ञान से
ही मोक्ष ही प्राप्ति होती है। अन्य ज्ञान से नहीं ।।५३।।

४३
यद्दृष्ट्वा न परं दृश्यं यद्भूत्वा न पुनर्भवः।
यज्ज्ञात्वा न परं ज्ञानं तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।५४।।
जिसको देख लेने पर अन्य कोई दृश्य शेष नहीं रह जाता,
वह ब्रह्म है। क्योंकि उसी में सम्पूर्ण पुरुषार्थों की सिद्धि हो जाती
है। जिसकी स्वरूपता को प्राप्त कर लेने पर पुनः जन्म नहीं लेना
पड़ता है। वही ब्रह्म है। जिसके जान लेने पर अन्य कोई ज्ञेय नहीं
रह जाता, वही ब्रह्म है। ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए। इसके
अतिरिक्त सभी तो वृथा पाण्डित्य ही है ।।५४।।
अब दो श्लोकों से ब्रह्म का स्वरूप लक्षण कहते हैं-
तिर्यगूर्ध्वमधः पूर्णं सच्चिदानन्दमद्वयम्।
अनन्तं नित्यमेकं यत्तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।५५।।
जो बायें-दाहिने, आगे-पीछे, ऊपर-नीचे सर्वत्र पूर्ण,
सच्चिदानन्द स्वरूप, अद्वितीय, त्रिविध परिच्छेद रहित, नित्य तथा
एक ही है, वही ब्रह्म है। ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए ।।५५।।
अतद्व्यावृत्तिभेदैस्तु वेदान्तैर्लक्ष्यतेऽव्ययम्।
अखण्डानन्दमेकं यत्तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।५६।।
वेदान्त वाक्यों से अनात्म पदार्थों की व्यावृत्ति के द्वारा जो
अव्यय, अखण्ड, आनन्दस्वरूप, एक तत्त्व लक्षित होता है, वही ब्रह्म
है। ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए ।।५६।।
शङ्का- ब्रह्मा आदि भी निरतिशय आनन्द वाले सुने गये हैं?
समाधान करते हैं-
अखण्डानन्दरूपस्य तस्यानन्दलवाश्रिताः।
ब्रह्माद्यास्तारतम्येन भवन्त्यानन्दिनोऽखिलाः।।५७।।