आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)
पूर्वोक्त श्लोक वर्णित मनन का चिरकाल अभ्यास
३५
पूर्वोक्त श्लोक वर्णित मनन का चिरकाल अभ्यास
करने पर पुरुषार्थ की सिद्धि अवश्यम्भावी होती है, इसे
दिखाते हैं-
एवं निरन्तराभ्यस्ता ब्रह्मैवास्मीति वासना।
हरत्यविद्याविक्षेपान् रोगानिव रसायनम्।।३५।।
इस प्रकार से निरन्तर 'मैं ब्रह्म हूँ' इसका अभ्यास करने
से तज्जन्य दृढ़ संस्कार अविद्याकृत चित्त विक्षेपों को पूरी तरह से
नाश कर देता है। जैसे चिरकालतक सेवन की गयी उपयुक्त
औषधि रोग को जड़ से निकाल देती है, ठीक वैसे ही ।।३५।।
अब जीव-ब्रह्म की एकता को दृढ़ करने के लिए पुनः
कथन करते हैं-
नित्यशुद्धविमुक्तैकमखण्डानन्दमद्वयम्।
सत्यं ज्ञानमनन्तं यत् परब्रह्माहमेव तत्।।३६।।
'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतियों में जिस नित्य,
शुद्ध, विमुक्त, एक, अखण्ड, आनन्दस्वरूप, अद्वितीय परब्रह्म का
कथन किया गया है, वह ब्रह्म मैं ही हूँ। ।।३६।।
अब ब्रह्मानुसन्धान संबन्धित कुछ अवश्य पालनीय नियमों
को कहते हैं-
विविक्तदेश आसीनो विरागो विजितेन्द्रियः।
भावयेदेकमात्मानं तमनन्तमनन्यधीः ।।३७।।
स्त्री, जन आदि के विक्षेप से रहित विविक्त देश में वैराग्य
और इन्द्रियनिग्रह पूर्वक स्थित होकर अनन्यचित्त से उस अनन्त
आत्मा का प्रत्यग् रूप से चिन्तन करें। अर्थात् ब्रह्म में ही बुद्धि को
स्थिर करे।।३७।।
३६
दृश्य प्रपञ्च के विद्यमान रहते एकत्वभावना कैसे
संभव है? इस विषय में बताते हैं-
आत्मन्येवाखिलं दृश्यं प्रविलाप्य धिया सुधीः।
भावयेदेकमात्मानं निर्मलाकाशवत्सदा ॥३८॥
बुद्धिमान् साधक शुद्ध बुद्धि से आत्मा में ही सम्पूर्ण दृश्य
प्रपञ्च को लीन करके अर्थात् प्रपञ्चमिथ्यात्व का दृढ़ निश्चय
करके, द्वैत का अभाव होने से निर्मल आकाश के समान एक
आत्मा की ही भावना करें।।३८।।
अब ज्ञानी महापुरुष की स्थिति का वर्णन करते हैं-
नामवर्णादिकं सर्वं विहाय परमार्थवित्।
परिपूर्णचिदानन्दस्वरूपेणावतिष्ठते।।३९।।
परमात्मतत्त्व ज्ञानी महापुरुष सम्पूर्ण नाम, रूप, वर्ण
आदि युक्त जगत् का परित्याग करके देश काल और वस्तु के
परिच्छेद से रहित चिदानन्द स्वरूप से अवस्थित हो जाता है
।।३९।।
शङ्का- प्रमातृत्व आदि त्रिपुटी (प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय)
का ज्ञान जब तक है, तब तक एकत्वभावना कैसे संभव है?
समाधान करते हैं-
ज्ञातृज्ञानज्ञेयभेदः परात्मनि न विद्यते।
चिदानन्दैकरूपत्वादीप्यते स्वयमेव हि।।४०।।
ज्ञातृ, ज्ञान, ज्ञेय भेद रूपी त्रिपुटी परमात्मा में बिल्कुल
नहीं है। भेद कल्पित आत्मा में ही भासित होता है। आत्मा ज्ञान
और आनन्दरूप होने से स्वयं ही प्रकाशित होता है ।।४०।।
३७
इस प्रकार विशुद्ध आत्म वस्तु के ज्ञान से प्रत्यक्ष फल
बताते हैं।
एवमात्मारणौ ध्यानमथने सततं कृते।
उदिताऽवगतिज्वाला सर्वाज्ञानेन्धनं दहेत्।।४१।।
याज्ञिक क्रियाओं के आरम्भ में दो अरणियों (अरहर
आदि काष्ठनिर्मित) के मन्थन से अग्नि प्रकट की जाती है, जो
डाली गयी सभी आहुतियों को जलाकर भस्म कर देती है। इसी
प्रकार दाष्ट्रान्त में, विशुद्ध अन्तःकरण रूपी अरणि में मन उत्तर
अरणि के समान है, ध्यान के द्वारा दोनों का नित्य निरन्तर मन्थन
करने पर वहाँ उत्पन्न ज्ञानाग्नि की ज्वाला, सम्पूर्ण अज्ञानरूपी
ईंधन को अर्थात् कार्य के सहित मूलाज्ञान को सम्पूर्ण रूप से
जलाकर भस्मसात् कर देती है। इससे तितिक्षु मुमुक्षु स्वाराज्य में
अभिषिक्त होकर कृतकृत्य हो जाता है ॥४१॥
जीव-ब्रह्म के एकत्व के दृढ़ ज्ञान से, अविद्या से
परिकल्पित अन्धकार के सम्पूर्ण रूप से नष्ट होने पर परमात्मा
स्वयं आविर्भूत हो जाता है। इसे अगले श्लोक से कहते हैं-
अरुणेनेव बोधेन पूर्वसन्तमसे हृते।
तत आविर्भवेदात्मा स्वयमेवांशुमानिव।।४२।।
जैसे सूर्योदय के पहले सूर्यप्रकाश से अन्धकार का नाश
होने पर सूर्य प्रकट हो जाता है। उसी तरह ज्ञान से अज्ञानान्धकार
का नाश होने पर आत्मा का आविर्भाव हो जाता है ॥४२॥
आत्मा परोक्ष स्वभाव वाला होने से सर्वदा अप्राप्त ही
है। वह प्राप्त कब होगा? इसे बताते हैं-
३८
आत्मा तु सततं प्राप्तो ह्यप्राप्तवदविद्यया।
तन्नाशे प्राप्तवद्भाति स्वकण्ठाभरणं यथा।।४३।।
सर्वत्र परिपूर्ण, अद्वितीय, आनन्दस्वरूप आत्मा सदा प्राप्त
ही है। अज्ञानकृत भ्रान्ति से अप्राप्त के समान भासित होता है।
जैसे कण्ठ में धारण की गयी माला, विस्मरण से अप्राप्त के समान
होती है। किन्तु आप्त वाक्य सुनते ही भ्रान्ति का अपनय होते ही
प्राप्त हो जाती है। ऐसे ही अज्ञानरूपी आवरण काल में अप्राप्त के
समान भासित होने वाला आत्मा, महावाक्य श्रवण जन्य ज्ञान से
अज्ञान नष्ट होते ही प्राप्त के समान भासित होता है। अत एव
शास्त्रों में आत्म-लाभ को 'प्राप्त की ही प्राप्ति' कहा गया है
।।४३।।
शङ्का- संसारी जीव परमात्मा से अभिन्न है, यह
कहना ठीक नहीं है? समाधान करते हैं-
स्थाणौ पुरुषवद्भ्रान्त्या कृता ब्रह्मणि जीवता।
जीवस्य तात्त्विके रूपे तस्मिन्दृष्टे निवर्तते।।४४।।
जैसे अन्धकार में स्थित स्थाणु आदि में कोई अनजान
व्यक्ति 'यह पुरुष है' इस प्रकार की आशङ्का करके भयसंयुक्त
होता है। वैसे ही अनादि काल से अविवेक से ब्रह्म में जीवत्व की
कल्पना करके प्राणी तरह-तरह के अनर्थों को प्राप्त करते हैं। जब
'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों से उत्पन्न विवेक दृष्टि से वह जीव
अपने तात्त्विक (पारमार्थिक) स्वरूप को जान लेता है, तो कल्पित होने
से जीवभाव की भी निवृत्ति हो जाती है। (तभी 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा जान
सकेगा) ।।४४।।
३६
अहंता-ममता का ज्ञान होते रहने पर एकत्त्वज्ञान
कैसे संभव है? इस आशङ्का का समाधान करते हैं-
तत्त्वस्वरूपानुभवादुत्पन्नं ज्ञानमञ्जसा।
अहं ममेति चाज्ञानं बाधते दिग्भ्रमादिवत् ।।४५।।
जैसे दिशाओं के सम्यग् ज्ञान से दिग्भ्रान्ति तुरंत नष्ट हो
जाती है। इसी प्रकार तत्त्वस्वरूप के अनुभव से अर्थात् जीव-ब्रह्म
की एकता का निरन्तर अभ्यास करने से उत्पन्न दृढ़ ज्ञान सहसा
'मैं' 'मेरा' इस अज्ञान को नष्ट कर डालता है। ऐसा ही तत्त्वज्ञानियों
का अनुभव देखा गया है ।।४५।।
अहंता-ममता रूपी अज्ञान के नष्ट होने पर योगी
(तत्त्वज्ञानी) ज्ञाननेत्र से सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च को आत्मा में ही
अभिन्न रूप से देखता है अर्थात् सम्पूर्ण प्रपञ्च को आत्मा में
कल्पित जानता है। इसे कहते हैं-
सम्यग्विज्ञानवान्योगी स्वात्मन्येवाखिलं स्थितम्।
एकं च सर्वमात्मानमीक्षते ज्ञानचक्षुषा ।।४६।।
यथार्थज्ञानवान् योगी सर्वाधिष्ठानभूत आत्मा में ही ज्ञान
नेत्र से सम्पूर्ण विश्व को स्थित देखता है। जैसे मिट्टी और स्वर्ण
से बने पदार्थों को जानकार व्यक्ति उपादान से अभिन्न मानते हैं,
वैसे ही। अथवा आत्मस्वरूप होने से मच्छर आदि सभी प्राणियों में
नियन्ता रूप से विद्यमान अपने निरतिशय ऐश्वर्य को देखता है।
किन्तु अपने ऐश्वर्य में तारतम्य नहीं देखता । इसके अतिरिक्त
तिर्यक् आदि अधम योनियों में भी भेदक जाति, गुणादि के न होने
से.निरतिशय ऐश्वर्य का दर्शन कर कृतकृत्य हो जाता है ।।४६।।
४०
शङ्का- प्रत्यक्षविरोध होने से आत्मा सर्वात्मक नहीं हो
सकता। नाना रूप से दृष्टिगोचर इस जगत् को योगी आत्मा
से अभिन्न रूप से कैसे देखता है? इसका समाधान करते हैं-
आत्मैवेदं जगत्सर्वमात्मनोऽन्यन्न किञ्चन।
मृदो यद्वद्घटादीनि स्वात्मानं सर्वमीक्षते॥४७॥
यह सम्पूर्ण जगत् आत्मा का कार्य होने से आत्मरूप ही
है। अतः आत्मा से भिन्न कोई भी वस्तु विद्यमान नहीं है। जैसे
मिट्टी के विकार घट, सकोरा, कुल्हड़ मिट्टी से भिन्न नहीं होते।
अतः योगी आत्मा में सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च को कल्पित देखता है,
इस विषय में शंका का कोई अवसर नहीं है। श्रुतियाँ भी कहती हैं,
“वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् (विकार वाणी के
आलम्बन मात्र है, उपादान मिट्टी ही सत्य है।) “सर्वं खल्विदं
ब्रह्म” (यह सम्पूर्ण दृश्यमान जगत् ब्रह्म ही हैं) इत्यादि ॥४७॥
ऐसा आत्मदर्शी ही जीवन्मुक्त होता है, इसे कहते हैं-
जीवन्मुक्तस्तु तद्विद्वान्पूर्वोपाधिगुणांस्त्यजेत्।
स सच्चिदादिधर्मत्वं भेजे भ्रमरकीटवत्॥४८॥
शास्त्रों में 'कीट भ्रमर न्याय' प्रसिद्ध है। जैसे कीट
क्रियान्तर का परित्याग करके सतत भ्रमर का ध्यान करते हुए उसी
शरीर में भ्रमरभाव को प्राप्त होता है। उसी प्रकार मुमुक्षु साधक
श्रवणादि साधनों की परिपाक दशा में अनादि अविद्या परिकल्पित
स्थूल शरीरादि उपाधियों के धर्मों का परित्याग करके जीवन्मुक्त हो
जाता है। वह सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म हो जाता है ॥४८॥
तदनन्तर स्वात्माराम होकर सुखपूर्वक स्थित होता है,
इसे बताते हैं-
४१
तीर्त्वा मोहार्णवं हत्वा रागद्वेषादिराक्षसान्।
योगी शान्तिसमायुक्तो ह्यात्मारामो विराजते।।४९।।
अपरिमित मोह रूपी समुद्र को ज्ञानरूपीनौका से पार
करके, मोक्ष के विरोधि राग, द्वेष आदि राक्षसों को मार करके शम
दम आदि से विशिष्ट ज्ञानी जीवन्मुक्त पुरुष आत्मा में ही रमण
करते हुए स्वराज्य में अभिषिक्त होकर विराजमान होता है
।।४६।।
अब जीवन्मुक्त का लक्षण बताते हैं-
बाह्यानित्यसुखासक्तिं हित्वाऽऽत्मसुखनिर्वृतः।
घटस्थदीपवच्छश्वदन्तरेव प्रकाशते ।।५०।।
बाह्येन्द्रियों का विषयों के सम्बन्ध से जन्य अनित्य सुख
की आसक्ति का परित्याग करके, आत्मसुखरूप से संपन्न, स्वसाक्षी
रूप से आत्मानुभव करने वाला ही जीवन्मुक्त कहलाता है। जैसे
घट के भीतर रखा हुआ दीपक भीतर-ही-भीतर प्रकाशित होता
रहता है। उसी प्रकार जीवन्मुक्त पुरुष आत्मसुख का अनुभव
नित्य करना है। किन्तु अन्यों के द्वारा नहीं जाना जाता ।।५०।।
इस प्रकार कहा गया जीवन्मुक्त पुरुष प्रारब्धक्षय
होने तक स्थित रहता है। इसे अगले श्लोक से स्पष्ट करते हैं-
उपाधिस्थोऽपि तद्धर्मैर्न लिप्तो व्योमवन्मुनिः।
सर्वविन्मूढवत्तिष्ठेदसक्तो वायुवच्चरेत् ।।५१।।
मननशील जीवन्मुक्त पुरुष देहादि उपाधियों के साक्षीरूप
से होने पर भी आकाश के समान उपाधि के धर्मों से लिप्त नहीं
होता। सर्वज्ञ होने पर भी प्राकृत (अज्ञानी) मनुष्यों के समान स्थित