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सर्वकोश
आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 51 में से

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पृष्ठ 33

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आत्मा में विकाराभाव को स्पष्ट करते हैं-
आत्मनो विक्रिया नास्ति बुद्धेर्बोधो न जात्विति।
जीवः सर्वमलं ज्ञात्वा ज्ञाता द्रष्टेति मुह्यति॥२५॥
आत्मा स्वभाव से ही विकार शून्य है। बुद्धि में ज्ञान होने
की शङ्का भी नहीं हो सकती और आत्मा में कभी विकार नहीं हो
सकता। फिर भी जीव शब्द वाच्य साभास अहंकार देह, इन्द्रिय
आदि में अत्यन्त अध्यास करके 'मैं ज्ञाता, कर्ता, भोक्ता, द्रष्टा,
पैदा हुआ तथा मरने वाला हूँ' इस प्रकार मानता है। जिस प्रकार
लौहपिण्ड में अग्नि का अध्यास होता है, वैसे ही परस्पर धर्मों के
अध्यास से मोहित होता है ॥२५॥
आत्मा अविवेक से अन्य के धर्मों को आरोपित
करके भययुक्त होता है, इसे कहते हैं-
रज्जुसर्पवदात्मानं जीवं ज्ञात्वा भयं वहेत्।
नाहं जीवः परात्मेति ज्ञातश्चेन्निर्भयो भवेत्॥२६॥
जैसे जीव रज्जु में सर्प का आरोप करके भय, कम्पन
आदि से युक्त होता है। इसी प्रकार अपने सत्, चित्, आनन्द
स्वरूपता को न जानकर, अपने को जीव मान करके सहस्रों
सांसारिक दुःखों से पीड़ित होता है। जब शास्त्र और आचार्य के
उपदेश से उत्पन्न विवेकदृष्टि से अखण्ड एकरूप आत्मा को जानता
है, तब भयरहित हो जाता है। ॥२६॥
'आत्मा सबका प्रकाशक है' इसे स्पष्ट करते हैं-
आत्मावभासयत्येको बुद्ध्यादीनीन्द्रियाणि च।
दीपो घटादिवत्स्वात्मा जडैस्तैर्नावभास्यते॥२७॥
आत्मा अकेले ही सम्पूर्ण बुद्धि आदि इन्द्रियों को प्रकाशित