आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)
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जङ्गम आदि सभी विशेष अभिव्यक्तियाँ, सुवर्ण में कटक, कुण्डल
और मुकट आदि के समान कल्पित है। अर्थात् कल्पित की
अधिष्ठानातिरिक्त सत्ता न होने से ब्रह्म से अभिन्न हैं। ।।८।।
उपर्युक्त अर्थ को आकाश दृष्टान्त से दृढ़ करते हैं-
यथाऽऽकाशो हृषीकेशो नानोपाधिगतो विभुः।
तद्भेदाद्भिन्नवद्भाति तन्नाशे सति केवलः।।९।।
'हृषीकम्' इन्द्रियों को कहते हैं। अतः मनः आदि सभी
इन्द्रियों के प्रेरक या नियामक परमात्मा को 'हृषीकेश' कहा जाता
है। ऐसे सर्वगत परमात्मा अपनी माया से परिकल्पित नाना प्रकार
की उपाधियों में प्रतिबिम्बित होकर नाना (भिन्न) के समान
भासित होते हैं। किन्तु ब्रह्मैक्यज्ञान होने पर, देहादि उपाधियों के
नष्ट होने पर केवल एक आत्मस्वरूप से ही परिशिष्ट होकर भासते
हैं। जैसे एक ही आकाश मठ, घट आदि उपाधियों में नाना (भिन्न)
के समान भासित होता है और उपाधियों के विलय होने पर एक
के समान ही भासता हैं, तद्वद् ।।६।।
शङ्का- सभी देहों में तत्तद् जाति आदि से सम्बद्ध
आत्मा नित्य मुक्त कैसे है? इस विषय में बताते हैं-
नानोपाधिवशादेव जातिनामाश्रमादयः।
आत्मन्यारोपितास्तोये रसवर्णादिभेदवत्।।१०।।
नाना उपाधि संयुक्त आत्मा में जाति, वर्ण, नाम, रूप
आदि आरोपित हैं अर्थात् मायाकल्पित हैं। वास्तव में सत्य नहीं है।
ठीक उसी प्रकार जैसे स्वाभाविक रूप से मधुर जल कड़वा, तीखा,
मधुर, लाल और पीले आदि द्रव्यों से संयुक्त होकर वैसा ही हो
जाता है, स्वरूपतः नहीं ।।१०।।