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आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

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परब्रह्म परमात्मा अखण्ड आनन्द स्वरूप है। उस आनन्द
समुद्र की जरा सी मात्रा का आश्रय लेकर ब्रह्मा आदि सभी जीव
आनन्द के तारतम्य से आनन्दित होते हैं। अतः श्रुति कहती है,
"एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति।" इससे सिद्ध
होता है कि ब्रह्मा आदि का आनन्द परिच्छिन्न है ॥५७॥
आत्मा ही परम प्रेमास्पद होने से सभी की अपेक्षा
प्रियतम होता है, इसे बताते हैं-
तद्युक्तमखिलं वस्तु व्यवहारस्त्वतिप्रियः।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म क्षीरे सर्पिरिवाखिले ।।५८।।
उस आनन्दस्वरूप आत्मा से सम्बद्ध सभी देहादि वस्तुएँ
प्रियतम हो जाती है। आत्मसंयुक्त व्यवहार भी अत्यन्त प्रिय ही
होता है। इसीलिए सम्पूर्ण दूध में व्याप्त घृत के समान सर्वगत
अत्यन्त प्रिय ब्रह्म ही सबका प्रिय आत्मा है ।।५८।।
तब आत्मा को किस प्रकार से सबको व्याप्त करके
स्थित हुआ जाने? ऐसी आशङ्का होने पर कहते हैं कि साक्षात्
कथन संभव न होने पर भी सत्ता रूप से उसी का भान हो
रहा है। अतः 'अनण्वस्थूलम्.........' इस श्रुति के आधार पर
समाधान करते हैं-
अनण्वस्थूलमह्रस्वमदीर्घमजमव्ययम् ।
अरूपगुणवर्णाख्यं तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।५९।।
जो अणु भी नहीं, स्थूल नहीं, ह्रस्व नहीं, दीर्घ नहीं,
अजन्मा, अविनाशी तथा रूप-गुण वर्ण और नाम से रहित है, वही
ब्रह्म है। ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए ।।५६।।

पुनः ज्ञान के लिए तीन श्लोकों से ब्रह्म का निरूपण

।
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पुनः ज्ञान के लिए तीन श्लोकों से ब्रह्म का निरूपण
करते हैं-
यद्भासा भासतेऽर्कादिर्भास्यैर्यत्तु न भास्यते।
येन सर्वमिदं भाति तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।६०।।
जिस प्रकाशस्वरूप के प्रकाश से सूर्यादि प्रकाशित होते हैं।
परन्तु प्रकाश्य सूर्यादि के द्वारा जो प्रकाशित नहीं होता। जिसके
द्वारा सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है। वही ब्रह्म है, ऐसा निश्चय
कर लेना चाहिए। कठोपनिषद्-श्रुति कहती है “न तत्र सूर्यो भाति
न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः तमेव भान्तमनुभाति
सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति।” (कठ. २/२/१५) (उस आत्मस्वरूप
ब्रह्म का प्रकाशन सर्वप्रकाशक सूर्य भी नहीं कर सकता। इसी प्रकार
चन्द्रमा, तारे और विद्युत् भी उस का प्रकाश नहीं कर पाती। उस
चैतन्यज्योति आत्मा के प्रकाशित होने पर ही सब प्रकाशित होता
है। उसके प्रकाश से ही सब कुछ भासता है) ।।६०।।
श्रीमद्भगवद्गीता में भी इसी तथ्य का कथन शब्दान्तर
से किया गया है। उसे कहते हैं-
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ।।६१।।
भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से बताते हैं कि मेरे उस तेजस्वरूप
परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर पाता है, न चन्द्रमा और न ही
अग्नि। जिस वैष्णव (व्यापक) पद को प्राप्त होकर प्राणी वापस
नहीं लौटते, वहीं मेरा परम धाम है ।।६१।।
पुनः अग्रिम श्लोक से उसी अर्थ को कहते हैं-
स्वयमन्तर्बहिर्व्याप्य भासयन्नखिलं जगत्।

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ब्रह्म प्रकाशते वह्निप्रतप्तायसपिण्डवत् ॥६२॥
सर्वस्वरूपभूत ब्रह्म सम्पूर्ण जगत् के भीतर-बाहर व्याप्त
होकर प्रकाशित करता हुआ स्वयं प्रकाशित हो रहा है। जैसे तपे हुए
लोह के गोले में स्थित अग्नि, गोले को सम्पूर्ण रूप से व्याप्त होकर
प्रकाशित करते हुए स्वयं भी प्रकाशित होती है, ठीक वैसे ही ॥६२॥
पुनः स्वरूपभूत ब्रह्म का कथन करते हैं-
जगद्विलक्षणं ब्रह्म ब्रह्मणोऽन्यन्न किञ्चन।
ब्रह्मान्यद्भाति चेन्मिथ्या यथा मरुमरीचिका ॥६३॥
ब्रह्म जगत् से विलक्षण है क्योंकि वह जगत् का अधिष्ठान
है। किन्तु अन्य सभी वस्तुएँ ब्रह्म में ही अध्यस्त होने से ब्रह्म से
भिन्न नहीं है। ब्रह्म से भिन्न यदि कुछ भी दिखाई पड़ता है, तो
उसे मरुमरीचिका के जल के समान मिथ्या ही जानना चाहिए
॥६३॥
पुनः उसी तथ्य का प्रतिपादन करते हैं-
दृश्यते श्रूयते यद्यद्ब्रह्मणोऽन्यन्न तद्भवेत्।
तत्त्वज्ञानाच्च तद्ब्रह्म सच्चिदानन्दमद्वयम् ॥६४॥
चक्षु से जो कुछ भी दिखाई पड़ता है, श्रोत्र से जो कुछ भी
सुनाई पड़ता है, मन से जो कुछ भी स्मरण किया जाता है, वाणी
से जो भी बोला जाता है, तात्त्विक दृष्टि से सब ब्रह्म ही है। श्रुतियों
में भी कहा गया है-
“न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा।
ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः॥”
(मुण्डक. ३/१/८)

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यह आत्मा चक्षु, वाणी, अन्य इन्द्रियों, तप, कर्म आदि से
गृहीत नहीं होता। रागादि मल से रहित ज्ञान के प्रसाद से शुद्ध
अन्तःकरण वाला पुरुष ही ध्यान से उस निष्कल आत्मा का
साक्षात्कार कर पाता है ।।६४।।
शङ्का - यदि ब्रह्म सर्वगत है तो सभी को दिखाई क्यों
नहीं पड़ता? समाधान करते हैं-
सर्वगं सच्चिदात्मानं ज्ञानचक्षुर्निरीक्षते ।
अज्ञानचक्षुर्नैक्षेत भास्वन्तं भानुमन्धवत् ।।६५।।
अज्ञान नेत्र से विशिष्ट पुरुष सर्व व्याप्त, सच्चिदानन्द
अद्वितीय ब्रह्म का साक्षात्कार नहीं कर पाता। श्रुतियाँ कहती है,
"न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम्।" -कोई भी इस आत्मा को चर्म-चक्षु
से नहीं देख सकता। "तमक्रतुः पश्यति वीतशोको
धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ।"- दृष्टादृष्ट विषयों से निष्काम
पुरुष ही मन आदि इन्द्रियों की प्रसन्नता से जब अपनी आत्मा की
महिमा को जान लेता है तो वह शोकरहित हो जाता है। अतः
श्रुतियों से सिद्ध होता है कि विवेकी पुरुष ही आत्मा का
साक्षात्कार कर सकता है। इसे दृष्टान्त से स्पष्ट करते हैं। जैसे
कोई अन्धा व्यक्ति प्रकाशमान सूर्य को भी नहीं देख पाता। उसी
प्रकार अविवेकी पुरुष आत्मा को नहीं जान पाता ।।६५।।
एवं उपर्युक्त रीति से, अभ्यास से रहित अनुभव
संपन्न पुरुष को अनादिकालीन वासनाओं से अज्ञान संभव है।
उसका परिहार करने के लिये बार-बार श्रवणादि की आवृत्ति
करनी चाहिए। इसे बताते हैं-
श्रवणादिभिरुद्दीप्तो ज्ञानाग्निपरितापितः।

४८
जीवः सर्वमलान्मुक्तः स्वर्णवद्द्योतते स्वयम्॥६६॥
जीव शब्द वाच्य साभास अहंकार यहां श्रवण मनन आदि
से प्रकाशित होकर, ज्ञानरूपी अग्नि से शोधित किए जाने पर सभी
अज्ञानात्मक मल से मुक्त होकर स्वयं ही सम्यक् रूप से प्रकाशित
होता है। जैसे स्वर्ण को अग्नि में तपाये जाने पर वह अशुद्धियों को
छोड़कर स्वरूपतः प्रकाशित होता है। ठीक वैसे ही ॥६६॥
इस प्रकार शोधित होकर परमात्मस्वरूप जीव हृदयाकाश
में स्थित अज्ञानान्धकार का उपसंहार करके सूर्य के समान
प्रकाशित होता है। अब इसे बताते हैं-
हृदाकाशोदितो ह्यात्मा बोधभानुस्तमोऽपहत्।
सर्वव्यापी सर्वधारी भाति भासयतेऽखिलम्॥६७॥
जैसे आकाश में उदित हुआ सूर्य अन्धकार का नाश करके
प्रकाशित होता है। वैसे ही हृदयाकाश में उदित हुआ बोधात्मक सूर्य
सर्वव्यापक, सर्वाधार, सच्चिदानन्द स्वरूप आत्मा अज्ञान रूपी
अन्धकार का नाश करके सम्पूर्ण प्रपञ्च को प्रकाशित करता है।
'सर्वात्मक ब्रह्म मैं ही हूँ, इस प्रकार सर्वात्मक रूप से प्रकाशित होता
है।' श्रुतियाँ भी कहती हैं, "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (सम्पूर्ण दृश्यमान
प्रपञ्च निश्चित रूप से ब्रह्म ही है।) इत्यादि ॥६७॥
शङ्का- आत्मज्ञानी को परमात्मज्ञान के प्रतिबन्धक
पापों का नाश करने के लिए नाना प्रकार के पदार्थों से याग
करना चाहिए? समाधान करते हैं-
दिग्देशकालाद्यनपेक्ष्य सर्वगं
शीतादिहन्नित्यसुखं निरञ्जनम्।
यः स्वात्मतीर्थं भजते विनिष्क्रियः

४६
स सर्ववित्सर्वगतोऽमृतो भवेत् ।।६८।।
।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमच्छङ्कर-
भगवत्पादाचार्यविरचित आत्मबोधः।।
जो निष्क्रिय परमहंस महापुरुष आत्मरूपी तीर्थ में अवगाहन
कर लेता है, वह सर्वज्ञ, सर्वगत विद्वान् परमात्मस्वरूप होने से
अमृत हो जाता है। अर्थात् मुक्त हो जाता है। वह आत्मतीर्थ कैसा
है? ऐसी आशंका होने पर बताते हैं- जो देश, काल आदि की
अपेक्षा न रखकर सर्व व्यापक, शीत-उष्ण आदि दुःखों को हरने
वाला परमानन्द का हेतु होने से नित्यसुखस्वरूप, माया के लेप से
रहित होने से निरञ्जन है, ऐसे आत्मतीर्थ में ही परमहंस रमण करते
हैं। इतर तीर्थ आत्मतीर्थ से विपरीत हैं। अतः आत्मतीर्थ में रमण करने
वाले ज्ञानी को कोई भी कर्त्तव्य शेष नहीं रह जाता ।।६८।।
(इस प्रकार परमहंस परिव्राजकाचार्य कैलास
पीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर श्रीमत्स्वामी दिव्यानन्द
सरस्वती द्वारा रचित आत्मबोध व्याख्या समाप्त हुई।)
समरीतिर्महातेजाः परब्रह्म सनातनः
जयताज्जानकीनाथो वेदवेद्यो
महामतिः॥