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आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

अग्रिम श्लोक से बताते हैं-

: ४२
होता है। स्वाभाविक रूप से विषयों की प्राप्ति होने पर भी आसक्ति
से रहित होकर वायु के समान विचरण करता है ।।५१।।
प्रारब्ध के क्षीण होने पर देहद्वय रूपी उपाधि के लीन
होने पर कैवल्य (विदेहमुक्ति) को प्राप्त कर लेता है। इसे
अग्रिम श्लोक से बताते हैं-
उपाधिविलयाद्विष्णौ निर्विशेषं विशेन्मुनिः।
जले जलं वियद्व्योम्नि तेजस्तेजसि वा यथा।।५२।।
जैसे जल में जल, आकाश में आकाश और तेज में तेज
मिलकर एकाकारता को प्राप्त कर लेता है। उसी प्रकार प्रारब्ध
समाप्त होने पर दोनों शरीर नष्ट होते ही तत्त्वज्ञानी मुनि
सर्वव्यापक परब्रह्म परमात्मा में निर्विशेष को प्राप्त कर लेता है।
अर्थात् अत्यन्त अभिन्न हो जाता है ।।५२।।
अब तटस्थ लक्षण के द्वारा ब्रह्म जीव से अभिन्न है,
इसे दिखाते हैं-
यल्लाभान्नापरो लाभो यत्सुखान्नापरं सुखम्।
यज्ज्ञानान्नापरं ज्ञानं तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।५३।।
जिस ब्रह्म साक्षात्कार रूपी लाभ से बढ़कर कोई लाभ
कहीं भी विद्यमान नहीं है। क्योंकि सभी सांसारिक लाभों का
अन्तर्भाव ब्रह्मलाभ में ही हो जाता है। ब्रह्मानन्द में ही सभी
सांसारिक आनन्दों का अन्तर्धान (अन्तर्भाव) हो जाता है। जिस ब्रह्म
सुख से बढ़कर कोई भी सांसारिक सुख नहीं है। क्योंकि ब्रह्म सुख
निरतिशय सुख है। जिसके साक्षात्कार से अन्य कोई ज्ञान अवशिष्ट
नहीं रहता। वही ब्रह्म है, ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए ब्रह्म ज्ञान से
ही मोक्ष ही प्राप्ति होती है। अन्य ज्ञान से नहीं ।।५३।।

४३
यद्दृष्ट्वा न परं दृश्यं यद्भूत्वा न पुनर्भवः।
यज्ज्ञात्वा न परं ज्ञानं तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।५४।।
जिसको देख लेने पर अन्य कोई दृश्य शेष नहीं रह जाता,
वह ब्रह्म है। क्योंकि उसी में सम्पूर्ण पुरुषार्थों की सिद्धि हो जाती
है। जिसकी स्वरूपता को प्राप्त कर लेने पर पुनः जन्म नहीं लेना
पड़ता है। वही ब्रह्म है। जिसके जान लेने पर अन्य कोई ज्ञेय नहीं
रह जाता, वही ब्रह्म है। ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए। इसके
अतिरिक्त सभी तो वृथा पाण्डित्य ही है ।।५४।।
अब दो श्लोकों से ब्रह्म का स्वरूप लक्षण कहते हैं-
तिर्यगूर्ध्वमधः पूर्णं सच्चिदानन्दमद्वयम्।
अनन्तं नित्यमेकं यत्तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।५५।।
जो बायें-दाहिने, आगे-पीछे, ऊपर-नीचे सर्वत्र पूर्ण,
सच्चिदानन्द स्वरूप, अद्वितीय, त्रिविध परिच्छेद रहित, नित्य तथा
एक ही है, वही ब्रह्म है। ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए ।।५५।।
अतद्व्यावृत्तिभेदैस्तु वेदान्तैर्लक्ष्यतेऽव्ययम्।
अखण्डानन्दमेकं यत्तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।५६।।
वेदान्त वाक्यों से अनात्म पदार्थों की व्यावृत्ति के द्वारा जो
अव्यय, अखण्ड, आनन्दस्वरूप, एक तत्त्व लक्षित होता है, वही ब्रह्म
है। ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए ।।५६।।
शङ्का- ब्रह्मा आदि भी निरतिशय आनन्द वाले सुने गये हैं?
समाधान करते हैं-
अखण्डानन्दरूपस्य तस्यानन्दलवाश्रिताः।
ब्रह्माद्यास्तारतम्येन भवन्त्यानन्दिनोऽखिलाः।।५७।।

४४
परब्रह्म परमात्मा अखण्ड आनन्द स्वरूप है। उस आनन्द
समुद्र की जरा सी मात्रा का आश्रय लेकर ब्रह्मा आदि सभी जीव
आनन्द के तारतम्य से आनन्दित होते हैं। अतः श्रुति कहती है,
"एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति।" इससे सिद्ध
होता है कि ब्रह्मा आदि का आनन्द परिच्छिन्न है ॥५७॥
आत्मा ही परम प्रेमास्पद होने से सभी की अपेक्षा
प्रियतम होता है, इसे बताते हैं-
तद्युक्तमखिलं वस्तु व्यवहारस्त्वतिप्रियः।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म क्षीरे सर्पिरिवाखिले ।।५८।।
उस आनन्दस्वरूप आत्मा से सम्बद्ध सभी देहादि वस्तुएँ
प्रियतम हो जाती है। आत्मसंयुक्त व्यवहार भी अत्यन्त प्रिय ही
होता है। इसीलिए सम्पूर्ण दूध में व्याप्त घृत के समान सर्वगत
अत्यन्त प्रिय ब्रह्म ही सबका प्रिय आत्मा है ।।५८।।
तब आत्मा को किस प्रकार से सबको व्याप्त करके
स्थित हुआ जाने? ऐसी आशङ्का होने पर कहते हैं कि साक्षात्
कथन संभव न होने पर भी सत्ता रूप से उसी का भान हो
रहा है। अतः 'अनण्वस्थूलम्.........' इस श्रुति के आधार पर
समाधान करते हैं-
अनण्वस्थूलमह्रस्वमदीर्घमजमव्ययम् ।
अरूपगुणवर्णाख्यं तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।५९।।
जो अणु भी नहीं, स्थूल नहीं, ह्रस्व नहीं, दीर्घ नहीं,
अजन्मा, अविनाशी तथा रूप-गुण वर्ण और नाम से रहित है, वही
ब्रह्म है। ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए ।।५६।।