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सर्वकोश
आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 51 में से

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आत्मस्वरूप को जानने में अनात्म पदार्थों का निषेध,
न करने से क्या क्षति हो सकती है? वास्तव में विचार दृष्टि
से देखा जाए तो अनात्म पदार्थों का निरास न करने पर
आत्मा जाना ही नहीं जा सकता। जैसे 'यह सर्प है' इस प्रकार
रज्जु में भ्रान्ति से आरोपित सर्प का निषेध किए बिना
रज्जुज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता। इसी प्रकार अनात्म पदार्थों
का निषेध करने पर ही आत्मा ज्ञातव्य है। इस आशय को
अगले श्लोक से स्पष्ट करते हैं-
आविद्यकं शरीरादि दृश्यं बुद्बुदवत् क्षरम्।
एतद्विलक्षणं विद्यादहं ब्रह्मेति निर्मलम्।।३०।।
देहेन्द्रियादि सम्पूर्ण दृश्य समुदाय अविद्याका कार्य है, दृश्य होने
से, पानी के बुलबुले के समान। यह विनाशी भी है। इससे विलक्षण
उपाधियों के संसर्ग से रहित, निर्मल, नित्य, एक, सच्चिदानन्द ब्रह्म मैं ही हूँ,
इस प्रकार अनुभव करें। ऐसा जानने से ही कृतकृत्य होगा ।।३०।।
एवं उपर्युक्त रीति से अद्वितीय, आनन्दस्वरूप आत्मा
को महावाक्यार्थ ज्ञान से अपरोक्ष रूप से जानकर, अपने
अनुभव के आधार पर विशुद्ध अन्तःकरण में आत्मविषयक
मनन के स्वरूप को पाँच श्लोकों से कहते हैं-
देहान्यत्वान्न मे जन्मजराकार्श्यलयादयः।
शब्दादिविषयैः सङ्गो निरिन्द्रियतया न च।।३१।।
दृश्य, जड़ आदि स्वभाव वाले स्थूल शरीर से भिन्न होने
से जन्म, बुढ़ापा, कृशता (पतला होना) और लय (मृत्यु) आदि
विकार मुझमें नहीं है। इन्द्रियों से सम्बन्ध न होने से मुझमें शब्दादि
विषयों का सङ्ग नहीं, अत एव मुझमें विषय-भोग नहीं हैं ।।३१।।