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सर्वकोश
आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 51 में से

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पृष्ठ 38

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दृश्य प्रपञ्च के विद्यमान रहते एकत्वभावना कैसे
संभव है? इस विषय में बताते हैं-
आत्मन्येवाखिलं दृश्यं प्रविलाप्य धिया सुधीः।
भावयेदेकमात्मानं निर्मलाकाशवत्सदा ॥३८॥
बुद्धिमान् साधक शुद्ध बुद्धि से आत्मा में ही सम्पूर्ण दृश्य
प्रपञ्च को लीन करके अर्थात् प्रपञ्चमिथ्यात्व का दृढ़ निश्चय
करके, द्वैत का अभाव होने से निर्मल आकाश के समान एक
आत्मा की ही भावना करें।।३८।।
अब ज्ञानी महापुरुष की स्थिति का वर्णन करते हैं-
नामवर्णादिकं सर्वं विहाय परमार्थवित्।
परिपूर्णचिदानन्दस्वरूपेणावतिष्ठते।।३९।।
परमात्मतत्त्व ज्ञानी महापुरुष सम्पूर्ण नाम, रूप, वर्ण
आदि युक्त जगत् का परित्याग करके देश काल और वस्तु के
परिच्छेद से रहित चिदानन्द स्वरूप से अवस्थित हो जाता है
।।३९।।
शङ्का- प्रमातृत्व आदि त्रिपुटी (प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय)
का ज्ञान जब तक है, तब तक एकत्वभावना कैसे संभव है?
समाधान करते हैं-
ज्ञातृज्ञानज्ञेयभेदः परात्मनि न विद्यते।
चिदानन्दैकरूपत्वादीप्यते स्वयमेव हि।।४०।।
ज्ञातृ, ज्ञान, ज्ञेय भेद रूपी त्रिपुटी परमात्मा में बिल्कुल
नहीं है। भेद कल्पित आत्मा में ही भासित होता है। आत्मा ज्ञान
और आनन्दरूप होने से स्वयं ही प्रकाशित होता है ।।४०।।