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सर्वकोश
आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 51 में से

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शङ्का- प्रत्यक्षविरोध होने से आत्मा सर्वात्मक नहीं हो
सकता। नाना रूप से दृष्टिगोचर इस जगत् को योगी आत्मा
से अभिन्न रूप से कैसे देखता है? इसका समाधान करते हैं-
आत्मैवेदं जगत्सर्वमात्मनोऽन्यन्न किञ्चन।
मृदो यद्वद्घटादीनि स्वात्मानं सर्वमीक्षते॥४७॥
यह सम्पूर्ण जगत् आत्मा का कार्य होने से आत्मरूप ही
है। अतः आत्मा से भिन्न कोई भी वस्तु विद्यमान नहीं है। जैसे
मिट्टी के विकार घट, सकोरा, कुल्हड़ मिट्टी से भिन्न नहीं होते।
अतः योगी आत्मा में सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च को कल्पित देखता है,
इस विषय में शंका का कोई अवसर नहीं है। श्रुतियाँ भी कहती हैं,
“वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् (विकार वाणी के
आलम्बन मात्र है, उपादान मिट्टी ही सत्य है।) “सर्वं खल्विदं
ब्रह्म” (यह सम्पूर्ण दृश्यमान जगत् ब्रह्म ही हैं) इत्यादि ॥४७॥
ऐसा आत्मदर्शी ही जीवन्मुक्त होता है, इसे कहते हैं-
जीवन्मुक्तस्तु तद्विद्वान्पूर्वोपाधिगुणांस्त्यजेत्।
स सच्चिदादिधर्मत्वं भेजे भ्रमरकीटवत्॥४८॥
शास्त्रों में 'कीट भ्रमर न्याय' प्रसिद्ध है। जैसे कीट
क्रियान्तर का परित्याग करके सतत भ्रमर का ध्यान करते हुए उसी
शरीर में भ्रमरभाव को प्राप्त होता है। उसी प्रकार मुमुक्षु साधक
श्रवणादि साधनों की परिपाक दशा में अनादि अविद्या परिकल्पित
स्थूल शरीरादि उपाधियों के धर्मों का परित्याग करके जीवन्मुक्त हो
जाता है। वह सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म हो जाता है ॥४८॥
तदनन्तर स्वात्माराम होकर सुखपूर्वक स्थित होता है,
इसे बताते हैं-