अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 114, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाँचवाँ प्रकरण । १०७
भावार्थ ।
प्रश्न—प्रत्यक्ष प्रमाण करके रज्जु विषे सर्पादिकों का
भेद प्रतीत होता है, उनका कैसे लय हो सकता है ? क्योंकि
जो वस्तु प्रत्यक्ष प्रमाण का विषय है, उसका लय नहीं
होता है ?
उत्तर—प्रत्यक्ष प्रमाण का जो विषय है, उसका भी बाध
शास्त्र करके हो जाता है । जैसे चन्द्रमा का मंडल प्रत्यक्ष
प्रमाण से तो एक बित्ता भर का दिखाई देता है, परन्तु
ज्योतिष-शास्त्र में वह दश हजार योजन का लिखा है । उस
शास्त्र करके बित्ता भर का नहीं माना जाता है । वैसे ही
प्रत्यक्ष प्रमाण का विषय जो जगत् है, वह भी श्रुति-वाक्यों
करके बाधित हो जाता है, क्योंकि जगत् वास्तव में तीनों
कालों में नहीं है, और जैसे स्वप्न की सृष्टि और गंधर्व-
नगरादिक तीनों कालों में नहीं हैं, वैसे ही यह जगत् भी
वास्तव में तीनों कालों में नहीं है । ऐसा चिन्तन ही जगत्
के लय का हेतु है ॥ ३ ॥
मूलम् ।
समदुःखसुखः पूर्ण आशानैराश्ययोः समः ।
समजीवितमृत्युः सन्नेवमेव लयं व्रज ॥ ४ ॥
पदच्छेदः ।
समदुःखसुखः, पूर्णः, आशानैराश्ययोः, समः, समजीवित्-
मृत्युः, सन्, एवम्, एव, लयम्, व्रज ॥