अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
साहिब आए संसार में
साहिब आये संसार में
धर्मराय उठ सीस नवायो । तबहिँ हम संसार सिधायो ॥
निरंजन ने तब उठकर साहिब को प्रणाम किया और साहिब संसार में आए।
आये जहाँ यम जीव सतावे । काल निरंजन जीव नचावे ॥
चटपट करे जीव तहाँ भाई । ठाढे भये तहाँ पुनि जाई ॥
मोहि देख जीव कीन्ह पुकारा । हे साहिब मुहि लेहि उबारा ॥
तब हम सत्य शब्द गुहरावा । पुरुष शब्द ते जीव जुड़ावा ॥
साहिब तप्त शिला पर आए, जहाँ निरंजन जीवों को कष्ट दे रहा था, भून-2 कर खा रहा था। साहिब को देख जीवों ने पुकार की कि हमें छुड़ाओ। तब साहिब ने सत्य शब्द पुकारा, जिससे तप्तशिला ठण्डी हो गयी, जीव शांत हो गये।
सकल जीव तब अस्तुति लाये । धन्य पुरुष भल तपन बुझाये ॥
यम ते छोर लेव तुम स्वामी । दया करो प्रभु अन्तरयामी ॥
सब जीवों ने साहिब से पुकार की, कहा-हे प्रभु! हमें छुड़ाओ।
तब मैं कहा जीव समुझाई । जोर करो तो वचन नसायी ॥
जब तुम जाय धरौ जग देहा । तब तुम करिहो शब्द सनेहा ॥
देह धरी सत शब्द समाई । तब हँसा सत लोकै जाई ॥
जहाँ आशा तहाँ वासा होई । ताको टार सका न कोई ॥
जब तुम देह धरो जग जायी । बिसर्यो पुरुष काल धरि खाई ॥
साहिब ने कहा कि यदि ऐसे ही जबरन ले जाऊँगा तो मेरा शब्द कट जाएगा, जो निरंजन को दे चुका हूँ, इसलिए जब तुम मानव तन में जाओगे तो मेरे शब्द से प्रीत करना, जिस देही में मेरा नाम आ जायेगा,
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साहिब बन्दगी
वो सतलोक चला जायेगा। साहिब ने कहा—जहाँ आशा होगी, वहीं वास होगा, तुमने परम पुरुष को भुला दिया, इसलिए काल पुरुष ने तुम्हें खा लिया।
जीवों ने कहा
कहे जीव सुन पुरुष पुराना। देह धरी विसर्यो यह ज्ञाना ॥
पुरुष जान सुमरे उ यमराई। वेद पुराण कहे समुझाई ॥
वेद पुराण कहे मत एहा। निराकार ते कीजे नेहा ॥
सुर नर मुनि तैतीस करोरी। बाँधे सबै निरंजन डोरी ॥
जीवों ने कहा कि हे साहिब! मनुष्य तन में जाकर हमें ज्ञान नहीं रहा, हम भूल गये, काल को ही परम पुरुष जानकर पूजने लगे, क्योंकि वेद पुराण आदि भी इसी निराकार की भक्ति करने को कह रहे हैं, सुर, नर, मुनि, 33 करोड़ देवता आदि सभी निरंजन को मान रहे हैं।
साहिब ने कहा
सुनो जीव यह छल यम कैरा। यह यम फंदा कीन्ह घनेरा ॥
साहिब ने कहा कि काल ने ही यह जाल फैलाया है।
काल कन्या अनेक कीन्हे, जीव कारण जाल हो।
तीरथ व्रत जग योग फन्दे, कोई ना पावत बाट हो ॥
देह धरि नर परगट हो, फिरि ताहि आशा कीन्हे ऊ ॥
भरमत इत उत काल बस, बहु पुण्य में चित दीन्हे ऊ ॥
काल और माया ने जीवों को फँसाने के लिए तीर्थ, योग, यज्ञ, तप आदि के अनेक जाल बनाए हैं, अनेक फंदे बनाए हैं, कोई भी सच्चा रास्ता नहीं पा रहा है। नर तन पाकर जीव काल की ही आशा में इधर उधर भटकते हुए पुण्य कर्मों में उलझ रहे हैं।