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अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished144 पृष्ठ

गुरु भक्ति का महत्व

गुरु भक्ति का महत्व

साहिब कहते हैं

गुरुमुख शब्द सदा उर राखे । निशिदिन नाम सुधारस चाखे ॥
पिया नेह जिमि कामिनि लागे । तिमि गुरु रूप शिष्य अनुरागे ॥
पल पल निरखे गुरुमुख कांति । शिष्य चकोर गुरु शशि शांति ॥
पतिव्रता ज्यों पतिव्रत ठाने । द्वितीय पुरुष सपने नहिं जाने ॥
पतिव्रता दोउ कुलहिं उजागर । यह गुण गहे संत मति आगर ॥
ज्यों पतिव्रता पिया मन लावे । गुरु आज्ञा अस शिष्य जुगावे ॥
गुरु ते अधिक और कोई नाहिं । धर्मदास परखहु हिय माहीं ॥
गुरु ते अधिक कोई नहिं दूजा । भर्म तजै करि सतगुरु पूजा ॥
तीर्थ धाम देवल अरु देवा । शीश अर्पि जो लावैं सेवा ॥
तौ नहिं वचन कहें हितकारी । भूले भरमें यह संसारी ॥

साहिब कहते हैं कि नाम रूपी रस का पान करते हुए गुरु के शब्दों को ही हृदय में धारण किये रखो। चंद चकोर की प्रीत की तरह गुरु के मुख को निहारते रहो। जिस प्रकार पतिव्रता स्त्री सपने में भी किसी दूसरे पुरुष की तरफ नहीं जाती, ऐसे ही गुरु के प्रति भाव रखो, गुरु आज्ञा में ही हर समय रहो, गुरु से अधिक किसी को नहीं मानो, सब भ्रम के जाल तोड़ कर केवल गुरु की मूर्ति का ही ध्यान करो। जो संसारी लोग हैं, वे तीर्थ, धाम, देव-पूजा आदि में भूले हुए हैं, पर तुम ऐसा मत करो।

गुरु भक्ति अटल अमान धर्मनि, यहि सरस दूजा नहीं।
जप योग तप व्रत दान पूजा, तृण सदृश यह जग कहीं।।

साहिब कहते हैं कि गुरु भक्ति सर्वोपरि है, उसके समान दूसरी कोई भक्ति नहीं। जप, योग, तप, व्रत, दान आदि उसके आगे तिनके के समान हैं।

शुकदेव भये गरभ योगेश्वर । उन समान नहिं थाप्यो दूसर ॥

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अनुरागसागर वाणी

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तजके तेज गये हरि धामा। गुरु बिन नहिं लहे विश्रामा॥
विष्णु कहे ऋषि कहँवा आये। गुरुबिहीन तप तेज भुलोये॥
गुरु बिहीन नर मोहि न भावे। फिर-2 जो इन सकट आवे॥
जाहु पलट करहु गुरु सयाना। तब पैरो यहँवा अस्थाना॥
सुनि मुनि शुक्देव वेगि सिधाये। गुरु बिहीन तहँ रहन न पाये॥
जनक बिदेह कीन्ह गुरु जानी। हरषि मिले तब सांगपानी॥
नारद ब्रह्मा सुत बड़ ज्ञानी, यह सब कथा जगत में जानी॥
और देव ऋषि मुनिवर जेते। जिनगुरु कीन्ह उतर सो तेते॥
जो गुरु मिले तो पंथ बतावे। सार असार परख दिखलावे॥
गुरु सोई जो सत्य बतावे। और गुरु कोइ काम ना आवे॥
सत्य पुरुष के कहे संदेशा। जन्म जन्म का मिटै अंदेशा॥
पाप पुन्य की आशा पाहीं। बैठै अक्षय वृक्ष की छाहीं॥
भुंङ्गी मत होवे जिहि पास। सोई गुरु सत्य सुनि धर्मदासा॥

महायोगेश्वर शुक्देव गुरु के बिना भक्ति कर रहा था तो नहीं पहुँच पाया था। विष्णु जी ने वापिस किया था, कहा कि गुरु के बिना इंसान मुझे अच्छा नहीं लगता। तब शुक्देव ने राजा जनक को गुरु किया था और जगह मिली थी। फिर ब्रह्मा का बेटा नारद तो इस अभिमान में था कि मुझे गुरु की आवश्यकता नहीं है। पर विष्णु जी ने उसे भी गुरु करने को कहा था, जो सब जानते हैं। जब सच्चे गुरु मिलते हैं, तभी सही राह मिलती है। जो गुरु सत्य पुरुष का संदेश देने वाला हो, वही सच्चा हो सकता है, और कोई नहीं। ऐसा गुरु ही जन्म-मरण के चक्कर से छुड़ाकर अमर लोक ले जा सकता है। हे धर्मदास! जिस गुरु के पास भूंगे की तरह अपना शब्द सुनाकर शिष्य को अपनी तरह करने की शक्ति हो वही सत्य गुरु है।