सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished144 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ

अनुरागसागर वाणी

1

श्री सद्गुरु वे नमः

अनुरागसागर वाणी

चलो चलो सब कोठ कहै, मोहि अंदेशा और।
साहिब से परिचय नहीं, जायेंगे किस ठौर ॥

-स्वामी मधु परमहंस जी

साहिब बन्दगी

सन्त आश्रम रंजड़ी, पोस्ट राया, ज़िला जम्मू

2

साहिब बन्दगी

अनुरागसागर वाणी

—स्वामी मधु परमहंस जी

प्रचार अधिकारी

—राम रतन जम्मू

© SANT ASHRAM RANJARI (JAMMU)
ALL RIGHTS RESERVED

प्रथम संस्करण – नवम्बर 2006
प्रतियाँ – 5000

Website Address.

www.sahib-bandgi.org

E-Mail Address.

*[email protected]

*[email protected]

प्रकाशक

साहिब बन्दगी सन्त आश्रम रॉजड़ी

पोस्ट राया, तहसील साम्बा

ज़िला—जम्मू

Ph. (01923) 242695, 242602


मुद्रक : सरताज प्रिंटिंग प्रेस, जालन्धर शहर।

अनुरागसागर वाणी

3

अनुरागसागर वाणी

विषय सूचीपृष्ठ संख्या
सतगुरु वंदना7
शब्द के प्रेमी8
अंत समय का मीत11
मृतक होय सो साधु12
गुरु कृपा से साधु कहावै18
सृष्टि उत्पत्ति से पहले का रहस्य21
सोलह सुत की उत्पत्ति25
काल निरंजन कीनहीं तपस्या27
निरंजन का पुनः तप32
त्रिदेव की उत्पत्ति41
निरंजन मन बनकर गुप्त हुआ43
त्रिदेवों ने किया समुद्र मंथन44
ब्रह्मा को दिया वेद ने रहस्य48
ब्रह्मा गये आकाश में52
नहीं पहुँच पाए विष्णु53
ब्रह्मा को लेकर आद्य शक्ति व्याकुल हुई55
ब्रह्मा को लाने चली गायत्री57
शाप से ग्रसित हुए सब65
विष्णु को हुए पिता के दर्शन69
धर्मदास का संशय70
विष्णु बने ठाकुर72
चौरासी लाख योनियाँ बनीं74
चार खानि के तत्व भेद75
ज्ञान विभिन्नता का कारण77
विभिन्न योनियों से मानव तन में आए हुएओं की पहचान78

4

साहिब बन्दगी

चौरासी की धारा क्यों बनी?82
रक्षक की कला दिखा अंत में जीवों को खा जाता है निरंजन84
जीवों को कष्ट दिये निरंजन ने86
अमर लोक से साहिब चले87
निरंजन ने की साहिब से बहस88
क्रोधित निरंजन साहिब पर झपटा और97
असली रूप में आए साहिब
निरंजन अधीन हुआ98
साहिब आए संसार में101
गुप्त वस्तु है नाम103
गुरु भक्ति का महत्व104
सतयुग में आए साहिब106
राम नाम का रहस्य109
सतयुग के हंस110
त्रेतायुग में साहिब का आगमन112
द्वापार में आए साहिब117
साहिब और धर्मदास131

000000__000000

अनुरागसागर वाणी

5

दो शब्द

भाईयो ! यह संसार काल पुरुष का देश है, मन का देश है । साहिब से पहले जितने भी पीर, पैगम्बर, ऋषि, मुनि आदि आए, सबने भूलवश काल को ही परमात्मा मान उसकी भक्ति की, इसलिए मन की दुनिया में ही रह गये । आज के महात्माओं को भी परम पुरुष की भक्ति का रहस्य मालूम नहीं है, इसलिए वे अपने साथ-2 अपने शिष्यों की नैया भी डुबा रहे हैं । वाणी तो सभी कबीर साहिब की ले रहे हैं, पर कुल मिलाकर भक्ति काल पुरुष की ही कर रहे हैं । कुछ ऐसे ही सत्य लोक की बात कर रहे हैं, पर वास्तव में ना तो उनके पास सच्चा नाम ही है और ना वो वहाँ पहुँचे हुए हैं । वे भी मन के ही दास हैं, इसलिए आ-जाकर सगुण-निर्गुण में ही अटक रहे हैं । यह मन बड़ा ही जालिम है, जिसने बड़े-बड़े महात्माओं को भी अपने जाल में फँसा रखा है । वास्तव में यह उनके माध्यम से जीवों को भ्रमित कर रहा है । इसलिए सब नकली नाम का व्यापार कर रहे हैं ।

संतो यह मन है बड़ा जालिम ॥

मन कारण की इनकी छाया, तेहि छाया में अटके ।
निरगुण सरगुण मन की बाजी, खरे सयाने भटके ॥
मनहीं चौदह लोक बनाया, पाँच तत्व गुण कीन्है ।
तीन लोक जीवन वश कीन्है, परे न काहू चीन्है ॥
जो कोठ कहै हम मन को मारा, जाकै रूप न रेखा ।
छिन छिन में कितने रँग बदले, जे सपनेहुँ न देखा ॥
रासातल यकईश ब्रह्मण्डा, सब पर अदल चलावै ।
षट रस में भोगी मन राजा, सो कैसे के पावै ॥
सबके ऊपर नाम निरक्षर तहाँ लै मन को राखै ।
तब मन की गति जानि परै, यह सत्य कबीर मुख भाखै ॥

संसार से अलग ?

हमारा पंथ भक्ति जगत में वैज्ञानिक तरीके से क्रांति लाया है। सबसे पहले पाँच बातें पूरे संसार को अलग बता रहें हैं। * ये काल का देश है। यहाँ निरंजन का राज्य है * योगेश्वर इस स्थान तक बहुत मुश्किल से जाते हैं। ये चौदहवा लोक है। * इसी को वेदों ने निराकार, निरंकार, निरंजन, पार ब्रह्मा आदि नामों से पुकारा है। गण, गंधर्व, सिद्ध, साधक, ऋषि मुनि, पीर पैगम्बर आदि यहाँ तक गये।

  • इसके आगे महा शून्य है, यहाँ कोई वस्तु नहीं है। इसके नाम अचिन्त लोक, सोहंग लोक, मूल सुरति लोक, अंकुर लोक, इच्छा लोक, वाणी लोक और सहज लोक हैं यह समस्त लोक महा शून्य में हैं। सहज अंश तक जो भी सृष्टि है इसका परम नाश है।

सहज पुरुष तक जेतक भाखा, यह रचना परलै ते राखा ॥
आगे अछय लोक है भाई, आदि पुरुष यहाँ आप रहाई ॥

  • इसके ऊपर अमरधाम परम पुरुष का लोक है। यहाँ कभी भी परलय नहीं है।

जहवां से हंसा आया, अमर है वो लोकवा ॥
तहाँ नहीं परले की छाया, नहीं तहाँ कछु मोह और माया ॥
ज्ञान ध्यान को तहाँ न लेखा, पाप पुण्य तहंवा नहीं देखा ॥
पवन न पानी पुरुष न नारी, हद अनहद तहं नाहिं विचारी ॥

यहीं से साहिब आत्माओं के कल्याण के लिए आते हैं।