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अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished144 पृष्ठ

विभिन्न योनियों से मानव तन में आए हुएओं की पहचान

विभिन्न योनियों से मानव तन में आए

हुओं की पहचान

प्रथम अंडज की कहीं मैं बानी। एकहि एक कहो बिलछानी ॥
आलस निद्रा ता कहँ होइ। काम क्रोध दरिद्री सोइ ॥
चोरी चुगली निंदा ठाने। ज्ञान ध्यान कछु मनहिं न आनै ॥
गुरु सतगुरु चीन्हें नहिं भाई। वेद शास्त्र सब देइ उठाई ॥
आपन नीच ऊँच मन होई। हम सम दूसर और ना कोई ॥
मैंले बस्तर नहीं नहाई। आँख कीच मुख लार बहाई ॥
पाँसा जुवा चित्त मन आने। गुरु चरनन निसि नहिं जाने ॥
कुबरा मूढ़ ताहि का होई। लम्बा होय पाव पुनि सोई ॥

साहिब कह रहे हैं कि जो अंडज खानि से मानव तन में आए हैं, उनकी पहचान बताता हूँ। उनमें निद्रा होती है, काम, क्रोध, से ग्रस्त होते हैं, दरिद्री होते हैं, चोरी, चुगली, परायी निंदा आदि ही उनका काम होता है, दूसरों के घर में आग लगाते हैं। सबसे बहस करते हैं, पर कुछ भी ज्ञान, ध्यान उनमें नहीं होता। गुरु-सतगुरु की पहचान उन्हें नहीं होती, वेद-शास्त्रों का कुछ पता नहीं होता, तुच्छ होते हुए भी खुद को बड़ा समझते हैं, मैंले कपड़े पहने रखते हैं, आँखों से कीच और मुँह से लार टपकती रहती है, जुए में मस्त रहते हैं, सिर उनका कुबड़ा और पाँव लम्बे होते हैं।

कहेँ कबीर सुनो धर्मदासा। ऊष्मज भेद कहैं परकासा ॥
जाइ शिकार जीव बहु मारे। बहुत आनंद होय तिमि वारे ॥
मार जीव जब घर कहँ आयी। बहु विधि रांध ताहि कहँ खाई ॥
निंदे शब्द और गुरु देवा। निंदे चौका नरियर भेवा ॥

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झूठे वचन सभा में कहई। टेढ़ी पाग छोर उरमई ॥
दया धरम मनहीं नहिं आवे। करें पुण्य तेहि हाँसी लावे ॥
भाला तिलक अरु चंदन करई। हाट बजार चिकन पट फिरई ॥
अन्तर पापी ऊपर दया। सो जिव यम के हाथ बिकाया ॥
लंब दाँत अरु वदन भयावन। पीरे नेत्र ऊँच अति पावन ॥

उकमज खानि से मानव तन में जो आए होते हैं, उन्हें शिकार खेलने में बड़ा आनन्द आता है। शिकार मारकर लाते हैं, और बड़े यत्न से पकाकर खाते हैं। गुरु और उनके नाम की निंदा करते हैं, झूठ बोलते हैं, टेढ़ी पगड़ी पहनते हैं, जिसका छोर लम्बा लटकता रहता है, उनके हृदय में दया-धर्म कुछ भी नहीं होता और दूसरों को पुण्य कर्म करते देख उनकी हँसी उड़ाते हैं। खुद माथे पर तिलक और चन्दन लगाकर बाजार में मटक-2 कर चलते हैं, उनके हृदय में कपट होता है, हृदय उनका कठोर होता है और ऊपर से कोमल बनते हैं, उनके दाँत लम्बे और शरीर डरावना होता है, उनकी आँखें आगे को उभरी होती हैं।

अचल खानि को कहौँ सँदेसा। देह धरे जस होवें भेसा ॥
छनिक बुद्धि होवे जिव कैरी। पलटत बुद्धि न लागे बेरी ॥
झंगा फेटा सिर पर पागी। राज द्वार सेवा भल लागी ॥
इत उत चितवत सैन जुमारहि। पर नारी कहँ सैन बुलावहि ॥
रस सों बात कहें मुख जानी। काम बान लागे उर आनी ॥
पर घर ताकहिं चोरों जायी। लाज सर्म उपजे नहिं भाई ॥
छन इक मन महँ बिसरे देवा। छन इक मन महँ कीजे सेवा ॥
छन इक ज्ञानी पोथी बाँचा। छन इक माहिं सबन घर नाचा ॥
छन इक मन में कीजे धर्मा। छन इक मन में करे अकर्मा ॥
भोजन करत माथ खजआई। बाँह जाँघ पुनि भींजत भाई ॥

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साहिब बन्दगी

भोजन करत सोय पुनि जाई । जो जगाय तिहि मारन धाई ॥
आँखें लाल होहिं पुनि जाकी । कहैं लग भेद कहौं मैं ताकी ॥

अस्थावर खानि से मनुष्य योनि में आने वालों की बुद्धि स्थिर नहीं होती, उनका निर्णय बदलता रहता है, सिर पर पगड़ी बाँधे रहते हैं, सरकारी नौकरी करते हैं, दूसरे की स्त्री की तरफ नज़र रखते हैं, इशारे से बुलाते हैं, कामुक बातें करते हैं और चोरों की तरह दूसरों के घर में घुसते हैं, यदि पकड़ लिए जाते हैं तो भी कोई शर्म नहीं होती, हँसते रहते हैं, एक क्षण में तो अपने ईष्ट को भूल जाते हैं और दूसरे ही क्षण उनकी सेवा करने लग जाते हैं, एक क्षण में तो पोथियाँ पढ़ने लगते हैं और दूसरे ही क्षण सबके घर में मौका मिलने पर नाचने लग जाते हैं, एक पल में तो शूरवीर हो जाते हैं और दूसरे ही पल कायर हो जाते हैं, एक पल तो अच्छे हो कर्म करने लगते हैं और दूसरे ही पल कुकर्मों में लग जाते हैं। भोजन करते हुए अपना माथा खुजलाते हैं, बाँह और जाँघ मलते हैं, भोजन के बाद सो जाते हैं और यदि कोई जगाए तो उसे मारने दौड़ते हैं, उनकी आँखें लाल होती हैं, उनका भेद कहाँ तक कहा जाए!

पिंडज खानिक लच्छ सुनाऊँ । गुन औगुन का भेद बताऊँ ॥
बैरागी उनमुनि मति धारी । करे धर्म पुनि वेद विचारी ॥
तीरथ औ पुनि योग समाधि । गुरु के चरण चित्त भल बाँधी ॥
वेद पुराण कथे बहु ज्ञाना । सभा बैठि बातें भल ठाना ॥
राज भोग कामिनि सुख माने । मन शंका कबहुँ नहिं आने ॥
उत्तम भोजन बहुत सुहाई । लौंग सुपारी बीरा खाई ॥
चच्छु तेज जाकर पुनि जानी । पराक्रम देही बल ठानी ॥
देखो स्वर्ग सदा तेहि हाथा । देखे प्रतिमा नावे माथा ॥

पिंडज खानि से मानव तन में आने वालों में वैराग्य होता है, वे वेद के अनुसार धर्म कार्य करते हैं, तीर्थ, योग आदि करते हैं और गुरु से प्रेम

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करते हैं, वेद, पुराण पढ़कर ज्ञान चर्चा करते हैं, राज भोग और स्त्री से प्रसन्न रहते हैं, मन में शंका नहीं आने देते हैं, उत्तम भोजन अच्छा लगता है, उनकी आँखों में तेज होता है, देह में पराक्रम होता है, स्वर्ग तो उनके हाथ ही होता है यानी अपने कर्मों से वे स्वर्ग तो हासिल कर ही लेते हैं।

छूटे नर की देह, जन्म धरे फिर आय के ॥

ताको कहैं संदेश, धर्मदास सुन कान दे ॥

साहिब कहते हैं कि जो मानव शरीर छोड़कर पुनः मानव तन पाता है, अब उसकी पहचान बताता हूँ।

आइ अछत जो नर मर जाई। जन्म धरे मानुस को आई ॥

सूरा होवे नर के माँहीं। भय डर ताके निकट न जाहीं ॥

माया मोह ममता नहिं व्यापे। दुश्मन ताहिं देख डर काँपे ॥

सत्य शब्द प्रतीत कर माने। निंदा रूप न कबहीं जाने ॥

सतगुरु चरण सदा चित राखे। प्रेम प्रीति सो दीनन भाखे ॥

ज्ञान अज्ञान दोइ कहैं बूझे। सत्य नाम परिचय नित सूझे ॥

जो मानुस अस लछन होई। धर्मदास लिख राखो सोई ॥

जो कुछ मानव तन पाने के बाद जल्दी शरीर छोड़ देते हैं, अपनी पूरी आयु से पहले शरीर त्याग देते हैं, वे वीर पुरुष होते हैं, उनके पास भय नाम की कोई वस्तु टिकती भी नहीं, उन्हें माया, मोह, ममता आदि भी नहीं सताती और उनके दुश्मन भी उनसे डरते हैं। वे सत्य शब्दों को प्रेम पूर्वक मान लेते हैं और दूसरों की निंदा नहीं करते। वे गुरु चरणों में चित लगाए रखते हैं, सत्य नाम को पहचान लेते हैं। ऐसे लक्षण जिनमें होते हैं, वे मानुष से मानुष तन में अपनी छूटी हुई आयु पूरी करने आए होते हैं।