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अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished144 पृष्ठ

धर्मदास का संशय

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साहिब बन्दगी

साहिब ने कहा-हे धर्मदास ! मैं तुम्हें नारी स्वभाव बताता हूँ। जब पुत्री घर में होती है तो बड़े यत्न से उसे प्रसन्न, संतुष्ट किया जाता है, पर जब वो पति के घर चली जाती है तो उसी में खो जाती है, उसी से प्रेम करने लगती है, तब माता-पिता को भूल जाती है। ऐसे ही अद्या ने भी किया; वो बेगानी हो गयी, इसी कारण उसने विष्णु को भी काल का रूप ही दिखलाया।

काल निरंजन

चकिया सब रागन की रानी ॥

एक पाट धरती चले, एक चले असमानी।

काल निरंजन पीसन लागे सवालाख की घानी ॥

बड़े २ इस जगमें पिस गये, पिसे गये योगी जिंदा।

छप्पन कोटि यादवा पिस गये, परे काल के फंदा ॥

नौ भी पिस गये दस भी पिस गये, पिस गये सहस अठासी।

कथनी कथ कथ पिस गये भक्ता भये, गर्भ के वासी ॥

नौऊनाथ चौरासी पिस गये, बूढ़ा सुत अट्टासी।

मौनी औ सन्यासी पिस गये, परे काल की फांसी ॥

जंगम और सेबड़ा पिस गये, रावण कंसा।

कहें कबीर सुनो भाई साधो, बचे विवेकी संता ॥

विष्णु बने ठाकुर

धर्मदास ने पूछा

हे साहब यह जान्यो भेदा। अब आगे का करहु उछेदा ॥

कहा कि अब आगे का भेद समझाकर कहें।

साहिब ने कहा

पुनि माता कहि विष्णु दुलारा। मरदयो मान जेठनिजबारा ॥

अहो बिस्नु तुम लेहु असीसा। सब देवन में तुमही ईसा ॥

प्रथम पुत्र ब्रह्मा दुरि गयऊ। अकरम झूठ ताहि प्रिय भयऊ ॥

देवन श्रेष्ठ तुमहिं कहैं मानहिं। तुम्हरी पूजा सब कोइ ठानहिं ॥

माता ने विष्णु को आशीर्वाद दिया कि तुम सब देवताओं में श्रेष्ठ होंगे, क्योंकि बड़े पुत्र ब्रह्मा ने झूठ और कुकर्म जैसे पाप किये, इसलिए अब सब तुम्हारी ही पूजा करेंगे।

रूद्र पास गयी तब माता। तुम शिव कहो हृदय की बाता ॥

माँगहु जो तुम्हरे चित भावे। सो तोहि देऊँ मात फरमावे ॥

अद्या ने फिर शिवजी से पूछा कि तुम क्या चाहते हो, माँग लो।

जोरि पानि शिव कहबे लीन्हा। देहु जननि जो आज्ञा कीन्हा ॥

कबहुँ न बिनसे मेरी देही। हे माता माँगों बर ऐही ॥

हे जननी यह कीजै दाय। कबहु न बिनसै मेरी काया ॥

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