अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
निरंजन अधीन हुआ
निरंजन अधीन हुआ
भया अधीन दोई कर जोरी। तुम सतपुरुष सरन हम तोरी।।
प्रथम ज्ञानी हम नहीं जाना। बन्धु जान कीन्हा अभिमाना।।
तुमसो बल बुद्धि हम धारा। अब तुम करहु मोर उद्धार।।
मैं साहिब तुमको नहीं चीन्हा। सतपुरुष तुम दरसन दीन्हा।।
दोइ कर जोरि चरण चित लावा। धन्य भाग हम दरसन पावा।।
तब निरंजन अधीन हुआ और दोनों हाथ जोड़कर कहा कि मैं आपकी शरण में हूँ, आप तो स्वयं सत्पुरुष हैं, मैंने भाई जानकर आपसे युद्ध किया, आपको पहचाना नहीं, आपसे ही बल और बुद्धि का प्रयोग किया, इसलिए क्षमा करें। मेरा बड़ा भाग्य है कि आपने आज मुझे दर्शन दिये।
साहिब ने कहा
सुन रे काल निरंजन राई। पुरुष नाम जो बीरा पाई।।
ताको खूँट गहो मत लाई। सो हँसा मेरे लोकहि आई।।
साहिब ने कहा कि हे निरंजन! जिसे नाम मिल जाएगा, उसे तुम नहीं पकड़ोगे, वो मेरे देश में आएगा।
निरंजन ने कहा
सुनो गुसाई विनती मोरी। नाम पाय करै कछु औरी।।
ज्ञान कथै अनत चित वासा। आवागमन की राखै आसा।।
निरंजन ने कहा कि जो नाम पाकर गलत चलें, नियमों का पालन न करें, आवागमन की इच्छा रखें, उनका क्या होगा, क्या वे भी पार होंगे!
साहिब ने कहा
सुनो निरंजन बचन हमारा। नहीं सत्त वह जीव तुम्हारा।।
तब साहिब ने वहाँ निरंजन से करार किया कि नहीं, उसे तुम ले जाना, वो जीव तुम्हारा हो जाएगा।
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अनुरागसागर वाणी
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निरंजन ने कहा
दयावन्त तुम साहिब दाता । एतिक कृपा करो हो ताता ।
पुरुष शाप सो कहैं अस दीन्हा । लच्छ जीव नित ग्रासन कीन्हा ॥
तुमहू कृपा मो पर करहू । माँगो सो वर मुहि उच्चरहू ॥
सतयुग त्रेता द्वापर माहीं । तीनहु युग शरण जीव थोरे जाहीं ॥
चौथा युग जब कलियुग आवे । तब तुव शरण जीव बहु जावे ॥
ऐसा वचन हार मुहिं दीजे । तब संसार गवन तुम कीजे ॥
निरंजन ने कहा कि एक कृपा करो, परम पुरुष ने मुझे एक लाख जीव रोज खाने का शाप दिया है, इसलिए मुझे कृप्या एक वर दो कि सतयुग, त्रेता और द्वापर युग में आप थोड़े-2 जीव ही ले जायेंगे और जब कलियुग आयेगा तो बहुत सारे जीव ले जाना।
साहिब ने कहा
अरे काल परपंच पसारा । तीनों युग जीवन दुख डारा ॥
विनती तोरि लीन्ह मैं जानी । मो कहैं ठग काल अभिमानी ॥
जस विनती तू मोसन कीन्ही । सो अब बकसि तोहि कहैं दीही ॥
चौथा युग जब कलियुग आये । तब हम आपन अंश पठाये ॥
साहिब ने कहा कि तूने षड्यन्त्र रचकर तीन युग जीवों के लिए दुखदायी कर दिये, पर तुमने विनती की, इसलिए मैंने तुम्हें माफ़ कर तुम्हारी विनती मान ली, पर जब कलियुग आयेगा, तो मैं अपने अंश भेजूँगा।
अंश ब्यालिस पुरुष के, जीव कारण आवई ।
कलि पंथ प्रगट पसारि के, वे जीव लोक पठावई ॥
कहा- परम पुरुष के ब्यालिस अंश जीवों के कल्याण हेतु आयेंगे और अपना पंथ चलाकर जीवों को अमर लोक ले जायेंगे।
निरंजन ने कहा
वचन तुम्हार लीन्ह मैं मानी । विनती एक करों तुहि ज्ञानी ॥
पंथ एक तुम आप चलाऊ । जीव लै सत लोक पठाऊ ॥
द्वादस पंथ करों मैं साजा । नाम तुम्हार ले करों अवाज़ा ॥
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साहिब बन्दगी
द्वादश यम संसार पठैहों। नाम तुम्हार पंथ चलैहों ॥
प्रथम दूत प्रगटे मम जायी। पीछे अंश तुम्हारा आयी ॥
द्वादश पंथ जीव जो ऐहैं। सो हमरे मुख आन समैहैं ॥
निरंजन ने कहा कि आपका कहा मैंने मान लिया, पर एक विनती है कि आप अपना एक पंथ चलाकर जीवों को अमर लोक ले जाना और मैं अपने 12 पंथ चलाकर जीवों को भटकाऊंगा। 12 यम मैं संसार में भेजूंगा, वे आपका नाम लेकर मेरा पंथ चलायेंगे और जो जीव उन पंथों में आ जायेंगे, वे मेरे मुख में ही समायेंगे यानी उन्हें मैं खा जाऊंगा।
साहिब ने कहा
धर्म जस तुम माँगहु सो, चरित्र हम भल चीन्हिया ॥
पंथ द्वादश तुम कहै उसो, अमी घोर विष दीन्हिया ॥
जो मेटि डारों तोहि को अब, पलटि कला दिखावऊँ ॥
लै जीवबंद छुड़ाय यमसो, अमर लोक सिधावऊँ ॥
पुरुष वचन अस नाहिं, यहै सोच चित कीन्है ॥
लै पहुँचावहुँ ताहि, सत्य शब्द जो दृढ़ गहे ॥
साहिब ने कहा कि मैंने तुम्हारी चालाकी जान ली है, जो तुम माँग रहे हो। अपने 12 पंथ चलाकर अमृत में विष घोल देना चाहते हो। यदि तुमने अब कोई खेल दिखाया तो तुम्हें मिटा दूँगा और सब जीवों को छुड़ाकर अमर लोक ले जाऊंगा, पर अफसोस! परम पुरुष की ऐसी आज्ञा नहीं है, इसलिए जो जीव मेरे नाम को दृढ़ता से पकड़े रहेंगे, उन्हें ही मैं अमर लोक ले जाऊंगा।
निरंजन ने कहा
कहे धर्म जाओ संसारा। आनहु जीव नाम अधारा ॥
जो कोई जैहैं शरण तुम्हारा। हम सिर पग दै होवे पारा ॥
निरंजन ने कहा कि ठीक है, अब संसार में जाओ और जीवों को नाम के सहारे ले जाओ, जो कोई आपकी शरण में आयेगा, वो मेरे शीश पर पैर रखकर पार हो जायेगा।