अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
सतयुग में आए साहिब
सतयुग में आए साहिब
धर्मदास जो पूछयो मोहिं । युग-2 कथा कहौं मैं तोहि ॥
कहैं कबीर सुन धर्मन नागर । सतयुग हम आयेऊँ भौसागर ॥
धर्मदास जी द्वारा पूछने पर साहिब ने युग-2 की कथा का वर्णन किया, कहा कि मैं हर युग में संसार में आया। सबसे पहले मैं सतयुग में आया।
आया चतुरानन के पास। तासों कीन्ह शब्द परकाशा ॥
ब्रह्मा चित दै सुनने लीन्हा। पूछयो बहुत पुरुष को चीन्हा ॥
तबहि निरंजन कीन्ह उपाई। जेठ पुत्र ब्रह्मा मोर जाई ॥
निरंजन मन घट विराजै। ब्रह्मा बुद्धि फेर उपराजै ॥
साहिब कह रहे हैं कि सतयुग में सबसे पहले मैं ब्रह्मा के पास आया और उसे परम पुरुष की बात समझायी। ब्रह्मा ध्यान से सुनने लगा, परम पुरुष का भेद पूछने लगा। इतने में निरंजन ने देखा कि मेरा बड़ा पुत्र ब्रह्मा तो मेरे शिर्कंजे से जा रहा है, उसने ब्रह्मा के अन्दर बैठ उसकी बुद्धि पलट दी।
ब्रह्मा ने कहा
निराकार निर्गुण अविनाशी। ज्योति स्वरूप शून्य का वासी ॥
ताहि पुरुष कहैं वेद बखाने। आज्ञा वेद ताही हम जाने ॥
ब्रह्मा ने कहा कि वेद से हमने जाना है कि परमात्मा निराकार है, निर्गुण है, ज्योति स्वरूप है और वो शून्य में रहता है।
जब देखा तेहि काल भटकाओ। तहाँ ते उठ विष्णु पहुँ आयो ॥
विष्णुहि कहौ पुरुष उपदेशो। कालवश नहिं गहो सँदेशो ॥
तब साहिब ने देखा कि ब्रह्मा की बुद्धि तो काल ने पलट दी है, तब वे विष्णु के पास आए, विष्णु से परम पुरुष का भेद कहा, पर कालवश उसने भी साहिब का सँदेश नहीं पकड़ा।
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अनुरागसागर वाणी
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विष्णु ने कहा
कहे विष्णु मोसम को आही । चार पदार्थ हमरे पाही ॥
काम मोक्ष धर्मारथ माही । चाहे जौन देउँ मैं ताही ॥
विष्णु ने कहा कि मेरे समान कौन है ! कहा-मेरे पास धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष-चारों पदार्थ हैं, इनमें से तुम्हें जो चाहिए, मैं दे सकता हूँ।
साहिब ने कहा
सुनहु सो विष्णु मोक्ष कस तोही । मोक्ष अक्षर परले तर होही ॥
तुम नाहीं थिर थिर कस करहु । मिथ्या साखि कवण गुण भरहु ॥
रहे सकुच सुन निरभय बानी । निज हिय विस्नु आप डर मानी ॥
साहिब ने कहा कि तुम्हारे पास जो मोक्ष है, वो तो प्रलय तक रहेगा। तुम खुद ही स्थिर नहीं हो, फिर दूसरों को स्थिर कैसे करोगे ! यह सुन विष्णु जी मौन हुए।
तब पुनि नाग लोक चलि गयऊ । तासे कछु-2 कहिबे लयऊ ॥
पुरुष भेद कोइ जानत नाहीं । लागे सबहिं काल की छाहीं ॥
राखनहार कहँ चीन्हो भाई । यम सो को तुहिं लेइ छुड़ाई ॥
साहिब कहते हैं कि तब मैं नाग लोक चला और थोड़ी -2 बात परम पुरुष की करते हुए कहा कि उसका भेद कोई नहीं जानता है, सभी काल के पीछे लगे हुए हैं, इसलिए रक्षक को पहचानो, जो तुम्हें यम से छुड़ा ले।
ब्रह्मा विष्णु रुद्र जिहि ध्यावैं । वेद जासु गुण निशि दिन गावैं ॥
सोइ पुरुष महिं राखनहारा । का करिहैं यमराज बिचारा ॥
शेषनाग ने कहा कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव जिसका ध्यान करते हैं और जिसके गुणों का गान वेद भी दिन-रात करते हैं, वही मेरा रक्षक है, बेचारा यमराज क्या करेगा !
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साहिब बन्दगी
जाहि कहहु तुम राखनहार। सो तुमहिं लै करहि अहारा ॥
राखनहार और कोउ आही। करु विश्वास मिलाऊँ ताही ॥
साहिब ने कहा कि जिसे तुम रक्षक कह रहे हो, वो तो तुम्हें खा जायेगा; वो भक्षक है; रक्षक कोई ओर है; यदि तुम विश्वास करो तो मैं तुम्हें उससे मिला दूँगा।
शेषनाग विष तेज सुभाऊ। वचन प्रतीत हृदय नहिं आऊ ॥
सुनहु सुलच्छन धर्मन नागर। तब आयो मैं या भवसागर ॥
आये जब मृत्यु मण्डल माहीं। जीव पुरुष कोइ देख्यो नाहीं ॥
का कहैं कहियो पुरुष उपदेश। सो तो अधिक यम को भेषा ॥
साहिब धर्मदास से कहते हैं कि विपैले स्वभाव वाले शेषनाग के हृदय में मेरे वचन सुन विश्वास नहीं हुआ, तो फिर मैं सीधा भवसागर चला आया। जब यहाँ आया तो एक भी जीव परम पुरुष की भक्ति करने वाला नहीं दिखा, मैं किसे उसका उपदेश दूँ, सब ही तो काल का भेष धारण किये हुए थे।
मैं आया संसार में, फिरा गाँव की छोर।
ऐसा बंदा ना मिला, जो लीजै फटक पछोर ॥
कहा-गाँव-2 घूमा, गली-2 घूमा, कोई भी नहीं मिला, जो मेरी बात को समझे।..... इस तरह सौ साल धरती पर रहकर साहिब बापिस गये, कोई नहीं माना। तब साहिब ने गुप्त वस्तु दी, कहा-यह देना।
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