अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
ब्रह्मा को लाने चली गायत्री
ब्रह्मा को लाने चली गायत्री
उबटि शरीर मैल गहि काढ़ी। पुत्री रूप कीन्ह रचि ठाढ़ी ॥
शक्ति अंश निज ताहि मिलावा। नाम गायत्री ताहि धरावा ॥
गायत्री मातहि सिर नावा। चरण चूम निज सीस चढ़ावा ॥
तब शक्ति ने शरीर से मैल निकालकर गायत्री नामक कन्या की उत्पत्ति की, उसमें अपना अंश मिलाया। गायत्री ने माता के चरणों में शीश नमाकर उसके चरणों को चूमा।
गायत्री ने पूछा
गायत्री विनवै कर जोरी। सुनु जननी इक विनती मोरी ॥
कौन काज मो कहँ निरमाई। कहो बचन लेउँ सीस चढ़ाई ॥
गायत्री ने माता से पूछा कि उसकी उत्पत्ति क्यों की गयी है !
कहे अद्या पुत्री सुनु बाता। ब्रह्मा आहि जेठहि तुव भ्राता ॥
पिता दरश कहँ गयो अकाशा। आनौ ताहि वचन परगासा ॥
दरश तात कर वह नहिं पावे। खोजत खोजत जनम गमावे ॥
जौने विधि ते इहँवा आई। करो जाय तुम तौन उपाई ॥
आद्य शक्ति ने कहा—हे पुत्री ! तम्हारा बड़ा भाई ब्रह्मा पिता का दर्शन करने आकाश को गया है, वो पिता का दर्शन नहीं पा सकेगा और खोजते -2 जन्म गँवा रहा है, इसलिए तुम जाओ और ऐसा उपाय करो जिससे वो यहाँ वापिस आ जाए।
चलि गायत्री मारग आई। जननी वचन प्रीति चित लाई ॥
चलत भई मारग सुकुमारी। जननी वचन ध्यान उर धारी ॥
गायत्री माता के वचनों को ध्यान से सुन हृदय में धारण कर चल पड़ी।
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साहिब बन्दगी
जाय देख्यो चतुरमुख कहैं, नाहिं पलक उधारई।
कछु क दिन सो रही तहाँवा, बहु रि युक्ति विचारई॥
कौन विधि यह जागिहैं, अब करें कौन उपाय हो।
मन गुनन सोचे बहु त विधि, ध्यान जननी लाय हो॥
गायत्री ने जाकर देखा कि ब्रह्मा ध्यान मगन हैं, आँखें बंद किये हुए है, खोलता नहीं है। उसने कुछ दिन तक तो वहीं इंतजार किया, पर जब देखा कि यह जग नहीं रहा है तो विचार किया कि इसे किस तरह जगाऊँ ! यह सोच उसने अद्या का ध्यान किया।
अद्या आयसु पाय, गायत्री तब ध्यान महँ॥
निज कर परसहु, ब्रह्मा तबही जागिहैं॥
अद्या ने कहा कि अपने हाथों से उसके चरण को छुओ, तभी वो जागेगा।
गायत्री पुनि कीन्ही तैसी। माता युक्ति बतायी जैसी॥
गायत्री तब चित्त लगाई। चरण कमल कहँ परसेउ जायी॥
गायत्री ने वैसा ही किया, उसके चरणों को स्पर्श किया।
ब्रह्मा जाग ध्यान मन डोला। व्याकुल भयो बचन तब बोला॥
कवन अहै पापिन अपराधी। कहा छुड़ायहु मोरि समाधी॥
शाप देहुँ तोकहँ मैं जानी। पिता ध्यान मोहि खंड्यो आनी॥
ब्रह्मा ध्यान से जागा और व्याकुल होकर कहा कि मैं पिता के ध्यान में था; ऐसा कौन पापी है, जिसने मेरी समाधि भंग की है, मैं उसे शाप दे दूँगा।
गायत्री ने कहा
कहि गायत्री मोहि न पापा। बूझि लेहु तब देहहु शापा॥
कहँ तोहि सो सांची बाता। तोहि लेन पठयी तुव माता॥
चलहु वैगि जनि लावहु वारे। तुम बिन रचना को बिस्तारे॥
अनुरागसागर वाणी
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ब्रह्मा ने कहा
ब्रह्मा कहे कौन विधि जाऊँ ।
पिता दरस अजहूँ नहीं पाऊँ ॥
गायत्री ने कहा
गायत्री कह दरस न पैहो ।
बेगि चलहु नहीं तो पछतैहो ॥
ब्रह्मा ने कहा
ब्रह्मा कहै देहु तुम साखी । परस्यो सीस देख मैं आँखी ॥
ऐसे कहो मातु समुझायी । तो तुम्हरे संग हम चलि जायी ॥
गायत्री ने कहा
कह गायत्री सुन श्रुत धारी । हम नहीं मिथ्या बचन उचारी ॥
जो मम स्वारथ पुरवहु भाई । तो हम मिथ्या कहब बनायी ॥
ब्रह्मा ने कहा
कह ब्रह्मा नहीं लखी कहानी ।
कहौ बुझाय प्रगट की बानी ॥
गायत्री ने कहा
कह गायत्री देहु रति मोहि ।
तो कह झूठ जिताऊँ तोहि ॥
सुन ब्रह्मा चित करे विचारा । अब का यत्न करहुँ इहि बारा ॥
ब्रह्मा ने सुनकर विचार किया कि अब क्या करूँ !
जो विमुख या कह करें, अब तो नहीं बनआवई ।
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साहिब बन्दगी
साखि तो यह देय नाहिं, जननी मोहि लजावई ॥
यहाँ नाहिं पिता पायो, भयो न एको काज हो।
पाप सोचत नहिं बने, अब करौं रति विधि साज हो ॥
कियो भोग रति रंग, विसर्यो सो मन दरश का ॥
दोउ कहैं बढू यो उमंग, छल मति बुद्धि प्रकाश किये ॥
कह ब्रह्मा चल जननी पास। तब गायत्री वचन प्रकाशा ॥
औरौ करौ युक्ति इक ठानी। दूसरी साखि लेहु उत्पानी ॥
ब्रह्मा कहे भली है बाता। करहु सोई जेहि मानै माता ॥
तब गायत्री यतन बिचारा। देह मैल गहि कीन्ह नियारा ॥
कन्या रचि निज अंश मिलावा। नाम सावित्री तासु धरावा ॥
गायत्री तिहि कह समुझावा। कहियो दरस ब्रह्मा पितु पावा ॥
कह सावित्री हम नहिं जानी। झूठी साख दै आपनि हानि ॥
यह सुन दोउ कहैं चिंता व्यापा। यह तो भयो कठिन संतापा ॥
गायत्री बहु विधि समझायी। सावित्री के मन नहिं आयी।
पुनि गायत्री कहा बुझायी। तब सावित्री बचन सुनायी ॥
ब्रह्मा कर मोसों रति साजा। तो मैं झूठ कहों यहि काजा ॥
गायत्री ब्रह्माहिं समुझावा। दै रति या कहूँ काज बनावा ॥
ब्रह्मा रति सावित्रीहिं दीन्हा। पाप मोट आपन शिर लीन्हा ॥
सावित्री कर दूसर नाऊँ। कहि पुहपावति वचन सुनाऊँ ॥
सावित्री कर दूसर नाऊँ। कहि पुहपावति वचन सुनाऊँ ॥
तीनों मिलि के चलि भे तहाँवा। कन्या आदि कुमारी जहवाँ ॥
सावित्री ने कहा कि उसे पुहुपावती नाम से पुकारा जाए। अब तीनों माता के पास आए।
अनुरागसागर वाणी
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करि प्रणाम सम्मुख रहे जाई। माता सब पूछी कुशललाई।।
कहु ब्रह्मा पितु दरसन पाये। दूसरि नारि कहाँ से लाये।।
तीनों ने माता के सम्मुख जाकर प्रणाम किया। माता ने कुशल पूछी, और कहा—हे ब्रह्मा! क्या तुमने पिता का दर्शन पाया और यह दूसरी नारी कहाँ से लाए!
ब्रह्मा ने कहा
कह ब्रह्मा दोऊ हैं साखी। परस्यो सीस देख इन आँखी।।
ब्रह्मा ने माता से कहा कि ये दोनों गवाह हैं कि मैंने पिता के दर्शन किये और उनके शीश का स्पर्श किया।
माता ने गायत्री से पूछा
तब माता बूझे अनुसारि। कछु गायत्री बचन विचारी।।
तुम देखा इन दर्शन पावा। कहो सत्य दर्शन परभावा।।
माता ने गायत्री से पूछा कि कहो, क्या ब्रह्मा ने दर्शन किये!
गायत्री ने कहा
तब गायत्री बचन सुनावा। ब्रह्मा दर्श सीस पितु पावा।।
मैं देखा इन परसेठ शीशा। ब्रह्माहि मिले देव जगदीशा।।
गायत्री ने झूठी गवाही देते हुए कहा कि ब्रह्मा ने पिता के दर्शन किये, मैंने देखा कि इसने पिता के शीश को स्पर्श भी किया।
लेइ पुहु प परसेठ सीस पितु, इन दृष्टि मैं देखत रही।।
जल ढार पुहु प चढ़ाय दीन्ह, हे जननि यह है सही।।
पुहुपते पुहुपावती भयी, प्रगट ताही ठामते।।
इनहु दरसन लह्यो पितु को, पूछहू इहि पुहु पावती।।
सबही साँच मैं तोसो कहूँ, नहिं झूठ हैं एको रती।।
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साहिब बन्दगी
गायत्री ने कहा कि मैंने देखा, ब्रह्मा ने पिता के शीश को स्पर्श कर वहाँ फूल चढ़ाया और उसी से यह पुहुपावती (पंपावती) नामक कन्या उत्पन्न हुई। यह बिलकुल सच है, मैं थोड़ा सा भी झूठ नहीं बोल रही हूँ, यदि तुम्हें यकीन न हो तो पंपावती से ही पूछ लो।
माता ने पुहुपावती से पूछा
कहु पुहुपावती मोहि, दरश कथा निरवार के ॥
यह मैं पूछों तोहि, किमि ब्रह्मा दरसन किये ॥
अद्या शक्ति ने पुहुपावती से कहा कि मैं तुमसे पूछती हूँ, बताओ क्या ब्रह्मा ने पिता के दर्शन किये?
पुहुपावती ने कहा
पुहु पावती बचन तब बोली । माता सत्य बचन नहीं डोली ॥
दर्शन सीस लह्यो चतुरानन । चढ़े सीस यह धर निश्चय मन ॥
पुहुपावती ने भी झूठी गवाही देते हुए कहा कि ब्रह्मा ने पिता के शीश को देखा।
साख सुनत अद्या अकुलानी । भा अचरज यह मर्म न जानी ॥
गवाही सुनकर शक्ति व्याकुल हुई, उसे अचरज हुआ कि यह कैसे हुआ! क्योंकि निरंजन ने तो कहा था कि वो किसी को दिखेगा नहीं। अद्या को रहस्य का पता न चला कि सब झूठ बोल रहे हैं।
काल जो कहिये अलख निरंजन, चारों वेदन गाई हो।
यह मत से सब दुनियां उरझी, पाप पुण्य भुगताई हो॥
शाप से ग्रसित हुए सब
जब तीनों ने झूठ बोला तो अद्या शक्ति चिंतित हुई, उसने ध्यान में निरंजन से पूछा—
निरंजन ने कहा
अलख निरंजन अस प्रण भाखी। मोकहँ कोउ न देखै आँखी ॥
ये तीनहुँ कस कहहिँ लबारी। अलख निरंजन कहहु सम्हारी ॥
ध्यान कीन्ह अष्टंगी तेहि छन। ध्यान माहिँ अस कहो
निरंजन ॥
आद्य शक्ति ने तब ध्यान में निरंजन से पूछा कि क्या इन्होंने तुम्हारा दर्शन किया! निरंजन ने भी ध्यान में कहा कि ये झूठ बोल रहे हैं, मुझे किसी ने नहीं देखा।
ब्रह्मा मोर दरश नहिं पाया। झूठी साखि इन आय दिवाया ॥
तीनों मिथ्या कहे बनाई। जनि मानहु ये हैं लबराई ॥
निरंजन ने कहा कि ब्रह्मा ने मेरा दर्शन नहीं पाया और इनसे झूठी गवाही दिलवायी है। ये तीनों झूठ बोल रहे हैं।
माता ने तीनों को शाप दिया
यह सुनि माता कीन्हँ दापा। ब्रह्मा को तब दीन्हों शापा ॥
पूजा तोरि करै कोई नाहीं। जो मिथ्या बोलेउ मम पाहीं ॥
इक मिथ्या अरु अकरम कीन्हा। नरक मोट अपने शिर लीन्हा ॥
आगे है जो शाख तुम्हारी। मिथ्या पाप करहि बहु भारी ॥
प्रगट करहिं बहु नेम अचारा। अन्तर मैल पाप विस्तारा ॥
विष्णु भक्त सों करहिं हँकारा। ताते परि हैं नरक मँझारा ॥
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साहिब बन्दगी
कथा पुराण औरहिं समुझैहैं । चाल बिहून आपन दुख पैहैं ॥
उनसे और सुनै जो ज्ञाना । करिसो भक्ति कहौं परमाना ॥
और देव को अंश लखैहैं । औरन निन्दि काल मुख जैहैं ॥
देवन पूजा बहु विधि लैहै । दछिना कारण गला कटैहैं ॥
जा कह शिष्य करै पुनि जायी । परमारथ तिहि नाहिं लखायी ॥
परमारथ के निकट न जैहैं । स्वारथ अर्थ सबै समुझैहैं ॥
आप स्वारथी ज्ञान सुनैहैं । आपनि पूजा जगत दूढै हैं ॥
आपन पूजा जगहि दिढायी । परमारथ के निकट न जायी ॥
आप ऊँच औरहि कहै छोटा । ब्रह्मा तोर सखा होई खोटा ॥
जब लग अस कीन्ह प्रहारा ।
ब्रह्मा मूर्छित मही कर धारा ॥
माता के बचन सुन ब्रह्मा मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े ।
गायत्री जान्यो तिहि वारा । हुइ हैं तोर पंच भरतारा ॥
गायत्री तोर होई वृषभ भतारा । सात पाँच और बहुत पसारा ॥
धर औतार अखज तुम खायी । बहुत झूठ तुम बचन सुनायी ॥
निज स्वारथ तुम मिथ्या भाखी । कहा जानि यह दीन्ही साखी ॥
मानि साप गायत्री लीन्ही । सावित्रिहि तब चितवत कीन्ही ॥
आद्या शक्ति ने तब गायत्री को भी शाप दिया, कहा-गाय हो जा !
तेरे अनेक पति होंगे । जिस मुख से झूठ बोला, उसी मुख से अब विष्ठा
भी खाना । अब अद्या शक्ति ने सावित्री की ओर देखा ।
पुहु पावती निज नाम धरायेहु । मिथ्या कह निज जन्म नशायेहु ॥
सुनहु पुष्पावति तुम्हरो विश्वासा । नहिं पुजिहैं तुमसे कछु आसा ॥
होय कुगंध ठौर तब बासा । भुगतहु नरक काम गहि आसा ॥
जो तोहि सींच लगावे जानी । ताकर होय वंश की हानी ॥