अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
ब्रह्मा को दिया वेद ने रहस्य
ब्रह्मा को दिया वेद ने रहस्य
ब्रह्मा वेद पढ़ न तब लाग। पढ़ त वेद तब भा अनुरागा।।
कहे वेद पुरुष इक आही। है निराकार रूप न ताही।।
शून्य माहिं वह जोत दिखावे। चितवत देह दृष्टि नहिं आवे।।
स्वर्ग सीस पग आहि पताला। तेहि मत ब्रह्मा भी मतवाला।।
चतुरानन कहे विष्णु बुझावा। आहि पुरुष मोहिं वेद लखावा।।
पुनि ब्रह्मा शिवसों अस कहईष वेद मंथन पुरुष इक अहई।।
अहै पुरुष इक वेद बतावा। वेद कहे हम भेद न पावा।।
अब ब्रह्मा वेद पढ़ने लगा। वेद में उसने जाना कि एक पुरुष है, जो निराकार है, जिसका कोई रूप नहीं है, जो शून्य में जोत दिखाता है और पाताल तक उसके पाँव हैं। (वेद में निरंजन ने अपनी ही बात की थी, परम पुरुष का भेद नहीं दिया) यह पढ़ ब्रह्मा मतवाला होकर विष्णु के पास आया और उसे कहा कि मुझे वेद कह रहा है कि एक पुरुष है।
तब ब्रह्मा शिवजी के पास आया और उसे भी यह बात बतायी। ब्रह्मा ने कहा कि वेद का मंथन करने से पता चलता है कि एक पुरुष है, पर वेद कह रहा है कि मैं उसका भेद नहीं जान पा रहा हूँ।
तब ब्रह्मा माता पहँ आवा। करि प्रणाम तब टे के पाँवा।।
हे माता मोहि वेद लखावा। सिरजनहार और बतलावा।।
तब ब्रह्मा माता के पास आया और प्रणाम करके कहा कि वेद कह रहा है कि सृष्टि की रचना करने वाला कोई और (निराकार) है।
ब्रह्मा ने कहा
ब्रह्मा कहे जननी सुनो, कहहु कहा कंत तुम्हार है।
कीजै कृपा जनि मोहि दुरावो, कहाँ पिता हमार है।।
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ब्रह्मा ने कहा कि तुम्हारा पति कौन है, कृपा करके सच-2 कहो, छिपाओ नहीं, बताओ कि हमारा पिता कहाँ है !
शक्ति ने कहा
कहे जननि सुनो ब्रह्मा, कोउ नहीं जनक तुम्हार हो ।
हमहिते भई सबे उत्पत्ति, हमहिं सब कीन सम्हार हो ॥
माता ने कहा-हे ब्रह्मा ! तुम्हारा पिता कोई नहीं है, मुझसे ही तुम्हारी उत्पत्ति हुई है, इसलिए मैं ही तुम्हारी माता हूँ और मैं ही तुम्हारा पिता हूँ ।
ब्रह्मा ने कहा
ब्रह्मा कहे पुकार, सुनु जननि तैं चित्त दे ।
कहत वेद निरुवार, पुरुष एक सो गुप्त है ॥
ब्रह्मा ने कहा-हे माता ! ध्यान से सुनो, वाणी में आ रहा है कि एक पुरुष है, जो गुप्त है । ब्रह्मा ने दिखाया माता को ।
शक्ति ने कहा
कहे अद्या सुनु ब्रह्म कुमारा । मोसे नहीं कोउ स्रष्टा न्यारा ॥
स्वर्ग मृत्यु पाताल बनाई । सात समुद्र हम निरमाई ॥
शक्ति ने कहा कि मैं ही स्रष्टा हूँ, मैंने ही स्वर्ग, पाताल, मृत्यु आदि लोक बनाए हैं, मैंने ही समुद्र बनाया है, मेरे अलावा और कोई नहीं है ।
ब्रह्मा ने कहा
माना वचन तुमहि सब कीन्हा । प्रथम गुप्त तुम कस रख लीन्हा ॥
जबै वेद मुहि कहै बुझाई । अलख निरंजन पुरुष बताई ॥
अब तुम आप बनो करतारा । प्रथम काहे न किया बिचारा ॥
जो तुम वेद आप कथ राखा । सो कस तुम अलख निरंजन भाखा ॥
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साहिब बन्दगी
आपे आप आप निरमाई । काहे न कथन कीन तुम माई ॥
अब मोसन तुम छल जनि करहू । साँचे साँच सब कहि उच्चरहू ॥
ब्रह्मा ने कहा कि माना तुम्हीं ने सब कुछ बनाया, पर यदि ऐसा था तो पहले हमसे क्यों नहीं कहा, छिपाए क्यों रखा और जब वेद मुझसे कह रहा है कि एक पुरुष है, निरंजन है, निराकार है, दिखता नहीं है तो तुम कह रही हो कि मैं ही सब कुछ हूँ, सब कुछ मैंने ही रचा है । अच्छा, यदि तुमने ही सब कुछ रचा तो वेद के शब्द भी तुम्हारे ही होंगे, फिर उसमें अलख निरंजन की बात की ! इसलिए मुझसे छल मत करो और सच-2 कहो ।
शक्ति ने कहा
जब ब्रह्मा यहि विधि हठ ठाना । तब अद्या मन कीन्ह तिवाना ॥
केहि विधि यहि कहूँ समझाई । विधि नहि मानत मोर बड़ाई ॥
जो यहि कहौं निरंजन बाता । कैहि विधि समझे यह विख्याता ॥
प्रथम कह्यो निरंजन राई । मोर दरश काहू नहिं पाई ॥
अबै जो यही अलख लखावो । कौनी विधि ताको दिखलावों ॥
अब विचार पुनि ब्रह्मै समझावा । अलख निरंजन नहिं दरस दिखावा ॥
जब ब्रह्मा ने जिद् की तो शक्ति ने मन में विचार किया कि यह तो मुझे सृष्टा मान ही नहीं रहा है, इसे कैसे समझाऊँ ! यदि इसे निरंजन की बात कहूँ तो यह कैसे समझेगा ! क्योंकि निरंजन ने तो कहा था कि उसे कोई देख नहीं पायेगा, फिर यदि यह कहेगा कि दिखाओ तो कैसे दिखाऊँगी ! यह विचार कर शक्ति ने उससे कहा कि वो किसी को दिखता नहीं है ।
ब्रह्मा ने कहा
ब्रह्मा कहै मोहिं ठौर बतावो । आगा पीछा जनि तुम लावो ॥
मैं ना मानो तम्हरी बाता । ऐसी बात न मोहि सुहाता ॥
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प्रथम तुम मुहि दीन भुलावा । अब तुम कहो न दरस दिखावा ॥
तासु दरस न पैहो पूता । ऐसी बात कहो अजगूता ॥
ब्रह्मा ने कहा कि मैं नहीं मानूँगा, मुझे बताओ कि वो कहाँ है, क्योंकि पहले भी तुमने कहा कि नहीं है, फिर कहती हो कि दिखाई नहीं देता।
शक्ति ने कहा
कहे जननी सुनो ब्रह्मा, कहों तोसों सत्त ही ॥
सात स्वर्ग हैं माथ ताको, चरण पताल सप्त ही ॥
शक्ति ने कहा—हे ब्रह्मा! मैं तुमसे सच कहती हूँ, सात स्वर्ग तक उसका मस्तक है और सात पाताल तक उसके चरण हैं।
लेहु पुष्प तुम हाथ, जो इच्छा तिहि दरश की ।
जाय नवओ माथ, ब्रह्मा चलै शिर नाइ कै ॥
माता ने उसे फूल देते हुए कहा कि यदि तुम्हें पिता दर्शन की इच्छा है तो यह फूल लो और जाकर माथा टेकना और फूल चढ़ाना। तब ब्रह्मा फूल लेकर आकाश में पिता की खोज में चला।