अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
चौरासी की धारा क्यों बनी?
चौरासी की धारा क्यों बनीं !
धर्मदास पूछते हैं
चौरासी योनिन की धारा । किह कारण यह कीन्ह पसारा ॥
नर कारण यह सृष्टि बनाई । कै कोइ और जीव भुगताई ॥
धर्मदास जी साहिब से पूछ रहे हैं कि मनुष्य के कारण यह सृष्टि बनाई गयी, फिर दूसरी योनियाँ क्यों बनीं ! यानी चौरासी लाख योनियाँ क्यों बनाई गयीं !
साहिब ने कहा
धर्मनि नर देही सुखदायी । नर देही गुरु ज्ञान समायी ॥
नर तनु काज कीन्ह चौरासी । शब्द न गहे मूढ़ मति नाशी ॥
चौरासी की चाल न छाड़े । सत्य नाम सो नेह न माड़े ॥
लै डारे चौरासी माहीं । परचै ज्ञान जहाँ कछु नाहीं ॥
पुनि पुनि दौड़ काल मुख जाहीं । ताहू ते जिव चेतत नाहीं ॥
यह तन पाय गहे सतनामा । नाम प्रताप लहे निजधामा ॥
साहिब धर्मदास से कहते हैं कि यह मानव-चोला बड़ा ही सुखदायी है, इसी में गुरु ज्ञान समा सकता है। वास्तव में इस मानव चोले के कारण ही चौरासी बनायी गयी ताकि जीव मूर्ख रहे, सत्य शब्द को न पकड़ पाए। (क्योंकि विभिन्न योनियों से आने के कारण जीव चेतन नहीं हो पाता है, यदि लगातार मानव चोला मिलता रहे तो जीव चेतन होकर भक्ति में लग जायेंगे और संसार का कार्य नहीं चलेगा) इसलिए उसे चौरासी में डाला गया, जहाँ ज्ञान नहीं है, जहाँ आत्म-साक्षात्कार नहीं किया जा सकता। इसी कारण बार-2 जीव काल के मुख में जाता है और चेतन नहीं हो पाता है। यदि मानव तन पाकर कोई सच्चे नाम को पकड़ ले तो अमर-लोक चला जाता है।
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निह अछर है सार, अछर ते लिखि पावई ॥
धर्मनि करो विचार, निह अछर निह तत्व है ॥
साहिब धर्मदास को सार तत्व के विषय में समझाते हुए कह रहे हैं कि वो निःअक्षर है, अक्षर की सीमा से परे है, अक्षर तो लिखा जा सकता है, इसलिए हे धर्मदास! जो सार तत्व है, वो निःअक्षर है, निःतत्व है।
शब्द शब्द सब कोई कहे, वह तो शब्द विदेह।
जिभया पर आवे नहीं, निरख परख के लेह ॥