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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

८ आल्हखण्ड । ३७४
उड़ा बेंडुला त्यहि समया मा तम्बुनपास गयो असवार ६८
क्षत्री लौटे बूँदी वाले बैठे आय राज दरबार ॥
रूपन बारी को देखत खन बोला उदयसिंह सरदार ६६
कैसी गुजरी कहु बूँदी में रूपन रङ्ग विरङ्गा ज्वान ॥
इतना सुनिकै रूपन बोले भैया भलो कीन मैदान ७०
नामी ठाकुर का बारी है जान्यो सबै राजदरबार ॥
दुइ घण्टा भरि चली सिरोही द्वारे बही रक्तकी धार ७१
मातु शारदा तुम्हरी बशिमा लाला देशराज के लाल ॥
सरबर तुम्हरी का दुनिया मा दूसर नहीं आज नरपाल ७२
सुनो हकीकति अब बूँदी कै भारी लाग राजदरबार ॥
रूपन बारी की चरचा का खरचाहोनलाग त्यहिवार ७३
म्वती जवाहर दोउ पुत्रन को राजा पास लीन बैठाय ॥
कही हकीकति सब ऊदन की पुत्रन वार वार समुझाय ७४
जाति बनाफर की हीनी है अगुवाकार भये सो आय ॥
कैसे व्याहब हम बेटीका हँसि हैं जातिपांतिकेभाय ७५
लड़िकै जितिबे नहिं ऊदनते यहहू साँच दीन बतलाय ॥
धोखा दैकै लखराना का अब हम कैदलेयँ करवाय ७६
तौ तौ इज्जत हमरी रहिहै नहिं सब जैहै काम नशाय ॥
तुम अब जावो त्यहि तम्बूमा जहँ पर बैठ कनौजीराय ७७
समय आयगा अब भौरिनका इकलो लड़का देउ पठाय ॥
देश हमारे यह रीती है कहियो वारंवार समुझाय ७८
इतना सुनिकै चला जवाहर चारो नेगी संग लिवाय ॥
जहाँ कनौजी का तम्बूथा पहुँचा तहाँ जवाहरआय ७६
कही हकीकति सब राजा सों दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥

लाखनिका विवाह । ३७५

देश हमारे की रीती यह इकलो लड़का देउ पठाय ८०
नाई बारी दूनों नेगी इनको लेवें संग लिवाय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले दोउ हाथ जोरि शिरनाय ८१
ग्यारह नेगी औ सहिबाला इतने पठै देउ महराज ॥
इतना सुनिकै राजा बोले भावै करो तौन तुमकाज ८२
जो मन भावै सो करु ऊदन तुमको दीन पूर अधिकार ॥
बनि सहिबाला तब ऊदन गे नेगी बने और सरदार ८३
बैठि पालकी में लखराना अपनी लिये ढालतलवार ॥
संग जवाहर के चलि दीन्हे नेगीबने शूर सरदार ८४
आसा लीन्हे कोउ हाथेमा मुरछल कोऊ डुलावत जाय ॥
झण्डी लीन्हे कोऊ नेगी कोऊ रहे मशाल दिखाय ८५
बूँदी केरे नर नारी सब भारी भीर कीन अधिकाय ॥
रूप देखिकै लखराना का मनमें कामदेव शर्माय ८६
धरी पालकी गै फाटक पर बैठे सबै शूर सरदार ॥
यक यक भाला दुइ दुइ बरछी कम्मर परी एकेतलवार ८७
बाहर आये तब गंगाधर औ लाखनिते कह्यो सुनाय ॥
जल्दी चलिये तुम भीतर को भौंरीसमयगयो नगच्याय ८८
इतना सुनिकै ऊदन ठाकुर नेगी लीन्हे संग लिवाय ॥
भीतर पहुँचा जब मन्दिर के तहँ नहिंखम्भपरादिखराय ८६
लौटन लाग्यो जब बाहर को आये शूरवीर तब धाय ॥
मारु मारु कै हल्ला करिकै ऊदन उपर पहुँचे आय ६०
चली सिरोही तब आँगनमा हाहाकार शब्दगा छाय ॥
नेगी बनिकै जे क्षत्री गे तेसब दीन्ह्यो जूझ मचाय ६१
तेरा क्षत्री कनउजवाले बूँदी केर पाँचमै जवान ॥

१० | आल्हाखण्ड । १७६
मारे मारे तलवारिन के मचिगा घोर शोर घमसान ६१
ऊदन मारैं ज्यहि क्षत्री को सो मुहभरा तुरत गिरि जाय ॥
पास न जावै कोउ ऊदन के रणमा बढ़ा बनाफरराय ६३
कागति वरणौं तहँ लाखनि कै दूनों हाथ करै तलवार ॥
मारे मारे तलवारिन के आँगन बही रक्तकी धार ६४
मोती जवाहिर दोनों भाई आँगन खूनकीन मैदान ॥
लड़ै बहादुर भीपमवाला देवा मैनपुरी चौहान ६५
घायल ह्वैकै ग्यारह नेगी आँगन गिरे पछाराखाय ॥
लाखनि ऊदन त्यहि समयमा चालिस क्षत्री दीनगिराय ६६
तबै जवाहिर सम्मुख आवा गरई हाँक देत ललकार ॥
काह सिपाहिन का मारो तुम हमरे साथ करौ तलवार ६७
इतना सुनिकै लाखनि ऊदन सम्मुख चले तुरतही धाय ॥
आगे पीछे चौगिर्दा ते परिगे गाँस फाँसमें आय ६८
लाखनि ऊदन दोऊ ठाकुर मोती कैदलीन करवाय ॥
घैहानेगी जे आँगन में तिनहुन तुरतलीन बँधवाय ६९
लाखनि ऊदन दोउ क्षत्रिनको राजै खंदक दीनडराय ॥
यह सुधिपाई जब मालिनिने कुसुमा पास पहुँची जाय १००
हाल बतायो त्यहि बेटी को मालिनि बार बार समुझाय ॥
ब्याहन तुमका लाखनि आये राजै खन्दक दीन डराय १०१
देश देश में जब फिरि आये टीका लीन कनौजीराय ॥
ऐस मुनासिब नहिं राजाको जोअबदीन्हेनिजझमचाय १०२
गली गली में यह चरचाहै नीकिन कीन बात महराज ॥
रूप उजागर सब गुण आगर खन्दक परे तुम्हारेकाज १०३
इतना सुनिकै कुसुमा बेटी मनमें बारबार पछिताय ॥

लाखनका विवाह । ३७७ ११-
हमें न भाई यह आली है तुमते साँच दीन बतलाय १०४
बयस बराबरीकी मालिनि हौ अब गाढ़े माँ होउ सहाय ॥
राति अँधेरिया की बिरिया है खन्दक मोहिंदेइ दिखराय १०५
मोरे कारण महराजा सुत कैदी भये यहांपर आय ॥
उत्तम शय्या केरि स्ववैया खन्दकदीन बाप डरवाय १०६
मोहिं दिखावै त्यहि क्षत्री को जियरा धीरधरा ना जाय ॥
इतना सुनिकै मालिनि दौरी पलकीलाई तुरतलिआय १०७
बैठि पालकी मा दूनो फिरि खन्दक पास गई नियराय ॥
दीन अशर्फी तहँ चकरन का तिनफिरतहाँदीनपहुँचाय १०८
कुसुमा बोली तहँ लाखनि ते स्वामी बार बार बलिजायँ ॥
मोहिं अभागिनि के कारणसों तुमपरबिपतिपरीअधिकाय१०६
अब तुम निकरो यहि खन्दकते रस्ता देउँ कन्त लटकाय ॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले तुमते साँचदेयँ बतलाय ११०
जो तुम चाहौ लखराना को फौजन खबरि देउ पहुँचाय ॥
चहै सहारा जो नारी को तौ सब क्षत्रीधर्म नशाय १११
शंका लावो मन अन्तर ना महलन जाउ तड़ाका धाय ॥
खबरि पायकै आल्हा ठाकुर हमरीबिपतिविदरिहैंआय११२
कुसुमा बोली फिरि ऊदन ते क्षत्री भोजन देउँ पठाय ॥
ऊदन बोले तब कुसुमा ते यहनहिंउचितयहाँपरआय११३
चोरी चोरा कछु दैहै ना शाहंशाह कनौजीराय ॥
भोर भवरहरे मुरगा बोलत फौजन खबरिदेउ पठवाय ११४
और न चाहें कछु तुमते ये साँचे हाल दीन बतलाय ॥
इतना सुनिकै कुसुमा बेटी महलनफेरिपहुँची आय ११५
सोचत सोचत राति पारभे प्रातःकाल गयो नगणाय ॥

१२ आल्हखण्ड । ३७८
कहि समुझावा तब मालिनिको फौजन तुरतदीन पठवाय ११६
नाइनि बारिनि तेलि तँबोलिनि मालिनिधोबिनि के समुदाय ॥
साँची दूती रस ग्रन्थन में भाषा चतुरन खूब बनाय ११७
सोई मालिनि चलि बूँदी ते फौजन अटी तड़ाका धाय ॥
पता लगायो तहँ आल्हा को चँकरन तम्बूदीन बताय ११८
बेला चमेलिन के हरवा को मालिनि तुरत दीन पहिराय ॥
कह्यो सँदेशा तहँ ऊदन का मालिनि वारवार सब गाय ११९
जो सुधि पावैं बूँदी वाले हमरो पेट देयँ फरवाय ॥
भुसा भरावैं ते पेटेमा तुमकासाँच दीन बतलाय १२०
इतना सुनिकै आल्हा ठाकुर मुहरें सात दीन पकराय ॥
मालिनि चलिभै तब फौजनते बेटी पास पहुँची आय १२१
खबरिसुनाई सब जयचँद को आल्हा वार वार समुझाय ॥
तब महराजा कनउज वाला डंका तुरतदीन बजवाय १२२
हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न मे असवार ॥
झीलमबख्तर पहिरि सिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार १२३
तोपैं चढ़ि गईं सब चर्खन मा गोला तुरत दीन छुटवाय ॥
चढ़े जवाहर औ मोती दोउ तोपनआगिदीनलगवाय १२४
तोपैं छूटीं दुहुँ तरफा ते धुवना रहा सरग में छाय ॥
बड़ी दुर्दशा भै तोपन मा तबफिरिमारुवन्द है जाय १२५
गोली ओला सम वर्षत भइँ सननन सन्न सन्न सन्नाय ॥
दुनो गोल आगे का बढ़िगे सम्मुख भये समरमें आय १२६
भाला बलछी तलवारिन की लागी होन भड़ाभड़ मार ॥
मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार १२७
ना मुहँ फेरैं बूँदी वाले ना ई कनउज के सरदार ॥

लाखनिका विवाह। ३७५ १३
शूर सिपाही सम्मुख रहिगे कायरछोड़िभागि हथियार १२८
कटि कटि मूड़ गिरैं धरणीमा उठि उठि रुण्ड करें तलवार ॥
मूड़न केरे मुड़चौरा भे औरुरुडूनके लाग पहार १२६
सात कोस के तहँ गिर्दा मा कौवा गीध रहे मड़राय ॥
घैहा करहैं समरभूमि मा दैया बापू रहे मचाय १३०
हाय रुपैया बैरी द्वैगे हमरे गई प्राणपर आय ॥
सात रुपैया के कारण ते छूटे लोग कुटुम औभाय १३१
तहिले बिरिया मै संध्या कै तब फिरि मारु बन्द है जाय ॥
जीबे लायक जितने घैहा तिनकीलोथिल्रीनउठवाय १३२
दईलाख दल कनउज वाला बूँदी डेढ़लाख सरदार ॥
इतने जूझे दुहुँ तरफा ते करिकरि मारुतहाँपरयार १३३
आल्हा आये जब तम्बू मा आसनअगलगीनबिछवाय ॥
श्वास चढ़ाई फिरि ऊपर का शारदसुमिरिबनाफरराय १३४
बिनती कीन्ही भल शारद की आल्हा बार बार शिरनाय ॥
तव अवलम्बा जगदम्बा है दूसर करिहै कौन सहाय १३५
बिनती करिकै आल्हा ठाकुर सोये सेज आपनी जाय ॥
देबी शारदा महिरवाली निशिमास्वप्न दिखायो आय १३६
मलखे ब्रह्मा को बुलगाओ द्वैहै जीति बनाफरराय ॥
स्वपन देखिकै आल्हा ठाकुर प्रातःकाल उठे हर्षाय १३७
लिखिकै चिट्ठी मलखाने को धावन हाथ दीन पठवाय ॥
चढ़ा साँड़िया मा धावन तब सिरसागढ़ै पहुँवाजाय १३८
चिट्ठी दीन्ही मलखाने को धावन बार बार शिरनाय ॥
पढ़िकै चिट्ठी मलखेठाकुर औ यहबोले वचनसुनाय १३९
हम समुझावा भल ऊदन का सिरसा बसो बनाफरराय ॥

१४ आल्हाखण्ड । ३८०
कहा न माना आल्हा ऊदन खन्दकपरे लहुरवाभाय १४०
मनते हमरे यह आवति है की बूँदी का जाय वलाय ॥
जैसो कीन्हेोनि तस फलपायनि दूनोभाय बनाफरराय १४१
करैं तयारी नहिं बूँदी की तवहूं ठीक नहीं ठहराय ॥
इतना कहिकै मलखेठाकुर फौजनहुकुमदीनकरवाय १४२
करो तयारी सब बूँदी की खन्दक परा लहुरवाभाय ॥
इतना कहिकै मलखेठाकुर अपने महल पहुँचेजाय १४३
पढ़िकै चिट्ठी गजमोतिनि को मलखे हाल दीन समुझाय ॥
हम ना जैबै अब बूँदी का प्यारी साँच दीन बतलाय १४४
इतना सुनिकै प्यारी बोली दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
आजु साँकरा बघऊदन का स्वामीगाढ़े होउ सहाय १४५
बिना सहायक अब दादा को स्वामीदुःख होय अधिकाय ॥
आजु साँकरा है दादापर यहुदिनपरीरोज ना आय १४६
ब्याना सहिबे घबरानिन का होई पीर रोज अधिकार ॥
धर्म विहीनी हीनी ह्वैकै जीनो जन्मजनमधिकार १४७
धर्म न रहै जब देही मा करि है कौन्दकाहि उपकार ॥
धर्म निशाना मर्दाना है अर्जुनसकदीनोकसरदार १४८
सारथि कीन्ह्यो नारायण जे ध्रुव कृष्ण कहि दीन्ह्यो महराज ॥
बुद्धीद्वारा करि दिखलावा ताकी राखि लई सबके काज १४६
करौं किहानी जो पूरी मैं ताको सिन्ध बड़ा विस्तार ॥
सुनी किहानी जो विप्रन ते सोई कहौ सत्य भतार १५०
ह्रवै दवाई दुखदाई यह नींवी हरै अनेकन रोग ॥
जो कोउ पीवै चंगा होवै याको कैस नीक संयोग १५१
धर्म दवाइन के पीने मा स्वामिन सत्य सत्य आरोग ॥

लाखनिका विवाह । ३८१ १५
ताते जावो तुम बूँदी को होवै पूर हमारो भोग १५२
बातैं सुनिकै गजमोतिनि की मलखे धरा पीठिपर हाथ ॥
होय पियारी अस नारी जो तवहीं रहे धर्म की पाथ १५३
बड़ी पियारी निज नारी को मलखे बार बार समुझाय ॥
गये दुवारा फिरि माता घर चलिभेचरणकमलशिरनाय १५४
घोड़ी कबूतरीपर चढ़ि बैठे डंका तुरत दीन बजवाय ॥
लैके लश्कर मोहबे आये जहँ पर रहें चँदेलेराय १५५
आय सिंहासन के लगभग में ठाढ़े भये शीश को नाय ॥
आल्हा ऊदन की गाथा को मलखे गये तहाँ परगाय १५६
भयो बुलौवा हम ब्रह्माका आयसु कहामिलै महराज ॥
परम दयालू चित तुम्हरो है स्वामीपूँछि करौं मैं काज १५७
गुरु पितु भ्राता अरु त्राता तुम हमरे सदा चँदेलेराय ॥
आज्ञापावों महराजा कै तौ ऊदनका लवों छुड़ाय १५८
सुनिकै बातैं मलखाने की आयसु दीन रजापरिमाल ॥
लैके ब्रह्माको जावो तुम दूनों बहू हमारेबाल १५६
माथनाइ कै महराजा को मल्हना महल पहुँचे जाय ॥
चिट्ठी पढ़ि तँह आल्हा की मलखेदीनसकलसमुझाय १६०
विपदा सुनिकै बघऊदन कै मल्हना रोयदीन त्यहिबार ॥
हाथ पकरिकै फिरि ब्रह्माको बोली लेउ पूत तलवार १६१
क्षत्री द्वैकै समर सकावै जावै तुरत नरक के द्वार ॥
परम पियारे सुतजावो तुम हमरो पूरहोय उपकार १६२
इतना सुनिकै ब्रह्मा ठाकुर अपनी लीन ढाल तलवार ॥
बिदा मांगिकै पितु मातासों दोऊ चलत भये सरदार १६३
सजिगा घोड़ा हरनागर जो तापर ब्रह्मा भये सवार ॥

१६ आल्हखण्ड । ३८२
घोड़ी कबूतरी की पीठोपर मलखे सिरसाका सरदार १६४
बाजे डंका अहलंका के बंका चले शूर त्यहि बार ॥
शङ्का फंका करि डंका तहँ बाजे घोर शोर ललकार १६५
रहा कलङ्का नहिं देही माँ ऐसे कहत चलैं सब यार ॥
पंद्रादिनका धावा करिकै बूँदी निकट गये सरदार १६६
झील देखिकै मलखाने ने तम्बू तहाँ दीन गड़वाय ॥
लाले पीले नीले काले सबरँग ध्वजा रहे फहराय १६७
खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥
तारागण कछु चमकन लागे पक्षी चले बसेरन धाय १६८
परे आलसी खटिया तकि तकि संतन धुनी दीन परचाय ॥
भस्म लगायो सब अंगन में ध्यायो चरित पुरातन गाय १६६
शिवा रमा ब्रह्माणी पति के मनमें चरित रहे सुलगाय ॥
बड़े यशस्वी पितु अपने के दोऊचरणकमलकोध्याय १७०
करों तरंग यहां सों पूरण दोऊ गणपतिचरण मनाय ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवैं लेवैं आपन मोहिं बनाय १७१
इति श्रीलखनऊनिवसि (सी,आई,ई) मुंशी नवलकिशोरात्मजवाबू प्रयाग
नारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां निवासि
मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत मलखान
बड़ाईवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥
सवैया ॥
सत्यहैं वेद पुराण सबै मति एक असत्य यहै लखिपावा ।
मतिही के असत्य असत्य सबै यह सत्यहि २ सत्य बतावा ॥
बेद पुराण भूलनहीं यह भूल असत्य मती ठहरावा ।
ललिते मति सत्यासत्य निवारण वेद पुराणन ने दर्शावा १

लाखनिका विवाह । ३८३ :१७
सुमिरन ॥
बेदन ध्यावों सामबेद को बिप्रन परशुराम महराज ॥
क्षत्रिन ध्यावों रामकृष्ण को बैश्यन नन्दभये शिरताज १
शूद्रन ध्यावों मैं निषाद को कीशन पवनतनय बलवान ॥
ईशन ध्यावों शिवशङ्कर को शीशनबढ़ा दशानन ज्वान २
ध्याय नदीशनमें बड़वानल पक्षिन बैनतेय महराज ॥
ध्याय गिरीशन में हिमपर्वत नारिन जनकसुता शिरताज ३
कुँवारिन ध्यावैं हम राधाको राखैं सदा हमारी लाज ॥
परम पियारी यदुनन्दन की हमरी माननीय शिरताज ४
सबै पुस्तकन में दुर्गा जी अबहूं बिप्रन की रखवार ॥
खूटि सुमिरनी गै ह्याँते अब बूँदी हाल सुनो यहिबार ५
अथ कथाप्रसंग ॥
देखिकै फौजै मलखाने की बोला तुरत कनौजीराय ॥
फौजै आई हैं बूँदी ते आल्हा देखु भीर अधिकाय १
चिट्ठी पठई तुम सिरसा को आये नहीं वीर मलखान ॥
कैसी करिहौ यहि समया में आल्हा समरभूमि मैदान २
सुनिकै बातैं महराजा की आल्हा बोले शीश नवाय ॥
मुर्चा बन्दी अब करवावो चर्खन तोप देउ चढ़वाय ३
तर्बलंग धावन सिरसावाला आल्हा फौज पहुंचा आय ॥
शीश नाय कै सो आल्हा को मलखे आवन दीन बताय ४
दीन इनामै त्यहि धावन को ब्रह्मा मलखे लीन बुलाय ॥
खबरि पाय कै सो आल्हा की दूनों गये तहाँ पर आय ५
बड़ी खातिरी जैचँद कीन्ह्यो अपने पास लीन बैठाय ॥
खबरि बताई सब बूँदी की जयचँद बार बार पछिताय ६

१८ आल्हाखण्ड । ३८४
मलखे बोले तब राजा ते साँची सुनो कनौजीराय ॥
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम चारो दिशा लेउ घ्यग्वाय ७
तुमतो लड़ियो उत्तर दिशिको दक्षिण समर करब हम आय ॥
कछुदल पठवो पूरब पश्चिम बूँदी शहर लेउ घिराय ८
इतना कहिकै मलखे ब्रह्मा फोजन फेरि पहूँचे आय ॥
बाजे डंका कनौजिया के हाहाकार शब्दगा छाय ६
बिनही डंका के मलखाने दक्षिण दिशा पहूँचे जाय ॥
म्वती जबाहिर उत्तर दिशिमाँ लै कै फौजगयो फिरिआय १०
तोपैं धरिगइँ फिरि चर्खेन में तिनमें बत्तीदई लगाय ॥
छूटे गोला हाहाकारी धुवनारहा सरगमें छाय ११
लागे गोला ज्यहि क्षत्री के मानो गिरह कबूतरखाय ॥
गोला लागै ज्यहि घोड़ाके आधे सरगलिहे मड़राय १२
लागै गोला ज्यहि हाथी के झुप्पे देवै भूमि बिछाय ॥
जौने ऊंटके गोला लागै सो मुहभरा तुरतगिरिजाय १३
अरर अरर गोला छूटैं जैसे प्रलय मेघ घहराय ॥
जौने रथमाँ गोला लागै पहियाधुरीसहितउड़िजाय १४
बड़ी दुईशा भै तोपन में तब फिरि मारुबन्द द्वैजाय ॥
दुनो गोल आगे का बढ़िगे मुर्चा परा बरोबरि आय १५
कल्ला भिड़िगे असवारन के घोड़न भिड़ी रानमें रान ॥
सूंडि लपेटा हाथी भिड़िगे लाग्यो होन घोर घमसान १६
कउँधालपकनिविजुलीचमकनि रणमाँ चमाचम्म तलवार ॥
झल् झल् झल् झल् छुरी झलकैं भारी ढालनकी ठनकार १७
धम् धम् धम् धम् बजैं नगारा मारा मारा परै सुनाय ॥
न् सन् सन् सन् गोली सनकैं तेगा मन्न मन्न मन्नाय १८

लाखनिका विवाह। ३८५
मारु मारु करि मौहरि बाजै बाजै हाव हाव करनाल ॥
बड़ी लड़ाई भै बूँदीमाँ जूझे बड़े बड़े नरपाल १६
पैदल पैदल कै बरणी मै औ असवार साथ असवार ॥
कोताखानी चलैं कटारी ऊनाचलै बिलाइति क्यार २०
कटिकटि कल्ला गिरैं खेतमाँ उठि उठि फेरि करैं तलवार ॥
ना मुहँ फेरैं कनउज वाले ना ई बूँदी के सरदार २१
ब्रह्मा मलखे दक्षिण दिशिसों पहुँचे बीच शहरमें आय ॥
बड़ा कुलाहल भा बूँदी माँ काहू धीर धरा ना जाय २२
लीन्हे फौजै मलखाने फिरि फाटक उपर पहुँवा जाय ॥
औ कहि पठवा गंगाधर को सबकी कैद देउ छुटवाय २३
नाहीं बचिहौ ना महलन माँ बूँदी शहर देउँ फुँकवाय ॥
सुना सँदेशा महराजा जब मनमाँ बार बार पछिताय २४
पै जब सूझी कछु मनमाँ ना सबकी कैद दीन छुटवाय ॥
घायल करहति ऊदन लाखनि मलखे पास पहुँचे आय २५
मिला भेंट करि सब आपस में उत्तर दिशा चले हर्षाय ॥
एक तरफ सों जयचंद राजा दूसरी तरफ बनाफरराय २६
मोती जवाहरि परे बीचमाँ सबके गयी प्राणपर आय ॥
बड़ी लड़ाई भै बूँदी मा अद्भुत समर कहा ना जाय २७
मारे मारे तलवारिन के नदिया वही रक्तकी धार ॥
मुण्डन केरे मुड़चौड़ा भै औ रुण्डन के लगे पहार २८
घोड़मनोहर की पीठी सों देवा गरू देय ललकार ॥
चढ़ा कबूतरी पर मलखाने ऊदन बेंदुलपर असवार २९
भयो जवाहरि फिरि सम्मुख माँ लीन्हे तीनिलाख असवार ॥
का गति बरणों मैं मोती कै दूनों हाथ करै तलवार ३०

२० आलहखण्ड । ३८६
मीराताल्हन बनरस वाला सिर्गा घोड़े पर असवार ॥
अल्ला अल्ला औ बिसमिल्ला करिकै खूब मचाई रार ३१
झुके सिपाही बूँदी वाले दोऊ हाथ करैं तलवार ॥
बड़े लड़ैया मुहबेवाले एकते एक शूर सरदार ३२
येऊ मारैं औ ललकारैं हारैं नहीं तहाँ पर ज्वान ॥
छोड़ि आसरा जिंदगानी का क्षत्रिन खून कीन मैदान ३३
दूनों दिशि की तहँ मारुन माँ क्षत्री बूँदी के हैरान ॥
तीनि लाख बूँदीके ठाकुर ह्वैगै समर भूमि वैरान ३४
मती जवाहर त्यहिसमया माँ दूनों भाय गये घबड़ाय ॥
मलखे ठाकुर त्यहि औसर माँ तिनका कैदलीन करवाय ३५
भागि सिपाही अरझ्वारातब अपने अपने लिहे परान ॥
जीति के डंका तब बजवाये नाहर समरधनी मलखान ३६
राजा जयचँद के तम्बू माँ पहुँचे सबै शूर सरदार ॥
को गति बरणै त्यहि समयाकै भारी लाग राजदरबार ३७
जितने घायल अपनी दिशिके सबको तुरतलीन उठवाय ॥
मलहम पट्टी तिन क्षत्रिन के घायन ऊपर दीन कराय ३८
सुनी हकीकति जब गंगाधर मनमाँ बारबार पछिताय ॥
मेलछाँड़िकै त्यहि औसर माँ और न कछू ठीक ठहराय ३६
लिखिकै चिट्ठी त्यहि समयामाँ जयचँद पास दीनपठवाय ॥
कैदी छोड़ो दोउ पुत्रनको भाँवरि तुरत लेउ करवाय ४०
जहँना तम्बू महराजा का धावन तहाँ पहुँचा आय ॥
चिट्ठी दीन्ह्यो महराजाको दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ४१
पढ़िकै चिट्ठी जयचँदराजा तुरतै सबका दीनसुननाय ॥
सम्मत सबके तब याही भै कैदी देउ पुत्र छुड़वाय ४२

लाखनिका विवाह । ३८७ २१
म्वती जवाहर दोउ पुत्रन को राजा तुरत लीन बुलवाय ॥
लिखी हकीकति जो गंगाधर तिनको तुरतदीन बतलाय ४३
गंगा कैलेउ तुम तम्बुन माँ तुम्हरी कैद देइँ छुड़वाय ॥
सुनिकै बातें ये जयचंदकी दोऊ गंगा लीन उठाय ४४
तब छुड़वायो जयचंद राजा पहुँचे धाम आपने जाय ॥
सम्मत कीन्ह्यो फिरि गंगाधर मड़ये मूड़ लेब कटवाय ४५
अकसर लड़काको लै आवो जावो पूत जवाहरलाल ॥
सुनिकै तुरतै सो गमनत भा आयो जहाँ बैठ नरपाल ४६
कहि समुझायो सब राजा को दोऊ चरणन शीश नवाय ॥
अकसर लड़का को पठवावो सबियाँ शंका देउ भुलाय ४७
इतना सुनिकै मलखे बोले राजन हुकुम देउ फरमाय ॥
पांच सात मिलि हमअब जैबे भौंरी तुरत देब करवाय ४८
सुनिकै बातें मलखाने की आयसु दीन कनौजीराय ॥
बैठि पालकी में लखराना देबी फूलमती को ध्याय ४६
आल्हा ऊदन मलखे ब्रह्मा देवा बनरस का सरदार ॥
गंगा मामा लखराना का सोऊ बांधि लीन हथियार ५०
सवैया ॥
ते सरदार सबै चलिकै फिरि भीतर भौन के जाय सिधाये ।
सुन्दर आसन डारितहाँ नृप आदर भाव किये अधिकाये ॥
पण्डित आयकै बैठि गयो गठिबन्धन हेतु सुता बुलवाये ।
सातसुहागिल आय तहाँ ललिते मन मोदन गीत सुनाये ५१
पहिली भाँवरिके परतै खन क्षत्री आये आध हजार ॥
आल्हा ऊदन मलखे ब्रह्मा इनहुन खैंचि लीन तलवार ५२

२२ आल्हखण्ड । ३८८
आधे आँगन भाँवरि होवैं आधे होय भड़ाभड़ मार ॥
मारे मारे तलवारिन के आँगन वही रक्त की धार ५३°
काटिकै कल्ला दुइ पल्ला करि लल्ला बच्छराज के लाल ॥
लड़ै इकल्ला अति हल्लाकरि अल्हो खैर करैं त्यहिकाल ५४
भा खलभल्ला औ हल्ला अति बल्लन क्यार मनो त्यवहार ॥
काटि बजुल्ला सोने छल्ला लल्ला उदयसिंह सरदार ५५
हनि हनि मारै औ ललकारै देवा मैनपुरी चौहान ॥
म्वती जवाहर दूनों भाई लीन्हे तहाँ अनेकन ज्वान ५६
बड़ी लड़ाई करिहारे तहँ पै नहिं विजय परी दिखराय ॥
तब पछितान्यो फिरि गंगाधर दीन्ह्यो मारु बन्द करवाय ५७
कन्या दान दीन आनँद सों नेगिन नेग दीन हर्षाय ॥
सातो भाँवरि पूरी करिकै पूरा ब्याह दीन करवाय ५८
बिदा न करिबे हम ब्याहे में लीन्ह्यो गवन सालमें आय ॥
इतना कहिकै गंगाधर जी दायज खूबदीन अधिकाय ५६
बात मानिकै चन्देले फिरि तहँ ते कूच दीन करवाय ॥
विदा मांगिकै मलखे ब्रह्मा पहुँचे नगर मोहोबे आय ६०
बाजत डंका अह्तंका के कनउज गये कनौजी आय ॥
अनँद बधैया घर घर बाजीं मंगल गीतरही सब गाय ६१
रानी तिलका त्यहिअवसर में बिप्रन दान दीन अधिकाय ॥
ध्रुबी शारदा के बरदानी दूनों भाय बनाफरराय ६२
सवैया ॥
गावत गीत सबै तिनको जिनको कछु ज्ञान बलै अधिकाई ।
१-( अल्हा ) देवी का नाम है ॥

लाखनिका विवाह। ३८६ २३
ते मनमाँझ विचारकरै औ धरै मनमें प्रभुकी प्रभुताई ॥
त्यागत झूठ प्रपञ्च सबै औ जबै मन भासत हैं रघुराई ।
नाशत पाप सबै ललिते फलिते जगधर्म कि बेलि सदाई ६३
सोई मन्तर मन अन्तर धरि यन्तर धर्म बनाफरराय ॥
बड़ी बड़ाई कनउज पायो कीरति रही आजलों छाय ६४
बिपदा सहिकै यहि दुनियामा त्यागा धर्म नहीं कहुँभाय ॥
तासों बेली यह फैली अति सुन्दर धर्म रूप जलपाय ६५
अधरम बेली दुरयोधन की छैलिकै लीन जगतकोछाय ॥
तैसे - रावण कंसासुरहू बाढ़यो धनै बलै अधिकाय ६६
रीछ बँदरवा ग्वालन बालन दूनन दीन्यो तुरत नशाय ॥
तासों चाहिये यहि दुनियामाँ नितप्रतिनवत नवन नैजाय६७
धन बल बाढ़ै त्यहि दुनियामाँ कीरति जाय धरामें छाय ॥
खेत छूटिगा दिननायक सों झंडागड़ा निशाकोआय ६८
तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ॥
परे आलसी खटिया तकितकि घोंघों करठ रहे घरांय ६६
आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनरायण भाय ॥
हुकुम तुम्हारो जो पावत ना ललिते कहतकथाकस गाय७०
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥
मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर ७१
माथ नवावों पितु अपने को जिनबल गाथ भई यह पार ॥
जैसे सेयो बालापन में तैसे सदा होउ रखवार ७२
जल थल जन्मों चहु पहाड़ में स्वामी होयँ राम भगवान ॥
यह बर पावैं ललिते पण्डित खण्डित होय न हमरी बान ७३

२४ आल्हखण्ड । ३६०
पूर विवाह भयो लाखनि को हँाते करों. तरंगको अन्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानी कन्त ७४
इति श्रीलखनऊनवासि (सी, आई, ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजवाबूप्रयागनारायण
जीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलांनिवासि मिश्र
वंशोद्भवबुध कृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृत लाखनि
पाणिग्रहणवर्णनोनामद्वितीयस्तरंगः २ ॥
लाखनिरानाजीका विवाह सम्पूर्ण ॥
इति ॥

अथ आल्हखण्ड ॥
गाँजर की लड़ाईका प्रारम्भ ॥
सवैया ॥
दानिन में बलि औ हरिचन्द शिबी दधि कर्ण इन्ही यश पाये ।
बीरन में गिनती रघुबीर औ धीरन कृष्ण युधिष्ठिर गाये ॥
पापिन औ परितापिन में जग कंस दशानन बीर सुनाये ।
जापिन योग उदार अपार सदाशिवही ललिते मन आये १
सुमिरन ॥
प्रथमै ध्यावों श्री गणेश को लीन्हे सुभग पुस्तकी हाथ ॥
करों बन्दना शिवशंकर की दूनों धरों चरणपर माथ १
देवि दुर्गा को ध्यावों फिरि लैके रामचन्द्र को नाम ॥
कीरति गावों मैं ऊदन कै पूरणकरो हमारो काम २
देवि शारदा मइहरवाली मनियादेव महोबे केर ॥
ध्यावों ललिता नैमिषार की माता मोरि दीनता हेर ३
नहीं बीरता कछु मोमें है तव बल धरी धीरता हीय ॥

२ आल्हाखण्ड । ३६२
कीरति तुम्हरी जो कोउ गावै पावै वहै चहै जो जीय ४
निरभय होवै घर बाहर सों केवल करै तुम्हारी आश ॥
बन्धन छूटैं सब दुनियां के यमकी परै गले नहिं पाश ५
छूटि सुमिरनी गै हाँते अब सुनिये गाँजर केर हवाल ॥
साजिकै फौजै ऊदन चलि हैं लड़ि हैं बड़े बड़े नरपाल ६
अथ कथाप्रसंग ॥
जैचन्द राजा कनउज बाला आला सकलजगत सरनाम ॥
लागि कचहरी त्यहि राजा कै सोहैं सोन सरिस त्यहिधाम १
को गति वरणै त्यहि मन्दिरकै ज्यहिमाँ भरी लाग दर्बार ॥
आस पास माँ राजा सोहैं बीचम कनउज का सरदार २
बनासिंहासन है सोने का हीस पन्ना करै बहार ॥
तामैं बैठे जैचन्द बोले सुनिये सकल शूर सरदार ३
बारह वरसन का अरसा भा पैसा मिला न गाँजर क्यार ॥
कौन शूरमा मोरे दलमाँ नङ्गी काढ़िलेय तलवार ४
करै बन्दगी तलवारी सों औ गाँजर को होय तयार ॥
सुनिकै बातें ये जैचँदकी झुकिगे सकल शूर सरदार ५
झुका डुलरुवानाहिं द्यावलिको औ आल्हाक लहुरवाभाय ॥
सुनिकै बातें ये जैचंद की नैना अग्निवरण ह्वैजायँ ६
सबदिशिताक्यो सबक्षत्रिनको सबहिन लीन्ह्यो मूड़नवाय ॥
उठा डुलरुवा तब द्यावलिको औ आल्हा को शीशनवाय ७
सुमिरि भवानी जगदम्बा को म्यान ते खैंचिलीन तलवार ॥
किह्यो बन्दगी फिर राजा को यहु द्यावलिको राजकुमार ८
हाथ जोरिकै बोलन लाग्यो सुनिये विनय कनौजीराय ॥
लाखनि राना सँगमाँ दीजै लीजै पैसा सकल मँगाय ६

गॉजरकीलड़ाई । ३६३ ३
बिना हकीकी लखराना के पैसा कौन तसीलै जाय ॥
साथ में होवैं लखराना जो तम्बू बैठे लेयें मँगाय १०
लड़ै भिड़े को जिम्मा हमरो इन को वार न बाँको जाय ॥
हुकुम जो पावौं महराजा को गाँजर अबै पहुँचों जाय ११
सुनिकै बातें बघऊदन की बोला कनउज को सरदार ॥
सोरह रानिन में इकलौतो मेरो लाखनि राजकुमार १२
सो नहिं जैहै चढ़ि गाँजर को पैसा मिलै चहौ रहिजाय ॥
सुनिकै बातें ये जैचँद की बोला तुरत बनाफरराय १३
क्षत्री राजा यह नहिं सोचैं मानो सत्य बचन महराज ॥
रही न देही रामचन्द्र के रहि ना गये कृष्ण यदुराज १४
यशै इकेलो जग में रहिगो गावैं तीनलोक तिहुँकाल ॥
तासों देवो सँग लाखनि को सोचो कछू नहीं नरपाल १५
सुनिकै बातें ये ऊदन की जैचँद हुकुम दिन फरमाय ॥
हुकुम पायकै महराजा को लाखनि ढिगै पहुँचो जाय १६
कही हकीकति सबजैचँदकी यहु द्यावातिको राजकुमार ॥
सुनिकै बातें बघऊदन की लाखनि बेगि भयो तय्यार १७
चोबदार को फिर बुलवायो ताको दीनो हुकुम सुनाय ॥
पिटै ढिंढोरा अब कनउज माँ सजिकै फौज आयसबजाय १८
सुनिकै बातें लखराना की दौरत चोबदार चलिजाय ॥
ढोल बजाई गै कनउज माँ सब का खबरि दीन पहुँचाय १६
खबरि पायकै सब क्षत्री दल तुरतै सजन लागि सरदार ॥
हथी महाउत हाथी लैकै तिनका करनलागि तय्यार २०
अंगद पंगद मकुना भौंरा हाथी झूमा दीन बिछाय ॥
चुम्बक पत्थर का हौदा धरि जामें सेल बरौंवा खाय २१