आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगॉजरकीलड़ाई । ३६३ ३
बिना हकीकी लखराना के पैसा कौन तसीलै जाय ॥
साथ में होवैं लखराना जो तम्बू बैठे लेयें मँगाय १०
लड़ै भिड़े को जिम्मा हमरो इन को वार न बाँको जाय ॥
हुकुम जो पावौं महराजा को गाँजर अबै पहुँचों जाय ११
सुनिकै बातें बघऊदन की बोला कनउज को सरदार ॥
सोरह रानिन में इकलौतो मेरो लाखनि राजकुमार १२
सो नहिं जैहै चढ़ि गाँजर को पैसा मिलै चहौ रहिजाय ॥
सुनिकै बातें ये जैचँद की बोला तुरत बनाफरराय १३
क्षत्री राजा यह नहिं सोचैं मानो सत्य बचन महराज ॥
रही न देही रामचन्द्र के रहि ना गये कृष्ण यदुराज १४
यशै इकेलो जग में रहिगो गावैं तीनलोक तिहुँकाल ॥
तासों देवो सँग लाखनि को सोचो कछू नहीं नरपाल १५
सुनिकै बातें ये ऊदन की जैचँद हुकुम दिन फरमाय ॥
हुकुम पायकै महराजा को लाखनि ढिगै पहुँचो जाय १६
कही हकीकति सबजैचँदकी यहु द्यावातिको राजकुमार ॥
सुनिकै बातें बघऊदन की लाखनि बेगि भयो तय्यार १७
चोबदार को फिर बुलवायो ताको दीनो हुकुम सुनाय ॥
पिटै ढिंढोरा अब कनउज माँ सजिकै फौज आयसबजाय १८
सुनिकै बातें लखराना की दौरत चोबदार चलिजाय ॥
ढोल बजाई गै कनउज माँ सब का खबरि दीन पहुँचाय १६
खबरि पायकै सब क्षत्री दल तुरतै सजन लागि सरदार ॥
हथी महाउत हाथी लैकै तिनका करनलागि तय्यार २०
अंगद पंगद मकुना भौंरा हाथी झूमा दीन बिछाय ॥
चुम्बक पत्थर का हौदा धरि जामें सेल बरौंवा खाय २१