आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ आल्हाखण्ड । ३६२
कीरति तुम्हरी जो कोउ गावै पावै वहै चहै जो जीय ४
निरभय होवै घर बाहर सों केवल करै तुम्हारी आश ॥
बन्धन छूटैं सब दुनियां के यमकी परै गले नहिं पाश ५
छूटि सुमिरनी गै हाँते अब सुनिये गाँजर केर हवाल ॥
साजिकै फौजै ऊदन चलि हैं लड़ि हैं बड़े बड़े नरपाल ६
अथ कथाप्रसंग ॥
जैचन्द राजा कनउज बाला आला सकलजगत सरनाम ॥
लागि कचहरी त्यहि राजा कै सोहैं सोन सरिस त्यहिधाम १
को गति वरणै त्यहि मन्दिरकै ज्यहिमाँ भरी लाग दर्बार ॥
आस पास माँ राजा सोहैं बीचम कनउज का सरदार २
बनासिंहासन है सोने का हीस पन्ना करै बहार ॥
तामैं बैठे जैचन्द बोले सुनिये सकल शूर सरदार ३
बारह वरसन का अरसा भा पैसा मिला न गाँजर क्यार ॥
कौन शूरमा मोरे दलमाँ नङ्गी काढ़िलेय तलवार ४
करै बन्दगी तलवारी सों औ गाँजर को होय तयार ॥
सुनिकै बातें ये जैचँदकी झुकिगे सकल शूर सरदार ५
झुका डुलरुवानाहिं द्यावलिको औ आल्हाक लहुरवाभाय ॥
सुनिकै बातें ये जैचंद की नैना अग्निवरण ह्वैजायँ ६
सबदिशिताक्यो सबक्षत्रिनको सबहिन लीन्ह्यो मूड़नवाय ॥
उठा डुलरुवा तब द्यावलिको औ आल्हा को शीशनवाय ७
सुमिरि भवानी जगदम्बा को म्यान ते खैंचिलीन तलवार ॥
किह्यो बन्दगी फिर राजा को यहु द्यावलिको राजकुमार ८
हाथ जोरिकै बोलन लाग्यो सुनिये विनय कनौजीराय ॥
लाखनि राना सँगमाँ दीजै लीजै पैसा सकल मँगाय ६