ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 92, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय अध्याय
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प्रथम खण्ड
आत्मसम्बन्धी प्रश्न
ब्रह्मविद्यासाधनकृतसर्वात्म- | श्रुतिद्वारा वामदेव आदि
भावफलावाप्तिं वामदेवाद्याचार्य- | आचार्योंकी परम्परासे प्रकाशित
परम्परया श्रुत्यावद्योत्यमानां ब्रह्म- | तथा ब्रह्मवेत्ताओंकी सभामें अत्यन्त
वित्परिषदत्यन्तप्रसिद्धामुपलभ- | प्रसिद्ध, ब्रह्मविद्यारूप साधनके
माना मुमुक्षवो ब्राह्मणा अधुनातना | किये हुए सर्वात्मभावरूप फलकी
ब्रह्मजिज्ञासवोऽनित्यात्साध्यसा- | प्राप्तिको उपलब्ध करनेवाले आधुनिक
धनलक्षणात्संसारादाजीवभावाद्व्या- | मुमुक्षु और ब्रह्मजिज्ञासु ब्राह्मणलोग
विवृत्सवो विचारयन्तो- | जीवभावपर्यन्त साध्य-साधनरूप
ऽन्योन्यं पृच्छन्ति कोऽयमात्मेति ? | अनित्य संसारसे निवृत्त होनेकी
कथम्— | इच्छासे परस्पर विचार करते हुए
| पूछते हैं—यह आत्मा कौन है ?
| किस प्रकार [पूछते हैं ? सो बतलाया
| जाता है ]—
कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे । कतरः स आत्मा,
येन वा पश्यति येन वा शृणोति येन वा गन्धानाजिघ्रति
येन वा वाचं व्याकरोति येन वा स्वादु चास्वादु च
विजानाति ॥ १ ॥