ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
४०० [छठी पञ्चिका
रहस्य को समझता है वह संवत्सर की सायुज्यता, सारूपता
और सालोक्यता प्राप्त करता है ।
इन मंत्रों को प्रग्राह विधि से पढ़ना चाहिये । जैसे वृषा-
कपि । क्योंकि इनका भी वृषाकपि का सा रूप है । जो नियम
वृषाकपि के पढ़ने में होना चाहिये वह इसमें भी । इनमें
न्यूंख नहीं होना चाहिये । निनाद होना चाहिये । यही उनका
न्यूंख है ।
यह “कारव्या मंत्रों” (अथर्व० २०।१२७।११-१४) को पढ़ता
है । देवों ने जो कोई कल्याण कर्म किया वह कारव्या के द्वारा
किया । इसी प्रकार यजमान भी जो कुछ कल्याण कर्म करते हैं
वह व्याख्या के द्वारा करते हैं ।
इनको भी प्रग्राह की विधि से पढ़ना चाहिये । जैसे वृषा-
कपि मंत्र पढ़े जाते हैं । जो वृषाकपि का रूप है । वह इनका
रूप है । इसलिये जो नियम वृषाकपि के हैं वही इनके भी
होने चाहिये । इनमें न्यूंख नहीं होता, निनाद होता है । यही
इनका न्यूंख है ।
अब वह “दिशांकॢप्ती” (अथर्व २०।१२८।१-५) मंत्रों को
पढ़ता है । क्योंकि वह इस प्रकार दिशाओं को बनाता है ।
ऐसे पाँच मंत्र पढ़ता है । पाँच दिशाएँ हैं । चार पूर्व, पश्चिम,
उत्तर, दक्षिण, और एक उनके ऊपर । इनमें न न्यूंख होता है,
न निनाद । वह सोच कर कि मैं इन दिशाओं को बिगाड़ूँ नहीं
(न्यूंख यानि) वह आधा आधा मंत्र करके पढ़ता है ।
प्रतिष्ठा के लिये 'जनकल्प' मंत्रों (अथर्व० २०।१२८।६ ११)
को पढ़ता है । प्रजा जनकल्प है । ऊपर की रीति से दिशा बना
कर वह उनमें प्रजा को रखता है । इनमें न्यूंख नहीं होता, न
निनाद होता है । यह सोच कर कि मैं प्रजा को न बिगाड़ूँ, वह
आधी आधी ऋचा करके पढ़ता है ।
पाँचवाँ अध्याय ] ४०१
अब इन्द्र-गाथा ( अथर्व० २०।१२८।१२-१६ ) को पढ़ता है ।
इन्द्र-गाथाओं द्वारा देवों ने असुरों को गाकर हरा दिया। इसी
प्रकार इन्द्र-गाथाओं द्वारा यजमान भी अपने वैरियों को हरा
देता है। और उन पर विजय पाता है । इनको प्रतिष्ठा के लिये
आधी आधी ऋचा करके पढ़ता है । ( ६ )
३३—ब्राह्मणाच्छंसी 'ऐतशप्रलाप' पढता है । 'ऐतश' मुनि
था। वह "अग्नेरायुः" ( अर्थात् अग्नि के जीवन ) मंत्रों का
द्रष्टा हुआ । यह वह मंत्र हैं जिनके विषय में लोग कहते हैं कि
यह मंत्र यज्ञ के सब दोषों को दूर कर देते हैं। उसने अपने
पुत्रों से कहा, "प्यारे पुत्रो, मैंने 'अग्नेरायुः' मंत्रों का दर्शन
किया है। मैं उनको तुमसे कहूँगा। मैं जो कुछ कहूँ, तुम अव-
हेलना न करना ।" तब उसने कहना शुरू किया :—"एता अश्वा
आ प्लवन्ते प्रतीपं प्राति सत्वनम्"...(अथर्ववेद २०।१२९।१ )
उसके वंश का अभ्यग्नि नाम का एक व्यक्ति असमय उसके
पास गया और उसके मुँह को बन्द करके कहने लगा, "हमारा
बाप पागल हो गया है।" तब उसके बाप ने कहा, 'जा, कोढ़ी
हो जा, तू ने मेरी वाणी को मार दिया । नहीं तो मैं गाय के
जीवन को सौ साल का और आदमी के जीवन को हजार साल
का कर देता । परन्तु तू ने मुझे रोक दिया । मैं शाप देता हूँ
कि तेरी संतान पापिष्ठ हो जाय ।" इसलिये कहावत है कि
और्वाण गोत्र के ऐतशायनों में अभ्यग्नि लोग बहुत पापी हैं।
कुछ लोग इन ( ऐतशप्रलाप ) को बहुत बढा देते हैं। किसी
को इस बात का निषेध नहीं करना चाहिये । कहना चाहिये कि
जितने चाहें मंत्र पढ़े । क्योंकि ऐतशप्रलाप जीवन है, जो इस
रहस्य को समझता है वह इस प्रकार यजमान के जीवन को
बढ़ा देता है।
ऐतशप्रलाप का यह भी अर्थ है :—यह छन्दों का रस है !
२६
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४०२ [ छठी पञ्चिका
ऐतशप्रलाप के पाठ से छन्दों में रस आ जाता है। उसका यज्ञ
रस युक्त छन्दों वाला हो जाता है। वह सरस छन्दों से
अपना यज्ञ करता है, जो इस रहस्य को समझता है।
ऐतशप्रलाप का यह भी अर्थ है :—यह यज्ञ की त्रुटियों को
दूर करने और यज्ञ को पूर्ण करने के लिये भी है। यह ऐतश-
प्रलाप अक्षिति ( न क्षय होने वाली चीज ) है। इनका पाठ
करने में कहते हैं :—"मेरे यज्ञ में कोई त्रुटि न रहे। मेरा यज्ञ
अक्षय हो।"
यह ऐतशप्रलाप हर पद पर ठहर ठहर कर पढा जाता है,
जैसे निविद पढा जाता है। अन्त के पद में 'ओ३म्' कहते हैं
जैसे निविद् में।
अब वह प्रवह्लिका मन्त्रों ( अथर्ववेद २०।१३३।१-६ ) को
पढ़ता है :—देवों ने असुरों को प्रवह्लिका मन्त्रों से ठंडा करके
हरा दिया ( प्रव हृत्य )। इसी प्रकार यजमान लोग प्रवह्लिका मंत्रों
से शत्रु को ठंडा करके हरा देते हैं। यह आधा आधा मंत्र
करके पढ़ा जाता है, प्रतिष्ठा के लिये।
वह आजिज्ञासेन्या मंत्रों ( अथर्ववेद २०।१३४।१-४ ) को
पढ़ता है। आजिज्ञासेन्या मंत्रों से देवों ने असुरों को पहचान
कर ( आशाय ) पछाड़ लिया लिया। इसी प्रकार यजमान भी
आजिज्ञासेन्या मंत्रों से शत्रुओं को पहचान कर पछाड़ डालते
हैं। वह इनको आधा आधा मंत्र करके पढ़ता है, प्रतिष्ठा के
लिये।
प्रतिराघ ( अथर्ववेद २०।१३५।१-३ ) मंत्रों को पढ़ता है।
प्रतिराघ मंत्रों से देवों ने असुरों में विघ्न डाल कर ( प्रतिराध्य )
उनको हरा दिया। इसी प्रकार यजमान लोग भी प्रतिराध
मंत्रों से शत्रुओं में विघ्न डाल कर उनको परास्त कर देते हैं।
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
पाँचवाँ अध्याय ] ४०३
अतिवाद ( अथर्ववेद २०।१३५।४ ) को पढता है । अति-
वाद से देवों ने असुरों को गाली देकर परास्त कर दिया ।
यजमान भी अतिवाद के द्वारा शत्रुओं को गाली देकर परास्त
कर देते हैं । इसको आधा आधा मन्त्र करके पढ़ता है, प्रतिष्ठा
के लिये । ( ७ )
३४—देवनीथ ( अथर्ववेद २०।१३५।१-१७ (?) ) मन्त्रों को
पढ़ता है । आदित्य लोग और अंगिरस लोग स्वर्ग में जाने के
लिये लड़ पड़े कि हम पहले जायंगे, हम पहले जायँगे । अंगि-
रसों ने मालूम कर लिया कि कल जो हम सोम यज्ञ करने
वाले हैं उससे हम स्वर्ग लोक को पहले पहुँच जायंगे । उन्होंने
अपने में से एक अग्नि नामी को भेजा कि जाकर आदित्यों से
कह दो कि कल जो हम सोम यज्ञ करने वाले हैं उससे हम
स्वर्ग में पहले पहुँच जायंगे ।
आदित्यों ने अग्नि को देखते ही सोम यज्ञ को जान लिया
जिससे वह स्वर्ग को जा सकें । अग्नि ने उनके पास आकर
कहा, "कल हम सोमयज्ञ करने वाले हैं जिससे हम स्वर्ग को
पहुँच जायंगे ।" उन्होंने उत्तर दिया, "हम भी तुम से कहते हैं
कि हम अभी सोम यज्ञ करने वाले हैं जिससे हम स्वर्गलोक
में पहुँच जायंगे । लेकिन तुझको होता बनाकर ही हम स्वर्ग
लोक में पहुँच सकते हैं", वह "अच्छा" कहकर लौट आया ।
और अंगिरसों से यह बात कह कर फिर आदित्यों के पास
लौट आया । उन्होंने पूछा, "तू ने कहा ?" उसने कहा, "हाँ,
मैंने कहा । ये कहने लगे कि क्या तूने हम को वचन नहीं दिया
था । मैंने कहा कि वचन तो दिया था ( लेकिन आदित्यों को
इनकार न कर सका ) क्योंकि जो यज्ञ रोपता है वह यश पाता
है, और जो यज्ञ में विघ्न डालता है वह यश से वंचित हो
जाता है । इसलिये मैंने नहीं रोका । इसलिये यदि कोई यज्ञ
४०४ [ छठी पञ्चिका
का होता बनने से इनकार करे तो केवल दो कारणों से, एक
यह कि वह किसी अन्य यज्ञ में संलग्न हो, दूसरे यह कि वह
यज्ञ के अयोग्य हो। (८)
३५—इसलिये अंगिरसों ने आदित्यों को यज्ञ में मदद दी।
आदित्यों ने अगिरसों को दक्षिणा से पूर्ण पृथिवी दी। परन्तु
जब उन्होंने यह पृथिवी ली तो उसने इनको तपा डाला। इसलिये
उन्होंने उसे फेंक दिया। वह सिंहनी होकर मुँह खोलकर
आदमियों को खाने दौड़ी। पृथिवी की इस जलती हुई दशा
से ऊँचे नीचे गार पड़ गये, पहले यह समतल थी। इसी लिये
कहते हैं कि अस्वीकृत की हुई दक्षिणा को न लेवे। उसे सोचना
चाहिये कि जिस दक्षिणा को अग्नि ने वेध दिया वह मुझे क्यों
न वेधेगी? यदि दक्षिणा ले भी तो उसे शत्रु को दे देवे। वह
हार जायगा क्योंकि यह उसको जला देती है।
यह सूर्य सफेद घोड़ा बन कर काठी और लगाम से युक्त
होकर अन्य आदित्यों के पास आया। उन्होंने कहा, “इसको
आपको (अंगिरसों को) दे देवें।” इस लिये देवनीथ मन्त्र
(जो देवों से ले जाया गया) पढ़े जाते हैं। “हे जरितः
(स्तुति करने वाले), आदित्य, लोग अंगिरा लोगों के पास
दक्षिणा लाये। हे जरितः, वे इसके पास तक न गये”। (अथर्व०
२०।१३५।६) अर्थात् पृथिवी के पास न गये।
“हे जरितः वे उसके पास गये।” अर्थात् उस घोड़े के
पास गये।
“हे जरितः, उन्होंने इसको ग्रहण न किया”, अर्थात् पृथिवी
को।
“उन्होंने उसको ग्रहण किया, हे जरितः”। (अथर्व०
२०।१३५।७) अर्थात् उस घोड़े को।
पाँचवाँ अध्याय ] ४०५
"अहानेतरसं न वि चेतनानि" (अथर्व० २०।१३५।७)
"जब उन्होंने सूर्य को ले लिया तो दिन न रहे", क्योंकि
दिन तो सूर्य से ही बनते हैं ।
"यज्ञानेतरसं पुरोगवामः" (अथर्व० २०।१३५।७)
"जब सूर्य्य चला गया तो लोग बिना नेता के रह गये ।
क्योंकि दक्षिणा यज्ञ की नेता है । जैसे बिना अगुआ बैल के
गाड़ी में गड़बड़ हो जाती है इसी प्रकार बिना दक्षिणा के यज्ञ
में गड़बड़ हो जाती है । इसलिये कहते हैं कि दक्षिणा अवश्य
हो, चाहे थोड़ी ही क्यों न हो ।
उत श्वेतं आशुपत्वा । (अथर्व० २०।१३५।८)
"यह घोड़ा सफेद और जल्दी चलने वाला है" ।
उतो पद्भिर्यविष्ठः । (अथर्व० २०।१३५।८)
"और पैरों का बहुत तेज है" ।
उतेमाशु मानं पिपर्ति (अथर्व० २०।१३५।८)
"वह शीघ्र काम को पूरा करता है" ।
"आदित्या रुद्रा वसवस्तवेनु" (अथर्व वे० २०।१३५।६)
"आदित्य, रुद्र और वसु इसकी स्तुति करते हैं' ।
इदं राधः प्रतिगृह्णीह्यङ्गिरः ।* (अथर्व० २०।१३५।६)
"हे अंगिरा लोगो, इस दक्षिणा को ग्रहण करो" ।
उन्होंने उसको लेने की इच्छा की ।
इदं राधो बृहत्पृथु । (अथर्व० २०।१३५।६)
यह दक्षिणा बहुत बड़ी और विस्तृत है ।
देवा ददत्वासुरं ।
तद्वो अस्तु सुचेतनम् ।
युष्माँ अस्तु दिवे दिवे ।
*कहीं कहीं किञ्चित् पाठभेद है ।
४०६ [छठी पञ्चिका
प्रत्येवगृभायत । (अथर्व० २०।१३५।१०)
"यह जो देवों ने दी है। यह तुम्हारे लिये प्रकाशदायक
हो। तुम्हारे लिये यह प्रति दिन हो। इसको ग्रहण करने के
लिये राज़ी हूजिये"।
इस देवनीथ को पद पद पर ठहर कर पढ़ता है जैसे निविद्
पढ़ा जाता है। इसके अन्त के पद पर 'ओ३म्' कहते हैं जैसे
निविद् के साथ।
अब वह भूतेच्छद मन्त्रों (अथर्व० २०।१३५।११-१३) को
पढ़ता है। इन भूतेच्छद मन्त्रों द्वारा देवों ने युद्ध और माया
(चालाकी) से असुरों को हरा दिया। उन्होंने इन भूतेच्छदों
से असुरों की शक्ति को मंद कर दिया और उनको परास्त कर
दिया। इसी प्रकार यजमान भूतेच्छद मन्त्रों से शत्रुओं की
शक्ति को मंद करके उनको परास्त कर देते हैं। उनको आधा
मन्त्र करके पढ़ते हैं, प्रतिष्ठा के लिये।
अब आहनस्या मन्त्रों को पढ़ता है। आहनस्य अर्थात् उपस्थ
इन्द्रिय से वीर्य निकलता है और वीर्य से सन्तान होती है।
इस प्रकार यजमान के लिये संतान को धारण कराता है। यह
दस मन्त्र हैं। दश अक्षर का विराट् छन्द है। विराट् अन्न
है। अन्न से वीर्य सींचा जाता है। वीर्य से संतान होती है।
इस प्रकार वह संतान को धारण कराता है। उनको न्यूङ्ख की
रीति से पढ़ता है। क्योंकि न्यूङ्ख अन्न है। अन्न से वीर्य
होता है। वीर्य से सन्तान होती है। इस प्रकार यजमान को
सन्तान युक्त करता है।
दधिक्रावन मन्त्र को पढ़ता है :-
दधिक्राव्णो अकारिषम् (अथर्व० २०।१३७।३)
दधिक्रा देवों को पवित्र करने वाला है। क्योंकि उसने
सबसे उत्तम वीर्य वाले शब्द कहे (अथर्व० २०।१३६।१-१०)
पाँचवाँ अध्याय ] ४०७
इस देवों को पवित्र करने वाले से वह वाक् को पवित्र
करता है।
यह मंत्र अनुष्टुभ् छन्द में है। वाक् अनुष्टुभ् है। इस
प्रकार इसी के निज छन्द से वह वाक् को पवित्र करता है।
अब वह पावमान्य मन्त्रों ( ऋ० ९।१०१।४ ) को पढ़ता
है :—सुतासो मधुमत्तमा......
पावमान्य मन्त्रदेवों को पवित्र करने वाले हैं। उसने सबसे
उत्तम वीर्य वाले शब्द बोले। इस देवों को पवित्र करने वाले
से वाक् को पवित्र करता है।
यह अनुष्टुभ् छन्द में है। अनुष्टुभ् वाक् है। इस प्रकार
वाक् को उसी के निज छन्द द्वारा पवित्र करता है।
अब वह इंद्रबृहस्पति के मंत्र पढ़ता है :—
अव द्रप्सो अं॑शुमतीमतिष्ठत्......(ऋ० ८।६६।१३-१५)
इसके अन्त में है :—
विशो अदेवी॑रभ्याचरं॑तीबृ॑हस्पतिना यु॒जे॑न्द्रः ससाहे ॥
( ऋ० ८।६६।१५ )
"इन्द्र ने बृहस्पति की मदद से देवों के विरोधी लोगों को
जो युद्ध में लड़ने आये हरा दिया", क्योंकि असुरों के लोगों
को जब वे देवों से लड़ने आये इन्द्र ने बृहस्पति की सहायता
से हरा कर भगा दिया। इसी प्रकार यजमान इन्द्र और
बृहस्पति की सहायता से असुरों के लोगों को ( असुर्यं वर्णम् )
हराकर भगा देते हैं।
इस पर कुछ लोग पूछते हैं कि छठे दिन (शस्त्रों के साथ
यह सूक्त) पढ़ने चाहिये या नहीं ? इसका उत्तर यह है कि
पढ़ना चाहिये। जब अन्य शस्त्रों के साथ पढ़े जाते हैं तो इनके
साथ क्यों न पढना चाहिये। कुछ लोग कहते हैं कि न पढ़ना
चाहिये। छठा दिन स्वर्ग लोक है। स्वर्ग लोक तक सबकी
४०८ [ छठी पंचिका
पहुँच नहीं है। स्वर्ग लोक में विरले ही जाते हैं। यदि पढ़ेगा
तो सबको बराबर कर देगा । न पढ़ना ही स्वर्ग लोक का रूप
है। इस लिये न पढ़े । इसलिये नहीं पढ़ता । उक्थ यह हैं—
नाभानेदिष्ठ, बालखिल्य, वृषाकपि, एवयामरुत् । इनको यदि
पढ़ेगा तो इनमें इच्छा की पूर्त्ति न होगी । वृषाकपि इन्द्र का है ।
एतशप्रलाप सब छन्दों में होता है। जो इन्द्र का जगती छन्द
का मन्त्र है उससे कामना पूरी होती है । इंद्र-बृहस्पति के सूक्त
को इन्द्र बृहस्पति के मन्त्र से समाप्त करता है । इसलिये शस्त्रों
के साथ इन मन्त्रों को न पढ़े । (९)
ऐतरेय ब्राह्मण की छठी पंचिका का पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।
ऐतरेय ब्राह्मण की छठी पंचिका समाप्त हुई ।
सप्तम पञ्चिका
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CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
पहला अध्याय
१—अब पशु के बाँट का विषय है। उसके विभाग कहेंगे।
दोनों जबड़े और जीभ प्रस्तोता के लिये। गरुड़ रूपी छाती
उद्गाता के लिये। कण्ठ और तालु प्रति हर्ता के लिये। दाहिना
नितम्ब होता के लिये। बांया ब्रह्मा के लिये। दाहिनी जाँघ मैत्रा-
वरुण की। बाईं ब्राह्मणाच्छंसी की। दाहिनी बगल कन्धे
सहित अध्वर्यु की। बाईं उपगाताओं की (जो सामगान करने
वालों के साथ पढ़ते हैं), बाँया कन्धा प्रतिप्रस्थाता के लिये,
दाहिने बाजू का नीचे का भाग नेष्टा को, बाँया पोता को,
दाहिनी जाँघ अच्छावाक को, बाईं आग्नीध्र को। दाहिने बाजू
का ऊपरी भाग अत्रेयि को, बाँया सदस्य को, रीढ़ की हड्डी
और मूत्राशय की नलिका गृहपति को, दाहिने पैर भोज देने
वाले गृहपति को, बायें पैर भोज देने वाले गृहपति की स्त्री को।
ऊपर का होंठ इन दोनों का शामिल है। इसको गृहपति ही
बाँटेगा। पूँछ को पत्नियों के लिये ले जाते हैं। लेकिन उनको
( ४११ )
४१२ [ सातवीं पञ्चिका
चाहिये कि उसे किसी ब्राह्मण को दे देवे । कन्धे का मांस,
तीन कीकस ग्रावस्तुत के लिये । तीन दूसरे कीकस और पीठ
के मांस का आधा भाग उन्ने ता को, गर्दन के मांस का दूसरा
अर्ध भाग और बाँया क्लोम, काटने वाले को । वह यदि स्वयं
ब्रह्मा न हो तो उसे ब्रह्मा को दे देवे । शिर सुब्रह्मण्य को जो
कहता है “श्वः सुत्यां”। चमड़ा सुब्रह्मण्य का है। जो इडा का
भाग है वह सब का है। होता का विकल्प से ।
यह सब छत्तीस टुकड़े होते हैं । इनमें से हर एक, एक-एक
अक्षर है जो यज्ञ को ले जाते हैं । बृहती छन्द ३६ अक्षर का
होता है, स्वर्ग लोक बृहती वाले हैं । इस प्रकार प्राणों और
स्वर्ग लोक को प्राप्त करता है और प्राणों और स्वर्गलोकों में
प्रतिष्ठित होता है ।
जिस पशु को इस प्रकार बाँटते हैं वह स्वर्ग को ले जाने
वाला होता है । जो अन्यथा बाँटते हैं वह बुरे और पापी हैं ।
और पशु को व्यर्थ मारते हैं ।
इस प्रकार का पशु का बाँट श्रुत ऋषि के पुत्र देवभाग ने
निकाला था । जब वह इस लोक से चलने लगा तो उसने यह
रहस्य किसी से न कहा । किसी अमनुष्य ने बभ्रु के पुत्र गिरिज़
को बताया । तब से मनुष्य इसका अध्ययन करते हैं । (१)
ऐतरेय ब्राह्मण की सातवीं पञ्चिका का पहला अध्याय समाप्त हुआ ।
दूसरा अध्याय
२—कुछ लोग पूछते हैं कि अगर अग्नि स्थापित करने के
बाद कोई मनुष्य उपवसथ ( यज्ञ के पहले ) के दिन मर जाय
तो उसके यज्ञ का क्या हो ? कुछ लोगों की राय है कि उस
यज्ञ को न करे क्योंकि वह् यज्ञ उसको प्राप्त नहीं होता ।
कुछ पूछते हैं कि अगर कोई अग्निहोत्री अग्नि स्थापित कर
सान्नाय्य या दूसरी आहुतियों के पीछे मर जाय तो इसका क्या
प्रायश्चित्त है ? इसका यही प्रायश्चित है कि सब चीज़ों को इकट्ठा
करके जला दे ।
कुछ पूछते हैं कि हवियों का सामान इकट्ठा करने के पीछे
कोई मर जाय तो उसका क्या प्रायश्चित्त है ? इसका प्रायश्चित्त
यही है कि जिन जिन देवताओं के लिये जो जो हवि इकट्ठी
की गई उस-उस को उस-उस देवता के लिये "स्वाहा" कह कर
आहवनीय अग्नि में दे दे ।
कुछ लोग पूछते हैं कि अगर अग्निहोत्री प्रवास में ( घर से
दूर ) मर जाय तो उसके यज्ञ का क्या हो ? ऐसी गाय के
( ४१३ )
ब्राह्मण में है) । (२)
४१४ [ सातवीं पञ्चिका
दूध की आहुति दे, जिसमें दूसरे का बछड़ा लगाया गया हो
क्योंकि जैसा उस गाय का दूध है वैसा ही मरे हुये का अग्नि-
होत्र है। या किसी और गाय का दूध।
यह भी उपाय बताया जाता है। मृत अग्निहोत्री के सम्बन्धी
उन तीनों अग्नियों को जलता रक्खें जब तक कि मृतक की
अस्थियाँ ठंढी करके इकट्ठी न हों। अगर मृतक का शरीर न
मिले तो ३६० पलाश की लकड़ियां लेकर एक पुरुष की शक्ल
का बनावे और उसका अन्त्येष्टि संस्कार करे। और उन
बनावटी शरीरांगों को उन अग्नियों के पास लाकर अग्नियों को
शांत कर दे। यह पुरुष इस प्रकार बनाया जाय :- १५० लक-
ड़ियों का धड़, १४० की जाँघें, ५० की कमर, शेष का सिर।
यही इसका प्रायश्चित्त है। (१)
३—( पंचिका पाँच, अध्याय ५, ब्राह्मण २७ वही है जो इस
ब्राह्मण में है) । (२)
४—वे पूछते हैं कि यदि सायंकाल को दुहा हुआ सान्नाय्य
खराब हो जाय या खो जाय तो इसका क्या प्रायश्चित्त है ?
इसका प्रायश्चित्त यह है कि अग्निहोत्री प्रातःकाल के दूध के
दो भाग करे और आधे का दही बनाकर उसकी आहुति
दे दे।
अब सवाल है कि अगर प्रातःकाल दुहा हुआ सान्नाय्य
खराब हो जाय या खो जाय तो क्या प्रायश्चित्त है ? इसका
प्रायश्चित्त यह है कि इन्द्र और महेन्द्र के लिये पुरोडाश बनावे
और दूध के बजाय उसके भाग करके आहुति दे।
अब प्रश्न यह है कि यदि सान्नाय्य का सब दूध बिगड़ जाय
या नष्ट हो जाय तो क्या प्रायश्चित्त है ? इसका वही इन्द्र और
महेन्द्र के पुरोडाश का प्रायश्चित्त है।
दूसरा अध्याय ] ४१५
अब प्रश्न यह है कि अगर सभी हवियाँ बिगड़ जायें या
खो जायें तो क्या प्रायश्चित्त है ? इसका प्रायश्चित यह है कि
घी की आहुतियाँ ले और सब देवताओं का भाग अलग अलग
करे । और याज्य हवि को इष्टि के रूप में दे । तब दूसरी इष्टि
तैयार करे । यह यज्ञ ही उस यज्ञ का प्रायश्चित्त है। (३)
५-अब प्रश्न यह है कि अग्निहोत्र का सामान करने पर
अगर अग्नि में कोई अनुचित वस्तु गिर पड़े तो क्या प्रायश्चित्त
है ? इसका प्रायश्चित्त यह है कि इस सब को स्रुच में भर कर
पूर्व को ले जाकर आहवनीय अग्नि में डाल दे। फिर आहवनीय
के उत्तर के भाग से गर्म भस्म को लेकर मन में अग्नि के मंत्रों
को जपकर या प्रजापति के मंत्र को पढ़ कर आहुतियाँ दे दे।
इस प्रकार आहुति जल तो जाती है लेकिन यथा रीति हवन
नहीं होता। चाहे एक आहुति खराब हो चाहे अधिक, प्राय-
श्चित्त वही है। यदि दुष्ट पदार्थ को फेंककर अदुष्ट पदार्थ डाल कर
आहुति दे तो क्रमानुकूल आहुति दे । यह प्रायश्चित्त है।
अब प्रश्न यह है कि यदि अग्नि होत्र के लिये पकाई गई
हवि गिर जाय या उबल कर निकल जाय तो इस का क्या
प्रायश्चित है ? उस पर जल छिड़क दे । शान्ति के लिये ।
जल ही शान्ति है। सीधे हाथ से उसे छू कर यह मंत्र
जपता है :-
“दिवं तृतीयं देवान् यज्ञो गात् । ततो मा द्रविणमाष्टांतरिक्षं
तृतीयं पितॄन् यज्ञो गात् । ततो मा द्रविणमाष्ट पृथिवीं तृतीयं मनुष्यान्
यज्ञो गात् ह । ततो मा द्रविणमाष्ट ।”
“तीसरा यज्ञ के रूप में द्यौ लोक में देवों के पास जावे ।
यहाँ से मुझे धन मिले । तीसरा यज्ञ के रूप में अन्तरिक्ष में
पितरों के पास जावे । वहाँ से मुझे धन मिले । तीसरा यज्ञ के
४१६ [ सातवीं पञ्चिका
रूप में पृथिवी पर मनुष्यों के पास आवे । वहाँ से मुझे धन
मिले । अब वह नीचे का विष्णु और वरुण का मंत्र पढ़े :--
ययोरोजसा स्कभिता रजांसि ( अथर्व० ७।२५।१ )
क्योंकि यज्ञ में जो बुराई है उसकी विष्णु रक्षा करता है
और जो भलाई है उसकी वरुण । उन दोनों की शान्ति के
लिये । यही प्रायश्चित्त है ।
अब प्रश्न है कि जब हवि को तैयार करके अध्वर्यु आहव-
नीय अग्नि में पूर्व की ओर ले जाता है तो उस समय यदि
हवि गिर जाय या उबल कर निकल जाय तो इसका क्या
प्रायश्चित्त है ? यदि वह अपना मुँह पीछे को करेगा तो यज-
मान को स्वर्ग से विमुख कर देगा । इससे कोई दूसरा ही
उसके लिये उस गिरी हुई हवि को इकट्ठा करके यथा क्रम
आहुतियाँ दे देवे । यही उसका प्रायश्चित्त है ।
अब प्रश्न है कि यदि स्रुक् टूट जाय तो क्या प्रायश्चित्त
है ? दूसरा स्रुक् ले और उससे आहुति दे । तब टूटे हुये स्रुक्
को आहवनीय अग्नि में छोड़ दे, हस्ता आगे को और प्याली
पीछे को । यह उसका प्रायश्चित्त है ।
अब प्रश्न है कि अगर आहवनीय की अग्नि ही जलती हो,
गार्हपत्य की बुझ गई हो तो क्या प्रायश्चित्त है ? अगर आहव-
नीय के पूर्व भाग को गार्हपत्य के लिये ले आवे तो अपनी
प्रतिष्ठा खो देगा । यदि पश्चिमी भाग ले आवे तो असुरों के
समान यज्ञ करेगा । यदि फिर अग्नि उत्पन्न करे तो यजमान
के लिये शत्रु बनावेगा । यदि बुझावे तो यजमान के प्राण चलें
जायँ । इसलिये सम्पूर्ण आहवनीय अग्नि को लेकर उस में
गार्हपत्य की राख मिला कर गार्हपत्य अग्नि में रख देवे ।
फिर पूर्व भाग को आहवनीय में रख देवे । यही इसका
प्रायश्चित्त है । (४)
अनुवाक्य यह है :-
दूसरा अध्याय ] ४१७
६-अब प्रश्न है कि यदि किसी अग्निहोत्री की अग्नि में
से अग्नि ले लें तो उसका क्या प्रायश्चित्त है ? अगर पास
दूसरी अग्नि दिखाई पड़े तो उस अग्नि को पहले की जगह पर
रख दे। यदि न दिखाई पड़े तो 'अग्नि अग्निवत्' के लिये आठ
कपालों का पुरोडाश देवे। इसके लिये याज्य मंत्र यह है :-
अग्निना अग्निः समिध्यते (ऋ० १।१२।६)
अनुवाक्य यह है :-
त्वं ह्यग्ने अग्निना...(ऋ० ८।४३।१४)
या बिना याज्य और अनुवाक के केवल
"अग्नये अग्नवते स्वाहा" कहकर घी की आहुति आहवनीय
अग्नि में दे दे। यही इसका प्रायश्चित्त है।
अब प्रश्न है कि अगर किसी की आहवनीय और गार्हपत्य
अग्नियां मिल जायँ तो क्या प्रायश्चित्त है ?
वह 'अग्निनीति' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश दे।
उसका याज्य यह है :-
अग्न आ याहि वीतये...(ऋ० ६।१६।१०)
अनुवाक्य यह है :-
यो अग्निं देववीतये...(ऋ० १।१२।६)
या केवल 'अग्नये वीतये स्वाहा' से आहवनीय में आहुति
दे दे।
अब प्रश्न है कि यदि अग्निहोत्री की तीनों अग्नियां आपस
में मिल जायँ तो इसका क्या प्रायश्चित्त है। वह अग्नि विविचि
के लिये आठ कपालों का पुरोडाश देवे। उसका याज्य
यह है :-
स्वर्णा वस्तोरुषसामरोचि...(ऋ० ७।१०।२)
अनुवाक्य यह है :-
त्वामग्ने मानुषी रीङते विशः...(ऋ० ५।८।३)
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४१८ [सप्तम पञ्चिका
या केवल 'अग्नये विविचये' से आहवनीय में घी की
आहुति दे देवे। यही इसका प्रायश्चित्त है।
अब प्रश्न है कि यदि किसी की अग्नियां दूसरे की अग्नियों
में मिल जायें तो क्या प्रायश्चित्त है ? "क्षामवत् अग्नि" के
लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनावे, उसका याज्य मन्त्र
यह है :—
अक्रन्ददग्निः स्तनयन्निव द्यौः...(ऋ० १०।४५।४)
अनुवाक्य यह है :—
अधा यथा नः पितरः परासः...(ऋ० ४।२।१६)
या केवल 'अग्नये क्षामवते स्वाहा' से आहवनीय में घी
की आहुति दे देवे। यही इसका प्रायश्चित्त है। (५)
७—अब प्रश्न है कि यदि किसी की अग्नियां गाँव की अग्नि
के साथ जल उठें तो क्या प्रायश्चित्त है ? वह 'अग्नि संवर्ग'
के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनाये, उसका याज्य
यह है :—
कुवित् सु नो गविष्टये...(ऋ० ८।७५।११)
अनुवाक्य यह है :—
मा नो अस्मिन्महाधने...(ऋ० ८।७५।१२
या केवल 'अग्नये संवर्गाय स्वाहा' से आहवनीय अग्नि
में घी की आहुति देवे। यही उसका प्रायश्चित्त है।
अब प्रश्न है कि यदि किसी की अग्नियां दिव्य अग्नि से
मिल जायें तो इसका क्या प्रायश्चित्त है ? वह 'अग्नि अप्सुमत्'
के लिये आठ कपाल का पुरोडाश बनावे। याज्य मंत्र यह है—
अप्स्वग्ने सधिष्टव...(ऋ० ८।४३।६)
अनुवाक्य यह है :—
मयो दधे मेधिरःपूतदक्षो...(ऋ० ३।१।३)
दूसरा अध्याय ] ४१९
या केवल 'अग्नये अप्सुमते स्वाहा' से आहवनीय अग्नि
में घी की आहुति दे दे। यही उसका प्रायश्चित्त है।
अब प्रश्न है कि जब अग्निहोत्री की अग्नियाँ लाश की
अग्नि से मिल जायें तो क्या प्रायश्चित्त है ? 'अग्नि शुचि'
के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनाये ! उसका याज्य मंत्र
यह है :-
अग्निः शुचिव्रततमः... ( ऋ० ८।४४।२१ )
अनुवाक्य यह है :-
उदग्ने शुचयस्तव... ( ऋ० ८।४४।१७ )
या केवल 'अग्नये शुचये स्वाहा' से आहवनीय में घी की
आहुति दे देवे। यही उसका प्रायश्चित्त है।
अब प्रश्न है कि जिसकी अग्नियाँ अरण्य की अग्नि से
मिल जावें उसका क्या प्रायश्चित्त है ? वह अरणियों से उस
को पकड़ ले। और यदि संभव न हो तो आहवनीय या
गार्हपत्य से एक जलती लकड़ी ले, और बचा रक्खे। यदि
यह भी संभव न हो तो 'अग्नि संवर्ग' के लिये आठ कपालों
का पुरोडाश बनाये और ऊपर दिये याज्य और अनुवाक्यों
का प्रयोग करे। या 'अग्नये संवर्गाय स्वाहा' से घी की एक
आहुति दे देवे। यही उसका प्रायश्चित्त है। (६)
८-अब प्रश्न यह है कि यदि उपवास के दिन अग्निहोत्री
हवि पर आँसू बहा दे तो क्या प्रायश्चित्त है ? वह 'अग्नि व्रत-
भृत्' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनावे। उसका याज्य
यह है :-
त्वमग्ने व्रतभृच्छुचि... ( आश्व० ३।११ )
अनुवाक्य यह है :-
व्रतानि विभ्रद् व्रतपा अदब्ध... ( आश्व० ३।११ )