ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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रहस्य को समझता है वह संवत्सर की सायुज्यता, सारूपता
और सालोक्यता प्राप्त करता है ।
इन मंत्रों को प्रग्राह विधि से पढ़ना चाहिये । जैसे वृषा-
कपि । क्योंकि इनका भी वृषाकपि का सा रूप है । जो नियम
वृषाकपि के पढ़ने में होना चाहिये वह इसमें भी । इनमें
न्यूंख नहीं होना चाहिये । निनाद होना चाहिये । यही उनका
न्यूंख है ।
यह “कारव्या मंत्रों” (अथर्व० २०।१२७।११-१४) को पढ़ता
है । देवों ने जो कोई कल्याण कर्म किया वह कारव्या के द्वारा
किया । इसी प्रकार यजमान भी जो कुछ कल्याण कर्म करते हैं
वह व्याख्या के द्वारा करते हैं ।
इनको भी प्रग्राह की विधि से पढ़ना चाहिये । जैसे वृषा-
कपि मंत्र पढ़े जाते हैं । जो वृषाकपि का रूप है । वह इनका
रूप है । इसलिये जो नियम वृषाकपि के हैं वही इनके भी
होने चाहिये । इनमें न्यूंख नहीं होता, निनाद होता है । यही
इनका न्यूंख है ।
अब वह “दिशांकॢप्ती” (अथर्व २०।१२८।१-५) मंत्रों को
पढ़ता है । क्योंकि वह इस प्रकार दिशाओं को बनाता है ।
ऐसे पाँच मंत्र पढ़ता है । पाँच दिशाएँ हैं । चार पूर्व, पश्चिम,
उत्तर, दक्षिण, और एक उनके ऊपर । इनमें न न्यूंख होता है,
न निनाद । वह सोच कर कि मैं इन दिशाओं को बिगाड़ूँ नहीं
(न्यूंख यानि) वह आधा आधा मंत्र करके पढ़ता है ।
प्रतिष्ठा के लिये 'जनकल्प' मंत्रों (अथर्व० २०।१२८।६ ११)
को पढ़ता है । प्रजा जनकल्प है । ऊपर की रीति से दिशा बना
कर वह उनमें प्रजा को रखता है । इनमें न्यूंख नहीं होता, न
निनाद होता है । यह सोच कर कि मैं प्रजा को न बिगाड़ूँ, वह
आधी आधी ऋचा करके पढ़ता है ।