ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 426, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ें४१२ [ सातवीं पञ्चिका
चाहिये कि उसे किसी ब्राह्मण को दे देवे । कन्धे का मांस,
तीन कीकस ग्रावस्तुत के लिये । तीन दूसरे कीकस और पीठ
के मांस का आधा भाग उन्ने ता को, गर्दन के मांस का दूसरा
अर्ध भाग और बाँया क्लोम, काटने वाले को । वह यदि स्वयं
ब्रह्मा न हो तो उसे ब्रह्मा को दे देवे । शिर सुब्रह्मण्य को जो
कहता है “श्वः सुत्यां”। चमड़ा सुब्रह्मण्य का है। जो इडा का
भाग है वह सब का है। होता का विकल्प से ।
यह सब छत्तीस टुकड़े होते हैं । इनमें से हर एक, एक-एक
अक्षर है जो यज्ञ को ले जाते हैं । बृहती छन्द ३६ अक्षर का
होता है, स्वर्ग लोक बृहती वाले हैं । इस प्रकार प्राणों और
स्वर्ग लोक को प्राप्त करता है और प्राणों और स्वर्गलोकों में
प्रतिष्ठित होता है ।
जिस पशु को इस प्रकार बाँटते हैं वह स्वर्ग को ले जाने
वाला होता है । जो अन्यथा बाँटते हैं वह बुरे और पापी हैं ।
और पशु को व्यर्थ मारते हैं ।
इस प्रकार का पशु का बाँट श्रुत ऋषि के पुत्र देवभाग ने
निकाला था । जब वह इस लोक से चलने लगा तो उसने यह
रहस्य किसी से न कहा । किसी अमनुष्य ने बभ्रु के पुत्र गिरिज़
को बताया । तब से मनुष्य इसका अध्ययन करते हैं । (१)
ऐतरेय ब्राह्मण की सातवीं पञ्चिका का पहला अध्याय समाप्त हुआ ।