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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 431, कुल 592 में से

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पृष्ठ 431

दूसरा अध्याय ] ४१७
६-अब प्रश्न है कि यदि किसी अग्निहोत्री की अग्नि में
से अग्नि ले लें तो उसका क्या प्रायश्चित्त है ? अगर पास
दूसरी अग्नि दिखाई पड़े तो उस अग्नि को पहले की जगह पर
रख दे। यदि न दिखाई पड़े तो 'अग्नि अग्निवत्' के लिये आठ
कपालों का पुरोडाश देवे। इसके लिये याज्य मंत्र यह है :-
अग्निना अग्निः समिध्यते (ऋ० १।१२।६)
अनुवाक्य यह है :-
त्वं ह्यग्ने अग्निना...(ऋ० ८।४३।१४)
या बिना याज्य और अनुवाक के केवल
"अग्नये अग्नवते स्वाहा" कहकर घी की आहुति आहवनीय
अग्नि में दे दे। यही इसका प्रायश्चित्त है।
अब प्रश्न है कि अगर किसी की आहवनीय और गार्हपत्य
अग्नियां मिल जायँ तो क्या प्रायश्चित्त है ?
वह 'अग्निनीति' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश दे।
उसका याज्य यह है :-
अग्न आ याहि वीतये...(ऋ० ६।१६।१०)
अनुवाक्य यह है :-
यो अग्निं देववीतये...(ऋ० १।१२।६)
या केवल 'अग्नये वीतये स्वाहा' से आहवनीय में आहुति
दे दे।
अब प्रश्न है कि यदि अग्निहोत्री की तीनों अग्नियां आपस
में मिल जायँ तो इसका क्या प्रायश्चित्त है। वह अग्नि विविचि
के लिये आठ कपालों का पुरोडाश देवे। उसका याज्य
यह है :-
स्वर्णा वस्तोरुषसामरोचि...(ऋ० ७।१०।२)
अनुवाक्य यह है :-
त्वामग्ने मानुषी रीङते विशः...(ऋ० ५।८।३)
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