ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
ब्राह्मणाच्छंसी प्रतिदिन यह मंत्र पढ़ता है :—
चौथा अध्याय ] ३८७
करना चाहिये ) । इन मंत्रों को पढ़ कर इन्द्र को बुलाता है जैसे
गाय के पास बैल को। यह पाठ यज्ञ के सिलसिले को कायम
रखने के लिये है। इससे सिलसिला कायम रहता है। (५)
२२—मैत्रावरुण सूक्तों से पहले हर दिन यह मंत्र बोलता
है :—
अप प्राच इन्द्र विश्वाँ अमित्रानपाचो अभिभूते नुदस्व ।
अपोदीचो अप शूराधराच उरौ यथा तव शर्मन् मदेम ॥
( ऋ० १०।१३१।१ )
“हे इन्द्र सब अमित्रों को दूर कर दो। हे विजयी, उनको
भगा दो। चाहे वे दक्षिण में हों या उत्तर में। जिससे कि हम
तेरी विस्तृत शरण से लाभ उठा सकें।”
इसमें अभय की बात है। वह अभय चाहता है।
ब्राह्मणाच्छंसी प्रतिदिन यह मंत्र पढ़ता है :—
ब्रह्मणा ते ब्रह्मयुजा युनज्मि...( ऋ० ३।३५।४ )
'युनज्मि' में 'जोड़' का भाव है। 'अहीन यज्ञों का यही
रूप है।
अच्छावाक प्रतिदिन यह मंत्र पढ़ता है :—
उरुं नो लोकमनु नेषि विद्वान्...( ऋ० ६।४७।८ )
'अनु' अहीन यज्ञों का रूप है। और 'नेषि' सत्र का रूप
है।
इन मंत्रों को रोज पढ़े। अन्त के मंत्र एक से हैं। इन्द्र
यजमान के घर में व्यापक है। वह यज्ञ में है। जैसे बैल गाय
के पास जाता है और गाय प्रसिद्ध गोशाला में जाती है। इसी
प्रकार इन्द्र यज्ञ में जाता है।
अहीन यज्ञ को “शुनं हुवेम” ( ऋ० ३।३०।२२ ) से समाप्त
न करें। क्योंकि जो क्षत्रिय उसको अपने राज्य में आने देता
३८८ [छठी पञ्चिका
है जो उसका शत्रु हो चुका है तो उसका राष्ट्र क्षीण हो
जाता है। (६)
२३—अहीन 'यज्ञ की युक्ति भी है और विमुक्ति भी।
( जोड़ना और अलग करना )।
अहीन इन ब्राह्मणाच्छंसीय मंत्रों से युक्त होता है ;—
व्यंतरिक्षमतिरद्...( ऋ० ८।१४।७-६ )
और इन मंत्रों से विमुक्त होता है:—
एवेदिंद्रम्...( ऋ० ७।२३।६ )
अच्छावाक् के इस मंत्र से युक्त होता है :—
आहं सरस्वती वतोः...( ऋ० ८।३८।१० )
इस मंत्र से विमुक्त होता है :—
नूनं सा ते...( ऋ० २।११।२१ )
मैत्रावरुण इस मंत्र से जोड़ता है :—
ते स्याम देववरुण...( ऋ० ७।६६।६ )
और इससे विमुक्त करता है :—
नू ष्टुत... ऋ० ४।१६।२१ )
जो अहीनों को युक्त करना और विमुक्त करना जानता
है। वह अहीन यज्ञ के सिलसिले को कायम रख सकता है।
चौबीसवें दिन जोड़ते हैं वह युक्ति है और अन्तिम अति-
रात्र के दिन अलग करते हैं यह विमुक्ति है।
अगर एकाह के मंत्रों से समाप्त करते हैं तो अहीन यज्ञ का
कृत्य नहीं हो सकता। अगर अहीन का कृत्य करके समाप्त
करते हैं तो जैसे थके बैल को अलग कर देते हैं, ऐसे ही यज-
मान भी यज्ञ से अलग हो जाता है। इसलिये एकाह और अहीन
कृत्यों से समाप्त करना चाहिये जैसे दूर की यात्रा करने वाले
मंजिल पर बैल बदल देते हैं। इस प्रकार यज्ञ सिलसिलेवार हो
जाता है और यजमान विश्राम ले लेते हैं।
चौथा अध्याय ] ३८९
दोनों सवनों में स्तोमों में नियत मंत्रों से एक या दो से
अधिक न बोले। अधिक बोलने से बड़े वन के समान हो जाता
है, तीसरे सवन में अपरिमित बोले क्योंकि स्वर्ग अपरिमित
है। स्वर्ग लोक की प्राप्ति के लिये।
जो इस रहस्य को समझता है उसका अहीन यज्ञ आरंभ
होकर विना विघ्न के समाप्त होता है। (७)
२४—देवों ने वल ( कन्दरा ) में गायों को देखा। उन्होंने
यज्ञ के द्वारा उनको लेना चाहा। छठे दिन के द्वारा उन्होंने
इनको पा लिया। पहले सवन में नभाक ( खोदने का कुदाल )
द्वारा वल खोदा। फिर जब छिद्र हो गया तो पत्थरों को हटाया
और तीसरे सवन में वालखिल्य मंत्रों रूपी वज्र द्वारा 'वाचः
कूट' नामी एक पद से वल को तोड़ लिया और गायों को
निकाल लिया।
इस प्रकार यजमान प्रातः सवन में नभाक द्वारा वल को
तोड़ते हैं और उसके पत्थरों को ढीला कर लेते हैं। इसी लिये
होत्रक लोग प्रातः सवन में नाभाक तृचों को पढ़ते हैं। मैत्रा-
वरुण “यः ककुभो निधारयः” ( ८।४१।४-६ ) को, ब्राह्मणाच्छंसी
“पूर्वीष्ट इंद्रोपमातयः” ( ८।४०।६-११ ) को अच्छावाक “ताहि
मध्यं भराणा” ( ८।४०।३-५ ) को। तीसरे सवन में वालखिल्य
वज्र से और “वाचः कूट” एक पद द्वारा वल को खोद कर
गायों को पालते हैं। वालखिल्य सूक्त छः हैं। उनको तीन बारी
में पढ़ते हैं। पहले यह पद करके, फिर आधी आधी ऋचा
करके, फिर ऋचा वार ।
जब पद पद करके पढ़ता है तो हर प्रगाथ में एक पद
रखे। इस प्रकार के एक पद पाँच हैं। चार दशाह से लिये हैं
और एक महाव्रत से ।
३९० [ छठी पञ्चिका
महानामन पदों से आठ अक्षरों को जब जब आवश्यकता
हो पूरा कर लें। इतरों की परवाह नहीं।
जब आधे आधे मंत्र पढ़ें तो उन पाँच एकपदों को पढ़ें।
और महानाम्नी से आठ अक्षर पूरा कर लें।
जब ऋचावार बालखिल्यों को पढ़ें तो उन पाँच एकपदों
को पढ़ें और महानाम्नी मंत्रों से आठ अक्षर लेकर पूरा
कर लें।
जब छः बालखिल्यों को पहली बार पढ़ता है तो प्राण और
वाणी का विहार कर देता है। जब दूसरी बार पढ़ता है तो
आँख और मन को मिला देता है। जब तीसरी बार पढ़ता है
तो कानों और आत्मा को मिला देता है।
इस प्रकार विहार का सब काम समाप्त हो जाता है । और
बालखिल्य रूपी वज्र, तथा एक पद वाचःकूट और प्राणों का
निर्माण इन सब के सम्बन्ध का कार्य्य समाप्त हो जाता है।
बालखिल्य प्रगाथों को बिना विहार के (बिना दो सूक्तों
को मिलाये हुये चौथी बार पढ़ता है। प्रगाथ पशु हैं। पशुओं
की प्राप्ति के लिये। यहाँ बीच में एक पद नहीं मिलाना चाहिये।
अगर बीच में एक पद मिलायेगा तो 'वाचः कूट' के द्वारा
यजमान को पशुओं से अलग कर देगा उनको मारकर। यदि
किसी होत्रक को ऐसा करते देखे तो उससे कहे कि तुम ने
यजमान से पशुओं को मार कर अलग कर दिया। तुमने
उसको पशुओं से वंचित कर दिया। ऐसा हो ही जाता
है। इसलिये ऐसे अवसर पर एकपाद को मिलाना नहीं
चाहिये।
बालखिल्य के पिछले दो सूक्तों (७वां, ८वां) को पर्यास
के तौर पर जोड़ता है (मानों किसी बर्तन पर ढक्कन रख दिया)
इन दोनों को मिला देता है। वत्स के पुत्र सर्पि ने सुबल नामी
ब्राह्मण कही जा चुकी (४।२०)। जिसको पशु की कामना हो
चौथा अध्याय ] ३९१
यजमान के लिये इनको इसी प्रकार पढ़ा था। उसने कहा था,
'मैंने यजमान के लिये बहुत पशु पकड़ लिये। बहुत अच्छे
मुझे मिलेंगे।' उसने उसको इतनी ही दक्षिणा दी जितनी
बड़े २ ऋत्विजों को दी गई। इस शस्त्र से पशु और स्वर्ग की
प्राप्ति होती है। इसलिये इसका पाठ किया जाता है ।(८)
२५-अब दुरोहण का पाठ करता है। इसके लिये एक
ब्राह्मण कही जा चुकी (४।२०)। जिसको पशु की कामना हो
वह इन्द्र का सूक्त पढ़े। क्योंकि पशु इन्द्र के हैं। यह जगती
छन्द में हो, क्योंकि पशु जागत (चलने वाले) हैं। यह महा-
सूक्त होना चाहिये जिससे यजमान को बहुत से पशु मिल
जायें। वरु ऋषि का सूक्त पढ़े (१०।९६ प्रतेमहे)। यह महा
सूक्त भी है और जगती छन्द में भी है।
प्रतिष्ठा की कामना हो तो इन्द्र वरुण का सूक्त पढ़े।
क्योंकि यह होत्र उसी देवता का है। यह इन्द्र वरुण की
प्रतिष्ठा है। यह जो इन्द्र-वरुण का याज्य है वह उसी अपनी
ही प्रतिष्ठा में स्थित है। यह इन्द्र-वरुण का सूक्त निविद् के
समान है इससे कामनायें पूरी हो जाती हैं। जब इन्द्र-वरुण
का सूक्त दुरोहण के लिये चुने तो सुपर्ण ऋषि का चुने
(८।३९ इमानि वां भागधेयानि...)। इससे इन्द्र-वरुण तथा
सुपर्ण सम्बन्धी कामना एक साथ पूरी हो सकती है ।(९)
२६-प्रश्न होता है कि दुरोहण के साथ छठे दिन के
अहीन सूक्त पढ़े या न पढ़े ? इसका उत्तर यह है कि अवश्य
पढ़े। जब और दिन पढ़ता है तो आज क्यों न पढ़े !
कुछ लोग कहते हैं कि न पढ़े। छठा दिन स्वर्ग लोक है।
स्वर्ग लोक असमायी है अर्थात् सब इस को प्राप्त नहीं कर
सकते (inaccessible)। स्वर्ग लोक में कोई विरला ही
पहुँचता है। अगर दुरोहण के साथ में और सूक्त भी पढ़े
३९२ [छठी पञ्चिका
जायँगे तो सभी बराबर हो जायँगे । स्वर्ग लोक की विशेषता
यह है कि दुरोहण के साथ अन्य सूक्त न पढ़े जायँ । इस
लिये न पढ़े।' इसीलिये नहीं पढ़ता । स्तोत्रिय आत्मा हैं और
वालखिल्य प्राण हैं । जब अहीन सूक्तों का दुरोहण के साथ
पाठ करता है तो इन दो देवतों के द्वारा यजमान के प्राण ले
लेता है। जब किसी होत्रक को ऐसा करते देखे तो कहे कि
तू ने इन दो देवताओं के द्वारा यजमान के प्राण ले लिये ।
और वह मर जायगा । सदा ऐसा ही होता है । इस लिये
न पढ़े ।
अगर मैत्रावरुण सोचे कि मैंने वालखिल्य का पाठ कर
लिया, अब मैं दुरोहण के पूर्व एकाह सूक्त पढूँ, उसे ऐसा न
करना चाहिये। लेकिन अगर घमंड में आकर कहे कि दुरोहण
के पीछे बहुत सैकड़ों सूक्त पढ लूँ गा तो इस कामना की पूर्ति
के लिये पढ़ ले। परन्तु न पढ़ना अच्छा है। वालखिल्य इन्द्र
के हैं। उनमें बारह अक्षरों के पद होते हैं। और जगती छन्द
के इन्द्र के सूक्त से जो कामना पूरी हो सकती है वह इनसे
भी पूरी हो सकती है ।
न पढने के लिये एक हेतु यह है कि यह इन्द्र-वरुण के
सूक्त हैं। और इन्द्र-वरुण के याज्य से ही यज्ञ की समाप्ति
होती हैं।
कहते हैं कि जैसा स्तोत्र हो वैसा शस्त्र हो । प्रश्न यह है
कि क्या विहार युक्त (मिले हुये) वालखिल्यों की गणना
ऐसे स्तोत्रों में है या बिना मिले हुये (अविहृत) की ? इसका
उत्तर है कि विहृत सूक्तों की है । बारह अक्षरों का पद आठ
अक्षरों के पद से मिल जाता है ।
कहते हैं कि जैसा याज्य हो वैसा शस्त्र हो । अगर शस्त्र में
तीन देवता हों अर्थात् अग्नि, इन्द्र और वरुण तो केवल इन्द्र-
चौथा अध्याय ] ३९३
वरुण का याज्य कैसे पढ़े, अग्नि को कैसे छोड़ दे ? इसका उत्तर
यह है कि अग्नि और वरुण तो एक ही हैं। ऋषि भी यही
कहता है :—
त्वमग्ने वरुणो जायसे ( ५।३।१ )
इसलिये इन्द्र और वरुण के याज्य में अग्नि छूटता नहीं । (१०)
ऐतरेय ब्राह्मण की छठी पञ्चिका का चौथा अध्याय समाप्त हुआ ।
पाँचवाँ अध्याय
२७—शिल्पसूक्तों को पढ़ते हैं। देव-शिल्प बहुत से हैं।
और यह जो मानवी शिल्प है वह देव-शिल्पों की अनुकृति है।
हाथी की सुनहरी झूलें और घोड़ों के रथ यह सब शिल्प हैं।
जो इस रहस्य को समझता है वह शिल्प को जान सकता है।
शिल्पों से आत्मा का संस्कार होता है और आत्मा छन्दोमय
हो जाती है। होत्रक इनसे यजमान की आत्मा का संस्कार कर
देता है।
नाभानेदिष्ठ को पढ़ता है। नाभानेदिष्ठ वीर्य है। इस
प्रकार वह वीर्य को सींचता है। यह अनिरुक्त पढ़ा जाता है
(अर्थात् नाभानेदिष्ठ का मंत्र में नाम नहीं होता) क्योंकि
वीर्य का नाम नहीं लेते। उसे गुप्त रीति से योनि में डाल
देते हैं। वह वीर्य मिश्रित हो जाता है। (जब प्रजापति ने
पुत्रों के साथ समागम किया) तब वह वीर्य जमीन पर गिर
गया। सन्तानोत्पत्ति के लिये। (ऋ० १०।६१।६)
अब नराशंस को पढ़ता है। 'नर' का अर्थ है 'प्रजा', 'शंस'
( ३९४ )
पाँचवाँ अध्याय ] ३९५
का अर्थ है 'वाक्' । इस प्रकार सन्तान में वाणी को रखता है ।
इस प्रकार बोलने वाली सन्तान उत्पन्न होती है ।
कुछ लोग नाराशंस को नाभानेदिष्ठ से पहले बोलते हैं
क्योंकि जबान आगे है। कुछ पीछे क्योंकि जबान पिछले भाग
में है। मध्य में बोले क्योंकि वाणी मध्य में है। चूँकि वाणी
नाभानेदिष्ठ के अगले भाग के निकटतम है अतः नाराशंस को
नाभानेदिष्ठ के समाप्त होने से पहले पढ़ना चाहिये ।
होता यजमान को वीर्य के रूप में मैत्रावरुण को दे देता
है। यह कहकर "तू इसका प्राण बना” । (१)
२८—अब वह वालखिल्य पढ़ता है। वालखिल्य प्राण हैं।
इस प्रकार वह यजमान के प्राण बनाता है। वह वालखिल्य
को विहृत दशा में पढ़ता है (अर्थात् एक मन्त्र के एक भाग से
मिलाकर)। क्योंकि यह प्राण मिले हुये हैं, प्राण अपान से
और अपान व्यान से । पहले दो सूक्तों में पद-वार मिलाता
है। दूसरे दो में आधी आधी ऋचा करके। और तीसरे दो
में मंत्र-वार ।
पहले सूक्त में जो मिलाता है सो प्राण और वाणी को
मिलाता है। दूसरे में चक्षु और मन को । तीसरे में कान और
आत्मा को ।
कुछ लोग वालखिल्य पढ़ते हुये दो बृहती और दो सतो-
बृहती को मिलाते हैं। इससे इच्छा तो पूरी हो जाती है परन्तु
प्रगाथ नहीं बनते । एक पद अधिक मिला कर पढ़े तो प्रगाथ
बन जाते हैं। वालखिल्य प्रगाथ हैं। इस लिये एक पद मिला
कर पढ़े ।
बृहती आत्मा है और सतोबृहती प्राण । बृहती के पढ़ने से
आत्मा बनता है और सतोबृहती से प्राण । इस प्रकार बृहती
और सतोबृहती के पढ़ने से आत्मा को प्राणों से युक्त करता
ब्राह्मणाच्छंसी के हवाले कर देता है। यह कहकर कि "तू उत्पन्न
३९६ ।[ छठी पञ्चिका
है। वालखिल्यों को पद बढ़ा कर ऐसे पढ़े कि प्रगाथ बन
जायें।
बृहती आत्मा है और सतोबृहती पशु। बृहती पढ़ने से
आत्मा बनता है और सतोबृहती पढ़ने से पशु बनते हैं। दोनों
के पढ़ने से आत्मा को पशुओं से युक्त कर देता है। इसलिये
पद बढ़ाकर पढ़े। पिछले दो सूक्त क्रम बदल कर पढ़े जाते हैं।
यह उनका विहार है।
मैत्रावरुण इस प्रकार यजमान के प्राण बनाकर उसको
ब्राह्मणाच्छंसी के हवाले कर देता है। यह कहकर कि "तू उत्पन्न
कर'। (२)
२९-अब ब्राह्मणाच्छंसी 'सुकीर्ति' सूक्त (ऋ० १०।१३१)
को पढ़ता है। सुकीर्ति देवयोनि है। इस प्रकार यज्ञ रूपी देव
योनि से यजमान को उत्पन्न करता है।
अब वृषाकपि सूक्त (ऋ० १०।८६) को पढ़ता है। वृषा-
कपि आत्मा है। इस प्रकार यजमान के आत्मा को बनाता है।
उसको वह न्यूंख के साथ पढ़ता है। न्यूंख अन्न है। इस प्रकार
वह उसे उत्पन्न होने पर अन्न से युक्त करता है जैसे माँ बच्चे
को दुग्धपान कराती है।
यह सूक्त पंक्ति छन्द में है। पुरुष के पाँच भाग हैं—लोम,
त्वचा, माँस, अस्थि, मज्जा। वह जैसे पुरुष बनता है उसी प्रकार
यजमान को बनाता है।
ब्राह्मणाच्छंसी उसको पैदा करके अच्छावाक को दे देता
है, यह कह कर, "इसके लिये प्रतिष्ठा को बना"। (३)
३०—'एवायामरुत' सूक्त को अच्छावाक पढ़ता है, 'एव-
यामरुत' प्रतिष्ठा है। इससे यजमान के लिये प्रतिष्ठा का
संपादन करता है। इसको न्यूंख से पढ़ता है। न्यूंख अन्न है।
इससे यजमान को अन्न युक्त करता है। इस सूक्त का छन्द
पाँचवाँ अध्याय ] ३९७
जगती और अतिजंगती है । यह जो कुछ संसार में हैं वह या
तो जगत् ( जंगम ) है या अति जगत् ( या स्थावर ) । यह
सूक्त मरुत का है । मरुत जल हैं । जल अन्न हैं जो भरे जाने
चाहियें । इस प्रकार वह यजमान को अन्न से युक्त करता है ।
यह जो नाभानेदिष्ठ, बालखिल्य, वृषाकपि और एवयामरुत
सूक्त हैं यह सहचर कहलाते हैं । उनको दूसरों के साथ साथ
पढ़े । अगर दूसरों के साथ न पढ़ना चाहे तो न पढ़े । इनको
अलग पढ़ना ऐसा ही है जैसे किसी पुरुष को उसके वीर्य से
अलग करना । इस लिये या तो इनको दूसरे सूक्तों के साथ
पढ़े या न पढ़े ।
अश्व के पुत्र अश्वतर के पुत्र बुलिल ने विश्वजित यज्ञ में
होता बनते हुये इन शिल्पों के विषय में ऐसा विचार किया
था :- “संवत्सर के विश्वजित् यज्ञ में मध्यसवन में दो शस्त्र
( मैत्रावरुण और ब्राह्मणाच्छंसी ) बढ़ाने के बाद मैं 'एवया-
मरुत' सूक्त पढूँगा ।” उसने ऐसा ही किया । जब वह पढ़
रहा था तो गौशल आया । और कहने लगा “होता, यह
तेरा शस्त्र बिना पहियों के जैसा क्यों घसिट रहा है ? यह दशा
कैसे हो गई ? एवयामरुत तो उत्तर की ओर पढ़ा जाता है” ।
फिर उसने कहा, 'मध्य सवन इंद्र का है । तू इन्द्र को इसमें
से क्यों निकालना चाहता है ?” उसने उत्तर दिया, “मैं इंद्र
को इससे निकालना नहीं चाहता” । उसने कहा, “तुम चाहते
हो । क्योंकि यह जगती और अतिजगती छन्द मध्यसवन का
नहीं हैं। यह सूक्त मरुतों का है । इसलिये यहाँ इसका पाठ
नहीं होना चाहिये ।” उसने कहा, “अच्छावाक, ठहर
जाओ । मैं इनके अनुशासन को पूरा करूँ गा” । गौशल ने कहा,
“इंद्र का सूक्त पढ़ो जिसमें विष्णु की छाप पड़ी हो” । इसलिये
हे होता, अपने शस्त्र में से 'एवयामरुत' छोड़ दो जो रुद्र
३९८ [ छठी पञ्चिका
धाय्या के पहले और मरुत शस्त्र के पीछे पढ़ा गया। उसने ऐसा
ही किया और अब भी ऐसा ही करते हैं। (४)
३१—इस पर एक शंका होती है। बालखिल्य प्राण हैं और
नाभानेदिष्ट वीर्य। वीर्य प्राणों से पहले होता है। जब विश्वजित,
अतिरात्र और षडह के छठे दिन मैत्रावरुण बालखिल्य को
पढ़ता है जो प्राण का रूप है तो नाभानेदिष्ट को क्यों नहीं
पढ़ता जो वीर्य का रूप है ? इसी प्रकार ब्राह्मणाच्छंसी वृषा-
कपि को क्यों पढ़ता है जब नाभानेदिष्ट नहीं पढ़ा जाता। वृषा-
कपि आत्मा है। नाभानेदिष्ट वीर्य है। आत्मा अर्थात् शरीर
से वीर्य पहले होता है। यज्ञ से ही यजमान का संस्कार करते
हैं। जिस प्रकार योनि में गर्भ बनता है। वह एक ही दिन में
नहीं बन जाता। एक एक अंग बनता है। जब पूरा बन जाय
तभी कहते हैं कि बन गया इसी प्रकार यज्ञ के पूरी तरह से
बनने पर यजमान भी बन जाता है।
होता तीसरे सवन में 'एवयामरुत' पढ़ता है। यही यजमान
की प्रतिष्ठा है जिसको वह अन्त में रखता है। (५)
३२—षडह के छठे दिन छन्दों का रस बहने लगा।
प्रजापति डरा कि कहीं यह छन्दों का रस बाहर न निकल जाय
और लोकों में फैल जाय। इसीलिये उसने दूसरे स्थान पर छन्द
रखकर उसको दबा दिया। नाराशंसी से गायत्री का रस
दबाया। रैभि से त्रिष्टुभ् का। पारिक्षिति से जगती का, कारव्य
से अनुष्टुभ् का। इस प्रकार उसने छन्दों को फिर रसयुक्त
कर दिया। जो इस रहस्य को समझता है उसका यज्ञ रसवाले
छन्दों से पूरा होता है। और वह यज्ञ को रस युक्त छन्दों से
पूरा करता है।
अब नाराशंसी को पढ़ता है। नर का अर्थ है सन्तान और
शंस का अर्थ है वाक्। इस प्रकार वह संतान में वाणी की
पांचवां अध्याय ] ३९९
स्थापना करता है। जो इस रहस्य को समझता है उसकी संतान
वाणीयुक्त होती है। देवों और ऋषियों ने नाराशंसी के द्वारा
स्वर्ग को प्राप्त किया। जो इस रहस्य को समझता है उसको भी
स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
यह प्रग्राह* की रीति से पढ़े जाते हैं जैसे वृषाकपि पढ़ा
जाता है। (नाराशंसी) वृषाकपि के रूप के हैं। इसलिये
भी ऐसा ही नियम है। इनके पाठ में न्यूंख नहीं होता किन्तु
एक प्रकार का निनाद होता है। नाराशंसी मंत्रों का यही
न्यूंख है।
होता रैभी मंत्रों (अथर्व० २०।१२७।४) को पढ़ता है।
देव और ऋषि शोर करते हुये (रेभंतो) स्वर्ग को गये थे।
इसी प्रकार यजमान भी शोर करते हुये (रेभंतो) स्वर्ग को
जाते हैं। इसको प्रग्राह की रीति से पढ़ता है। जैसे वृषाकपि।
यह भी वृषाकपि के रूप के हैं। इसलिये इनके पाठ का भी
वैसा ही नियम है। उनका न्यूंख नहीं होता, निनाद होता है।
इनका यही न्यूंख है।
अब यह पारिक्षिति (अथर्व० २०।१२७।७-१०) को पढ़ता
है। अग्नि परिक्षित है (चारों ओर घूमती है)। प्रजा अग्नि के
चारों ओर रहती है और अग्नि प्रजा के चारों ओर। जो इस
रहस्य को समझता है, वह अग्नि की सायुज्यता, सारूपता और
सालोक्यता प्राप्त करता है। पारिक्षिती मंत्रों के विषय में एक
और बात है। संवत्सर परिक्षित है। संवत्सर प्रजा के चारों
ओर रहता है और प्रजा संवत्सर के चारों ओर। जो इस
*'प्रग्राह' एक पाठ की विधि है जिसमें दो तीन पदों के बाद
ठहरना पड़ता है।
४०० [छठी पञ्चिका
रहस्य को समझता है वह संवत्सर की सायुज्यता, सारूपता
और सालोक्यता प्राप्त करता है ।
इन मंत्रों को प्रग्राह विधि से पढ़ना चाहिये । जैसे वृषा-
कपि । क्योंकि इनका भी वृषाकपि का सा रूप है । जो नियम
वृषाकपि के पढ़ने में होना चाहिये वह इसमें भी । इनमें
न्यूंख नहीं होना चाहिये । निनाद होना चाहिये । यही उनका
न्यूंख है ।
यह “कारव्या मंत्रों” (अथर्व० २०।१२७।११-१४) को पढ़ता
है । देवों ने जो कोई कल्याण कर्म किया वह कारव्या के द्वारा
किया । इसी प्रकार यजमान भी जो कुछ कल्याण कर्म करते हैं
वह व्याख्या के द्वारा करते हैं ।
इनको भी प्रग्राह की विधि से पढ़ना चाहिये । जैसे वृषा-
कपि मंत्र पढ़े जाते हैं । जो वृषाकपि का रूप है । वह इनका
रूप है । इसलिये जो नियम वृषाकपि के हैं वही इनके भी
होने चाहिये । इनमें न्यूंख नहीं होता, निनाद होता है । यही
इनका न्यूंख है ।
अब वह “दिशांकॢप्ती” (अथर्व २०।१२८।१-५) मंत्रों को
पढ़ता है । क्योंकि वह इस प्रकार दिशाओं को बनाता है ।
ऐसे पाँच मंत्र पढ़ता है । पाँच दिशाएँ हैं । चार पूर्व, पश्चिम,
उत्तर, दक्षिण, और एक उनके ऊपर । इनमें न न्यूंख होता है,
न निनाद । वह सोच कर कि मैं इन दिशाओं को बिगाड़ूँ नहीं
(न्यूंख यानि) वह आधा आधा मंत्र करके पढ़ता है ।
प्रतिष्ठा के लिये 'जनकल्प' मंत्रों (अथर्व० २०।१२८।६ ११)
को पढ़ता है । प्रजा जनकल्प है । ऊपर की रीति से दिशा बना
कर वह उनमें प्रजा को रखता है । इनमें न्यूंख नहीं होता, न
निनाद होता है । यह सोच कर कि मैं प्रजा को न बिगाड़ूँ, वह
आधी आधी ऋचा करके पढ़ता है ।
पाँचवाँ अध्याय ] ४०१
अब इन्द्र-गाथा ( अथर्व० २०।१२८।१२-१६ ) को पढ़ता है ।
इन्द्र-गाथाओं द्वारा देवों ने असुरों को गाकर हरा दिया। इसी
प्रकार इन्द्र-गाथाओं द्वारा यजमान भी अपने वैरियों को हरा
देता है। और उन पर विजय पाता है । इनको प्रतिष्ठा के लिये
आधी आधी ऋचा करके पढ़ता है । ( ६ )
३३—ब्राह्मणाच्छंसी 'ऐतशप्रलाप' पढता है । 'ऐतश' मुनि
था। वह "अग्नेरायुः" ( अर्थात् अग्नि के जीवन ) मंत्रों का
द्रष्टा हुआ । यह वह मंत्र हैं जिनके विषय में लोग कहते हैं कि
यह मंत्र यज्ञ के सब दोषों को दूर कर देते हैं। उसने अपने
पुत्रों से कहा, "प्यारे पुत्रो, मैंने 'अग्नेरायुः' मंत्रों का दर्शन
किया है। मैं उनको तुमसे कहूँगा। मैं जो कुछ कहूँ, तुम अव-
हेलना न करना ।" तब उसने कहना शुरू किया :—"एता अश्वा
आ प्लवन्ते प्रतीपं प्राति सत्वनम्"...(अथर्ववेद २०।१२९।१ )
उसके वंश का अभ्यग्नि नाम का एक व्यक्ति असमय उसके
पास गया और उसके मुँह को बन्द करके कहने लगा, "हमारा
बाप पागल हो गया है।" तब उसके बाप ने कहा, 'जा, कोढ़ी
हो जा, तू ने मेरी वाणी को मार दिया । नहीं तो मैं गाय के
जीवन को सौ साल का और आदमी के जीवन को हजार साल
का कर देता । परन्तु तू ने मुझे रोक दिया । मैं शाप देता हूँ
कि तेरी संतान पापिष्ठ हो जाय ।" इसलिये कहावत है कि
और्वाण गोत्र के ऐतशायनों में अभ्यग्नि लोग बहुत पापी हैं।
कुछ लोग इन ( ऐतशप्रलाप ) को बहुत बढा देते हैं। किसी
को इस बात का निषेध नहीं करना चाहिये । कहना चाहिये कि
जितने चाहें मंत्र पढ़े । क्योंकि ऐतशप्रलाप जीवन है, जो इस
रहस्य को समझता है वह इस प्रकार यजमान के जीवन को
बढ़ा देता है।
ऐतशप्रलाप का यह भी अर्थ है :—यह छन्दों का रस है !
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४०२ [ छठी पञ्चिका
ऐतशप्रलाप के पाठ से छन्दों में रस आ जाता है। उसका यज्ञ
रस युक्त छन्दों वाला हो जाता है। वह सरस छन्दों से
अपना यज्ञ करता है, जो इस रहस्य को समझता है।
ऐतशप्रलाप का यह भी अर्थ है :—यह यज्ञ की त्रुटियों को
दूर करने और यज्ञ को पूर्ण करने के लिये भी है। यह ऐतश-
प्रलाप अक्षिति ( न क्षय होने वाली चीज ) है। इनका पाठ
करने में कहते हैं :—"मेरे यज्ञ में कोई त्रुटि न रहे। मेरा यज्ञ
अक्षय हो।"
यह ऐतशप्रलाप हर पद पर ठहर ठहर कर पढा जाता है,
जैसे निविद पढा जाता है। अन्त के पद में 'ओ३म्' कहते हैं
जैसे निविद् में।
अब वह प्रवह्लिका मन्त्रों ( अथर्ववेद २०।१३३।१-६ ) को
पढ़ता है :—देवों ने असुरों को प्रवह्लिका मन्त्रों से ठंडा करके
हरा दिया ( प्रव हृत्य )। इसी प्रकार यजमान लोग प्रवह्लिका मंत्रों
से शत्रु को ठंडा करके हरा देते हैं। यह आधा आधा मंत्र
करके पढ़ा जाता है, प्रतिष्ठा के लिये।
वह आजिज्ञासेन्या मंत्रों ( अथर्ववेद २०।१३४।१-४ ) को
पढ़ता है। आजिज्ञासेन्या मंत्रों से देवों ने असुरों को पहचान
कर ( आशाय ) पछाड़ लिया लिया। इसी प्रकार यजमान भी
आजिज्ञासेन्या मंत्रों से शत्रुओं को पहचान कर पछाड़ डालते
हैं। वह इनको आधा आधा मंत्र करके पढ़ता है, प्रतिष्ठा के
लिये।
प्रतिराघ ( अथर्ववेद २०।१३५।१-३ ) मंत्रों को पढ़ता है।
प्रतिराघ मंत्रों से देवों ने असुरों में विघ्न डाल कर ( प्रतिराध्य )
उनको हरा दिया। इसी प्रकार यजमान लोग भी प्रतिराध
मंत्रों से शत्रुओं में विघ्न डाल कर उनको परास्त कर देते हैं।
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
पाँचवाँ अध्याय ] ४०३
अतिवाद ( अथर्ववेद २०।१३५।४ ) को पढता है । अति-
वाद से देवों ने असुरों को गाली देकर परास्त कर दिया ।
यजमान भी अतिवाद के द्वारा शत्रुओं को गाली देकर परास्त
कर देते हैं । इसको आधा आधा मन्त्र करके पढ़ता है, प्रतिष्ठा
के लिये । ( ७ )
३४—देवनीथ ( अथर्ववेद २०।१३५।१-१७ (?) ) मन्त्रों को
पढ़ता है । आदित्य लोग और अंगिरस लोग स्वर्ग में जाने के
लिये लड़ पड़े कि हम पहले जायंगे, हम पहले जायँगे । अंगि-
रसों ने मालूम कर लिया कि कल जो हम सोम यज्ञ करने
वाले हैं उससे हम स्वर्ग लोक को पहले पहुँच जायंगे । उन्होंने
अपने में से एक अग्नि नामी को भेजा कि जाकर आदित्यों से
कह दो कि कल जो हम सोम यज्ञ करने वाले हैं उससे हम
स्वर्ग में पहले पहुँच जायंगे ।
आदित्यों ने अग्नि को देखते ही सोम यज्ञ को जान लिया
जिससे वह स्वर्ग को जा सकें । अग्नि ने उनके पास आकर
कहा, "कल हम सोमयज्ञ करने वाले हैं जिससे हम स्वर्ग को
पहुँच जायंगे ।" उन्होंने उत्तर दिया, "हम भी तुम से कहते हैं
कि हम अभी सोम यज्ञ करने वाले हैं जिससे हम स्वर्गलोक
में पहुँच जायंगे । लेकिन तुझको होता बनाकर ही हम स्वर्ग
लोक में पहुँच सकते हैं", वह "अच्छा" कहकर लौट आया ।
और अंगिरसों से यह बात कह कर फिर आदित्यों के पास
लौट आया । उन्होंने पूछा, "तू ने कहा ?" उसने कहा, "हाँ,
मैंने कहा । ये कहने लगे कि क्या तूने हम को वचन नहीं दिया
था । मैंने कहा कि वचन तो दिया था ( लेकिन आदित्यों को
इनकार न कर सका ) क्योंकि जो यज्ञ रोपता है वह यश पाता
है, और जो यज्ञ में विघ्न डालता है वह यश से वंचित हो
जाता है । इसलिये मैंने नहीं रोका । इसलिये यदि कोई यज्ञ
४०४ [ छठी पञ्चिका
का होता बनने से इनकार करे तो केवल दो कारणों से, एक
यह कि वह किसी अन्य यज्ञ में संलग्न हो, दूसरे यह कि वह
यज्ञ के अयोग्य हो। (८)
३५—इसलिये अंगिरसों ने आदित्यों को यज्ञ में मदद दी।
आदित्यों ने अगिरसों को दक्षिणा से पूर्ण पृथिवी दी। परन्तु
जब उन्होंने यह पृथिवी ली तो उसने इनको तपा डाला। इसलिये
उन्होंने उसे फेंक दिया। वह सिंहनी होकर मुँह खोलकर
आदमियों को खाने दौड़ी। पृथिवी की इस जलती हुई दशा
से ऊँचे नीचे गार पड़ गये, पहले यह समतल थी। इसी लिये
कहते हैं कि अस्वीकृत की हुई दक्षिणा को न लेवे। उसे सोचना
चाहिये कि जिस दक्षिणा को अग्नि ने वेध दिया वह मुझे क्यों
न वेधेगी? यदि दक्षिणा ले भी तो उसे शत्रु को दे देवे। वह
हार जायगा क्योंकि यह उसको जला देती है।
यह सूर्य सफेद घोड़ा बन कर काठी और लगाम से युक्त
होकर अन्य आदित्यों के पास आया। उन्होंने कहा, “इसको
आपको (अंगिरसों को) दे देवें।” इस लिये देवनीथ मन्त्र
(जो देवों से ले जाया गया) पढ़े जाते हैं। “हे जरितः
(स्तुति करने वाले), आदित्य, लोग अंगिरा लोगों के पास
दक्षिणा लाये। हे जरितः, वे इसके पास तक न गये”। (अथर्व०
२०।१३५।६) अर्थात् पृथिवी के पास न गये।
“हे जरितः वे उसके पास गये।” अर्थात् उस घोड़े के
पास गये।
“हे जरितः, उन्होंने इसको ग्रहण न किया”, अर्थात् पृथिवी
को।
“उन्होंने उसको ग्रहण किया, हे जरितः”। (अथर्व०
२०।१३५।७) अर्थात् उस घोड़े को।
पाँचवाँ अध्याय ] ४०५
"अहानेतरसं न वि चेतनानि" (अथर्व० २०।१३५।७)
"जब उन्होंने सूर्य को ले लिया तो दिन न रहे", क्योंकि
दिन तो सूर्य से ही बनते हैं ।
"यज्ञानेतरसं पुरोगवामः" (अथर्व० २०।१३५।७)
"जब सूर्य्य चला गया तो लोग बिना नेता के रह गये ।
क्योंकि दक्षिणा यज्ञ की नेता है । जैसे बिना अगुआ बैल के
गाड़ी में गड़बड़ हो जाती है इसी प्रकार बिना दक्षिणा के यज्ञ
में गड़बड़ हो जाती है । इसलिये कहते हैं कि दक्षिणा अवश्य
हो, चाहे थोड़ी ही क्यों न हो ।
उत श्वेतं आशुपत्वा । (अथर्व० २०।१३५।८)
"यह घोड़ा सफेद और जल्दी चलने वाला है" ।
उतो पद्भिर्यविष्ठः । (अथर्व० २०।१३५।८)
"और पैरों का बहुत तेज है" ।
उतेमाशु मानं पिपर्ति (अथर्व० २०।१३५।८)
"वह शीघ्र काम को पूरा करता है" ।
"आदित्या रुद्रा वसवस्तवेनु" (अथर्व वे० २०।१३५।६)
"आदित्य, रुद्र और वसु इसकी स्तुति करते हैं' ।
इदं राधः प्रतिगृह्णीह्यङ्गिरः ।* (अथर्व० २०।१३५।६)
"हे अंगिरा लोगो, इस दक्षिणा को ग्रहण करो" ।
उन्होंने उसको लेने की इच्छा की ।
इदं राधो बृहत्पृथु । (अथर्व० २०।१३५।६)
यह दक्षिणा बहुत बड़ी और विस्तृत है ।
देवा ददत्वासुरं ।
तद्वो अस्तु सुचेतनम् ।
युष्माँ अस्तु दिवे दिवे ।
*कहीं कहीं किञ्चित् पाठभेद है ।
४०६ [छठी पञ्चिका
प्रत्येवगृभायत । (अथर्व० २०।१३५।१०)
"यह जो देवों ने दी है। यह तुम्हारे लिये प्रकाशदायक
हो। तुम्हारे लिये यह प्रति दिन हो। इसको ग्रहण करने के
लिये राज़ी हूजिये"।
इस देवनीथ को पद पद पर ठहर कर पढ़ता है जैसे निविद्
पढ़ा जाता है। इसके अन्त के पद पर 'ओ३म्' कहते हैं जैसे
निविद् के साथ।
अब वह भूतेच्छद मन्त्रों (अथर्व० २०।१३५।११-१३) को
पढ़ता है। इन भूतेच्छद मन्त्रों द्वारा देवों ने युद्ध और माया
(चालाकी) से असुरों को हरा दिया। उन्होंने इन भूतेच्छदों
से असुरों की शक्ति को मंद कर दिया और उनको परास्त कर
दिया। इसी प्रकार यजमान भूतेच्छद मन्त्रों से शत्रुओं की
शक्ति को मंद करके उनको परास्त कर देते हैं। उनको आधा
मन्त्र करके पढ़ते हैं, प्रतिष्ठा के लिये।
अब आहनस्या मन्त्रों को पढ़ता है। आहनस्य अर्थात् उपस्थ
इन्द्रिय से वीर्य निकलता है और वीर्य से सन्तान होती है।
इस प्रकार यजमान के लिये संतान को धारण कराता है। यह
दस मन्त्र हैं। दश अक्षर का विराट् छन्द है। विराट् अन्न
है। अन्न से वीर्य सींचा जाता है। वीर्य से संतान होती है।
इस प्रकार वह संतान को धारण कराता है। उनको न्यूङ्ख की
रीति से पढ़ता है। क्योंकि न्यूङ्ख अन्न है। अन्न से वीर्य
होता है। वीर्य से सन्तान होती है। इस प्रकार यजमान को
सन्तान युक्त करता है।
दधिक्रावन मन्त्र को पढ़ता है :-
दधिक्राव्णो अकारिषम् (अथर्व० २०।१३७।३)
दधिक्रा देवों को पवित्र करने वाला है। क्योंकि उसने
सबसे उत्तम वीर्य वाले शब्द कहे (अथर्व० २०।१३६।१-१०)