ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 406, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ें३९२ [छठी पञ्चिका
जायँगे तो सभी बराबर हो जायँगे । स्वर्ग लोक की विशेषता
यह है कि दुरोहण के साथ अन्य सूक्त न पढ़े जायँ । इस
लिये न पढ़े।' इसीलिये नहीं पढ़ता । स्तोत्रिय आत्मा हैं और
वालखिल्य प्राण हैं । जब अहीन सूक्तों का दुरोहण के साथ
पाठ करता है तो इन दो देवतों के द्वारा यजमान के प्राण ले
लेता है। जब किसी होत्रक को ऐसा करते देखे तो कहे कि
तू ने इन दो देवताओं के द्वारा यजमान के प्राण ले लिये ।
और वह मर जायगा । सदा ऐसा ही होता है । इस लिये
न पढ़े ।
अगर मैत्रावरुण सोचे कि मैंने वालखिल्य का पाठ कर
लिया, अब मैं दुरोहण के पूर्व एकाह सूक्त पढूँ, उसे ऐसा न
करना चाहिये। लेकिन अगर घमंड में आकर कहे कि दुरोहण
के पीछे बहुत सैकड़ों सूक्त पढ लूँ गा तो इस कामना की पूर्ति
के लिये पढ़ ले। परन्तु न पढ़ना अच्छा है। वालखिल्य इन्द्र
के हैं। उनमें बारह अक्षरों के पद होते हैं। और जगती छन्द
के इन्द्र के सूक्त से जो कामना पूरी हो सकती है वह इनसे
भी पूरी हो सकती है ।
न पढने के लिये एक हेतु यह है कि यह इन्द्र-वरुण के
सूक्त हैं। और इन्द्र-वरुण के याज्य से ही यज्ञ की समाप्ति
होती हैं।
कहते हैं कि जैसा स्तोत्र हो वैसा शस्त्र हो । प्रश्न यह है
कि क्या विहार युक्त (मिले हुये) वालखिल्यों की गणना
ऐसे स्तोत्रों में है या बिना मिले हुये (अविहृत) की ? इसका
उत्तर है कि विहृत सूक्तों की है । बारह अक्षरों का पद आठ
अक्षरों के पद से मिल जाता है ।
कहते हैं कि जैसा याज्य हो वैसा शस्त्र हो । अगर शस्त्र में
तीन देवता हों अर्थात् अग्नि, इन्द्र और वरुण तो केवल इन्द्र-