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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 403, कुल 592 में से

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पृष्ठ 403

चौथा अध्याय ] ३८९
दोनों सवनों में स्तोमों में नियत मंत्रों से एक या दो से
अधिक न बोले। अधिक बोलने से बड़े वन के समान हो जाता
है, तीसरे सवन में अपरिमित बोले क्योंकि स्वर्ग अपरिमित
है। स्वर्ग लोक की प्राप्ति के लिये।
जो इस रहस्य को समझता है उसका अहीन यज्ञ आरंभ
होकर विना विघ्न के समाप्त होता है। (७)
२४—देवों ने वल ( कन्दरा ) में गायों को देखा। उन्होंने
यज्ञ के द्वारा उनको लेना चाहा। छठे दिन के द्वारा उन्होंने
इनको पा लिया। पहले सवन में नभाक ( खोदने का कुदाल )
द्वारा वल खोदा। फिर जब छिद्र हो गया तो पत्थरों को हटाया
और तीसरे सवन में वालखिल्य मंत्रों रूपी वज्र द्वारा 'वाचः
कूट' नामी एक पद से वल को तोड़ लिया और गायों को
निकाल लिया।
इस प्रकार यजमान प्रातः सवन में नभाक द्वारा वल को
तोड़ते हैं और उसके पत्थरों को ढीला कर लेते हैं। इसी लिये
होत्रक लोग प्रातः सवन में नाभाक तृचों को पढ़ते हैं। मैत्रा-
वरुण “यः ककुभो निधारयः” ( ८।४१।४-६ ) को, ब्राह्मणाच्छंसी
“पूर्वीष्ट इंद्रोपमातयः” ( ८।४०।६-११ ) को अच्छावाक “ताहि
मध्यं भराणा” ( ८।४०।३-५ ) को। तीसरे सवन में वालखिल्य
वज्र से और “वाचः कूट” एक पद द्वारा वल को खोद कर
गायों को पालते हैं। वालखिल्य सूक्त छः हैं। उनको तीन बारी
में पढ़ते हैं। पहले यह पद करके, फिर आधी आधी ऋचा
करके, फिर ऋचा वार ।
जब पद पद करके पढ़ता है तो हर प्रगाथ में एक पद
रखे। इस प्रकार के एक पद पाँच हैं। चार दशाह से लिये हैं
और एक महाव्रत से ।